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छोटी सी डोरी (कहानी) | Chhotee See Doree : गी द मोपासाँ

बाज़ार का दिन होने के कारण गॉदवेल से शहर की ओर जाने वाली सारी सड़कों पर हलचल थी। किसान अपनी पत्नियों के साथ उमड़ पड़े थे। सारे मर्द सरक-सरक कर ही चल पा रहे थे, क्योंकि एक तो वे हल चला-चला कर बुर तरह थक चुके थे, दूसरे गेहूँ की कटाई करने के कारण उनके हाथ की काँख भी भर आई थी। थकान के मारे चूर हो चुके इन मर्दों का सीधे खड़े हो पाना भी मुश्किल हो गया था। लेकिन हाँ, उनके नीले कलफ़दार कुर्ते ज़रूर चकाचक लग रहे थे। उन कुर्तों के गले और कलाइयों पर छोटी-छोटी सफ़ेद डिज़ाइन बनी हुई थीं। मगर ये कपड़े उनके टांटिया शरीर पर ऐसे लग रहे थे, जैसे कोई ग़ुब्बारा उड़ने की तैयारी में हो और उसमें से आदमी के हाथ, पैर और सिर लटक रहे हों। कुछ लोग गाय या बछड़े को रस्सी से बाँध कर चल रहे थे। उनकी बीवियाँ जानवरों के पुट्ठों पर पेड़ की टहनी से बने हंटर फटकारते हुए पीछे-पीछे चल रहीं थीं। उनके हाथों में डलिया लटकी हुई थीं, जिनमें से मुर्गे या बत्तख अपनी चोंच बाहर निकाल रहे थे। इन महिलाओं की चाल पुरुषों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा तेज़ थी। अपने सपाट सीने पर उन्होंने छोटा-सा शाल ओढ़ रखा था। सिर पर सफ़ेद कपड़ा लपेट कर उस प...