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धूप का टुकड़ा (कहानी) | Dhoop Ka Tukaraa : यासुनारी कवाबाता

मेरी आयु उन दिनों चौबीस वर्ष की थी। पतझड़ का मौसम था। सागर तट की एक आरामगाह में मेरी भेंट उस लड़की से हुई। यह प्यार की शुरुआत थी। उस लड़की ने अकस्मात् अपना सिर ऊपर उठाया और फिर अपने चेहरे को किमोनो की आस्तीन के पीछे छिपा दिया। जब मेरा ध्यान उसकी इस हरकत की ओर गया तो मुझे लगा कि मैंने अनजाने ही अपनी पुरानी बुरी आदत को दोहराया होगा? यह सोच कर मैं परेशान हो गया और मेरे चेहरे पर दर्द का अहसास उभर आया। ‘मैं तुम्हारी ओर टकटकी बाँधे देख रहा था। क्यों यही बात है न?’ ‘हाँ, किंतु यह बुरी नज़र नहीं थी।’ उसकी आवाज़ कोमल थी और उसके शब्द स्वाभाविक थे। मैंने स्वयं को हलका-सा महसूस किया। ‘किंतु मेरे इस प्रकार घूरने से तुम्हें कष्ट हुआ होगा?’ ‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं—तुम चिंता मत करो।’ उसने अपने किमोनो की आस्तीन चेहरे से हटा ली। उसके हाव-भाव से लगता था कि उसे अपना चेहरा दिखाने में शर्म महसूस हो रही है। मैंने अपनी गर्दन घुमा ली और समुद्र की ओर देखने लगा। अपने निकट बैठे लोगों की ओर घूर-घूर कर देखने की मेरी-पुरानी आदत है। मैंने अनेक बार अपनी इस आदत छुटकारा पाने के बारे में सोचा था, किंतु अपने आसपास के...

ईज़ू नर्तकी (कहानी) | Eezoo Nartakee : यासुनारी कवाबाता

जैसे ही सड़क दर्रे की तरफ़ मोड़ लेने वाली थी कि पहाड़ी की तलहटी से बारिश का एक झपेटा देवदार के वन को सफ़ेद करता हुआ मेरी तरफ़ आया। मैं उन्नीस साल का था और ईजू प्रायद्वीप की यात्रा अकेले कर रहा था। मैंने एक विद्यार्थी के से ही कपड़े पहन रखे थे। गहरे रंग का किमोन, लकड़ी की ऊँची खड़ाऊँ, स्कूली टोपी और कंधे से लटकता किताबी बस्ता। तीन रातें मैंने प्रायद्वीप के मध्य भाग के निकटवर्ती गरम पानी के स्रोतों के पास बिताई थी। टोकियो से आए आज चौथा दिन था और मैं आमामी दर्रे की चढ़ाई तय करता दक्षिणी ईजू की तरफ़ बढ़ रहा था। शरत का दृश्य लुभावना था, एक पर एक उठती पर्वत शृंखलाएँ, वन-प्रांतर, गहरी घाटियाँ, किंतु यह दृश्य उतना नहीं, जितना कि मुझे एक अन्य प्रत्याशा अधिक प्रोत्साहित कर रही थी। बारिश की बड़ी-बड़ी बूँदें पड़ने लगीं। मैंने दौड़कर सामने की खड़ी चढ़ाई वाली घुमावदार सड़क पार की। ऊपर, दर्रे के मुहाने पर एक चाय की दुकान थी। भाग्य का चमत्कार नहीं तो और क्या कहूँ? नाटक मंडली वहाँ विश्राम कर रही थी। जिस गद्दी पर वह छोटी नर्तकी बैठी थी, उसे उठाकर, उसने विनम्रतापूर्वक मेरी ओर बढ़ा दिया। मूर्ख की तरह 'अच...