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सरहपा के पद : Sarhapa Ke Pad

सरहपा (सरहपाद) 8वीं शताब्दी के प्रमुख वज्रयानी सिद्ध और सहजिया परंपरा के आरंभिक कवियों में माने जाते हैं। उनका संबंध नालंदा, बिहार से माना जाता है। वे बौद्ध सिद्ध परंपरा के उन संत कवियों में थे, जिन्होंने बाहरी आडंबर और कर्मकांड के बजाय सहज साधना, आत्मबोध और गुरु के महत्व पर जोर दिया। उनकी रचनाएँ अपभ्रंश और प्राचीन लोकभाषा के निकट भाषा में मिलती हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य की आरंभिक काव्यधारा के विकास में महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके पदों में सहज जीवन, साधना और रूढ़ धार्मिक मान्यताओं पर तीखा व्यंग्य दिखाई देता है।

जहि मण पवण ण संचरइ

जहि मण पवण ण संचरइ, रवि−ससि णाहिं पवेस॥
तहि बढ चित्त विसाम करु, सरहें कहिअ उएस॥
एक्क करु मा वेण्णि करुख मा करु विण्णि विसेस।
एक्कें रंगे रञ्जआ, तिहुअण सअलासेस॥
आइ ण अंत ण मज्झ तहिंख णउ भव णउ णिव्वाण।
एहु सो परममहासुह, णउ पर णउ अप्पाण॥


अरे बढ़ सहज गइ पर रज्जह

अरे बढ़ सहज गइ पर रज्जह।
मा भव−गंध−बंध पहिबज्जह॥
एहु निअ मण सबल चातर स चल।
मेलहिं सहाव ट्ठाअ वसइ दोस−णिम्मल॥
जब्बें मण अत्थमणु जाइ, तणु तुट्टइ बंधण।
तब्बें सम रसहि मज्झे, णउ सुद्द ण बाम्हण॥


देक्खउ सुणउ पईसउ साद्दउ

देक्खउ सुणउ पईसउ साद्दउ। जिघ्घउ भमउ बईसउ उट्ठउ॥
आलमाल बवहारें बोल्लउ। मण च्छडु एकाअरे म्म चलउ॥
चित्ताचित्त वि परिहरहु, तिम अच्छहु जिम बाल।
गुरु−बअणें दिढ भत्ति करु, होइहइ सहज उल्लाल॥
आग्गे आच्छअ बाहिरे आच्छअ। पइ देक्खअ पडवेसी पुच्छअ॥
सरह भणइ बढ जाणहु अप्पा। णउ सो धेअ ण धारण जापा॥
विसअ रमन्ते ण विसअहिं लिप्पइ। उअल हरन्तें ण पाणी च्छप्पइ॥
एमइ जोइ मूल सगत्तो। विसअण बाज्झइ विसअ रमंतो॥

एथु से सरसइ सोवणाह

एथु से सरसइ सोवणाह, एथु से गडगासाअरु।
वाराणसि पअग एथु, से चान्द−दिवाअरु॥
खेत्त् पिट्ट उअपअट्ठ, एथु मइ भमिअसमिट्ठउ।
देहासरिसत तित्थ, मइ सुणउ ण दिट्ठउ॥
सरु पुडअणि दुल कमल, गन्ध−केसर वर णालें।
च्छाडहु वेण्णिमा करहु से, मा लाग्गहु बढ आलें॥


जहि म्मण मरइ

जहि म्मण मरइ, पवणहो तहि खअ जाइ।
एहु सो परममहासुह, सरह कहिहए जाइ॥


मन्त ण तन्त ण धेअ ण धारण

मंत ण तंत ण धेअ ण धारण।
सव्ववि रे बढ़ वि (ब्) भम−कारण॥
असमल चीअ म झाणें खरडह।
सुह अच्छंतें म अप्पण झगडह॥
गुरु−वअण−अमिअ−रस, धवहि ण पिविअउ जहिं।
बहुत सात्यात्य−मरुत्थलिहिं, तिसिअ मरिब्बो त्तेहिं॥



