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जो देखकर भी नहीं देखते – हेलेन केलर हिंदी निबंध | Jo Dekhakar Bhee Naheen Dekhate

कभी-कभी मैं अपने मित्रों की परीक्षा लेती हूँ, यह परखने के लिए कि वह क्या देखते हैं। हाल ही में मेरी एक प्रिय मित्र जंगल की सैर करने के बाद वापस लौटीं। मैंने उनसे पूछा, “आपने क्या-क्या देखा?”



“कुछ ख़ास तो नहीं,” उनका जवाब था। मुझे बहुत अचरज नहीं हुआ क्योंकि मैं अब इस तरह के उत्तरों की आदी हो चुकी हूँ। मेरा विश्वास है कि जिन लोगों की आँखें होती हैं, वे बहुत कम देखते हैं।



क्या यह संभव है कि भला कोई जंगल में घंटाभर घूमे और फिर भी कोई विशेष चीज़ न देखे? मुझे—जिसे कुछ भी दिखाई नहीं देता—सैकड़ों रोचक चीज़ें मिलती हैं, जिन्हें मैं छूकर पहचान लेती हूँ। मैं भोज—पत्र के पेड़ की चिकनी छाल और चीड़ की खुरदरी छाल को स्पर्श से पहचान लेती हूँ। वसंत के दौरान मैं टहनियों में नई कलियाँ खोजती हूँ। मुझे फूलों की पंखुड़ियों की मखमली सतह छूने और उनकी घुमावदार बनावट महसूस करने में अपार आनंद मिलता है। इस दौरान मुझे प्रकृति के जादू का कुछ अहसास होता है। कभी, जब मैं ख़ुशनसीब होती हूँ, तो टहनी पर हाथ रखते ही किसी चिड़िया के मधुर स्वर कानों में गूँजने लगते हैं। अपनी अँगुलियों के बीच झरने के पानी को बहते हुए महसूस कर मैं आनंदित हो उठती हूँ। मुझे चीड़ की फैली पत्तियाँ या घास का मैदान किसी भी महँगे कालीन से अधिक प्रिय है। बदलते हुए मौसम का समाँ मेरे जीवन में एक नया रंग और ख़ुशियाँ भर जाता है।



कभी-कभी मेरा दिल इन सब चीज़ों को देखने के लिए मचल उठता है। अगर मुझे इन चीज़ों को सिर्फ़ छूने भर से इतनी ख़ुशी मिलती है, तो उनकी सुंदरता देखकर तो मेरा मन मुग्ध ही हो जाएगा। परंतु, जिन लोगों की आँखें हैं, वे सचमुच बहुत कम देखते हैं। इस दुनिया के अलग-अलग सुंदर रंग उनकी संवेदना को नहीं छूते। मनुष्य अपनी क्षमताओं की कभी क़दर नहीं करता। वह हमेशा उस चीज़ की आस लगाए रहता है जो उसके पास नहीं है।



यह कितने दुख की बात है कि दृष्टि के आशीर्वाद को लोग एक साधारण सी चीज़ समझते हैं, जबकि इस नियामत से ज़िंदगी को ख़ुशियों के इंद्रधनुषी रंगों से हरा-भरा किया जा सकता है।

प्रेमचंद के फटे जूते – हरिशंकर परसाई हिंदी निबंध | Premachand Ke Phate Joote

प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं। सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुर्ता और धोती पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियाँ उभर आई हैं, पर घनी मूँछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं।



पाँवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बँधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं।



दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।



मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है। सोचता हूँ—फ़ोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी—इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है।



मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अँगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अँगुली ढक सकती है? मगर फिर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाही, बड़ा विश्वास है! फ़ोटोग्राफ़र ने जब 'रेडी-प्लीज़' कहा होगा, तब परंपरा के अनुसार तुमने मुस्कान लाने की कोशिश की होगी, दर्द के गहरे कुएँ के तल में कहीं पड़ी मुस्कान को धीरे-धीरे खींचकर ऊपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही 'क्लिक' करके फ़ोटोग्राफ़र ने 'थैंक यू' कह दिया होगा। विचित्र है यह अधूरी मुस्कान। यह मुस्कान नहीं, इसमें उपहास है, व्यंग्य है!



यह कैसा आदमी है, जो ख़ुद तो फटे जूते पहने फ़ोटो खिंचा रहा है, पर किसी पर हँस भी रहा है!



फ़ोटो ही खिंचाना था, तो ठीक जूते पहन लेते, या न खिंचाते। फ़ोटो न खिंचाने से क्या बिगड़ता था। शायद पत्नी का आग्रह रहा हो और तुम, 'अच्छा, चल भई' कहकर बैठ गए होंगे। मगर यह कितनी बड़ी 'ट्रेजडी' है कि आदमी के पास फ़ोटो खिंचाने को भी जूता न हो। मैं तुम्हारी यह फ़ोटो देखते-देखते, तुम्हारे क्लेश को अपने भीतर महसूस करके जैसे रो पड़ना चाहता हूँ, मगर तुम्हारी आँखों का यह तीखा दर्द भरा व्यंग्य मुझे एकदम रोक देता है।



तुम फ़ोटो का महत्व नहीं समझते। समझते होते, तो किसी से फ़ोटो खिंचाने के लिए जूते माँग लेते। लोग तो माँगे के कोट से वर-दिखाई करते हैं। और माँगे की मोटर से बारात निकालते हैं। फ़ोटो खिंचाने के लिए तो बीवी तक माँग ली जाती है, तुमसे जूते ही माँगते नहीं बने! तुम फ़ोटो का महत्व नहीं जानते। लोग तो इत्र चुपड़कर फ़ोटो खिंचाते हैं जिससे फ़ोटो में ख़ुशबू आ जाए! गंदे-से-गंदे आदमी की फ़ोटो भी ख़ुशबू देती है।



टोपी आठ आने में मिल जाती है और जूते उस ज़माने में भी पाँच रुपए से कम में क्या मिलते होंगे। जूता हमेशा टोपी से क़ीमती रहा है। अब तो जूते की क़ीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। तुम भी जूते और टोपी के आनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे। यह विडंबना मुझे इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं चुभी, जितनी आज चुभ रही है, जब मैं तुम्हारा फटा जूता देख रहा हूँ। तुम महान कथाकार, उपन्यास-सम्राट, युग प्रवर्तक, जाने क्या-क्या कहलाते थे, मगर फ़ोटो में भी तुम्हारा जूता फटा हुआ है!



मेरा जूता भी कोई अच्छा नहीं है। यों ऊपर से अच्छा दिखता है। अँगुली बाहर नहीं निकलती, पर अँगूठे के नीचे तला फट गया है। अँगूठा ज़मीन से घिसता है और पैनी मिट्टी पर कभी रगड़ खाकर लहूलुहान भी हो जाता है। पूरा तला गिर जाएगा, पूरा पंजा छिल जाएगा, मगर अँगुली बाहर नहीं दिखेगी। तुम्हारी अँगुली दिखती है, पर पाँव सुरक्षित है। मेरी अँगुली ढँकी है, पर पंजा नीचे घिस रहा है। तुम पर्दे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम पर्दे पर क़ुर्बान हो रहे हैं!



तुम फटा जूता बड़े ठाठ से पहने हो! मैं ऐसे नहीं पहन सकता। फ़ोटो तो ज़िंदगी भर इस तरह नहीं खिंचाऊँ, चाहे कोई जीवनी बिना फ़ोटो के ही छाप दे।



तुम्हारी यह व्यंग्य-मुस्कान मेरे हौसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौन सी मुस्कान है यह?



—क्या होरी का गोदान हो गया?



—क्या पूस की रात में नीलगाय हलकू का खेत चर गई?



—क्या सुजान भगत का लड़का मर गया; क्योंकि डॉक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते?



नहीं, मुझे लगता है माधो औरत के कफ़न के चंदे की शराब पी गया। वही मुस्कान मालूम होती है।



मैं तुम्हारा जूता फिर देखता हूँ। कैसे फट गया यह, मेरी जनता के लेखक?



क्या बहुत चक्कर काटते रहे?



क्या बनिये के तग़ादे से बचने के लिए मील-दो मील का चक्कर लगाकर घर लौटते रहे?



चक्कर लगाने से जूता फटता नहीं है, घिस जाता है। कुंभनदास का जूता भी फतेहपुर सीकरी जाने-आने में घिस गया था। उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने कहा—'आवत जात पन्हैया घिस गई, बिसर गयो हरि नाम।'



और ऐसे बुलाकर देने वालों के लिए कहा था—'जिनके देखे दु:ख उपजत है, तिनको करबो परै सलाम!'



चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?



मुझे लगता है, तुम किसी सख़्त चीज़ को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज़ जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आज़माया।



तुम उसे बचाकर, उसके बग़ल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियाँ पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।



तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमज़ोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही 'नेम-धरम' वाली कमज़ोरी? 'नेम-धरम' उसकी भी ज़ंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुस्करा रहे हो, उससे लगता है कि शायद 'नेम-धरम' तुम्हारा बंधन नहीं था, तुम्हारी मुक्ति थी!



तुम्हारी यह पाँव की अँगुली मुझे संकेत करती-सी लगती है, जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?



तुम क्या उसकी तरफ़ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते-मारते तुमने जूता फाड़ लिया?



मैं समझता हूँ। तुम्हारी अँगुली का इशारा भी समझता हूँ और यह व्यंग्य-मुस्कान भी समझता हूँ।



तुम मुझ पर या हम सभी पर हँस रहे हो, उन पर जो अँगुली छिपाए और तलुआ घिसाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाज़ू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो—मैंने तो ठोकर मार-मारकर जूता फाड़ लिया, अँगुली बाहर निकल आई, पर पाँव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अँगुली को ढाँकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे?



मैं समझता हूँ। मैं तुम्हारे फटे जूते की बात समझता हूँ, अँगुली का इशारा समझता हूँ, तुम्हारी व्यंग्य-मुस्कान समझता हूँ!

प्रेमचंद के फटे जूते – हरिशंकर परसाई हिंदी निबंध | Premachand Ke Phate Joote

प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फ़ोटो खिंचा रहे हैं। सिर पर किसी मोटे कपड़े की टोपी, कुर्ता और धोती पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियाँ उभर आई हैं, पर घनी मूँछें चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं।



पाँवों में केनवस के जूते हैं, जिनके बंद बेतरतीब बँधे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बंद के सिरों पर की लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बंद डालने में परेशानी होती है। तब बंद कैसे भी कस लिए जाते हैं।



दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अँगुली बाहर निकल आई है।



मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गई है। सोचता हूँ—फ़ोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी—इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फ़ोटो में खिंच जाता है।



मैं चेहरे की तरफ़ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अँगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका ज़रा भी अहसास नहीं है? ज़रा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अँगुली ढक सकती है? मगर फिर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाही, बड़ा विश्वास है! फ़ोटोग्राफ़र ने जब 'रेडी-प्लीज़' कहा होगा, तब परंपरा के अनुसार तुमने मुस्कान लाने की कोशिश की होगी, दर्द के गहरे कुएँ के तल में कहीं पड़ी मुस्कान को धीरे-धीरे खींचकर ऊपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही 'क्लिक' करके फ़ोटोग्राफ़र ने 'थैंक यू' कह दिया होगा। विचित्र है यह अधूरी मुस्कान। यह मुस्कान नहीं, इसमें उपहास है, व्यंग्य है!



यह कैसा आदमी है, जो ख़ुद तो फटे जूते पहने फ़ोटो खिंचा रहा है, पर किसी पर हँस भी रहा है!



फ़ोटो ही खिंचाना था, तो ठीक जूते पहन लेते, या न खिंचाते। फ़ोटो न खिंचाने से क्या बिगड़ता था। शायद पत्नी का आग्रह रहा हो और तुम, 'अच्छा, चल भई' कहकर बैठ गए होंगे। मगर यह कितनी बड़ी 'ट्रेजडी' है कि आदमी के पास फ़ोटो खिंचाने को भी जूता न हो। मैं तुम्हारी यह फ़ोटो देखते-देखते, तुम्हारे क्लेश को अपने भीतर महसूस करके जैसे रो पड़ना चाहता हूँ, मगर तुम्हारी आँखों का यह तीखा दर्द भरा व्यंग्य मुझे एकदम रोक देता है।



तुम फ़ोटो का महत्व नहीं समझते। समझते होते, तो किसी से फ़ोटो खिंचाने के लिए जूते माँग लेते। लोग तो माँगे के कोट से वर-दिखाई करते हैं। और माँगे की मोटर से बारात निकालते हैं। फ़ोटो खिंचाने के लिए तो बीवी तक माँग ली जाती है, तुमसे जूते ही माँगते नहीं बने! तुम फ़ोटो का महत्व नहीं जानते। लोग तो इत्र चुपड़कर फ़ोटो खिंचाते हैं जिससे फ़ोटो में ख़ुशबू आ जाए! गंदे-से-गंदे आदमी की फ़ोटो भी ख़ुशबू देती है।



टोपी आठ आने में मिल जाती है और जूते उस ज़माने में भी पाँच रुपए से कम में क्या मिलते होंगे। जूता हमेशा टोपी से क़ीमती रहा है। अब तो जूते की क़ीमत और बढ़ गई है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। तुम भी जूते और टोपी के आनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे। यह विडंबना मुझे इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं चुभी, जितनी आज चुभ रही है, जब मैं तुम्हारा फटा जूता देख रहा हूँ। तुम महान कथाकार, उपन्यास-सम्राट, युग प्रवर्तक, जाने क्या-क्या कहलाते थे, मगर फ़ोटो में भी तुम्हारा जूता फटा हुआ है!



मेरा जूता भी कोई अच्छा नहीं है। यों ऊपर से अच्छा दिखता है। अँगुली बाहर नहीं निकलती, पर अँगूठे के नीचे तला फट गया है। अँगूठा ज़मीन से घिसता है और पैनी मिट्टी पर कभी रगड़ खाकर लहूलुहान भी हो जाता है। पूरा तला गिर जाएगा, पूरा पंजा छिल जाएगा, मगर अँगुली बाहर नहीं दिखेगी। तुम्हारी अँगुली दिखती है, पर पाँव सुरक्षित है। मेरी अँगुली ढँकी है, पर पंजा नीचे घिस रहा है। तुम पर्दे का महत्त्व ही नहीं जानते, हम पर्दे पर क़ुर्बान हो रहे हैं!



तुम फटा जूता बड़े ठाठ से पहने हो! मैं ऐसे नहीं पहन सकता। फ़ोटो तो ज़िंदगी भर इस तरह नहीं खिंचाऊँ, चाहे कोई जीवनी बिना फ़ोटो के ही छाप दे।



तुम्हारी यह व्यंग्य-मुस्कान मेरे हौसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौन सी मुस्कान है यह?



—क्या होरी का गोदान हो गया?



—क्या पूस की रात में नीलगाय हलकू का खेत चर गई?



—क्या सुजान भगत का लड़का मर गया; क्योंकि डॉक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते?



नहीं, मुझे लगता है माधो औरत के कफ़न के चंदे की शराब पी गया। वही मुस्कान मालूम होती है।



मैं तुम्हारा जूता फिर देखता हूँ। कैसे फट गया यह, मेरी जनता के लेखक?



क्या बहुत चक्कर काटते रहे?



क्या बनिये के तग़ादे से बचने के लिए मील-दो मील का चक्कर लगाकर घर लौटते रहे?



चक्कर लगाने से जूता फटता नहीं है, घिस जाता है। कुंभनदास का जूता भी फतेहपुर सीकरी जाने-आने में घिस गया था। उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने कहा—'आवत जात पन्हैया घिस गई, बिसर गयो हरि नाम।'



और ऐसे बुलाकर देने वालों के लिए कहा था—'जिनके देखे दु:ख उपजत है, तिनको करबो परै सलाम!'



चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?



मुझे लगता है, तुम किसी सख़्त चीज़ को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज़ जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आज़माया।



तुम उसे बचाकर, उसके बग़ल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियाँ पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।



तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमज़ोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही 'नेम-धरम' वाली कमज़ोरी? 'नेम-धरम' उसकी भी ज़ंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुस्करा रहे हो, उससे लगता है कि शायद 'नेम-धरम' तुम्हारा बंधन नहीं था, तुम्हारी मुक्ति थी!



तुम्हारी यह पाँव की अँगुली मुझे संकेत करती-सी लगती है, जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ़ हाथ की नहीं, पाँव की अँगुली से इशारा करते हो?



तुम क्या उसकी तरफ़ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते-मारते तुमने जूता फाड़ लिया?



मैं समझता हूँ। तुम्हारी अँगुली का इशारा भी समझता हूँ और यह व्यंग्य-मुस्कान भी समझता हूँ।



तुम मुझ पर या हम सभी पर हँस रहे हो, उन पर जो अँगुली छिपाए और तलुआ घिसाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाज़ू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो—मैंने तो ठोकर मार-मारकर जूता फाड़ लिया, अँगुली बाहर निकल आई, पर पाँव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अँगुली को ढाँकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे?



मैं समझता हूँ। मैं तुम्हारे फटे जूते की बात समझता हूँ, अँगुली का इशारा समझता हूँ, तुम्हारी व्यंग्य-मुस्कान समझता हूँ!

आम फिर बौरा गए – हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी निबंध | Aam Phir Bauraa Gae

बसंतपंचमी में अभी देर है, पर आम अभी से बौरा गए। हर साल ही मेरी आँखें इन्हें खोजती हैं। बचपन में सुना था कि बसंतपंचमी के पहले अगर आम्रमंजरी दिख जाए तो उसे हथेली पर रगड़ लेना चाहिए। क्योंकि ऐसी हथेली साल भर तक बिच्छू के ज़हर को आसानी से उतार देती है। बचपन में कई बार आम की मंजरी हथेली पर रगड़ी है। अब नहीं रगड़ता। पर बसंतपंचमी से पहले जब कभी आम्रमंजरी दिख जाती है तो बिच्छू की याद अवश्य आ जाती है। सोचता हूँ, आम और बिच्छू में क्या संबंध है? बिच्छू ऐसा प्राणी है जो आदिम सृष्टि के समय जैसा था, आज भी प्रायः वैसा ही है। जल प्रलय के पहले वाली चट्टानों की दरारों में इसका जैसा शरीर पाया गया है, आज भी वैसा ही है। कम जंतु इतने अपरिवर्तनशील रहे होंगे। उधर आम में जितना परिवर्तन हुआ है, उतना बहुत कम वस्तुओं में हुआ होगा। पंडित लोग कहते हैं कि 'आम' शब्द 'अम' या 'अम्ल' शब्द का रूपांतर है। 'अम' अर्थात खट्टा। आम शुरू-शुरू में अपनी खटाई के लिए ही प्रसिद्ध था। वैदिक-आर्य लोगों में इस फल की कोई विशेष क़दर नहीं थी। वहाँ तो 'स्वाद उदुंबरम्' या ज़ायक़ेदार गूलर ही बड़ा फल था। लेकिन 'अमृत' शब्द कुछ इसी 'अम्र' का रूपांतर रहा होगा। पहले शायद सोमरस के खटाए हुए रूप को ही 'अम्रित' (खट्टा बना हुआ) कहते होंगे। बाद में 'आम्र' संसार का सबसे मीठा फल बन गया और 'अम्रित' अमृत बन गया। अपना-अपना भाग्य है। शब्दों के भी भाग्य होते हैं। परंतु यह सब अनुमान ही अनुमान है। सच भी हो सकता है, नहीं भी हो सकता है। पंडितों से कौन लड़ता फिरे। लेकिन बिच्छू के साथ आम का संबंध चक्कर में डाल देने वाला है अवश्य। मैं जब आम की मनोहर मंजरियों को देखता हूँ तब बिच्छू की याद आ जाती हैं, बिच्छू—जो संसार का सबसे पुराना, सबसे खूँसट, सबसे क्रोधी और सबसे दक़ियानूस प्राणी है। प्रायः मोहक वस्तुओं को देखकर मनहूस लोगों की याद आ जाती है। सबको आती है क्या?



