मेरी आयु उन दिनों चौबीस वर्ष की थी। पतझड़ का मौसम था। सागर तट की एक आरामगाह में मेरी भेंट उस लड़की से हुई। यह प्यार की शुरुआत थी। उस लड़की ने अकस्मात् अपना सिर ऊपर उठाया और फिर अपने चेहरे को किमोनो की आस्तीन के पीछे छिपा दिया। जब मेरा ध्यान उसकी इस हरकत की ओर गया तो मुझे लगा कि मैंने अनजाने ही अपनी पुरानी बुरी आदत को दोहराया होगा? यह सोच कर मैं परेशान हो गया और मेरे चेहरे पर दर्द का अहसास उभर आया। ‘मैं तुम्हारी ओर टकटकी बाँधे देख रहा था। क्यों यही बात है न?’ ‘हाँ, किंतु यह बुरी नज़र नहीं थी।’ उसकी आवाज़ कोमल थी और उसके शब्द स्वाभाविक थे। मैंने स्वयं को हलका-सा महसूस किया। ‘किंतु मेरे इस प्रकार घूरने से तुम्हें कष्ट हुआ होगा?’ ‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं—तुम चिंता मत करो।’ उसने अपने किमोनो की आस्तीन चेहरे से हटा ली। उसके हाव-भाव से लगता था कि उसे अपना चेहरा दिखाने में शर्म महसूस हो रही है। मैंने अपनी गर्दन घुमा ली और समुद्र की ओर देखने लगा। अपने निकट बैठे लोगों की ओर घूर-घूर कर देखने की मेरी-पुरानी आदत है। मैंने अनेक बार अपनी इस आदत छुटकारा पाने के बारे में सोचा था, किंतु अपने आसपास के...