षट् दर्शन−खंडन

(1) ब्राह्मण—
ये ब्राह्मण बिना ज्ञान के चारों वेद पढ़ते हैं। ये लोग वेद के भेद (रहस्य) तक को नहीं जानते। मिट्टी, पानी, हरी दूब सामने रखकर तथा अग्नि प्रज्वलित कर पूजा करने बैठ जाते हैं। अर्थात् ये लोग मात्र दिखावा करते हैं। ये लोग बिना मतलब के अग्नि में हवन−सामग्री जलाते हैं तथा उससे उत्पन्न धुएँ से आँखों से आँसू बहाए जाते हैं। कभी ये एक दंड पर खड़े होते हैं तो कभी ये तीन दंड पर खड़े होते हैं। भगवा वेश इनका आभूषण है। अपने को विद्वान समझ हंस को उपदेश देते हैं यानी बगुला भगत बनकर हंसों को उपदेश देते हैं। अर्थात् ज्ञानी बनकर जन−साधारण को उपदेश देकर ठगते हैं। वे धर्म−अधर्म की तुलना करना नहीं जानते, इसी कारण बाहरी भूल−भुलैया में रमे हुए हैं। अर्थात् व्यर्थ के कार्यों में लगे हुए हैं। आत्म−ज्ञान से विरल हो भौतिकता में लीन हैं।
(2) पाशुपत—
शैव−धर्म को मानने वाले ये साधु शरीर में राख लपेटे रहते हैं तथा सिर पर लंबी जटा धारण किए रहते हैं। घर में बैठकर दीपक जलाते हैं तथा घर के एक कोने में बैठ कर घंटी बजाते हैं, आँखों को बंद कर आसन लगाकर बैठते हैं तथा भोली जनता को ठगने हेतु कान में फुसफुसाकर बातें करते हैं। वनवासी तथा मुंडधारी आदि अन्य भेष धारण करके दक्षिणा मांगते हुए परिभ्रमण करते हुए दिखाई पड़ते हैं।
(3) जैन—
बड़े−बड़े नाख़ून वाले तथा मलिन वेशधारी ये साधु नंगे रहते हैं तथा नंगे होकर संपूर्ण शरीर के बाल उखड़वाते हैं। क्षपणक का ज्ञान इनके वेश को सुसज्जित करता है। इस वेश में इन्हें अंदर और बाहर मोक्ष ही मोक्ष दिखाई पड़ता है। इसी उद्देश्य से वे श्रमणक का वेश धारण करते हैं। यदि नंगेपन से मोक्ष प्राप्त होता तो कुत्ते और सियार को अवश्य ही मोक्ष प्राप्त हो जाता। शरीर के बालों को उखाड़ने पर यदि सिद्धि प्राप्त हो जाए तो रोम रहित नितंबों वाली युवतियों को तो सहज ही मोक्ष प्राप्त हो जाना चाहिए। यदि मोर पंखों से मोक्ष दिखाई देता है तो उन चर्मकारों और मोरों को भी मोक्ष प्राप्त हो जाना चाहिए जो पशुओं का चमड़ा व रोम उतारा करते हैं तथा पक्षी अपने पंखों को स्वयं उतारा करते हैं। जूठन खाने से यदि ज्ञान प्राप्त हो जाए तो घोड़े भी ज्ञान प्राप्त कर लेंगे, परंतु ऐसा नहीं होता। सरहपा कहते हैं कि श्रमणकों का ऐसा मोक्ष मुझको बिल्कुल रुचिकर नहीं लगता। भोजन तत्व से रहित काया में कोई जान नहीं होती फिर भी ये साधु साधना में लीन होते हैं।
(4) बौद्ध—
उसके ज्ञान को कोई नहीं जानता, कोई गगन−मंडल में आसक्त है क्योंकि वे सहजता का छोड़कर निर्वाण की प्राप्ति हेतु कठिन मार्ग का अनुसरण करते हैं, परमार्थ की चिंता छोड़, सिर्फ़ वे स्वयं पर ध्यान देते हैं। अपना हित साधते हैं। वे जैसे हैं, वैसे में ही संतुष्ट हैं, मोक्ष की प्राप्ति हेतु ध्यान में लीन होते हैं। दीप और नैवेद्य से क्या होगा तथा वहाँ मंत्र भी क्या करेगा? वे तप करने घनघोर जंगल में जाते हैं, मोक्ष क्या जल में नहाने से प्राप्त होता है? ओ पाखंडियो! मिथ्या प्रपंच को छोड़ दो और जो तुम में मूढ़ता व्याप्त है, उसे त्याग दो। जो नेत्रहीन हैं, जो देख नहीं सकते वे भी गुरु के वरदान से आँख वाले हो जाते हैं अर्थात् वह दिव्य दृष्टि तो गुरु के चरणों की सेवा से ही प्राप्त होती है। यदि उसने गुरु की वाणी को हृदय में बिठा लिया तो निश्चित रूप से वह स्वावलंबी अर्थात् आत्मनिर्भर होकर सही दिशा को प्राप्त कर लेता है।

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