ज़रा तुक मिलाइए। आम्रमंजरी मदन-देवता का अमोघ बाण है और बिच्छू मदनविध्वंसी महादेव का अचूक बाण है। योगी ने भोगी को भस्म कर दिया पर भोगी का अस्त्र योगी के अस्त्र को व्यर्थ बना रहा है। कुछ ठिकाना है इस बेतुकेपन का। परंतु सारी दुनिया—यानी बच्चों की दुनिया—इस बात को सच मानती आ रही है।



पर-साल भी मैंने बसंतपंचमी के पहले आम मुकुल देखे थे। पर बड़ी जल्दी वे मुरझा गए। उसी आम को दुबारा फूलना पड़ा। मुझे बड़ा अद्भुत लगा। आगे-आगे क्यों फूलते हो बाबा, ज़रा रुक के ही फूलते। कौन ऐसी यात्रा बिगड़ी जाती थी। मेरे एक मित्र ने कहा था कि मुझे ऐसा लगता है कि नवबधू के समान यह बिचारी आम्रमंजरी ज़रा सा झाँकने बाहर निकली और सामने हमारे जैसे मनहूसों को देखकर लज्जा गई। वस्तुतः यह मेरे मित्र की कल्पना थी। अगर सच होती तो मैं कहीं मुँह दिखाने लायक़ न रहता। पर मुझे इतिहास की बात याद आ गई। उससे मैं आश्वस्त हुआ, मनहूस कहाने की बदनामी से बच गया। वह इतिहास मनोरंजक है। सुनाता हूँ।



बहुत पहले कालिदास ने इसी प्रकार एक बार आम्रमंजरी को सकुचाते देखा था। 'शकुंतला' नाटक में वे उसका कारण बता गए हैं। दुष्यंत पराक्रमी राजा थे। उनके हृदय में एक बार प्रिया-वियोग की विरह ज्वाला जल रही थी, तभी बसंत का पदार्पण हुआ। राजा ने बसंतोत्सव न करने की आज्ञा दी। आम बिचारा बुरी तरह छका। इसका स्वभाव थोड़ा चंचल है। बसंत आया नहीं कि व्याकुल होकर फूल पड़ता है। उस बार भी हज़रत पुलकित हो गए। तब तक राजा की आज्ञा हुई। बेवक़ूफ़ बनना पड़ा। इन मंजरियों के रूप में मदन देवता ने अपना बाण चढ़ाया था। बिचारे अधखिंचे धनुष के बाण समेटने को बाध्य हुए—'शंके संहरति स्मरोऽपि चकितस्तूर्णार्धकृष्टं शरम्। आजकल दुष्यंत जैसे प्रतापी राजा नहीं है। पर पिछली बार भी जब मदन देवता को अपना अर्धकृष्ट शर समेटना ही पड़ा था तो कैसे कहा जाए कि वैसे प्रतापी लोग अब नहीं हैं? ज़रूर कोई-न-कोई पराक्रमी मनुष्य कहीं-न-कहीं विरह ज्वाला में संतप्त हो रहा होगा। कार्य जब है, तो कारण भी होगा ही। इतिहास बदल थोड़े जाएगा। और इस घटना के बाद जब कोई कालिदास को मनहूस नहीं कहता तो मुझे ही क्यों कहेगा?



आशा करता हूँ, इस बार आम्रमंजरी को मुरझाना नहीं पड़ेगा। आहा, कैसा मनोहर कोरक है। बालिहारी है इस 'आताम्रहरित-पाण्डुर' शोभा की। अभी सुगंधित नहीं फैली है, किंतु देर भी नहीं है। कालिदास ने आम्र-कोरकों को बसंत काल का 'जीवित सवैरव’ कहा था। उन दिनों भारतीय लोगों का हृदय अधिक संवेदनशील था। वे सुंदर का सम्मान करना जानते थे। गृहदेवियाँ इस लाल-हरे-पीले आम्र-कोरक को देखकर आनंद—विह्वल हो जाती थीं। वे इस 'ऋतुमंगल' पुष्प को श्रद्धा और प्रीति की दृष्टि से देखती थीं। आज हमारा संवेदन थोथा हो गया है। पुरानी बातें पढ़ने से ऐसा मालूम होता है जैसे कोई अधभूला पुराना सपना है। रस मिलता है, पर प्रतीति नहीं होती। एक अजब आवेश के साथ पढ़ता हूँ—



आत्ताम्पहरियपाण्युर जीवितसब्बं बसंतमासस्य।



विट्ठोसि चदकोरशच उदुमंगल तुमं पसाएमि॥



आम्रकोरकों को प्रसन्न करने की बात भावोच्छ्वास की बहक के समान सुनाई देती है। मनुष्यचित्त इतना नहीं बदल गया है कि पहचान में ही न आए। पहले लोग अगर आम्र-कोरक देखकर नाच उठते थे तो इन दिनों कम-से-कम उछल ज़रूर पड़ना चाहिए। पुष्प-भार से लदे हुए आम-वृक्ष को देखकर सहज भाव से निकल जाने वाले सैकड़ों मनुष्यों को मैंने अपनी आँखों देखा है। कोई नाच नहीं उठता। परंतु एक बार मैं भी थोड़ा विह्वल हुआ था और एक कविता लिख डाली थी। छपाई तो अब भी नहीं है, पर सोचता हूँ छपा देनी चाहिए। बहुत होगा, लोग कहेंगे, कविता में कोई बार सार नहीं है कौन बड़ा कवि हूँ जो अकवि कहाने की बदनामी से डरूँ? यह कविता आम कोरकों की अद्भुत विह्वलकारिणी शक्ति का परिचायक होकर मेरे पास पड़ी हुई है।



कामशास्त्र में 'सुबसंतक' नामक उत्सव की चर्चा आती है। सरस्वती कंठाभरण में लिखा है कि सुबसंतक बसंतावतार के दिन को कहते हैं। बसंतावतार अर्थात् जिस दिन बसंत पृथ्वी पर अवतरित होता है। मेरा अनुमान है, बसंतपंचमी ही वह बसंतावतार की तिथि है। ‘मात्स्यसूक्त’ और 'हरिभक्तिविलास' आदि ग्रंथों में इसी दिन को बसंत का प्रादुर्भावदिवस माना गया है। इसी दिन मदन-देवता की पहली पूजा विहित है। यह भी अच्छा तमाशा है। जन्म हो बसंत का और उत्सव मदन देवता का। कुछ तुक नहीं मिलता। मेरा मन पुराने ज़माने के उत्सवों को प्रत्यक्ष देखना चाहता है, पर हाय, देखना क्या संभव है? 'सरस्वती-कंठाभरण' में महाराज भोजदेव ने सुबसंतक की एक हल्की-सी झाँकी दी है। इस दिन उस युग की ललनाएँ कंठ में कुवलय की माला और कान में दुर्लभ आम्र-मंजरियाँ धारण करके गाँव को जगमग कर देती थीं—



छणपिट्ठ धूसरत्थणि, महुमअतम्मच्छि कुवलआहरणे।



कण्णकअ चूअमंजरि, पुत्ति तुए मंडिओ गामो।।



पर यह अपेक्षाकृत परवर्ती समाचार है। इसके पहले क्या होता था? क्या बसंत के जन्मदिन को मदन का जन्मोत्सव मनाया जाता था? धर्मशास्त्र की पोथियों में लिखा है कि बसंतपंचमी के दिन मदन-देवता की पूजा करने से स्वयं श्रीकृष्णचंद्र जी प्रसन्न होते हैं। यह और मज़ेदार बात निकली। तांत्रिक आचार से विष्णु भजन करने वाले बताते हैं कि ‘काम-गायत्री’ ही श्रीकृष्ण गायत्री हैं। तो कामदेव और श्रीकृष्ण अभिन्न देवता है? पुराणों में लिखा है कि काम-देवता श्रीकृष्ण के घर पुत्र रूप में उत्पन्न हुए थे, वह कथा भी कुछ अपने ढंग की अनोखी ही है। कामदेव प्रद्युम्न के रूप में पैदा हुए, शंबर नामक मायावी असुर उन्हें हर ले गया और समुद्र में फेंक दिया। मछली उन्हें खा गई। संयोगवश वही मछली शंबर की भोजनशाला में गई और बालक फिर उसके पेट से बाहर निकला। काम देवता की पत्नी रति देवी वहाँ पहले से ही मौजूद थीं, और ऐसे मौक़ों पर जिस व्यक्ति का पहुँचना नितांत आवश्यक होता है—वे नारद मुनि भी वहाँ पहुँच गए। रति को सारी बातें उन्हीं से मालूम हुई। प्रद्युम्न पाले गए, शंबर मारा गया, श्रीकृष्ण के घर में पुत्र ही नहीं, पुत्रवधू भी यथासमय पहुँच गई; इत्यादि-इत्यादि। पुराणों में असुर प्रायः ही शैव बताए गए हैं। कामदेव उनके दुश्मन हो यह तो समझ में आ जाता है, पर भागवतों से उसका संबंध कैसे स्थापित हुआ? मेरा मन अधभूले इतिहास के आकाश में चील की तरह मँडरा रहा है, कहीं कुछ चमकती चीज़ नज़र आई नहीं कि झपाटा मारा। पर कुछ दिख नहीं रहा है। सुदूर इतिहास के कुज्झटिकाच्छन नभोमंडल में कुछ देख लेने की आशोपासना ही मूर्खता है। पर आदत बुरी चीज़ है। आर्यों के साथ असुरों, दानवों और दैत्यों के संघर्ष से हमारा साहित्य भरा पड़ा है। रह-रहकर मेरा ध्यान मनुष्य की इस अदभुत् विजय-यात्रा की और खिंच जाता है, कितना भयंकर संघर्ष वह रहा होगा जब घर में पालने पर सोए हुए लड़के तक चुरा लिए जाते होंगे और समुद्र में फेंक दिए जाते होंगे; पर हम किस प्रकार उसको भूल-भालकर दोनों विरोधी पक्षों के उपास्य देवताओं को समान श्रद्धा के साथ ग्रहण किए हुए हैं? आज इस देश में हिंदू और मुसलमान इसी प्रकार के लज्जाजनक संघर्ष में व्यापत हैं। बच्चों और स्त्रियों को मार डालना, चलती गाड़ी से फेंक देना, मनोहर घरों में आग लगा देना मामूली बातें हो गई हैं। मेरा मन कहता है कि ये सब बातें भुला दी जाएँगी। दोनों दलों की अच्छी बातें ले ली जाएँगी, बुरी बातें छोड़ दी जाएँगी। पुराने इतिहास की ओर दृष्टि ले जाता हूँ तो वर्तमान इतिहास निराशाजनक नहीं मालूम होता। कभी-कभी निकम्मी आदतों से भी आराम मिलता है।



तो यह जो भागवत पुराण का शंबर असुर है, इसका नाम अनेक तरह से पुराने साहित्य में लिखा मिलता है। शंबर भी मिलता है, शंबर भी और संबर या शाबर भी। कोई विदेशी भाषा का शब्द होगा, पंडितों के नाना भाव से सुधारकर लिख लिया होगा। यह इंद्रजाल या जादू विद्या का आचार्य माना जाता है अर्थात् 'यातुधान’ है। यातु और जादू शब्द एक ही शब्द के भिन्न-भिन्न रूप हैं। एक भारतवर्ष का है, दूसरा ईरान का। ऐसे अनेक शब्द है। ईरान में थोड़ा बदल गए हैं और हम लोग उन्हें विदेशी समझने लगे हैं। ‘ख़ुदा’ शब्द असल में वैदिक ‘स्वधा' शब्द का भाई है। 'नमाज़' भी संस्कृत 'नमस्' का सगा संबंधी है। ‘यातुधान' को ठीक-ठीक फ़ारसी देश में सजा दें तो 'जादूदाँ’ हो जाएगा। कालिका पुराण में शाबर असुर के नाम पर होने वाले शाबरोत्सव का उल्लेख है, जिसने अश्लील गाली देना और सुनना ज़रूरी हुआ करता था। यह उत्सव सावन में मनाया जाता था और वेश्याएँ प्रमुख रूप से उसमें भाग लेती थीं। संसार में सभी देशों में एक दिन साल से ऐस ज़रूर मनाया जाता है जिसमें अश्लील गाली-गलौच आवश्यक माना जाता है। अपने यहाँ फागुन चैत में इस प्रकार का उत्सव मनाया जाता है। इसी को मदनोत्सव कहते हैं। मैं सोचता हूँ कि क्या मदनोत्सव के समान एक और उत्सव इस देश में प्रचलित था जिसके मुख्य उद्योक्ता असुर लोग थे? असुरों के साथ मदन देवता के संघर्ष से क्या इसीलिए दो विभिन्न संस्कृतियों का द्वंद प्रकट होता है? कौन बताएगा?



आर्यों को इस देश में सबसे अधिक संघर्ष असुरों से ही करना पड़ा था। दैत्यों, दानवों और राक्षसों से भी उनकी बजी थी, पर असुरों से निपटने में उन्हें बड़ी शक्ति लगानी पड़ी थी। वे भी बहुत उन्नत। हर तरह से वे सभ्य थे। उन्होंने बड़े-बड़े नगर बसाए थे, महल बनाए थे, जल-स्थल पर अधिकार जमा लिया था। गंधर्वों, यक्षों और किन्नरों से आर्यों को कभी विशेष नहीं लड़ना पड़ा। ये जातियाँ अधिक शांतिप्रिय थीं। विलासिता की मात्रा इनमें कुछ अधिक थी। काम-देवता या कंदर्प वस्तुतः गंधर्व ही हैं। केवल उच्चारण बदल गया है। ये लोग आर्यों से मिल गए थे। असुरों ने इनसे बदला लिया था पर अंत तक असुर विजई नहीं हुए। उनका संघर्ष असफल सिद्ध हुआ।



लेकिन आम्र-मंजरी के साथ बिच्छू का संबंध अब भी मुझे चक्कर में डाले हुए है। पोथियों पढ़ता हूँ, उनका सम्मान भी करता हूँ, पर लोक-प्रवादों को हँसकर उड़ा देने की शक्ति अभी संचय नहीं कर सका हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि इन प्रवादों में मनुष्य समाज का जीवंत इतिहास सुरक्षित है। जब कभी लोक-परंपरा के साथ किसी पोथी का विरोध हो जाता है, तो मेरे मन में कुछ नवीन रहस्य पाने की आशा उमड़ उठती है। सब समय नई बात सूझती नहीं; पर हार मैं नहीं मानता। कभी-कभी तो बड़े-बड़े पंडितों की बात में मुझे असंगति दिख जाती है। कहने में हिचकता हूँ, नए पंडितों के क्रोध से डरता हूँ, पर मन से यह बात किसी प्रकार नहीं जाती कि पंडित की बात की संगति लोक परंपरा से ही लग सकती है। कहीं जैसे कुछ छूट रहा हो, कुछ भूल रहा हो। एक उदाहरण दूँ।



क्षेमेंद्र बहुत बड़े सहृदय और बहुश्रुत आयार्च थे। उन्होंने बहुत सी पोथियाँ लिखी हैं। एक का नाम है 'औचित्यंविचार’ चर्चा। उसमें उन्होंने संज्ञा शब्दों के औचित्य के प्रसंग में कालिदास के 'विक्रमोवंर्शीय नाटक का वह श्लोक उदद्भुत् किया है जिसमें राजा ने विरहातुर अवस्था में कहा है कि वैसे ही तो दुर्लभ वस्तुओं के लिए मचल पड़ने वाला पंचबाण (कामदेव) मेरे चित्त को छलनी किए डालता है, अब मलय-पवन से आंदोलित इन आम-वृक्षों ने अंकुर दिखा दिए। अब तो बस भगवान ही मालिक हैं—



इदमसुलभवस्तुप्रार्थनादुर्निवारः



प्रथमपि मनो में पंचबाणः क्षिणोति।



किमंतु मलयवातान्दोलितैः पाण्डुपै—



रुपवनसहकारैर्दर्शितेष्वंकुरेषु॥



अब सहृदय-शिरोमणि क्षेमेंद्र कहते है कि यह कामदेव को पंचबाण कहना उचित ही हुआ है। कामदेव के पंचबाणों में एक तो यही आम्रमंजरी का अंकुर है। लेकिन मैं बिल्कुल उलटा सोच रहा हूँ। मैं कहता हूँ, पंचबाण कहने से ही तो आम्र-कोरक भी कह डाले गए, फिर दुबारा उनकी चर्चा करना कहाँ संगत है? मैं अगर अच्छा पंडित होता तो क्षेमेंद्र की भी ग़लती निकालता और कालिदास का भी अनौचित्य सिद्ध करता, लेकिन खेद के साथ कहता हूँ कि मैं “अच्छा” पंडित नहीं हूँ। मेरा मन पूछता है कि क्या कालिदास आम्र-मुकुलों को मदन-देवता के पाँच बाणों में नहीं गिनते थे? वैसे तो संसार के सभी फूल मदन देवता के तूणीर में आ ही सकते हैं, पर कालिदास के युग में लोक-प्रचलित कोई विश्वास ऐसा अवश्य रहा होगा कि आम पाँच बाणों से अतिरिक्त है। ऐसा न होता तो कालिदास इस श्लोक में 'पंचबाण' शब्द का प्रयोग न करते। सबूत दे सकता हूँ। पर सुनता कौन है? कालिदास ने एक जगह आम्र-कोरकों को यह आशीर्वाद दिलाया है कि तुम काम के पाँच बाणों से अभ्यधिक बाण बनो। इस 'अभ्यधिक' शब्द का सीधा अर्थ तो यही मालूम होता है कि पाँच से अधिक छठा बाण बनो। पर पंडित लोग कहते हैं कि इसका सही अर्थ है पाँचों में सबसे अधिक तीक्ष्ण। होगा बाबा, कौन झमेले में पड़े। क्या अतीत के अंधकार मैं झाँकने से कुछ दिख नहीं सकता? मदन-देवता हमारे साहित्य में कब आए और उनके बाणों का भी क्या कोई इतिहास है? और फिर बिच्छू से इसका कोई नाता-रिश्ता भी है क्या?



