दो भाई थे। उनके नाम नहीं बताऊँगा। मेरे स्कूल के दिनों के साथी थे। दोनों से ही अच्छा मेल-जोल था। परंतु कई वर्ष तक मेल-मुलाक़ात न हो सकी और संपर्क टूट गया। कुछ महीने पहले सुना कि उनमें से एक बहुत बीमार है। मैं अपने गाँव लौट रहा था, सोचा रास्ते में उन लोगों के यहाँ भी होता चलूँ। उनके घर गया तो एक ही भाई से मुलाकात हुई। उसने बताया कि छोटा भाई बीमार था।मित्र ने कहा, “तुम्हारे दिल में कितना स्नेह है। हम लोगों का ख़याल कर इतनी दूर से मिलने के लिए आए हो। अब छोटे भाई की तबीयत ठीक है। उसे सरकारी नौकरी मिल गई है, वहीं गया है।” बड़े भाई ने हँसते-हँसते दो मोटी-मोटी जिल्दों में लिखी डायरी मुझे दिखाई और बोला कि अगर कोई इस डायरी को पढ़ ले तो भाई की बीमारी का रहस्य समझ जाएगा और अपने पुराने दोस्त को दिखा देने में हर्ज़ भी क्या है। मैं डायरी ले आया और उसे पढ़ डाला। समझ गया कि बेचारा नौजवान अजीब आतंक और मानसिक यंत्रणा से पीड़ित था। लिखावट बहुत उलझी-उलझी और असंबद्ध थी। कुछ बेसिरपैर के आरोप भी थे। पृष्ठों पर तारीखें नहीं थीं। जगह-जगह स्याही के रंग और लिखावट के अंतर से अनुमान हो सकता था कि ये जब-तब आगे-पीछे ...