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चरवाहे की औरत (कहानी) | Charavaahe Ki Aurat : हेनरी लॉसन

दो कमरों का घर गोल लट्ठों, तख़्तों और पेड़ की छाल से गूँथी गई रस्सियों से बना है। फ़र्श की जगह अंदर चिरे हुए तख़्ते बिछे हैं। घर के एक सिरे पर बना रसोईघर और उसके सामने बना बरामदा आकार में उस घर से भी कहीं बड़े हैं। चारों तरफ़, जहाँ तक नज़र जाती है, एकसार झाड़ियाँ फैली हैं। ज़मीन बिल्कुल सपाट है, उसमें कहीं कोई उतार-चढ़ाव नहीं। कहीं क्षितिज के पार दिखती पहाड़ियों की झलक तक नहीं। दूर तक फैली वे एक-सी बौनी झाड़ियाँ सड़े हुए जंगली बेरनुमा सेबों की हैं। नीचे न घास, न किसी और पौधे का नामोनिशान। संकरे, लगभग सूखे घाटीनुमा मोड़ पर आहें भरते इक्का-दुक्का शीओक के अपेक्षाकृत हरे पेड़ों को छोड़कर ओने-कोने तक यहाँ कोई चीज़ नहीं जिस पर नज़र ठहर सके। सभ्यता के आख़िरी अवशेष से भी उन्नीस मील आगे मुख्य सड़क के किनारे खड़ा है यह झुग्गीनुमा घर। इस ज़मीन के प्रारम्भिक बाशिंदों में से एक, वह चरवाहा अपनी भेड़ों के साथ कहीं दूर भटक रहा है। उसकी औरत और बच्चे यहाँ घर में अकेले हैं। चार मैले चीकट, कुम्हलाए हुए बच्चे घर के नज़दीक खेल रहे हैं। अचानक उनमें से एक चिल्लाता है, “साँप, साँप! वहाँ साँप है माँ...” एक ...