पुराणों की गवाही पर मान लिया जा सकता है कि असुरों की आख़िरी हार अनिरुद्ध और ऊषा के विवाह के अवसर पर हुई थी। असुरों की ओर से भगवान शंकर का समूचा दल लड़ रहा था। शिवजी श्रीकृष्ण से गुँथे थे, प्रद्युम्न अर्थात् कामदेवता स्कंद (देवसेनापति) से। शिवजी के दल में भूत थे, प्रमय थे, यातुधान थे, बेताल थे, विनायक थे, डाकिनियाँ थीं, प्रेत थे, पिशाच थे, कुष्मांड थे, ब्रह्मराक्षस थे—यानी पूरी सेना थी, साँप, बिच्छू भी रहे होंगे। और तो, मलेरिया का बुख़ार भी था। इस लड़ाई में असुर बुरी तरह हारे। शिवजी भी हारे। देवताओं के दुर्धर्ष सेना-पति को कामावतार प्रद्युम्न से हारना पड़ा। मोर समेत बिचारे भाग खड़े हुए। भागवत में यह कथा बड़े विस्तार से कही गई है। इसके बाद इतिहास में कही असुरों ने सिर नहीं उठाया। शिवजी की सेना प्रथम बार पराजित हुई। कैसे और कब प्रद्युम्न ने आम्र-कोरकों का बाणसंधान किया और बेचारा बिच्छू परास्त हुआ, यह कहानी इतिहास में दबी रह गई। लेकिन लोग जान गए हैं और बच्चों की दुनिया को भी पता लग ही गया है।



मैं दूसरी बात सोच रहा हूँ। फूल तो दुनिया में अनेक हैं। आम, लेकिन, फूल की अपेक्षा फल-रूप में अधिक विख्यात है। कवि लोगों की बात छोड़िए। वे लोग कभी-कभी बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बोलते ही हैं। अपने भीतर ज़रा सी सुड़सुड़ी हुई नहीं कि समझ लेते हैं कि सारी दुनिया इसी प्रकार पागल हो गई है। हम लोग भी जानते हैं कि आम की मंजरी मादक होती है लेकिन कवि तो कहता है कि जब दिगंत सहकार मंजरी के केसर से मूर्च्छमान हो और मधुपान के लिए व्याकुल बने हुए भौंरें और गली-गली घूम रहे हों, तो ऐसे भरे बसंत में किसके चित में उत्कंठा नहीं लहरा उठती?—



सहकारकुसुमकेसरनिकरभरामोदमूर्च्छितदिगन्ते।



मधुरमधुविधुरमधुषे मधौ भवेत् कस्य नौत्कण्ठा॥



अब, अगर किसी सभा में आप यही सब लोग पूछ बैठें, तो प्रायः सौ फ़ीसदी भले आदमी ही 'मम' 'मम' कहकर चिल्ला उठेंगे। पर कवि तो अपनी ही सी कहे जाएगा। लेकिन बढ़िया आम दिखाकर अगर आप पूछे कि इसे पाने की उत्कंठा किसे नहीं है, तो सारी सभा चुप रहेगी। बस मन ही मन कहेंगे, ऐसा भी पूछना क्या उचित है? आम देखकर किसका जी नहीं ललचाएगा? एक बार कविवर रवींद्रनाथ चीन गए थे। उन्हें आम खाने को नहीं मिला। उन्होंने अपने एक साथी से विनोद में कहा—“देखिए, मैं जितने दिन तक जिऊँ उसका हिसाब कर लेने के बाद उसमें से एक साल कम कर दीजिएगा, क्योंकि जिस साल में आम खाने को नहीं मिला उसको में व्यर्थ समझता हूँ।” अबतक यह रिपोर्ट नहीं मिली कि किसी कवि ने आम्र-मंजरी की सुगंधि न पाने के कारण अपने जीवन के किसी वर्ष को व्यर्थ समझा हो। तो मेरा कहना यह है कि आम के फूलों का वर्णन इतना होना ही नहीं चाहिए। अरबिंद का हो, अशोक का हो, नवमल्लिका का हो, नीलोत्पल का हो, इनमें फल या तो आते ही नहीं या आते भी हैं तो नहीं आने के बराबर। ये काम देवता के अस्त्र बन सकते हैं, क्योंकि ये अप्सरा जाति के पूरक हैं। इनका सौंदर्य केवल दिखावे का है। कामदेवता के ये दुलारे हो सकते हैं। पर आम को क्यों घसीटते हो बाबा? यह अन्नपूर्णा का प्रसाद है। यह धन्वंतरि का अमृत-कलश है। यह धरती माता का मधुर दुग्ध है।



मेरा अनुमान है कि आम पहले इतना खट्टा होता था और इसका फल इतना छोटा होता था कि इसके फल को कोई व्यवहार में नहीं लाता था। संभवतः यह भी हिमालय के पार्वत्य देश का जंगली वृक्ष था। इसके मनोहर कोरक और दिगंत को मूर्च्छित कर देने वाला आमोद ही लोकचित्त को मोहित करते थे। धीरे-धीरे यह फल मैदान में आया। मनुष्य के हाथ-रूपी पारस से छूकर यह लोहा भी सोना बन गया है। गंगा की सुवर्णप्रसू मृत्तिका ने इसका कायाकल्प कर दिया है। मैं आश्चर्य से मनुष्य की अदभुत शक्ति की बात सोचता हूँ। आलू क्या से क्या हो गया। बैंगन, कंटकारी से वार्ताकु बन गया। आम भी उसी प्रकार बदला है। न जाने मनुष्य के हाथों से विधाता की सृष्टि में अभी क्या-क्या परिवर्तन होने वाले हैं। आज जो दुर्भिक्ष और अन्न संकट का हाहाकार चित्त को मथ रहा है, वह शाश्वत होकर नहीं आया है। मनुष्य उस पर विजयी होगा। कितने अव्यवहार्य पदार्थों को उसने व्यवहार्य बनाया है, कितनी खटाई उसके हाथों 'अमृत' बनी है। कौन जाने यह महान 'गोधूम' लता (गेहूँ) किसी दिन सचमुच गाँवों को लगने वाले मच्छरों को भगाने के लिए धुआँ पैदा करने के काम आती हो? निराश होने की कोई बात नहीं है। मनुष्य इस विश्व का दुर्जय प्राणी है।



हाँ, तो उसी बहुत पुराने जमाने में गंधर्व या (जैसा कि इसका एक दूसरा उच्चारण संस्कृत में प्रचलित है) कंदर्प देवता ने अपने तरकस में इस बाण को सजाया था। कवियों को उसी आदिम काल का संदेश बसंत में सुनाई देता है। लोग क्या ग़लत कहा करते हैं कि 'जहाँ न जाए रवि तहाँ जाए कवि? किस भूले युग की कथा वे आज भी गाए जा रहे हैं? कालिदास ज़रूर कुछ झिझके थे। शायद उनके ज़माने में सहृदय लोग आम को अरविंद, अशोक और नवमालिका की पंगत में बैठाने में हिचकते थे। अच्छा करते थे। वात्स्यायन कामशास्त्र में जहाँ आम और माधवीलता के विवाह के विशुद्ध विनोद का उत्सव सुझा गए हैं, वहाँ नवाभ्रमादनिका या आम के नए टिकोरों को खाने के उत्सव को भूले नहीं हैं। आम की मंजरी विधाता का वरदान है, पर आम का फल मनुष्य की बुद्धि का परिणाम है। मनुष्य प्रगति को अनुकूल बना देने वाला अद्भुत प्राणी है। यह विशाल विश्व आश्चर्यजनक है, पर इसको समझने के लिए प्रयत्न करने वाला और इसे करतलगत करने के लिए जूझने वाला यह मनुष्य और भी आश्चर्यजनक है। आम्रमंजरी उसी अचरज संदेश लेकर आई 'उद्दमंगल तुमं पसाएमि'॥

भारतीय संस्कृति की देन – हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी निबंध | Bhaarateey Sanskriti Kee Den

भारतीय संस्कृति पर कुछ कहने से पहले मैं एक निवेदन कर देना कर्त्तव्य समझता हूँ कि संस्कृति को किसी देश-विशेष या जाति-विशेष की अपनी मौलिकता नहीं मानता। मेरे विचार सारे संसार के मनुष्यों की एक सामान्य मानव-संस्कृति हो सकती है। यह दूसरी बात है कि वह व्यापक संस्कृति अब तक सारे संसार में अनुभूत और अंगीकृत नहीं हो सकी है। नाना ऐतिहासिक परंपराओं के भीतर में गुज़रकर और भौगोलिक परिस्थितियों में रहकर संसार के भिन्न-भिन्न समुदायों ने उस महान् मानवी संस्कृति के भिन्न-भिन्न पहलुओं का साक्षात्कार किया है। नाना प्रकार की धार्मिक भावनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा, भक्ति तथा योगमूलक अनुभूतियों के भीतर में मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक और परिपूर्ण रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है, जिसे हम 'संस्कृति' शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं। यह संस्कृति शब्द बहुत अधिक प्रचलित है, तथापि यह अस्पष्ट रूप में ही समझा जाता है। इसकी सर्वसम्मत कोई परिमाषा नहीं बन सकी है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि और संस्कारों के अनुसार इसका अर्थ समझ लेता है। फिर इसको एकदम अस्पष्ट भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य जानता है कि मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति है। इसकी अस्पष्टता का कारण यही है कि अब भी मनुष्य इसके संपूर्ण और व्यापक रूप को देख नहीं सका है। संसार के सभी महान तत्त्व इसी प्रकार मानव-चित्त में अस्पष्ट रूप से आभासित होते हैं। उनका आभासित होना ही उनकी सत्ता का प्रमाण है। मनुष्य की श्रेष्ठतर मान्यताएँ केवल अनुभूत होकर ही अपनी महिमा सूचित करती है। उनको स्पष्ट और सुव्यवस्थित परिभाषा में बाँधना सब समय संभव नहीं होता है। केवल नेति-नेति कहकर ही मनुष्य ने उस अनुभूति को प्रकाशित किया है। अपनी चरम सत्यानुभूति को प्रकट करते समय कबीरदास ने इसी प्रकार की भारतीय संस्कृति की देन विवशता का अनुभव करते हुए कहा था—“ऐसा लो नहिं तैसा लो, मैं केहि विधि कही अनूठा लो!” मनुष्य की सामान्य संस्कृति भी बहुत-कुछ ऐसी ही अनूठी वस्तु है। मनुष्य ने उसे अभी तक संपूर्ण पाया नहीं है; पर उसे पाने के लिए व्यग्र भाव से उद्योग कर रहा है। यह मार-काट, नोंच-खसोट और झगड़ा-टंटा भी उसी प्रयत्न के अंग हैं। आपको यह बात बहुत विरोधाभास-सी लगेगी, पर है सत्य। रास्ता खोजते समय भटक जाना, थक जाना या झुंझला पड़ना, इस बात के सबूत नहीं है कि रास्ता खोजने की इच्छा ही नहीं है। कविवर रवींद्रनाथ ने अपनी कविजनोचित भाषा में इस बात को इस प्रकार कहा है कि यह जो लुहार की दुकान की खटाखट और धूल-धक्कड़ है, इनसे घबराने की ज़रूरत नहीं है। वहाँ वीणा के तार तैयार हो रहे हैं। जब ये तार बन जाएँगे तो एक दिन इनकी मधुर संगीत-ध्वनि से निश्चय ही मन और प्राण तृप्त हो जाएँगे। ये युद्ध-विग्रह, ये कूटनीति दाँव-पेंच, ये दमन और शोषण के साधन, ये सव एक दिन समाप्त हो जाएँगे। मनुष्य दिन-दिन अपने महान् लक्ष्य के नज़दीक पहुँचता जाएगा सामान्य मानव-संस्कृति ही ऐसा दुर्लभ लक्ष्य है। मेरा विश्वास है कि प्रत्येक देश और जाति ने अपनी ऐतिहासिक परंपराओं और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार उस महान लक्ष्य के किसी-न-किसी पहलू का अवश्य साक्षात्कार किया है। ज्यों-ज्यों वैज्ञानिक साधनों के परिणाम स्वरूप भिन्न-भिन्न देश और भिन्न-भिन्न जातियाँ एक-दूसरे के नज़दीक आती जाएँगी, त्यों-त्यों इन अंश-सत्यों की सार्थकता प्रकट होती जाएगी और हम सामान्य व्यापक सत्य को पाते जाएँगे। आज की मारा-मारी इसमें थोड़ी रुकावट डाल सकती है; पर इस प्रयत्न को नि:शेष भाव से समाप्त नहीं कर सकती। अपने इस विश्वास का कारण मैं आगे बताने का प्रयत्न करूँगा।



जो आदमी ऐसा विश्वास करता है, उससे संस्कृति के साथ 'भारतीय' विशेषण जोड़ने का अर्थ पूछना नितांत संगत है! क्या 'भारतीय' से मतलब भारतवर्ष के समस्त अच्छे-बुरे प्रयत्न और संस्कार है? नहीं, समस्त भारतीय संस्कार अच्छे ही है या मनुष्य की सर्वोत्तम साधना की भारतीय संस्कृति की देन ओर अग्रसर करने वाले ही है; ऐसा मैं नहीं मानता। ऐसा देखा गया है कि एक जाति ने जिस बात को अपना अत्यंत महत्त्वपूर्ण संस्कार माना है, वह दूसरी जाति की सर्वोत्तम साधना के साथ मेल नहीं खाता। ऐसा भी हो सकता है कि एक जाति के संस्कार दूसरी जाति के संस्कार के एकदम उल्टे पड़ते हों। हो सकता है कि एक जाति मंदिरों और मूर्तियों के निर्माण में ही अपनी कृतार्थता मानती हो और यह भी हो सकता है कि दूसरी जाति उनको तोड़ डालने को ही अपनी चरम सार्थकता मानती हो। ये दोनों परस्पर-विरुद्ध है। ऐसे स्थलों पर विचार करने की आवश्यकता होगी। श्रेष्ठ लक्ष्य परस्पर-विरोधी नहीं होता। प्रसिद्ध संत रज्जबदास ने कहा था—“सव सोच मिल सो सांच है, ना मिलै सो झूठ।” संपूर्ण सत्य अविरोधी होता है। जहाँ भी विरोध दीखे, वहाँ सोचने की ज़रूरत होगी। हो सकता है कि दो भिन्न-भिन्न जन-समुदाय मोहवश दो असत्य बातो को ही बड़ा सत्य मान बैठे हों। हो सकता है कि दोनों में एक सही हो और दूसरा ग़लत। साथ ही यह भी हो सकता है कि दोनों सही रास्ते पर हो; पर उनके दृष्टिकोण ग़लत हो। यदि हमें अपनी ग़लती मालूम हो तो उसे निर्मम भाव से छोड़ देना होगा। महाभारत ने बहुत पहले घोषणा की थी कि जो धर्म दूसरे धर्म को बाधित करता है, वह धर्म नहीं है, कुधर्म है। सच्चा धर्म अविरोधी होता है—



धर्मो यो बाधते धर्म न स धर्मो कुधर्म तत्।



अविरोधी यो धर्मः स धर्मो मुनिसत्तम।।



मैं जब 'भारतीय' विशेषण जोड़कर संस्कृति शब्द का प्रयोग करता हूँ, तो मै भारतवर्ष द्वारा अधिगत और साक्षात्कृत अविरोधी धर्म की ही बात कहता हूँ। अपनी विशेष भौगोलिक परिस्थिति में और विशेष ऐतिहासिक परंपरा के भीतर से मनुष्य के सर्वोत्तम को प्रकाशित करने के लिए इस देश के लोगों ने भी कुछ प्रयत्न किए हैं। जितने अंश में वह प्रयत्न संसार के अन्य मनुष्यों के प्रयत्नों का अविरोधी है, उतने अंश में वह उनका पूरक भी है। भिन्न-भिन्न देशों और भिन्न-भिन्न जातियों के अनुभूत और साक्षात्कृत अन्य अविरोधी धर्मों की भाँति वह मनुष्य की जययात्रा में सहायक है। वह मनुष्य के सर्वोत्तम को जितने अंश में प्रकाशित और अग्रसर कर सका है, उतने ही अंश में वह सार्थक और महान है। वही भारतीय संस्कृति है, उसको प्रकट करना, उसकी व्याख्या करना या उसके प्रति जिज्ञासा-भाव उचित है। यह प्रयास अपनी बड़ाई का प्रमाणपत्र संग्रह करने के लिए नहीं है, बल्कि मनुष्य की जययात्रा में सहायता पहुँचाने के उद्देश्य से प्ररोचित है। इसी महान् उद्देश्य के लिए उसका अध्ययन, मनन और प्रकाशन होना चाहिए।



मनुष्य की जययात्रा! क्या मनुष्य ने किसी अज्ञात शत्रु को परास्त करने के लिए अपना दुर्द्धर रथ जोता है? मनुष्य की जययात्रा! क्या जान-बूझकर लोकचित्त को व्यामोहित करने के लिए वह पहले ही जैसा वाक्य बनाया गया है? मनुष्य की जययात्रा का क्या अर्थ हो सकता है? परंतु मैं पाठकों को किसी प्रकार के शब्द-जाल में उलझाने का संकल्प ले कर नहीं आया हूँ। मुझे यह वाक्य सचमुच बड़ा बल देता है। न जाने किस अनादि काल के एक अज्ञात मुहूर्त्त में यह पृथ्वी नामक ग्रहपिंड सूर्य-मंडल से टूटकर उसके चारों ओर चक्कर काटने लगा था। मुझे उस समय का चित्र कल्पना के नेत्रों से देखने में बड़ा आनंद आता है। उस सद्यस्त्रुटित धरित्री-पिंड में ज्वलंत गैस भरे हुए थे। कोई नहीं जानता कि इन असंख्य अग्निगर्भ कणों में से किसमें या किनमें जीवतत्त्व का अंकुर वर्तमान था। शायद वह सर्वत्र परिव्याप्त था। इसके बाद लाखों वर्ष तक धरती ठंडी होती रही, लाखों वर्ष तक उस पर तरल तप्त धातुओं की लहाछेह वर्षा होती रही, लाखों वर्ष तक उसके भीतर और बाहर प्रलयकांड मचा रहा, पृथ्वी अन्यान्य ग्रहों के साथ सूर्य के चारों ओर उसी प्रकार नाचती रही, जिस प्रकार खिलाड़ी के इशारे पर सरकस के घोड़े नाचते रहते हैं। जीवतत्त्व स्थिर-अविक्षुब्ध भाव से उचित अवसर की प्रतीक्षा में बैठा रहा। अवसर आने पर उसने समस्त जड़शक्ति के विरुद्ध विद्रोह करके सिर उठाया—नगण्य तृणांकुर के रूप में! तब से आज तक संपूर्ण जड़शक्ति अपने आकर्षण का समूचा वेग लगाकर भी उसे नीचे की ओर नहीं खींच सकी। सृष्टि के इतिहास में यह एकदम अघटित घटना थी। अब राक महाकर्ष (ग्रेबिटेशन पावर) में विराट वेग को रोकने में कोई समर्थ नहीं हो सकता था। जीवतत्व प्रथम बार अपनी ऊर्ध्वगामिनी वृत्ति की अदनी ताक़त के बल पर इस महाकर्ष अस्वीकार कर सका। तब से यह निरंतर अग्रसर होता गया। मनुष्य उसी की अंतिम परिणति है। यह एक कोष में अनेक कोशों के जटिल संघटन में कर्मेंद्रियों से ज्ञानेंद्रियों की ओर ज्ञानेंद्रियों से मन और बुद्धि की तरफ़ विकसित होता हुआ मानवात्मा के रूप में प्रकट हुआ। पंडितों ने देखा कि मनुष्य तक आते-आते प्रकृति ने अपने कारख़ाने में असंख्य प्रयोग किए हैं। पुराने जंतुओं की विशाल ठठरियाँ आज भी यत्र-तत्र मिल जाती है और उन असंख्य प्रयोगों की गवाही दी जाती है। प्रकृति अपने प्रयोग में कृपण कभी नहीं रही है। उसने बरबादी की कभी परवाह नहीं की। दस वृक्षों के लिए वह दस लाख बीज बनाने में कभी कोताही नहीं करती। यह सब क्या अर्थ की अंधता है, सुस्पष्ट योजना का अभाव है या हिसाब न जानने का दुष्परिणाम है? कौन बताए कि किस महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रकृति ने इतनी बरबादी सही है? हम येवल इतना ही जानते हैं कि जब जीवतत्त्व समस्त विघ्न-बाधाओं को अतिक्रम करके मनुष्य रूप में अभिव्यक्त हुआ, तब इतिहास ही बदल गया। जो कुछ जैसा होता है, वह होकर ही रहेगा—यही प्रकृति का अचल विधान है। कार्य-कारण बनता है और नए कार्य को जन्म देता है। कार्य-कारणों की इस नीरंध्र ठोस परंपरा में इच्छा का कोई स्थान नहीं था। जो जैसा होने को है, वह होकर ही रहेगा। इसी समय मनुष्य आया। उसने इस साधारण नियम को अस्वीकार किया। उसने अपनी इच्छा के लिए न जाने कहाँ से एक फाँक निकाला। जो जैसा है, वैसा ही मान लेने की विवशता को उसने नहीं माना; जैसा होना चाहिए, वही बड़ी बात है। इस जगह से सृष्टि का दूसरा अध्याय शुरू हुआ। एक बार कल्पना कीजिए, तरल-तप्त धातुओं के प्रचंड समुद्र की, निरंतर झरने वाले अग्निगर्भ-मेघों की; विपुल जड़-सघात की, और फिर कल्पना कीजिए क्षुद्राकार मनुष्य की! विराट् ब्रह्मांड-निकाय, कोटि-कोटि नक्षत्रों का अग्निमय आवर्त्त-नृत्य, अनंत शून्य में निरंतर उद्भूयमान और विनाशमान नीहारिका पुंज विस्मयकारी हैं, पर उनसे अधिक विस्मयकारी है मनुष्य, जो नगण्य स्थान-काल में रहकर इनकी नाप-जोख करने निकल पड़ा है! क्या मनुष्य इस सृष्टि की अंतिम परिणति है? क्या विधाता ने केशवदास के बीरबल की भाँति इस कृती बीज की रचना करके हाथ झाड़ लिया है—कै करतार वली बलबीर दियो करतार दुहूँ करतारी? कौन कह सकता है? परंतु क्या यह मनुष्य की अमोघ जययात्रा नहीं है? क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि समस्त ग़लतियों के बावजूद मनुष्य मनुष्यता की उच्चतर अभिव्यक्तियों की ओर ही बढ़ रहा है?



