माँ का आज देहांत हो गया या शायद कल हुआ हो; कह नहीं सकता। आश्रम से आए तार में लिखा है—“आपकी माँ चल बसी, अंतिम संस्कार कल। गहरी सहानुभूति”, इससे कुछ पता नहीं चलता, हो सकता है यह कल हुआ हो। वृद्धाश्रम मोरेंगो में हैं; अल्जीयर्स से तक़रीबन पचास मील दूर, दो बजे की बस से मैं रात घिरने से पहले पहुँच जाऊँगा, फिर रात वहाँ गुज़ार सकता हूँ—अर्थी के पास रतजगे की रस्म के लिए...। फिर कल शाम तक वापस, मैंने अपने मालिक से दो दिन की छुट्टी की बात कर ली है; ज़ाहिर है ऐसे हालात में वह मना नहीं कर सकता था। फिर भी लगा मानो ग़ुस्से में है। मैंने बग़ैर सोचे ही कह दिया “सॉरी सर, आप जानते हैं, इसमें मेरा कोई क़सूर नहीं है।” बाद में लगा, मुझे ऐसा कहने की ज़रूरत न थी, माफ़ी माँगने की तो कोई वजह ही न थी; दरअसल उसे मुझसे सहानुभूति दिखानी चाहिए थी। परसों जब मैं काले कपड़ों में दफ़्तर लौटू तो शायद वह ऐसा करेगा, अभी तक तो ख़ुद मुझे ही नहीं लग रहा कि माँ वाक़ई नहीं रही, शायद अंत्येष्टि के बाद यक़ीन हो जाएगा। मैंने दो बजे की बस पकड़ी—चिलचिलाती दुपहरी थी। हमेशा की तरह मैं सेलेस्टे के रेस्तरां में खाने के लिए उतरा। सभी...