यह जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर अग्रसर होना है, जो कुछ जैसा होने वाला है, उसको वैसा ही न मानकर जैसा होना चाहिए, उसकी ओर जाने का प्रयत्न है, यही मनुष्य की मनुष्यता है! अनेक बातो में मनुष्य और पशु में कोई भेद नहीं है। मनुष्य पशु की अवस्था से ही अग्रसर होकर इस अवस्था में आया है। इसलिए वह स्थूल को छोड़कर रह नहीं सकता। यही कारण है कि मनुष्य को दो प्रकार के कर्त्तव्य निभाने पड़ते हैं, एक स्थूल की क्षुधा को निवृत्त करना और दूसरा सूक्ष्म से सूक्ष्मतर तत्त्व की ओर बढ़ाने वाली अपनी ऊर्ध्वगामिनी वृत्ति को संतुष्ट करना। आहार-निद्रा आदि के साधन भी मनुष्य को जुटाने पड़ते हैं। यद्यपि मनुष्य-बुद्धि ने इनमें भी कमाल का उत्कर्ष दिखाया है, पर प्रयोजन प्रयोजन ही है। प्रयोजन के जो अतीत हैं, जहाँ मनुष्य की अनंदिनी वृत्ति ही चरितार्थ होती है, वहाँ मनुष्य की ऊर्ध्वगामिनी वृत्ति को संतोष होता है। ज्यों-ज्यों मनुष्य-संघबद्ध होकर रहने का अभ्यस्त होता गया, त्यों-त्यों उसे सामाजिक संघटन के लिए नाना प्रकार के नियम-क़ानून बनाने पड़े। इस संघटन को दोषहीन और गतिशील बनाने के लिए उसने दंड-पुरस्कार की व्यवस्था भी की, इन बातों को एक शब्द में सभ्यता कहते हैं। आर्थिक व्यवस्था राजनीतिक संघटन, नैतिक परंपरा और सौंदर्य-बोध को तीव्रतर करने की योजना; ये सभ्यता के चार स्तंभ है। इन सबके सम्मिलित प्रभाव से संस्कृति बनती है। सभ्यता मनुष्य के बाह्य प्रयोजनों को सहजलभ्य करने का विधान है और संस्कृति प्रयोजनातीत आंतर आनंद की अभिव्यक्ति। परंतु शायद फिर मैं पहेलियों की बोली बोलने लगा हूँ। आप जानना चाहेंगे कि यह बाह्य प्रयोजन और आंतर अभिव्यक्ति क्या है? किसको तुम बाह्य कहते हो और किसको आंतर, तुम्हारे कथन में प्रमाण क्या है?



यह जो हमारे बाह्यतंरण हैं—कर्मेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय है—हमारे अत्यंत सूक्ष्म प्रयोजनों के निवर्त्तक है। मन इनमें सूक्ष्म है, बुद्धि और भी सूक्ष्म है। मन में हम हज़ार गज की लंबाई की भी एकाएक धारणा नहीं कर सकते। पर बुद्धि द्वारा ज्योतिषी कोटि-कोटि प्रकाश-वर्षों में हुए ग्रह-नक्षत्रों की नाप-जोख किया करते हैं। परंतु बुद्धि भी बड़ी चीज़ नहीं है। बुद्धि से भी बढ़कर कोई वस्तु है। वही अंतरतम है।



गीता में कहा है—



इन्द्रियाणि पराण्यहुरिद्रियेभ्यः परं मनः।



मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुढेः परतस्तु सः॥



जो वस्तु केवल इंद्रियो को संतुष्ट कर सके, वह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। जो वस्तु मन को संतुष्ट कर सके, अर्थात् हमारे भावावेगों को संतोष दे सके, वह पहली से सूक्ष्म होने पर भी बहुत बड़ी नहीं है। जो बात बुद्धि को संतोष दे सके, वह ज़रूर बड़ी है, पर वह भी बाह्य है। बुद्धि से भी परे कुछ है। वही वास्तव है, उसका संतोष ही काम्य है! परंतु वह क्या है? मैं भारतीय मनीषा के इस मंतव्य तक आपको ले आकर यह आशा नहीं कर रहा हूँ कि आप शास्त्र-वाक्य पर विश्वास कर लें। मैं इसके निकट आपको ले आकर छोड़ देता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि यहाँ तक आकर आप इसकी गहराई में बैठने का प्रयत्न अवश्य करेंगे। जब तक इसकी गहराई में बैठने का प्रयत्न नहीं किया जाता, तब तक मनुष्य के बड़े-बड़े प्रयत्नों का रहस्य समझ में नहीं आएगा।



तैत्तिरीय उपनिषद् की भृगुवल्ली में वरुण के पुत्र भृगु की मनोरंजक कथा दी हुई है। भृगु ने जाकर वरुण से कहा था कि भगवन् मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ। पिता ने तप करने की आज्ञा दी। कठिन तपस्या के बाद पुत्र ने समझा—अन्न ही ब्रह्म है। पिता ने फिर तप करने को कहा। इस बार पुत्र कुछ और गहराई में गया। उसने प्राण को ही बह्म समझा। पिता को संतोष नहीं हुआ। उन्होंने पुत्र को पुनः तप करने के लिए उत्साहित किया। पुत्र ने फिर तप किया और समझा कि मन ही ब्रह्म है। पिता फिर भी असंतुष्ट ही रहे। फिर तप करने के बाद पुत्र ने अनुभव किया—विज्ञान ही ब्रह्म है। पर पिता को अब भी संतोष नहीं हुआ। पुनर्वार कठिन तप के बाद पुत्र ने समझा—आनंद ही ब्रह्म है। यही चरम सत्य था। इस प्रकार अन्न (भौतिक पदार्थ)—प्राण-मन—विज्ञान—(बुद्धि)—आनंद (अध्यात्म तत्त्व)—ये ही ज्ञान के पाँच स्तर हैं। ये उत्तरोत्तर सूक्ष्म है। इन्हीं पाँचों को आश्रय करके संसार के भिन्न-भिन्न दार्शनिक मत बने हैं। साधारणतः इनको आश्रय करके दो-दो प्रकार के मत बन जाते हैं। तर्काश्रित मत और विश्वास समर्पित मत। संदेह को उद्रिक्त करने वाला तर्काश्रित मत फ़िलासफ़ी का प्रतिपाद्य मत बन गया है और विश्वास को आश्रय करके श्रद्धा को उद्रिक्त करने वाला मत धर्म-विज्ञान का। भारतवर्ष का इतिहास अन्य देशों से कुछ विचित्र रहा है। सभ्यता के उषाकाल से लेकर आधुनिक काल के आरंभ तक हमारे इस देश में नाना मानव-समूहों की धारा बराबर आती रही है। इसमें सभ्य, अर्ध-सभ्य और बर्बर सभी श्रेणी के मनुष्य रहे हैं। भारतीय मनीषी शुरू से ही मनुष्य के बहुविध विश्वासों और मतों को जानने का अवसर पा सके हैं। इसलिए यहाँ धर्म-विज्ञान और तत्त्व-जिज्ञासा कभी परस्पर विरोधी मत नहीं माने गए। भारतीय ऋषि ने दोनों का उचित सामंजस्य किया है। शायद इस विषय में भारतवर्ष सारे संसार को कुछ दे सकता है। भारतवर्ष के दार्शनिक साहित्य के आलोचकों को आश्चर्य हुआ कि इस देश में उस चीज़ का कभी विकास हो ही नहीं हो पाया जिसे फ़िलासफ़ी कहते हैं; भारतवर्ष के दर्शन धर्म पर आधारित बताए गए हैं। 'दर्शन' शब्द का अर्थ ही देखना है। इसका अंतर्निहित अर्थ यह है कि 'दर्शन' कुछ सिद्ध महात्माओं के देखे हुए (साक्षात्कृत) सत्यों का प्रतिपादन करते हैं। जैसा कि हमने अभी लक्ष्य किया है, यह 'देखना' तब वास्तविक होगा जब वह केवल इंद्रिय द्वारा, प्राण द्वारा, मन द्वारा यहाँ तक कि बुद्धि द्वारा भी दृष्ट स्थूल तथ्यों को पीछे छोड़कर उस वस्तु के द्वारा देखा गया हो, जो आनंदरूप है, जो सबके परे और सबसे सूक्ष्म है। यही स्वसंवेद्य ज्ञान है परंतु यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ भी अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है। जब तक मनुष्य का बाहर और भीतर शुद्ध, निर्मल और पवित्र नहीं होते, तब तक वह ग़लत वस्तु को सत्य समझ सकता है। चंचल मन ने कोई मामूली समस्या भी ठीक-ठीक समाहित नहीं होती। यह जो बाह्य और अंतःकरणों की शुद्धि है, यही भारतीय दर्शनों की विशेषता है। जैसे-तैसे सोचकर बड़े सत्य को अनुभव नहीं किया जा सकता। चंचल चित्त केवल विकृत चिंता में ही लगा रहता है। भारतीय मनीषियों ने इस चंचल चित्त को वश में करने के उपाय बताए। उसी उपाय का नाम योग है। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि यद्यपि मन बड़ा चंचल है और उसे वश में करना कठिन है, तथापि अभ्यास और वैराग्य ने उसे वश में किया जा सकता है। अभ्यास और वैराग्य के लिए भारतीय साहित्य में शताधिक ग्रंथ वर्तमान है। संभवतः सारे संसार में बुद्धिजीवी इस विषय में यहाँ से कुछ सीख सकते हैं। केवल बौद्धिक विश्लेषण द्वारा सत्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। सर्वत्र अभ्यास और वैराग्य आवश्यक है।



हमने अभी जिन पाँच तत्वों को लक्ष्य किया, उनमें सबसे स्थूल है यह शरीर, फिर प्राण और फिर मन। शरीर का प्रतीक बिंदु है। भारतीय मनीषियों ने अनुभव किया है कि इनमें से किसी एक को संयत करने का अभ्यास लिया जाए तो बाकी संयत हो जाते हैं। भारतवर्ष के नाना आध्यात्मिक पंथ इन तीनों को संयत करने के ऊपर ज़ोर देने के कारण अलग-अलग हो गए है। संयमन की विधि भी सर्वत्र एक नहीं है। नाना बौद्ध और शाक्त साधनाओं में बिंदु को वश में करने की विधियाँ बताई गई हैं, हठयोग प्राण को वश में करने के पक्ष में है, राजयोग मन को वश करने की विधि बताता है। ये सब अभ्यास द्वारा सिद्ध होते हैं। ऊपर-ऊपर से देखने वाले आलोचक भारतीय साधन-मार्गों में इतना अधिक भेद देख सकते हैं कि उन्हें समझ में नहीं आता कि ये विभिन्न पंथ किस प्रकार अपने को एक ही मूल उद्गम से उद्भूत बताते हैं। गहराई में जाने वाले के लिए ये विरोध नगण्य हैं। नाना भाँति अभ्यास के द्वारा साधक बिंदु, प्राण और मन को स्थिर करता है। तब जाकर अंतःकरण राग निर्मल स्फटिक मणि के समान होता है। परंतु यहाँ भी भ्रांति का काश रहता है। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने केवल अभ्यास के एकमात्र साधन नहीं माना। अभ्यास के साथ वैराग्य होना चाहिए राग-द्वेष-वश जो इंद्रिय चांचल्य होता है, उसको रोकना, विराग के विषयों को अलग-अलग समझ सकना, मन द्वारा विषयों की चिंता और अंत में मानसिक उत्सुकता को दबा देना ये सब वैराग भेद हैं, परंतु असली वैराग्य तो तब होता है जब अंतरात्मा से इंद्रियों से और मन-बुद्धि आदि सब तत्त्वों से अपने को पृथक् लेता है। इस प्रकार अभ्यास और वैराग्य से चित्त स्थिर होता है बुद्धि निर्मल होती है—केवल उसी समय परम सत्य का साक्षातर होता है।



मेरा अनुमान है कि विचार का यह प्रकृष्ट पंथ है, परंतु यह दावा नहीं है कि मैं इस बात को ठीक-ठीक समझ सकता हूँ। वे यह साधन का विषय है, परंतु यह समझना कठिन नहीं कि किसी की सचाई तक पहुँचने के लिए एक प्रकार के बौद्धिक वैराग्य की आवश्यकता है। संसार की समस्त जटिल समस्याएँ नित्य-प्रति और जटिल इसलिए होती जाती है कि इन पर विचार करने वालों में मानसिक और बौद्धिक वैराग्य का अभाव है! लोग अपने-अपने विशेष से और विचार-पद्धतियों के भीतर से दूसरों को देखने का प्रयास कर और समस्याएँ और भी जटिलतर हो जाती है। बौद्धिक वैराग्य ही म को संस्कृत बनाता है।



भारतवर्ष का साहित्य बड़ा विशाल और विपुल है। उसने ज्ञान साधना के क्षेत्र में नाना भाव से विचार किया है। मैं सबकी चर्चा योग्य अधिकारी भी नहीं हूँ और यहाँ इतना समय भी नहीं है; पर इतना स्मरण कर लेना उचित है कि यह जो आध्यात्मिक परम-सत्य की उपलब्धि है और जिसके लिए शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक और वैराग्य की बात बताई गई है—सिर्फ़ यही एकमात्र काम्य बताया गया। यद्यपि यह परमोत्तम लक्ष्य है, पर इस लक्ष्य की पूर्ति के पहले प्रत्येक व्यक्ति को कुछ ऋण चुका लेने पड़ते है। बहुत थोड़े को इन ऋणों से छुटकारा दिया गया। अधिकांश लोग इन ऋणों को चुकाए बिना किसी भी बड़ी साधना के अधिकारी नहीं हो सकते।



भारतीय विश्वास के अनुसार मनुष्य तीन प्रकार के ऋणों को लेकर पैदा होता है। ये तीन ऋण है— देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण। पैदा होते ही मनुष्य अपने संपूर्ण शरीर और इंद्रयों को पा जाता है। ये इंद्रियाँ उसे न मिलती तो न तो वह संसार का कुछ आनंद ही उपयोग कर सकता, न कृत नया दे ही सकता। निश्चय ही वह माता-पिता के निकट इसके लिए ऋणी है। परंतु वस्तुतः वह अनादिकालीन धारा का परिणाम पितृ-पितामहो ने उसे जो शरीर दिया है, उसका क्या कोई प्रतिदान दे सकता है? भारतीय मनीषियों ने उसका एकमात्र उपाय यह बताया है कि मनुष्य इसे ऋण के रूप में स्वीकार कर ले और पितृ-पितामहो की इस धारा को आगे बढ़ा दे। धारा रुद्ध न होने पावे। कौन जानता है, भविष्य में उसी धारा में कौन कृति बालक पैदा होकर संसार को नई रोशनी दे? इसीलिए शास्त्रकारों में पितृऋण से मुक्ति पाने का उपाय संतान उत्पन्न करना और उन्हें शिक्षित बनाकर समाज के हाथों सौंप जाने को बताया है। फिर मनुष्य पैदा होते ही अनेक विद्वानों और विज्ञानियों की आविष्कृत ज्ञानराशि को सहज ही पा जाता है। हर व्यक्ति को नए सिरे से अगर अपना-अपना प्रयोग और आविष्कार चलाना पड़ता तो मनुष्य की यह दुनिया कैसी बन गई होती, यह केवल सोचने की बात है। सो मनुष्य इस प्रकार अतीत के ऋषियों का ऋण लिए हुए पैदा होता है। इसे चुकाने का उपाय ज्ञान की धारा की रक्षा और उसे अग्रसर कर देना है। विद्या पढ़ना और ज्ञानधारा को अग्रसर करना कोई कृतित्व नहीं, सिर्फ़ कर्ज़ा चुकाने का कर्तव्य-पालन-मात्र है। फिर अन्न को पैदा करने वाली पृथ्वी, जल बरसाने वाले मेघ, प्रकाश देने वाला सूर्य आदि प्राकृतिक शक्तियाँ जिन्हें भारतीय मनीषी 'देवता' कहता है—हमें अनायास मिल गई है। भारतीय मनीषी ने इनके ऋण से मुक्ति पाने का उपाय बाँटकर भोग करना बताया है। जो तुम्हारे पास है, सबको बाँटकर ग्रहण करो। सो ये तीन ऋण मनुष्य के जन्म से ही लदे आते हैं। इन तीन ऋणों को चुकाए बिना मोक्ष पाने का प्रयत्न पाप है। भारतवर्ष में प्रत्येक व्यक्ति से यह कम-से-कम आशा की गई है कि वह समाज को स्वस्थ और शिक्षित संतान दे, प्राचीन ज्ञान-परंपरा की रक्षा करे और उसे आगे बढ़ाने का प्रयत्न करे और प्राकृतिक शक्तियों से प्राप्त संपदा को निजी समझकर दबा न रखे। ये ऋण हैं। मनुस्मृति के छठवें अध्याय में कहा गया है कि जो इनको चुकाए बिना ही मोक्ष की कामना करता है, वह अतःपतित होता है :



ऋणानि श्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।



अनपाकृत्य मोक्षन्तु सेवमानो ब्रजत्यधः।



जब तक ये ऋण चुका नहीं दिए जाते, तब तक मनुष्य को बड़ी बात सोचने का अधिकार नहीं है।



भारतवर्ष ने एशिया और यूरोप के देशों को अपनी धर्म-साधना की उत्तम वस्तुएँ दान दी है। उसने अहिंसा और मैत्री का संदेश दिया है, क्षुद्र दुनियावी स्वार्थों की उपेक्षा करके विशाल आध्यात्मिक अनुभूतियों का उपदेश दिया है और उससे जिन बातों को ग्रहण किया है, वे भी उसी प्रकार महान और दीर्घस्थाई रही है। उच्चतर क्षेत्र के आदान-प्रदान के ठोस चिह्न अब भी इस भूमि के नीचे से निकलते रहते हैं और विदेशों में मिल जाया करते हैं। हमारा धर्म, विज्ञान, हमारा मूर्ति और मंदिर-शिल्प; हमारा दर्शन-शास्त्र, हमारे काव्य और नाटक, हमारी चिकित्सा और ज्योतिष संसार में गए हैं; सम्मानित और स्वीकृत हुए हैं और संसार की उच्च चिंतनशील जातियों से थोड़ा-बहुत प्रवाहित भी हुए हैं। मैं आज आपको उस दिव्य लोक की सैर नहीं करा सका, जहाँ भारतीय आचार्य पर्वतों और रेगिस्तानों को लाँघकर अहिंसा और मैत्री का संदेश देते हैं, जहाँ हमारे शिल्पी गांधार और यवन कलाकारों के साथ मिलकर पत्थर में जान डाल रहे हैं, जहाँ अरब और ईरान के मनीषियों के साथ मिलकर वे चिकित्सा और ज्योतिष का प्रचार कर रहे हैं, जहाँ मलय और यवद्वीप में वहाँ के निवासियों से मिलकर शिल्प और कला में नया प्राण-संचार कर रहे हैं। मैं उस परम मोहक लोक में आपको न ले जाकर शास्त्रीय नीरस विचारों में उलझाए रहा, परंतु इसके लिए मुझे क्षमा मांगने की ज़रूरत नहीं है, मेरा विश्वास है कि भारतीय मनीषियों ने अपने देशवासियों में जीवन के आवश्यक कर्तव्य और वैराग्य की महिमा और स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म की ओर झुकने का प्रेम पैदा किया, उसका ही परिणाम है कि भारतवर्ष दीर्घकाल तक पशु-सुलभ स्वार्थों का ग़ुलाम नहीं बन सका। आज हम सांस्कृतिक दृष्टि से जो बहुत नीचे गिर गए हैं, उसका प्रधान कारण यही है कि हम इस महान् आदमी को भूल गए हैं। मेरा विश्वास है कि इन आदर्शों को नई परिस्थितियों के अनुकूल बनाकर ग्रहण करने से हम तो ऊपर उठेंगे ही, सारे संसार को भी उनमें कुछ-न-कुछ ऐसा अवश्य मिलेगा जिससे उसे वर्तमान प्रलयकर अवस्था से उबरने का मौका मिले।



भारतवर्ष ने सामान्य मानवीय संस्कृति को पूर्ण और व्यापक बनाने की जो महती साधना की है, उसके प्रत्येक पहलू का अध्ययन और प्रकाशन हमारा अत्यंत महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य होना चाहिए।

हमारे पुराने साहित्य के इतिहास की सामग्री – हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी निबंध | Hamaare Puraane Saahity Ke Itihaas Kee Saamagree

हिंदी साहित्य का इतिहास केवल संयोग और सौभाग्यवश प्राप्त हुई पुस्तकों के आधार पर नहीं लिखा जा सकता। हिंदी का साहित्य संपूर्णतः लोक भाषा का साहित्य है। उसके लिए संयोग से मिली पुस्तकें ही पर्याप्त नहीं है। पुस्तकों में लिखी बातों से हम समाज की किसी विशेष चिंताधारा का परिचय पा सकते हैं, पर उस विशेष चिंताधारा के विकास में जिन पाशर्ववर्ती विचारों और आचारों ने प्रभाव डाला था, वे, बहुत संभव है, पुस्तक रूप में कभी लिपिबद्ध हुए ही न हो और यदि लिपिबद्ध हुए भी हों तो संभवतः प्राप्त न हो सके हो। कबीरदास का बीजक दीर्घकाल तक बुंदेलखंड से झारखंड और वहाँ से बिहार होते हुए धनौती के मठ में पड़ा रहा और बहुत बाद में प्रकाशित किया गया। उसकी रमैनियों से एक ऐसी धर्म-साधना का अनुमान होता है, जिसके प्रधान उपास्य निरंजन या धर्मराज थे। उत्तरी उड़ीसा और झारखंड में प्राप्त पुस्तकों तथा स्थानीय जातियों की आधार-परंपरा के अध्ययन से यह अनुमान पुष्ट होता है। पश्चिमी बंगाल और पूर्वी बिहार में धर्म ठाकुर की परंपरा अब भी जारी है। इस जीवित संप्रदाय तथा उड़ीसा के अर्ध विस्मृत संप्रदायों के अध्ययन से बीजक के द्वारा अनुमित धर्मसाधना का समर्थन होता है। इस प्रकार कबीरदास का बीजक इस समय यद्यपि अपने पुराने विशुद्ध रूप में प्राप्त नहीं है—उसमें बाद के अनेक पद प्रक्षिप्त हुए हैं—तथापि वह एक जनसमुदाय की विचार-परंपरा के अध्ययन में सहायक है। कबीर का बीजक केवल अपना ही परिचय देकर समाप्त नहीं होता। वह उस से अधिक है। वह अपने इर्द-गिर्द के मनुष्यों का इतिहास बताता है।



भारतीय समाज ठीक वैसा ही हमेशा नहीं रहा है, जैसा आज है। नए-नए जनसमूह इस विशाल देश में बराबर आते रहे हैं और अपने-अपने विचारों और आचारों का प्रभाव छोड़ते रहे हैं। आज की समाज-व्यवस्था कोई सनातन व्यवस्था नहीं है। आज जो जातियाँ समाज के निचले स्तर में पड़ी हुई हैं, वे सदा वहीं रही हैं, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। इसी प्रकार समाज के ऊपरी स्तर में रहने वाली जातियाँ भी नाना परिस्थितियों को पार करती हुई वहाँ पहुँची हैं। इस विराट जनसमुद्र का सामाजिक जीवन काफ़ी स्थितिशील रहा है। फिर भी ऐसी धाराओं का नितांत अभाव भी नहीं रहा है, जिन्होंने समाज को ऊपर से नीचे तक आलोड़ित कर दिया है। ऐसा भी एक ज़माना था, जब इस देश का एक बहुत बड़ा जनसमाज ब्राह्मण धर्म को नहीं मानता था। उसकी अपनी अलग पौराणिक परंपरा थी, अपनी समाज-व्यवस्था थी, अपनी लोक-परलोक भावना थी। मुसलमानों के आने के पहले ये जातियाँ हिंदू नहीं कही जाती थीं। किसी विराट सामाजिक दबाव के फलस्वरूप एक बार समूचे जनसमाज को दो बड़े-बड़े कैंपों में विभक्त हो जाना पड़ा—हिंदू और मुसलमान। गोरखनाथ के बारह संप्रदायों में उनसे पूर्व काल के अनेक बौद्ध, जैन, शैव और शाक्त संप्रदाय संगठित हुए थे। उनमें कुछ ऐसे संप्रदाय, जो केंद्र से अत्यंत दूर पड़ गए थे, मुसलमान हो गए, कुछ हिंदू। हिंदी-साहित्य की पुस्तकों से ही उस परम शक्तिशाली सामाजिक दबाव का अनुमान होता है। इतिहास में इसका कोई और प्रमाण नहीं है, परंतु परिणाम देखकर निःसंदेह इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि मुसलमानों के आगमन के समय इस देश में प्रत्येक जनसमूह को किसी-न-किसी बड़े कैंप में शरण लेनी पड़ी थी। उत्तरी पंजाब से लेकर बंगाल की ढाका कमिश्नरी तक एक अर्धचंद्राकृति भू-भाग में बसी हुई जुलाहा जाति को देख कर रिजली ने अनुमान किया था कि इन्होंने कभी सामूहिक रूप में मुसलमानी धर्म स्वीकार किया था। हाल कि खोजों से इस मत की पुष्टि हुई है। ये लोग न-हिंदू-न-मुसलमान योगी-संप्रदाय के शिष्य थे।



साहित्य का इतिहास पुस्तकों, उनके लेखकों और कवियों के उद्भव और विकास की कहानी नहीं है। वह वस्तुतः अनादि काल-प्रवाह में निरंतर प्रवाहमान जीवित मानव-समाज की ही विकास-कथा है। ग्रंथ और ग्रंथकार, कवि और काव्य, संप्रदाय और उनके आचार्य, उस परम शक्तिशाली प्राणधारा की ओर सिर्फ़ इशाराभर करते हैं। वे ही मुख्य नहीं हैं। मुख्य है मनुष्य। जो प्राणधारा नाना अनुकूल-प्रतिकूल अवस्थाओं से बहती हुई हमारे भीतर प्रवाहित हो रही है उसको समझने के लिए ही हम साहित्य का इतिहास पढ़ते हैं।



सातवीं-आठवीं शताब्दी के बाद से लेकर तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी का लोकभाषा का जो साहित्य बनता रहा, वह अधिकांश उपेक्षित है। बहुत काल तक लोगों का ध्यान इधर गया ही नहीं था। केवल लोक-साहित्य ही क्यों, वह विशाल शास्त्रीय साहित्य भी उपेक्षित ही रहा है, जो उस युग की समस्त साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना का उत्स था। काश्मीर के शैव साहित्य, वैष्णव संहिताओं का विपुल साहित्य, पाशुपत शैवों का इतस्ततो विक्षिप्त साहित्य, तंत्रग्रंथ, जैन और बौद्ध अपभ्रंश ग्रंथ अभी केवल शुरू किए गए हैं। श्रेडर ने जमकर परिश्रम न किया होता तो संहिताओं का वह विपुल साहित्य विद्वंमंडली के सामने उपस्थित ही न होता, जिसने बाद में सारे भारतवर्ष के साहित्य को प्रभावित किया है। मेरा अनुमान है कि हिंदी-साहित्य का इतिहास लिखने के पहले निम्नलिखित साहित्यों की जाँच कर लेना बड़ा उपयोगी होगा, जिनकी अच्छी जानकारी के बिना हम न तो भक्ति-काल के साहित्य को समझ सकेंगे और न वीरगाथा या रीतिकाल को—



1. जैन और बौद्ध अपभ्रंश का साहित्य।



2. काश्मीर के शैवों और दक्षिण तथा पूर्व के तांत्रिकों का साहित्य।



3. उत्तर और उत्तर-पश्चिम के नाथों का साहित्य।



4. वैष्णव आगम।



5. पुराण।



6. निबंधग्रंथ।



7. पूर्व के प्रच्छन्न बौद्ध-वैष्णवों का साहित्य।



8. विविध लौकिक कथाओं का साहित्य।



जैन अपभ्रंश का विपुल साहित्य अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है। जितना भी यह साहित्य प्रकाशित हुआ है, उतना हिंदी के इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जोइंदु (योगींद्र) और रामसिंह के दोहों के पाठक स्वीकार करेंगे कि क्या बौद्ध, क्या जैन और क्या शैव (नाथ) सभी संप्रदायों में एक रूढ़िविरोधी और अंतर्मुखी साधना का दाना दसवीं शताब्दी के बहुत पहले बँध चुका था। बौद्ध अपभ्रंश के ग्रंथ भी इसी बात को सिद्ध करते हैं। योग-प्रवणता, अंतर्मुखी साधना और परम प्राप्तव्य का शरीर के भीतर ही पाया जा सकना इत्यादि बातें उस देशव्यापी साधना का केंद्र थीं। यही बातें आगे चलकर विविध निर्गुण संप्रदायों में अन्य भाव से स्थान पा गईं। निर्गुण साहित्य तक ही यह साहित्य हमारी सहायता नहीं करेगा। काव्य के रूपों के विकास और तत्कालीन लोकचिंता का भी उससे परिचय मिलेगा। राहुल जी जैसे विद्वान तो स्वयंभू की रामायण को हिंदी का सबसे श्रेष्ठ काव्य मानते हैं। यद्यपि वह अपभ्रंश का ही काव्य है, तथापि महापुराण आदि ग्रंथों को जिसने नहीं पढ़ा, वह सचमुच ही एक महान् रसस्रोत से वंचित रह गया। रीति-काल के अध्ययन में भी यह साहित्य सहायक सिद्ध होगा।



काश्मीर का शैव साहित्य अप्रत्यक्ष रूप से हिंदी-साहित्य को प्रभावित करता है। यद्यपि श्री जगदीश बनर्जी और मुकुंदराम शास्त्री आदि विद्वानों के प्रयत्न से वह प्रकाश में आया है, फिर भी उसकी ओर विद्वानों का जितना ध्यान जाना चाहिए उतना नहीं गया है। हिंदी में पं० बलदेव उपाध्याय ने इसके और तंत्रों के तत्त्ववाद का संक्षिप्त रूप में परिचय कराया है, पर इस विषय पर और भी पुस्तकें प्रकाशित होनी चाहिए। यह आश्चर्य की बात है कि उत्तर का अद्वैत मत दक्षिण के परशुरामकल्पसूत्र के सिद्धांतों से अत्यधिक मिलता है। साधना की अंत:प्रवाहित भावधारा ने देश और काल के व्यवधान को नहीं माना।



हिंदी में गोरखपंथी साहित्य बहुत थोड़ा मिलता है। मध्य-युग में मत्स्येंद्रनाथ एक ऐसे युग संधिकाल के आचार्य है कि अनेक संप्रदाय उन्हें अपना सिद्ध आचार्य मानते हैं। हिंदी की पुस्तकों में इनका नाम 'मछंदर' आता है। परवर्ती संस्कृत ग्रंथों में इसका 'शुद्धीकृत' संस्कृत रूप ही मिलता है। वह रूप है 'मत्स्येंद्र', परंतु साधारण योगी मत्स्येंद्र की अपेक्षा 'मच्छंदर' नाम ही ज़्यादा पसंद करते हैं। श्रीचंद्रनाथ योगी जैसे शिक्षित और सुधारक योगियों को इन ‘अशिक्षितों' की यह प्रवृत्ति अच्छी नहीं लगी है। (योगिसंप्रदया-विष्कृति, पृ० 448-6)। परंतु हाल की शोधों से ऐसा लगता है कि 'मच्छंदर' नाम काफ़ी पुराना है और शायद यही सही नाम है। मत्स्येंद्रनाथ (मच्छंद) की लिखी हुई कई पुस्तकें नेपाल दरबार लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं। उनमें से एक का नाम है कौलज्ञान-निर्णय। इसकी लिपि को देखकर स्वर्गीय महामहोपाध्याय पं० हरप्रसाद शास्त्री ने अनुमान किया था कि यह पुस्तक सन् ईसवी की नवीं शताब्दी की लिखी हुई हैं (नेपाल सूचीपत्र द्वितीय भाग, पृ० 16)। हाल ही में डा० प्रबोधचंद्र बागची महोदय ने उस पुस्तक की मत्स्येंद्रनाथ की अन्य पुस्तकों (अकुलवीरतंत्र, कुलानंद और ज्ञानकारिका) के साथ संपादित करके प्रकाशित किया है। इस पुस्तक की पुष्पिका में मछ्घ्र, मच्छंद आदि नाम भी आते हैं। परंतु लक्ष्य करने की बात यह है कि शैव दार्शनिकों में श्रेष्ठ आचार्य अभिनवगुप्त पाद ने भी मच्छंद नाम का ही प्रयोग किया है और रूपकात्मक अर्थ समझाकर उसकी व्याख्या भी की है। उनके मत से आतानवितान वृत्यात्मक जाल को बताने के कारण मच्छंद कहलाए (तंत्रलोक, पृ० 25) और यंत्रालोक के टीकाकार जयद्रथ ने भी इसी से मिलता-जुलता एक श्लोक उद्घृत किया है, जिसके अनुसार मच्छ चपल चित्तवृत्तियों को कहते हैं। उन चपल वृत्तियों का छेदन किया था। इसलिए वे मच्छंद कहलाए। कबीरदास के संप्रदाय में आज भी मत्स्य, मच्छ आदि का सांकेतिक अर्थ मन समझा जाता है (देखिए कबीर बीजक पर विचारदास की टीका, पृ० 40)। यह परंपरा अभिनव गुप्त तक जाती है। उसके पहले भी नहीं रही होगी, ऐसा कहने का कोई कारण नहीं है। अधिकतर प्राचीन बौद्ध सिद्धों के पदों से इस प्रकार के प्रमाण संग्रह किए जा सकते हैं कि प्रज्ञा ही मत्स्य है (जर्नल ऑफ़ रायल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जिल्द, 26, 1630 ई०, नं० १. टुची का प्रबंध)। इस प्रकार यह आसानी से अनुमान किया जा सकता है कि मत्स्येंद्रनाथ की जीवितावस्था में रूपक के अर्थ में उन्हें मच्छंद कहा जाना नितांत असंगत नहीं है। इन छोटी-छोटी बातों से पता चलता है कि उन दिनों की ये धार्मिक साधनाएँ कितनी अंत:संबद्ध हैं।



यह अत्यंत खेद का विषय है कि भक्ति-साहित्य का अध्ययन अब भी बहुत उथला ही हुआ है। सगुण और निर्गुणधारा के अध्ययन से ही मध्ययुग के मनुष्य को अच्छी तरह समझा जा सकता है। यह भगवत्-प्रेम इंद्रियग्राह्य विषय नहीं है और मन और बुद्धि के भी अतीत समझा गया है। इसका आस्वादन केवल आचरण द्वारा ही हो सकता है। तर्क वहाँ तक नहीं पहुँच सकता, परंतु फिर भी इस तत्त्व को अनुमान के द्वारा समझने-समझाने का प्रयत्न किया गया है और उन आचरणों की तो विस्तृत सूची बनाई गई है, जिनके व्यवहार से इस अपूर्वं भागवत रस का आस्वादन हो सकता है। आगमों में से बहुत कम प्रकाशित हुए हैं। भागवत के व्याख्यापरक संग्रह-ग्रंथ भी कम ही छपे हैं। तुलसीदास के 'रामचरितमानस' को आश्रय करके भक्ति-शास्त्र का जो विपुल साहित्य बना है, उसकी बहुत कम चर्चा हुई है। इन सबकी चर्चा हुए बिना और इनको जाने बिना मध्य-युग के मनुष्य को ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता।



तांत्रिक आचारों के बारे में हिंदी-साहित्य के इतिहास की पुस्तकें एकदम मौन हैं, परंतु नाथमार्ग का विद्यार्थी आसानी से उस विषय के साहित्य और आचारों की बहुलता लक्ष्य कर सकता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि कबीर द्वारा प्रभावित अनेक निर्गुण संप्रदायों में अब भी वे साधनाएँ जी रही हैं जो पुराने तांत्रिकों के पंचामृत, पंच-पवित्र और चतुश्चंद्र की साधनाओं के अवशेष हैं। यहाँ प्रसंग नहीं है। इसलिए इस बात को विस्तार से नहीं लिखा गया; परंतु इतना तो स्पष्ट है कि हमारे इस साहित्य के माध्यम से मनुष्य को पढ़ने के अनेक मार्गों पर अभी चलना बाक़ी है।



कबीरदास के बीजक में एक स्थान पर लिखा है कि ब्राह्मन वैस्नव एकहि जाना” (12वीं ध्वनि)। इससे ध्वनि निकलती है कि ब्राह्मण और वैष्णव परस्पर-विरोधी मत हैं। मुझे पहले-पहल यह कुछ अजीब बात मालूम हुई। ज्यों-ज्यों मैं बीजक का अध्ययन करता गया, मेरा विश्वास दृढ़ होता गया कि बीजक के कुछ अंश पूर्वी और दक्षिणी बिहार के धर्ममत से प्रभावित हैं। मेरा अनुमान था कि कोई ऐसा प्रच्छन्न बौद्ध वैष्णव संप्रदाय उन दिनों उस प्रदेश में अवश्य रहा होगा, जिसे ब्राह्मण लोग सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते होंगे। श्रीनगेंद्रनाथ वसु ने उड़ीसा के पाँच वैष्णव कवियों की रचनाओं के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला है कि ये वैष्णव कवि वस्तुतः माध्यमिक मत के बौद्ध थे और केवल ब्राह्मण-प्रधान राज्य के भय से अपने को बौद्ध कहते रहे। मैंने अपनी नई पुस्तक 'कबीरपंथी साहित्य' में विस्तार-पूर्वक इस बात की जाँच की है। यहाँ प्रसंग केवल यह है कि हिंदी-साहित्य के ग्रंथों का अध्ययन अनेक लुप्त और सुप्त मानव चिंता प्रवाह का परिचय दे सकता है। केवल पुस्तकों की तिथि-तारीख़ तक ही साहित्य का इतिहास सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता। मनुष्य-समाज बड़ी जटिल वस्तु है। साहित्य का अध्ययन उसकी अनेक गुत्थियों को सुलझा सकता है।



परंतु इन सबसे अधिक आवश्यक हैं विभिन्न जातियों, संप्रदायों और साधारण जनता में प्रचलित दंत कथाएँ। इनसे हम इतिहास के अनेक भूले हुए घटना-प्रसंगों का ही परिचय नहीं पाँएगे, मध्ययुग के साहित्य को समझने का साधन भी पा सकेंगे। झारखंड और उड़ीसा तथा पूर्वी मध्य प्रांत की अनेक लोक प्रचलित दंत कथाएँ उन अनेक गुत्थियों को सुलझा सकती हैं, जो कबीर पंथ की बहुत गूढ़ और दुरूह बातें समझी जाती हैं। इस ओर बहुत अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। विभिन्न आँकड़ों और नृतत्त्व शास्त्रीय पुस्तकों में इतस्ततो-विक्षिप्त बातों का संग्रह भी बहुत अच्छा नहीं हुआ है। ये सभी बातें हमारे साहित्य को समझने में सहायक हैं। इनके बिना हमारा साहित्यिक इतिहास अधूरा ही रहेगा।

ठाकुर जी की बटोर – हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी निबंध | Thaakur Jee Kee Bator

(इस गाँव में हिंदुओं के सौ घर हैं, मुसलमानों के पंद्रह। धनी-मानी हिंदू ही हैं, ग़रीब कहाने योग्य मुसलमान ही। फिर भी गाँव के ठाकुर-बारी और मस्जिद में बड़ा अंतर है। मस्जिद जगमगाई रहती है, ठाकुरबारी में भूत रेंगते रहते हैं। मैं मस्जिद को भी ख़ुदा का ‘अपना’ घर नहीं मानता और ठाकुर-बारी को भी ठाकुर जी का एकमात्र मंदिर नहीं समझता। इस बार तीन वर्ष पर घर लौटा तो मालूम हुआ, एक साधु ठाकुर जी की पूजा साल भर से कर रहे हैं, पर दोनों शाम भोजन कर सकने भर का अन्न उन्हें नहीं मिल पाता। एक दिन जब मेरे एक ग्रेजुएट मित्र साधु को साथ लेकर मेरे पास आए और ठाकुरबारी की दुर्व्यवस्था का सजीव वर्णन किया तो मैं उनकी प्रस्तावित सभा में, जहाँ ठाकुर जी के राग-भोग की व्यवस्था करने का विचार होने वाला था, उपस्थित रहने और यथासंभव सहायता देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हो गया। स्थानीय भाषा में इसी प्रस्तावित सभा का नाम रखा गया ‘ठाकुर जी की बटोर।’)



तीन चार घंटा-ध्वनि के साथ विज्ञापन करने और अनेक सज्जनों को अनेक बार व्यक्तिगत रूप से अनुरोध करने पर भी जब सभा-स्थल पर कुछ बच्चों के सिवा और कोई नहीं आया तो मैं कुछ उद्विग्न हो आया। मैं सोचने लगा, लोग ठाकुर जी के प्रति इतने उदासीन क्यों हैं? हिंदुओं में धर्म-भावना क्या लुप्त हो गई है? मैंने कल्पना के नेत्रों से देखा कि जिस देवता के मंदिर के सामने बैठा हुआ हूँ उसकी छत्रछाया तीन हज़ार वर्षों से कोटि-कोटि नर-नारियों को शांति दान कर रही है। सिंधु उपत्य का में किसी अर्ध देवत्व-प्राप्त अनार्य वीर ने या उत्तरी प्रांतों के उपास्य किसी बाल-देवता ने युग-प्रतिष्ठित भागवत धर्म में परम दैवत का स्थान प्राप्त किया। तब से सैकड़ों बर्बर अनार्य जातियाँ उसके पावन नाम से उसी प्रकार हत-दर्प होकर शांत जीवन बिताने लगीं जिस प्रकार मंत्रौषधि के प्रयोग से उपगत-ज्वर महासर्प। मैंने मानो स्पष्ट ही देखा भारतवर्ष के उत्तरी-पश्चिमी किनारे से चींटियों की तरह सेनाएँ घुस रही हैं, लूट-पाट, नोच-खसोट, मार-पीट, कुछ भी उसके लिए असंभव नहीं है। किसी सैन्य दल के रक्त-कलुष हाथ में तीक्ष्ण फलक कुंत है, किसी के खर-धार तलवार। देखते-देखते समृद्धशाली नगर जलाकर भस्म कर दिए जाते हैं, बच्चे माताओं की गोदी से छीनकर पटक दिए जाते हैं, तरुणियों का दल ढोरों की भाँति हाँक कर ले जाया रहा है,—सारा उत्तरी भारत क्षण भर के लिए श्मशान की तरह हो जाता है। फिर मैंने देखा, यही जातियाँ यहीं बस जाती हैं और पचास वर्ष बाद अपने सिक्कों पर अपने को परम भागवत कहने में गर्व अनुभव करती हैं! इतना शीघ्र इतना विकट परिवर्तन! सचमुच उस देवता के सामर्थ्य का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है, जिसने एक नहीं, दो नहीं, बिसियों आर्योत्तर बर्बर जातियों को आचार-निष्ठ, शांत भक्त बना दिया! भागवत का श्लोक मन ही मन गुनगुनाते हुए मैंने उस महावीर्य देवता को मन ही मन प्रणाम किया—



किरात-हूणान्ध्र-पुलिन्द-पुक्कसा-



आभीर-कंकाः यवनाः खसादयः;



येऽन्येऽपि पापास्तदपाश्रयाश्रयात्



शुद्ध्यंति तस्मै प्रभविष्णवे नमः।



मैं सोचता ही गया—आज हम बौद्ध संस्कृति की संपूर्ण जानकारी के लिए तिब्बत, चीन, जापान, श्याम आदि देशों की ओर टकटकी बाँधे हैं, एक दिन ऐसा भी था जबकि पश्चिमी प्रांतों में—गांधार, पारस्य, शकस्थान,—इसी महावीर्य देवता के नाम और महिमा का कीर्तन होता था, भावावेश में लोग दरविगलित नेत्रों से महाविष्णु का स्मरण करते थे—वह दिन आज बीत गया है। पश्चिम में एक स्वतः सम्बुद्ध धर्म-भावना का अवतार हुआ जिसके एक हाथ में दृढ़-मुष्टि कठोर कृपाण थी, और दूसरे में समानता के आश्वासन का अमृत वरदान। उसका प्राण देवता अंतर्मुख था पर वह अपनी परिधि पर अक्लांत भाव से चक्कर मार रहा था। उसने किसी से समझौता नहीं किया, किसी को मित्र नहीं माना, जो सामने आया उसी को ललकारा, जिधर लपका उधर ही काल-चक्र घूम पड़ा! वह इस्लाम था। इसी इस्लाम ने पश्चिम में इस महावीर्य देवता को उखाड़ फेंका। विजय गर्व से स्फीत-वक्ष इस्लाम निर्भीक भाव से आगे बढ़ता गया, जिसने उसे आत्म-समर्पण किया वही उसके रंग में रंग गया, अब से लेकर गांधार तक एक ही विजय ध्वजा बार-बार प्रकंपित होकर धरित्री का हृदय कंपित करने लगी। आज हम उस कुचली हुई संस्कृति के लिए इन देशों की ओर ताकने की कुछ आवश्यकता ही नहीं समझते।



हाँ, जिस मंदिर के सामने बैठा हुआ मैं उसके उपासकों की प्रतीक्षा में समय बिता रहा हूँ वह उसी महावीर्य किंतु पराजित देवता का प्रतीक है। उसके उपासक एकाधिक बार कुचले गए हैं, लूटे गए हैं, नोचे गए हैं, और तंग किए गए हैं। वे थके हुए, निर्वीर्य, निष्पोषित उपासक हैं। उपासक के तेज से ही उपास्य तेजस्वी होता है। देवता का यह प्रतीक भी तेजोहीन, वीर्यहीन और निष्प्राण है।



इसी समय मैंने देखा, हमारी आशा-लता को लहलहाते हुए तीन वृद्ध हिंदू सभास्थल में उपस्थित हुए। उन्होंने माथे की पगड़ी उतारी और अपना अनाडंबर प्रणिपात ठाकुर जी को निवेदित किया। मन ही मन मैं सोचने लगा, आज भी करोड़ों हिंदू इसी प्रकार अनाडंबर भाव से गंभीर विश्वास के साथ ठाकुर जी को प्रणाम करके शांति पाते हैं। कौन कहता है कि वह महावीर्य देवता तेजोहत हो गया है। विजयस्फीत इस्लाम उसको कुचल नहीं सकता। आज गांधार मुसलमान हो गया है, उसे इस्लाम का अमृत वरदान प्राप्त हो गया है। तो क्या हुआ? इस्लाम के आने के पहले विद्या और ज्ञान का महापीठ गांधार आज मुसलमान होकर बदल गया है। पाणिनि और यास्क की संतान आज भारतवर्ष में हींग बेचती फिरती है। इस्लाम का इससे भयंकर पराजय और क्या हो सकता है? वैदिक ऋचाओं के बनाने वाले ऋषियों की संतान का इससे अधिक पतन क्या हो सकता है? मुझे ऐसा जान पड़ने लगा कि पाणिनि और यास्क, चरक और सुश्रुत, पतंजली और व्यास स्वर्ग में अत्यंत उदास बैठे हैं। भृकुटियाँ किंचित कुंचित हो गई हैं, विशाल ललाट पर चिंता की रेखाएँ स्पष्ट दिख रही हैं, आँख छलछला आई हैं—हाय, इस्लाम, तुम कब देख सकोगे?



मुझे ऐसा लगा, इस्लाम ने मेरी बात सुन ली है। उसके हाथ तलवार की मूठ पर ठीक ही बैठे हैं, मूर्ति अत्यंत उग्र है पर क्रूर नहीं। मुझे उस मूर्ति में वीरता का तेज दिखा, देर तक उस पर आँख ठहर नहीं सकती। इस्लाम ने शांत गंभीर स्वर में कहा, तुम ठीक कहते हो, पर तुम्हारे लगाए हुए अभियोग की मुझे बिल्कुल परवाह नहीं। मैं संस्कृति फैलाने नहीं आया, मैं कुफ़्र तोड़ने आया हूँ। हज़ारों को दास बनाकर, लाखों को दलित और अस्पृश्य बनाकर जिस संस्कृति का जन्म होता है वहाँ कुफ़्र का प्राबल्य होता है। मैं उसे साफ़ करने आया हूँ। इस असम व्यवस्था के साथ मेरा समझौता नहीं हो सकता। जिस सैकड़ों कच्चे-पक्के रंग के बेमेल पट को तुम कला का श्रेष्ठ निदर्शन मानते हो, उसे मैं भद्दे दाग़ों का एक हास्यासद प्रदर्शन समझता हूँ; मैं धरती को एक पक्के रंग में रंगी देखना चाहता हूँ, भले ही वह रंग नीला हो। आज इस्लाम की ध्वजा से धरती काँप रही है, क्योंकि उसमें भीरुता है, उसमें भेद-भाव है, उसमें भ्रांति और त्रुटि है। इस्लाम का विजयतूर्य इस भीरुता, इस भेद-भाव और भ्रांति त्रुटि को दूर करके ही चुप होगा। समझौता करना डरपोकों का काम है, इस्लाम डरपोक नहीं है, वह मरना भी जानता है और मारना भी जानता है। संस्कृति के विनाश की आशंका से पद-पद पर संत्रस्त बुद्धिमान कहे जाने वाले लोग कायर हैं।



मैंने ज़रा विस्मय और आशंका के साथ जवाब दिया—संसार को एक रंग में रंगने का प्रयत्न क्या मनुष्यता के वैचित्र्य-पूर्ण विकास में बाधा पहुँचाना नहीं है? चमेली को गुलाब बनाने का प्रयत्न या चमेली और गुलाब दोनों को कुछ एक विचित्र-सा एक-रंगा फूल बनाने का प्रयत्न क्या श्रेयस्कार है? यह तो स्वयं ही एक भयंकर कुफ़्र है। इस्लाम ने गरजकर जवाब दिया—शक्तिहीन ऐसी बातें कहा करते हैं, निर्वीर्य ऐसी बातें सुना करते हैं। तुममें मेरे कथन का सत्य अर्थ ग्रहण करने की शक्ति नहीं है, उसे धैर्य के साथ समझ सकने का साइंस नहीं है। उपमाओं और रूपकों का सहारा लेकर प्रकृत अर्थ को विकृत करना दुनिया के बुद्धिमान कहे जाने वाले लोगों का एक व्यवसाय है। तुमने मेरी सीधी-सी बात का विकृत अर्थ लगाया है। मैं कभी नहीं कहता कि गुलाब और चमेली को एक कर दिया जाए। मैं कहता हूँ गुलाब और चमेली हों या आम और धतूरे, सबको एक ही समान खुला आसमान, एक ही समान खाद और पानी की सुविधा, एक ही समान यंत्र और उपचार प्राप्त होने चाहिए। इस्लाम की उग्र मूर्ति पर ज़रा सा हास्य दिखाई पड़ा, वह मानो अवहेलना के साथ बड़ी संस्कृतियों का मज़ाक़ उड़ाना चाहता था। मैंने फिर बुद्धि का आश्रय लेते हुए पूछा—ऐसे भी तो पौधे हो सकते हैं जो गुलाब और चमेली के अनुकूल खाद पाकर ही मुरझा जाएँ? कुछ पौधे पानी से बढ़ते हैं, कुछ पानी से ही मर जाते हैं। उनका क्या उपाय होगा? इस्लाम ने इस बार कड़ककर जवाब दिया—मर जाएँ तो मर जाने दो, मुझे परवाह नहीं। जो तीन लोक से न्यारे हैं, उनका न रहना ही अच्छा है। उनके रहने से बाक़ी दुनिया को कष्ट होगा और देखो, तुम अधिक तर्क न करो। यह शक्तिहीन का लक्षण है। इस वज्रमुष्टि महाकृपाण को देखो। इस्लाम इस पर भी पूर्ण विश्वास करता है। यही भगवान का वरदान है, मनुष्यता का रक्षक है, इस्लाम अपने कृपाण पर कभी संदेह नहीं करता। यह कहकर एक अजब मस्ती के साथ मुसकराता हुआ इस्लाम ऊपर की ओर उठा, मानों वह जगत की सारी जड़ता, समस्त अंधकार, सारे जंजाल को विध्वस्त कर सकने के महाव्रत में अपने आपके सामने किसी दूसरे को नहीं मानना चाहता, मानों उसकी सफलता निश्चित है, मानों वह अद्वितीय कर्मठ योद्धा है।



(दो)



संस्कृति क्या है? मैं ज़रा उद्विग्न भाव से सोचने लगा। मुझे एक बार याद आए वैदिक युग के कर्मकांड-पटु ऋत्विजों के दल, जो प्रत्येक कुश और पल्लव के स्थान, पात्र, और विधान के विचार में गंभीर भाव से सतर्क थे। फिर याद आई उपनिषत्-कालीन ऋषियों की, जो बड़ी गंभीरता के साथ मौन भाव से चिंतन कर रहे थे कि क्या होगी वह चीज़ जिसे पाकर हम अमृत नहीं हो सकते? फिर याद आए काषाय-धारी बौद्ध भिक्षु, जो 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' घर बार छोड़कर, उत्तुंग शैल-शिखर और भीमकाय महासागर लाँघ रहे थे; और अंत में याद आईं, उज्जयिनी के सोध-गवाक्षों से लीला-कटाक्ष-क्षेपिणी पौर-विलासिनियाँ। देखते-देखते मेरी कल्पना ने मध्ययुग की आतंक ग्रस्त हिंदू संस्कृति को सामने खड़ा कर दिया—निराभूषणा, संकुचिता, अवमानिता, विक्षुब्धा! उसमें कर्मकांड-काल की सजीवता नहीं थी, उपनिषत्काल की स्वतंत्र चिंता नहीं थी, बौद्ध काल की दुर्वार करुणा-भावना नहीं थी, काव्य-काल की सुखमय विलास-सज्जा नहीं थी। इस्लाम के आक्रमण से उसका तेज म्लान हो गया था, दर्प हत हो गया था पर वह हार मानने को तैयार नहीं थी। वह कुचली हुई वन्य वीरुध की भाँति म्लान होकर भी सजीव थी, फिर से पनप उठने के लिए सचेष्ट थी, निरुपाय होकर वह जिधर सुविधा पाती उसी तरफ़ आश्रय को लपक पड़ती। इसी समय दक्षिणी आसमान से कई तेजःपुंज ज्वलंत ज्योतियाँ उत्तर की ओर बड़े वेग से दौड़ती हुई नज़र आईं। दिशाएँ तिमिराच्छन्न थीं, आसमान धूल से भरा हुआ था, धरित्री रक्त से तर थी! दक्षिण आकाश से आई हुईं इन ज्योतियों ने कोई बाधा नहीं मानी, किसी की परवाह न की। वे बढ़ती ही गईं। अचानक प्रकाश की किरण में स्पष्ट मालूम हुआ, इस कुचली हुई संस्कृति-लता को एक सहारा मिला है। वह सहारा था वैष्णव धर्म—भक्ति मतवाद। इसने इस लता को केवल आश्रय नहीं दिया, रस की धारासार वर्षा से उसे लहलहा दिया; पत्र और पुष्प की नूतन समृद्धि से देखने वालों की आँखें निहाल हो गईं। मैं जिस देवता के मंदिर के सामने बैठा हुआ हूँ, वह उसी आश्चर्यजनक भक्ति मतवाद का उपाश्रय है। कौन कहता है यह पराजित देवता का प्रतीक है? यह आश्रयों का ख़ज़ाना, सच्चा तिलस्म और अचिंतनीय जादू की लकड़ी है।



मैंने साफ़ देखा मुर्शिदाबाद की सड़कों पर मुसलमान वंशोद्भूत साधक हरिदास भावावेश में हरिनाम संकीर्तन करते जा रहे हैं और जल्लाद उन पर अविश्रांत भाव से दंड प्रहार करते जा रहे हैं, चेहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं पढ़ती, शांत और मोहक तेज बढ़ता ही जा रहा है—मैं स्तब्ध निर्वाक! मैंने देखा मेवाड़ के राजवंश की शोभा और शान मीरा बाई दर-विगलित नयन, कंपमान कंठ स्वर और खिन्न गात्र से गोपाल लाल के विरह में नृत्य कर रही हैं, राज-परिचारक ने ज़हर का प्याला दिया है, वे अजब लापरवाही से पी रही हैं—मैं रुद्ध-श्वास, हृत-चेष्ट! मैंने और भी देखा, बंदा वीर दिल्ली नगरी में बंदी होकर बैठा है; आँखों के सामने सात सौ प्राण-प्रिय साथी देखते-देखते तलवार से मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। जल्लाद बंदा की गोद में उसका कोमल बच्चा डालता है; आज्ञा मिलती है, इसे अपने हाथों मार डालो। बंदा कृपाण उठाता है। पिता-पुत्र साथ ही बोल उठते हैं—वाह गुरु जी! और कृपाण उस कोमल कलेवर को कदली स्तंभ की भाँति विदीर्ण कर देता है—मैं विचलित, अश्रु-अंध, विक्षुब्ध! कहाँ से आई इतनी शक्ति? ठाकुर, तुम धन्य हो!



मेरे सामने अचानक प्रकाश का एक महासमुद्र दिखाई दिया, देखते-देखते उस प्रकाश ने एक निश्चित रूप ग्रहण किया,—एक त्रिभंगी मूर्ति, माथे पर मोर-पंख, हाथ में बंशी और लकुट, कटि में पितांबर, वक्षःस्थल पर वैजयंती की माला, कंधे पर कामरी। जी में आया मध्ययुग के कवि के कंठ में कंठ मिलाकर चिल्ला उठूँ—



‘या लकुटी अरु कामरिया पर,



राज तिहूँपुर कौ तजि डारों’।



ठीक इसी समय मेरी चिंता को आहत करते हुए कुछ भले आदमी सभा-स्थल पर उपस्थित हुए। समय बहुत निकल गया था। जितने लोग आ गए थे उन्हीं के साथ प्रस्तावित विषय को बिना भूमिका के ही उठा दिया गया। ठाकुर जी के राग-भोग की व्यवस्था के साथ-ही-साथ सारे गाँव के छोटे-मोटे झगड़ों का विचार आरंभ हुआ। बहस द्रौपदी का चीर हो उठा। महज़ सात रुपए माहवार का प्रबंध करना था, मैंने उत्तेजना में अपनी शक्ति के बाहर कुछ अधिक भार उठाने का संकल्प करके वृद्ध सज्जनों के चित्त को शायद कुछ आघात पहुँचाया, पर कुछ फल नहीं हुआ। मैं फिर एक बार उद्विग्न हो उठा। कुछ समझ में नहीं आया कि मध्ययुगी महिमा शालिनी संस्कृति का उपाश्रय यह महावीर्य देवता आज इतना उपेक्षित क्यों है? मेरे सामने कुछ ही क्षण पहले जो तेजःपुंज दिखाई पड़ा था, वह धीरे-धीरे धूमिल होने लगा। मैंने समझा, यह भी मेरा बौद्धिक विकार था, वास्तव में न मध्य-युग की कोई संस्कृति ही महत्वपूर्ण थी और न उसका आश्रय यह देवता ही। अचानक तर्क और बहस के भीतर से एक प्रकाश दिखाई पड़ा। मैं चौंक उठा, उत्तेजित हो गया और क्षण भर के लिए हतबुद्धि हो रहा।



बात यह हुई। सभा में एक पंडित जी बैठे थे। इन्हें हम लोगों ने बड़ी आग्रह से बुलाया था। मनोनीत सभापति को अनुपस्थिति में उन्हीं के सभापति होने की बात थी। इन पंडित जी को अपनी शास्त्र-निष्ठा पर अभिमान था। साधारण मनुष्य के लिए यह समझना बड़ा कठिन है कि कब पंडित का शास्त्र उसकी बुद्ध को दबा देता है और कब उसकी बुद्धि शास्त्र को। सभा में उन्होंने मुझे और मेरे मित्र को चुनौती-सी देते हुए कहा कि ठाकुर जी की पूजा अब तक शास्त्र-निषिद्ध विधि से होती रही है। जो साधु इस समय पूजा कर रहे हैं, वे ब्राह्मण नहीं हैं और शास्त्र के मत से ठाकुर उसी जाति के होकर पूजा ग्रहण करते हैं, जिस जाति में पुजारी का जन्म हुआ रहता है। इसके पूर्ववर्ती पुजारी भी अब्राह्मण थे। पिछले तीन वर्षों ठाकुर जी अब्राह्मण होकर ही पूजा ग्रहण कर रहे हैं। इसीलिए यह अत्यंत स्पष्ट बात है कि ब्राह्मण ऐसे ठाकुर जी को पूज्य नहीं समझ सकता! ब्राह्मण धर्म का यथोचित पालन कठिन व्रत है।



पंडित जी ने अपने वक्तव्य को और भी स्पष्ट करते हुए बताया कि अनाधिकारी की पूजा से गाँव का अमंगल हो रहा है। इसलिए पहले अब्राह्मण साधु को स्थान च्युत किया जाए, फिर राग-भोग की व्यवस्था बाद में होती रहेगी। मेरा नाम पुकार कर उन्होंने इस विषय पर मेरी स्पष्ट सम्मति चाही।



क्षण भर में मेरे सामने मध्य-युग की भूयोभूयः पद-ध्वस्त भारतीय संस्कृति की जादू-भरी मूर्ति खेल गई। वह ब्राह्मण-संस्कृति नहीं थी, श्रमण संस्कृति नहीं थी, राजन्य संस्कृति नहीं थी, शास्त्रीय संस्कृति भी नहीं थी। वह संपूर्ण हिंदू जाति की एक केंद्रा संस्कृति थी—परिपूर्ण, तेजोमयी, जीवंत! ये वृद्ध सज्जन जिनके ललाट-पट्ट पर रामानुजी संप्रदाय का विशाल तिलक अंकित है, जो पंडित जी की हाँ में हाँ मिला रहे हैं, आज भूल ही गए हैं—और शायद उन्हें कभी जाने का मौक़ा ही नहीं मिला—कि रामनुज के दादा गुरुओं की परंपरा के सभी अलवार भक्त अब्राहाण ही नहीं थे, शूद्र से भी निम्न कुल में अवतरित हुए थे! महाप्रभु वल्लभाचार्य ने अपने शुद्र शिष्य कृष्णदास अधिकारी (अष्टछाप के एक कवि) को श्रीनाथ जी के मंदिर का प्रधान अधिकारी बनाया था। महाप्रभु के गोलोकवास के अनंतर एक बार उन्होंने महाप्रभु के एकमात्र पुत्र श्री गोकुलनाथ गोसाई को भी मंदिर में जाना निषिद्ध कर दिया था। पंडित जी अब्राह्मणीभूत ठाकुर का चरणोदक लेने में हिचकते हैं, गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के प्राण-प्रतिष्ठाता महाप्रभु चैतन्य देव ने मुसलमान भक्त हरिदास का चरणोदक हठ के साथ छककर पिया था। लेकिन मारिए गोली इन ऐतिहासिक घटनाओं को। गोप कुल में पालित और क्षत्रिय वंश में अवतीर्ण अखंडानंद विग्रह भगवान् श्रीकृष्णचंद्र क्या ऋषि-मुनियों से भरी सभा में पूजा के पात्र नहीं समझे गए?



मैं सोच में पड़ गया। इस सभा में जो अब्राह्मण कुलोत्पन्न सज्जन बैठे हैं उनके पास क्या आत्म-सम्मान नाम की कोई चीज़ नहीं है? वे इस कथन का विरोध क्यों नहीं करते? और इस सभा में जो ब्राह्मण सज्जन बैठे हैं उनमें क्या लोक कल्याण की भावना का कुछ भी अवशेष नहीं रह गया? वही क्यों नहीं इस बात का प्रतिवाद कर रहे हैं? क्यों पहले दल वाले भीरु हैं, कायर हैं, डरपोक हैं और क्यों दूसरे दल वाले हठी हैं, अभिमानी हैं, रूढ़ि-प्रिय हैं? मैंने उत्तेजित भाव से कहा—'जो ठाकुर जाति-विशेष की पूजा ग्रहण करके ही पवित्र रह सकते हैं, जो दूसरी जाति की पूजा ग्रहण करके आग्राह्य-चरणोदक हो जाते हैं, वे मेरी पूजा नहीं ग्रहण कर सकते। मेरे भगवान हीन और पतितों के भगवान हैं, जाति और वर्ण से परे के भगवान हैं, धर्म और संप्रदाय के ऊपर के भगवान है वे सबकी पूजा ग्रहण कर सकते हैं, और पूजा ग्रहण करके आब्राह्मण-चांडाल सबको पूज्य बना सकते हैं। मेरी बात अभी समाप्त भी नहीं हो पाई थी कि मेरे मित्र ने मुझे बीच ही में रोका। उन्होंने ओरेटर की भाषा और भाष्कार के लहज़े में कहा कि वे मेरी बात से सोलह आने सहमत हैं, पर ऐसी बात ऐसे समय में नहीं कहनी चाहिए। वे शंकित हो रहे थे कि उनकी परिश्रमपूर्वक बुलाई हुई सभा कहीं व्यर्थता में पर्यवसित न हो जाए। मेरी उत्तेजना उनकी आशंका का प्रधान कारण थी। लेकिन मुझे इस्लाम की बात याद आ रही थी—डरपोक ही समझौता किया करते हैं।



(तीन)



मेरे मित्र मुझे समझा रहे थे (क्योंकि भरी सभा में नासमझी का कार्य एक मात्र मैंने ही किया था!) और मैं अपनी सहज सहचीरी कल्पना के साथ ऊपर उठने लगा। मैं सभा-स्थल से कुछ ऊपर उठा, ठाकुर जी के मंदिर के ऊपर गया, उनकी निष्कंप ध्वजा से भी ऊपर उठा—उठते-उठते मैं आविल आकाश का प्रत्येक स्तर लाँघ गया। अब मैं ऐसी जगह आ गया जहाँ से दुनिया का कोई रहस्य दिखने से बाक़ी नहीं था। मैंने दक्षिण की ओर देखा। सूची-भेद्य निबिड़ अंधकार के साथ चिता की आग जूझ रही थी, उसी प्रकाश में कलकल-निनादिनी नदी चाँदी की लकीर-सी चमक रही थी, सामने दूर तक फैले हुए सैकत-राशि पर केवल कंकाल और नर-मुंड बिखरे पड़े थे। चिता के पास एक काली-सी मूर्ति बैठी थी, शायद वह चिता का अधिकारी चांडाल था। इसी समय मेरे आश्चर्य को शतगुण वृद्धि करते हुए एक चारु-दर्शन महात्मा चिता की ओर भागते हुए दिखाई दिए। घने, काले, घुँघराले बाल अस्त-व्यस्त थे, पर शोभा उनसे चुई-सी पड़ती थी; विशाल भालपट्ट पर रामानुजी तिलक विराजमान था, पवित्रता उसमें अपनी छाया देख रही थी; कटि देश और स्कंध देश पीत पट्टांबर से विभूषित थे; मुख-मंडल के चारों ओर प्रकाश की किरण छिटक रही थीं; मनोहर मुख देखकर आँखें धन्य हो जाती थीं। महात्मा अचानक बाकर चांडाल के चरणों से लिपट गए। चांडाल चिल्ला उठा— “प्रभो, पामर को और भी अपराधी बना रहे हो? क्या करते हो देवता? छोड़ो, छोड़ो, मैं पापी, मैं चांडाल, मुझे रौरव नरक में न फेंको!”



महात्मा ने कसकर चरण पकड़ लिया। उसी अवस्था में बोले—शांत हो जाओ। मेरे नारायण, नष्ट हो जाने दो मेरी सारी वासना, मेरा सारा अभिमान इस पावन तीर्थ में। मैं उस मठ का प्रधान हूँ। तीन दिन पहले तुम भगवान का दर्शन करने गए थे, मेरे शिष्यों ने तुम्हारा अपमान किया था तब से भगवान् रूठ गए हैं। तीन दिन से मैं भूखा-प्यासा हूँ। मेरे ठाकुर ने मेरा अन्न खाना छोड़ दिया है। आज वे आए थे, चेहरा उनका उदास था, आँखें उनकी डबडबायी हुई थीं, उत्तरीय उनका अश्रुसिक्त था, गला उनका भरा हुआ। मैंने रोते हुए पूछा— मेरे ठाकुर, मेरे प्यारे, तुम्हें हो क्या गया है? भर्राई हुई आवाज़ में उन्होंने गरजकर कहा— रामानंद, मैंने तुम्हारा मठ छोड़ दिया है, तुम्हारे शिष्यों ने मेरे भक्त का अपमान किया है। मैं अब यहाँ नहीं आ सकता। भीत भाव से मैंने पूछा—तुम अब कहाँ रहोगे मेरे ठाकुर? भगवान ने जल्द गंभीर स्वर में कहा—जहाँ मेरे भक्त रहते हैं। वह देखो, उस श्मशान में वही मेरा भक्त चिता जला रहा है। तुम उसकी कृपा के बिना मुझे नहीं पा सकते। यह कह कर वे चले गए और मैं दौड़ा तुम्हारे पास आया। मेरा शास्त्र-भिमान आज धूल में लोट रहा है, मेरा वर्ण और आश्रम का अभिमान आज अस्त हो गया है; तुम भक्त हो, तुम नारायण के रूप हो, मेरे ऊपर कृपा करो। आज्ञा दो, मैं क्या सेवा कर सकता हूँ।



चांडाल भक्त ने गद्गद् कंठ से कहा—प्रभो, मैं क्या कृपा कर सकता हूँ। भगवान् अगर मुझे कुछ इसी प्रकार की अनाधिकार चर्चा करने को कहते हैं, तो उठो प्रभो, मैं आज्ञा देता हूँ, स्नान करके मुझे अपना शिष्य बना लो, वह रास्ता दिखा दो जिससे मैं अभिमान का समुद्र तैर सकूँ, भक्ति की नौका पा सकूँ। रामानंद ने आज्ञा पालन किया, और दिग्वधुओं ने मौन शंख नाद। मैं चिंतातुर हो उठा। यह इतिहास है या मनोवांछितत स्वप्न?



मैंने देखा, मेरे गाँव के मंदिर से भी ठाकुर जी निकले जा रहे हैं। उनकी मुखाकृति गंभीर है। जिस चटुल-चपल आनंदमयी मूर्ति की कल्पना मैंने आजतक की है, उसका कोई चिन्ह उस चेहरे पर नहीं है। सारा आसमान अणु-परमाणुओं के साथ 'धिक-धिक' कर उठा। मेरे सिवा यह धिक्कार-वाक्य और कोई दूसरा नहीं सुन सका। लज्जा और ग्लानि सें मेरा चेहरा काला पड़ गया। मेरे ग्रेजुएट मित्र मुझे अब भी समझा रहे हैं। मैं शायद कुछ समझने योग्य हो चला था। अचानक उनके मुँह से एक युक्ति की अवतारणा होते देख मेरी भावुकता को एक और दचका लगा। उन्होंने मेरे वाक्य का यह अर्थ लगाया—जो मेरा लक्ष्य न होते हुए भी सही था—कि मैं मुसलमानों को भी पूजन का अधिकारी मान रहा हूँ।



हाय हिंदू और हाय मुसलमान! आठ सौ वर्ष के निरंतर संघर्ष के बाद, एक दूसरे से इतने नज़दीक रहकर भी, तुमने अपनी एक संस्कृति न बनाई! अभी कुछ हो क्षण पहले सभा में बैठे हुए एक क्षत्रिय अध्यापक को अभिवादन करते हुए एक वैश्य शिष्य ने कहा था—‘सलाम, बाबू साहब।’ शास्त्र-निष्ठ पंडित जी ने डपटकर बताया—‘यह मुसलमानी क़ायदा है।’ क्षत्रिय अध्यापक ने क्षमा याचना सी करते हुए कहा—‘हम लोगों में बुरा रिवाज़ चल गया है।’ लेकिन यह और इसी तरह के दो-चार और बुरे रिवाज़ ही तो हिंदू और मुसलमान नामक दो विशाल शिलापटों को जोड़ने के गोंद थे। आज वह भी टूटने जा रहे हैं, वर्जन परायण हिंदू-भाव सबको धो-पोंछ डालना चाहता है, अभिमानी मुसलमान-भाव कुछ भी ग्रहण करना नहीं चाहता।



मुझे इस समय ऐसा मालूम हुआ कि पश्चिमी महासमुद्र की भयंकर लहरों से दो-चार श्वेतांग नाविक जूझते हुए चले आ रहे हैं। सामने और पीछे जहाँ तक दृष्टि जाती है, केवल पानी ही पानी दिख रहा है, केवल लहरों का फूलकार केवल लोल समुद्र का गर्जन! उनके चेहरे शांत है मस्तिष्क धीर! इस शांति को देखकर मैं डर गया। यह वह शांति थी जिसके पेट में सारी दुनिया का तूफ़ान था। मैं साँस रोक कर उनके असम साहस और धैर्य को देखता रह गया—निर्वाक्, निश्चेष्ट, निस्तब्ध! अंत में ये नाविक भारतीय किनारे पर पहुँचे फिर टिड्डियों के दल की तरह शत-शत नौकाएँ महा समुद्र के लोल वक्ष पर छोड़ दी गईं। भारतीय अंतरीप इस कोने से उस कोने तक इन विदेशियों से भर गया। मौक़ा देखकर इन्होंने दरार पर आघात किया, पहले से ही अलग हिंदू और मुसलमान दूर से दूरतर होते गए। मौक़ा देखकर विदेशी राजा बन बैठे और अपूर्व अध्यवसाय और लगन के साथ दोनों जातियों को समझने की कोशिश करते गए। जितना ही उन्होंने समझा उतना ही भेद-भाव को उत्तेजित किया। आज हम प्रत्येक बात को हिंदू दृष्टिकोण और मुसलमान दृष्टिकोण से देखने के आदी हो गए हैं, मानों ऐसा कोई दृष्टिकोण ही नहीं है जिससे हिंदू और मुसलमान साथ ही देख सकें। मैंने फिर एक चार दीर्घश्वास के साथ मन ही मन कहा—हाय रे हिंदू और हाय रे मुसलमान!



अंत में काफ़ी बहस-मुबाहिस के बाद, सभा दूसरे दिन के लिए स्थगित हुई। मैं अब भी कल्पना के मनोगामी रथ पर आसीन था। मेरे बग़ल में एक तरुण पंडित मित्र बैठे थे। वे दूसरे गाँव से आए थे। एकमात्र वे ही शुरू से आख़िर तक निर्लिप्त भाव से बैठे रहे। उन्होंने सब सुना पर कहीं भी विचलित नहीं हुए, कहीं भी चंचल नहीं हुए मुझे झकझोरते हुए उन्होंने कहा—“चलिए, आज की सभा समाप्त हुईं। आप बहुत उत्तेजित हो जाते हैं।” मैंने कहा—'ठीक है।'



पर क्या ठीक था? मेरे गाँव की यह ठाकुर-बारी कुछ ऐसी महत्वपूर्ण नहीं है कि इसकी अव्यवस्था के कारण विराट हिंदू समाज अणुमात्र भी लज्जा अनुभव करे। और यह सभा? यह तो ततोधिक नगण्य है। फिर क्या कारण है कि इस मामूली-सी सभा ने मेरे मन में भारतीय महामानव समुद्र के प्रत्येक तरंग-विस्फूर्जन की स्मृति उत्पन्न करा दी? शायद यह हिंदू समाज की जीवनी शक्ति का सबूत हो, यह इस विराट महामानव समुद्र की सजीवता का प्रमाण हो। असल बात यह है कि इस महामानव समुद्र का कोई तरंग स्वतंत्र नहीं है। इस मामूली-सी ठाकुर-बारी की समस्या भी सारे विश्व की समस्या के साथ जटिल भाव से उलझी हुई है, उसको विच्छिन्न भाव से सुलझाया नहीं जा सकता। सभाएँ होती रहेंगी, राग-भोग की व्यवस्था होगी भी, नहीं भी होगी, पर समस्या ज्यों की त्यों रहेगी अगर उसे विराट पैमाने पर नहीं सोचा गया। सारे गाँव के मनुष्य सारे जगत के साथ विचित्र भाव से जड़ित हैं, उन पर विश्व की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक सभी प्रकार की गुरुतर समस्याओं का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव पड़ रहा है। वे ठाकुर जी से उदासीन होने को बाध्य हैं। सामने जो मस्जिद जगमगाई हुई है, वह भी समान रूप से उपेक्षित है। आज दस वर्ष पहले वह इतनी जगमगाई नहीं थी। उसकी आज की जगमगाहट उसी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दवाब का परिणाम है जिसके कारण यह ठाकुरबारी उपेक्षित है। एक ही किरण दो रंग के शीशों से प्रतिफलित होकर दो तरह की दिख रही है। यही ठीक था। मैं उठ पड़ा उठते- उठते मैंने फिर सोचा—लेकिन क्या कारण है कि एक ही आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्या के दबाव से वह मुसलमानी मस्जिद जगमगा उठी है, और यह हिंदू मंदिर उपेक्षित है? क्या मुसलमानी धर्म ज़्यादा सजीव है? शायद नहीं। क्या हिंदू धर्म ज़्यादा मुर्दा है? शायद नहीं। असल कारण यह है कि भारतवर्ष के मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, वे हिंदू धर्म के उत्कर्ष से भीत हैं। दूसरी तरफ़ हिंदू धर्म ज़रूरत से ज़्यादा आत्म-विश्वासी हो गया है। मुसलमान अपनी बची-खुची सारी शक्ति समेटकर मुसलमानियत का प्रदर्शन कर रहे हैं। यह अवस्था बहुत दिनों तक नहीं चलने की। वह आगंतुक उत्साह भी समाप्त हो जाएगा। और यह अत्यधिक आत्मबोध-मूलक शैथिल्य तो समाप्त हो ही चला है। जब दोनों समाप्त हो जाएँगे तभी रास्ता सूझेगा, तभी शांति आएगी। तथास्तु।

मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है – हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी निबंध | Manushy Hee Saahity Kaa Lakshy Hai

मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदु:ख कातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है। मैं अनुभव करता हूँ कि हम लोग एक कठिन समय के भीतर से गुज़र रहे हैं। आज नाना भाँति के संकीर्ण स्वार्थों ने मनुष्य को कुछ ऐसा अंधा बना दिया है कि जाति-धर्म-निर्विशेष मनुष्य के हित की बात सोचना असंभव सा हो गया है। ऐसा लग रहा है कि किसी विकट दुर्भाग्य के इंगित पर दलगत स्वार्थ से प्रेम ने मनुष्यता को दबोच लिया है। दुनिया छोटे-छोटे संकीर्ण स्वार्थों के आधार पर अनेक दलों में विभक्त हो गई है। अपने दल के बाहर का आदमी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उसके रोने-गाने तक पर असदुद्देश्य का आरोप किया जाता है। उसके तप और सत्य-निष्ठा का मज़ाक उड़ाया जाता है। उसके प्रत्येक त्याग और बलिदान के कार्य में भी ‘चाल’ का संधान पाया जाता है और अपने-अपने दलों में ऐसा करने वाला सफल नेता भी मान लिया जाता है; परंतु मेरा विश्वास है कि ऐसा करने वाला आदमी सबसे पहले अपना ही अहित करता है। बड़े-बड़े राष्ट्रनायक जब अपनी विराट अनुचरवाहिनी के साथ इस प्रकार का गंदा प्रचार करते हैं, तो ऊपर-ऊपर से चाहे जितनी भी सफलता उनके पक्ष में आती हुई क्यों न दिखाई दे, इतिहास विधाता का निष्ठुर नियम-प्रवाह भीतर-ही-भीतर उनके स्वार्थों का उन्मूलन करता रहता है। इतिहास शक्तिशाली व्यक्तियों और राष्ट्रों की चिताभूमि को कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा है, फिर भी गंदे तरीक़े सुधारे नहीं गए हैं, बल्कि उनको और भी कौशलपूर्ण और प्रभावशाली बनाया जाता रहा है। जो लोग दृष्टा हैं, वे इस ग़लती को समझते हैं; पर उनकी बात मदमत्त व्यक्तियों की ऊँची गद्दियों तक नहीं पहुँच पाती। संसार में अच्छी बात कहने वालों की कमी नहीं है, परंतु मनुष्य के सामाजिक संगठन में ही कहीं कुछ ऐसा बड़ा दोष है, जो मनुष्य को अच्छी बात सुनने और समझने से रोक रहा है। आज की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि अच्छी बात कैसे कही जाए, बल्कि यह है कि अच्छी बात को सुनने और मानने के लिए मनुष्य को तैयार कैसे किया जाए?



इसीलिए साहित्यकार आज केवल कल्पनाविलासी बनकर नहीं रह सकता। शताब्दियों का दीर्घ अनुभव यह बताता है कि उत्तम साहित्य की सृष्टि करना ही सबसे बड़ी बात नहीं है। संपूर्ण समाज को इस प्रकार सचेतन बना देना परमावश्यक है, जो उस उत्तम रचना को अपने जीवन में उतार सके। साहित्यिक सभाएँ यह कार्य कर सकती हैं। संपूर्ण जनसमाज को उत्तम साहित्य सुनाने का माध्यम बना सकती हैं। इस विशाल देश में शिक्षा की मात्रा बहुत ही कम है। जिन देशों में शिक्षा की समस्या हल हो चुकी है, उनके साहित्यिकों की अपेक्षा यहाँ के साहित्यिकों की ज़िम्मेदारी कहीं अधिक है। फिर हमने जिस भाषा के साहित्य-भंडार को भरने का व्रत लिया है, उसका महत्त्व और भी अधिक है। वह भारतवर्ष के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है। इसलिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान का वाहन बनाना है।



हम लोग जब हिंदी की ‘सेवा’ करने की बात सोचते हैं, तो प्रायः भूल जाते हैं कि यह लाक्षणिक प्रयोग है। हिंदी की सेवा का अर्थ है उस मानव-समाज की सेवा, जिसके विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम हिंदी है। मनुष्य ही बड़ी चीज़ है, भाषा उसी की सेवा के लिए है। साहित्य सृष्टि का भी यही अर्थ है। जो साहित्य अपने आपके लिए लिखा जाता है, उसकी क्या क़ीमत है, मैं नहीं कह सकता; परंतु जो साहित्य मनुष्य-समाज को रोग-शोक, दारिद्रय-अज्ञान तथा परमुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है। उसी महत्त्वपूर्ण साहित्य को हम अपनी भाषा में ले आना चाहते हैं। मैं मनुष्य की इस अतुलनीय शक्ति पर विश्वास करता हूँ कि हम अपनी भाषा और साहित्य के द्वारा इस विषम परिस्थिति को बदल सकेंगे।



परंतु हमें सावधानी से सोचना होगा कि हिंदी बोलने वाला जनसमुदाय क्या वस्तु है और वास्तव में वह परिस्थिति क्या है, जिसे हम बदलना चाहते हैं। काल्पनिक प्रेत को घूँसा मारना बुद्धिमानी का काम नहीं है। नगरों और गाँवों में फैला हुआ, सैकड़ों जातियों और संप्रदायों में विभक्त, अशिक्षा, दारिद्रय और रोग से पीड़ित मानव-समाज आपके सामने उपस्थित है। भाषा और साहित्य की समस्या वस्तुतः उन्हीं की समस्या है। क्यों ये इतने दीन-दलित हैं? शताब्दियों की सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक ग़ुलामी के भार से दबे हुए ये मनुष्य ही भाषा के प्रश्न हैं और संस्कृति तथा साहित्य की कसौटी हैं। जब कभी आप किसी विकट प्रश्न के समाधान का प्रयत्न कर रहे हों तो इन्हें सीधे देखें। अमेरिका में या जापान में ये समस्याएँ कैसे हल हुई हैं, यह कम सोचें; किंतु असल में ये हैं क्या और किस या किन कारणों से ये ऐसे हो गए हैं, इसी को अधिक सोचें। बड़े-बड़े विचारकों ने इस देश के जनसमुदाय के अध्ययन का प्रयत्न किया है, अब भी कर रहे हैं; पर ये अध्ययन या तो इन्हें अच्छी प्रजा बनाने के उद्देश्य से किए गए हैं या वैज्ञानिक कुतूहल-निवारण के उद्देश्य से। इनको इस दृष्टि से देखना अभी बाक़ी है कि वे मनुष्य कैसे बनाए जाएँ। हमारी भाषा, हमारा साहित्य, हमारी राजनीति—सब कुछ का उद्देश्य यही हो सकता है कि इनको दुर्गतियों से बचाकर किस प्रकार मनुष्यता के आसन पर बैठाया जाए।



हमारा यह देश जातिभेद का देश है। करोड़ों मनुष्य अकारण अपमान के शिकार हैं। निरंतर दुर्व्यवहार पाते रहने के कारण उनके अपने मन में हीनता की गाँठ पड़ गई है। यह गाँठ जब तक नहीं निकल जाती तब एक भारतवर्ष की आत्मा सुखी नहीं रह सकती। कर्म का फल मिलता ही है। इससे बचने का उपाय नहीं है। जिन लोगों को अकारण अपमान के बंधन में डालकर हमने अपमानित किया है, वे लोग सारे संसार में हमारे अपमान के कारण बने हैं।



हमें सावधानी से उनकी वर्तमान अवस्था का कारण खोजना होगा। ये अनादिकाल से हीन नहीं समझे जाते रहे हैं। नाना प्रकार की ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारण परंपरा के भीतर से गुज़र कर भारतवर्ष की सैकड़ों जातियों वाला समाज तैयार हुआ है। इस शतच्छिद्र कलश में आध्यात्मिक रस टिक नहीं सकता। आजकल हम लोग को हिंदू-मुसलमानों की मिलन-समस्या से बुरी तरह चिंतित हैं। निःसंदेह यह बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इस महान प्रश्न ने हमारे समस्त जीवन को गंभीरतापूर्वक विचारने के लिए चुनौती दी है। हम अपनी भाषा के क्षेत्र में भी इस कठिन समस्या से हतबुद्धि हो रहे हैं। हमारे बड़े-बड़े विचारकों ने प्रत्येक क्षेत्र में सुलह करने का व्रत लिया है; परंतु मुझे ऐसा लगता है कि इससे भी कठोर समस्या का सामना हमें हिंदू-हिंदू मिलन के लिए ही करना है। अशांति के चिह्न अभी से प्रकट होने लगे हैं। जब हम भाषा या साहित्य विषयक किसी प्रश्न का समाधान करने बैठें तो केवल वर्तमान पर दृष्टि निबद्ध रखने से हम घोखा खा सकते हैं। मुझे अपनी बुद्धि या दीर्घदर्शिता का गर्व नहीं है, लेकिन जो कुछ अनुभव करता हूँ, उसे ईमानदारी से प्रकट करने से शायद कुछ लाभ हो जाए, इसी आशा से ये बातें कह रहा हूँ। सैकड़ों व्यर्थ कल्पनाओं की भाँति ये अनंत वायुमंडल में विलीन हो जाएँगी। मुझे ऐसा लगता है कि ज्यों-ज्यों हमारे देशवासियों में आत्मचेतना का संचार होता जाएगा, त्यों-त्यों हिंदू-समाज की भीतरी समस्याएँ उग्र रूप धारण करती जाएँगी। राजनीतिक बंधनों के दूर होते ही हमारी मानसिक या आध्यात्मिक ग़ुलामी का बंधन और भी कठोर प्रतीत होगा। दो-सौ वर्षों की राजनीतिक ग़ुलामी को तोड़ने में हमें जितना प्रयास करना पड़ा है, उससे कहीं अधिक प्रयास करना पड़ेगा इस सहस्त्राधिक वर्षों की सामाजिक और आध्यात्मिक ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने में।



कवि ने बहुत पहले सावधान किया है, “जिसे तुमने नीचे फेंक रखा है, वह तुम्हें नीचे से जकड़कर बाँध लेगा; जिसे पीछे डाल रखा है, वह पीछे खींचेगा। अज्ञान के अंधकार की आड़ में जिसे तुमने ढक रखा है, वह तुम्हारे समस्त मंगल को ढककर घोर व्यवधान की सृष्टि करेगा। हे मेरे दुर्भाग्य ग्रस्त देश! अपमान में तुम्हें समस्त अपमानितों के समान होना पड़ेगा।”



शताब्दियों के विकट अपमान की प्रतिक्रिया कठोर होगी। उसके लिए हमें तैयार होना होगा। मुझे ऐसा लगता है कि जब भाषा और साहित्य के मसले पर विचार किया जाता है तो इस तथ्य को बिल्कुल भुला दिया जाता है। हिंदूओं की अपनी भीतरी समस्याएँ भी हैं और उन भीतरी समस्याओं के लिए जो विचार-विनिमय हुए हैं या हो रहे हैं, वे नाना कारणों से संस्कृत-साहित्य से अधिक प्रभावित हुए हैं। वे किसी के प्रति घृणा या अदूरदर्शिता के कारण नहीं हुए हैं। छोटी कही जाने वाली जातियों में ऊपर उठने की आकांक्षा स्वाभाविक है और उसके लिए उनका संस्कृत-साहित्य की ओर झुकना भी अस्वाभाविक नहीं है। यदि संस्कृत बहुल भाषा के व्यवहार और समस्त जातियों के ब्राह्मण या क्षत्रिय कहे जाने से सात करोड़ आदमियों में अपने को हीन समझने की मनोवृत्ति कुछ कम होती है, तो ऐसा करना वांछनीय है या नहीं, यह मैं देश के नेताओं के विचारने के लिए छोड़ देता हूँ।



एक ज़माना था जब भाषा-विज्ञान और नृतत्त्व-शास्त्र की घनिष्ठ मैत्री में विश्वास किया जाता था। माना जाता था कि भाषा से नस्ल की पहचान होती है परंतु शीघ्र ही यह भ्रम टूट गया। देखा गया है कि ये दोनों शास्त्र एक-दूसरे के विरुद्ध गवाही देते हैं। भारतवर्ष भाषा-विज्ञान और नृतत्त्व-शास्त्र के कलह का सबसे बड़ा अखाड़ा सिद्ध हुआ है। वर्तमान हिंदू-समाज में एक-दो नहीं, बल्कि दर्ज़नों ऐसी जातियाँ हैं, जो अपनी मूल भाषाएँ भूल चुकी हैं और आर्यभाषा बोलती हैं। ब्राह्मण-प्रधान धर्म ने जातियों का कुछ इस प्रकार स्तर-विभाग स्वीकार किया है कि निम्न श्रेणी की जाति हमेशा अवसर पाने पर ऊँचे स्तर में जाने का प्रयत्न करती है। इस देश में जाने किस अनादिकाल से संस्कृत भाषा का प्राधान्य स्वीकार कर लिया गया है कि प्रत्येक नस्ल और फ़िर्के के लोग अपनी भाषा को संस्कृत श्रेणी की भाषा से बदलते रहे हैं। ग्रियर्सन ने अपने विशाल सर्वे में एक भी ऐसा मामला नहीं देखा, जहाँ आर्यभाषा—संस्कृत श्रेणी की भाषा—बोलने वाले किसी जनसमुदाय ने अन्य से अपनी भाषा बदली हो, यहाँ तक कि आर्यभाषा की एक बोली के बोलने वाले ने भी दूसरी बोली को स्वीकार नहीं किया है।



स्पष्ट है कि इस देश में संस्कृत-प्राधान्य कोई नई घटना नहीं है। यह भी स्पष्ट है कि इस भाषा का सहारा लेकर जातियाँ ऊपर उठी हैं। मैं केवल उन तथ्यों को आपके सामने रख रहा हूँ, जिनके आधार पर मेरी यह धारणा बनी है कि इस देश के करोड़ों मनुष्यों में आत्मचेतना भरने का काम बहुत दिन से संस्कृत भाषा करती आई है और आगे भी करती रहेगी, ऐसी संभावना है। यह न समझिए कि जो लोग संस्कृत बहुल भाषा का व्यवहार कर रहे हैं, वे किसी संप्रदाय के प्रति द्वेषवश और घृणावश करते हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि ऐसी बेतुकी बातों पर भी आसानी से विश्वास कर लिया जाता है।



दीर्घकाल से ज्ञान के आलोक से वंचित इन मनुष्यों को हमें ज्ञान देना है। शताब्दियों से गौरव से हीन इन मनुष्यों में हमें आत्मगरिमा का संचार करना है। अकारण अपमानित इन मूक नर-कंकालों को हमें वाणी देनी है। रोग, शोक, अज्ञान, भूख, प्यास, परमुखापेक्षिता और मूकता से इनका उद्धार करना है। साहित्य का यही काम है।



इससे छोटे उद्देश्य को मैं विशेष बहुमान नहीं देता। आप क्या लिखेंगे, कैसे लिखेंगे और किस भाषा में लिखेंगे, इन प्रश्नों का निर्माण इन्हीं की ओर देखकर कीजिए। यदि इनको मनुष्यता के ऊँचे आसन पर आप नहीं बैठा सकते तो साहित्यिक भी नहीं कहे जा सकते; और यह कहना ही आवश्यक है कि स्वयं मनुष्य बने बिना, स्वयं छोटे-छोटे तुच्छ विवादों से ऊपर उठे बिना, कोई भी व्यक्ति दूसरे को नहीं उठा सकता है। साहित्य के साधकों को मनुष्य की सेवा करनी है तो देवता बनना होगा। नान्यः पंथा विद्यतेऽयनाय।



शायद मेरी ही भाँति आप भी इतना अवश्य स्वीकार करते हैं कि इस बहुधा-विभक्त जनसमुदाय को संबद्ध बनाना है। यदि यह बात सत्य है तो मैं समझता हूँ, अभी हमने साहित्य का आरंभ ही नहीं किया है। हिंदी में कितने जनसमूह के परिचायक ग्रंथ हमने लिखे हैं? इस विशाल मानव समाज की रीति-नीति, आचार-विचार, आशा-आकांक्षा, उत्थान-पतन समझने के लिए हमारी भाषा में कितनी पुस्तकें हैं? इनके जीवन को सुखमय बनाने के साधनों, इनकी भूमि, इनके पशु, इनके विनोद-सहचर, इनके पेशे, इनके विश्वास, इनकी नई-नई मनोवृत्तियों का हमने क्या अध्ययन प्रस्तुत किया है? कहाँ है वह सहानुभूति और दर्द का प्रमाण, जिसे आप गणदेवता के सामने रख सकेंगे? हिंदी की उन्नति का अर्थ उसके बोलने और समझने वालों की उन्नति है।



अपना यह देश कोई नया साहित्यिक प्रयोग करने नहीं निकला है। इसकी साहित्यिक-परंपरा अत्यंत दीर्घ, धारावाहिक और गंभीर है। साहित्य नाम के अंतर्गत मनुष्य जो कुछ भी सोच सकता है, उस सबका प्रयोग इस देश में सफलतापूर्वक हो चुका है। वह अपनी भाषा का दुर्भाग्य है कि हमारी प्राचीन चिंतनराशि को उसमें संचित नहीं किया गया है। संस्कृत, पालि और प्राकृत की बढ़िया पुस्तकों के जितने उत्तम अनुवाद अंग्रेज़ी, फ़्रेंच और जर्मन आदि भाषाओं में हुए हैं, उतने हिंदी में नहीं हुए। परंतु दुर्भाग्य भी लाक्षणिक प्रयोग है और यह वस्तुतः उस विशाल मानव-समाज का दुर्भाग्य है, जो भाषा के ज़रिए ही ज्ञान-अर्जन करना चाहता है या करता है। यह विशाल साहित्य अपनी भाषाओं में यदि अनूदित होता तो हमारा साहित्यिक सहज ही उन सैकड़ों प्रकार के अपप्रचारों और हीन भावनाओं का शिकार होने से बच जाता, जो आज संपूर्ण समाज को दुर्बल और परमुखापेक्षी बना रहे हैं। विभिन्न स्वार्थ के पोषक प्रचार इस देश की अतिमात्र विशेषताओं का डंका प्रायः पीटा करते हैं।



इतिहास को कभी भौगोलिक व्याख्या के भीतर से, कभी जातिगत और कभी धर्मगत विशेषताओं के भीतर से प्रतिफलित करके समझाया जाता है कि हिंदुस्तानी जैसे हैं, उन्हें वैसा ही होना है और उसी रूप में बना रहना ही उनके लिए श्रेयस्कर है। इतिहास की जो अभद्र व्याख्या इन भिन्न-भिन्न विशेषताओं के भीतर से देखने वाले प्रचारकों ने की है, वह हमारे रोम-रोम में व्याप्त होने लगीं हैं। अगर इस ज़हर को दूर करना है तो प्राचीन ग्रंथों के देशी प्रामाणिक संस्करण और अनुवाद करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। लेकिन अपनी भाषा में प्राचीन ग्रंथों को हमें सिर्फ़ इसलिए नहीं भरना है कि हमें दूसरे स्वार्थी लोगों के अपप्रचार के प्रभाव से मुक्त होना है। विदेशी पंडितों ने अपूर्व लगन और निष्ठा के साथ हमारे प्राचीन शास्त्रों का अध्ययन, मनन और संपादन किया है। हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए; परंतु यह बात भूल नहीं जाना चाहिए कि अधिकांश विदेशी पंडितों के लिए हमारे प्राचीन शास्त्र नुमाइशी वस्तुओं के समान हैं। उनके प्रति उनका जो सम्मान है, उसे अंग्रेज़ी के ‘म्यूज़ियम इंटरेस्ट’ शब्द से भी समझाया जा सकता है। नुमाइश में रखी हुई चीज़ों को हम प्रशंसा और आदर की दृष्टि से देखते हैं, परंतु निश्चित जानते हैं कि हम अपने जीवन में उनका व्यवहार नहीं कर सकते। किसी मुग़ल सम्राट का चोगा किसी प्रदर्शिनी में दिख जाए तो हम उसकी प्रशंसा चाहे जितनी करें, पर हम निश्चित जानेंगे कि उसको हमें धारण नहीं करना है। परंतु भारतीय शास्त्र हमारे देशवासियों के लिए प्रदर्शिनी की वस्तु नहीं हैं, वे हमारे रक्त में मिले हुए हैं। भारतवर्ष आज भी उनकी व्यवस्था पर चलता है और उनसे प्रेरणा पाता है। इसीलिए हमें इन ग्रंथों का अपने ढंग से संपादन करके प्रकाशन करना है, इनके ऐसे अनुवाद प्रकाशित करने हैं, जो पुरानी अनुश्रुति से विच्छिन्न और असंबद्ध भी न हों और आधुनिक ज्ञान के आलोक में देख भी लिए गए हों। यह बड़ा विशाल कार्य है। संस्कृत भारतवर्ष की अपूर्व महिमाशालिनी भाषा है। वह हज़ारों वर्षों के दीर्घकाल में और लाखों वर्गमील में फैले हुए मानव-समाज के सर्वोत्तम मस्तिष्कों में विहार करने वाली भाषा है। उसका साहित्य विपुल है। उसका साधन गहन है और उसका उद्देश्य साधु है। उस भाषा को हिंदी-माध्यम से समझने का प्रयत्न करना भी एक तपस्या है। उस तपस्या के लिए संयम तथा आत्मबल की आवश्यकता है। हमें अपनी संपूर्ण शक्ति लगाकर गंभीरतापूर्वक उसके अध्ययन में जुट जाना चाहिए। हिंदी को संस्कृत से विच्छिन्न करके देखने वाले उसकी अधिकांश महिमा से अपरिचित हैं।



महान कार्य के लिए विशाल हृदय होना चाहिए। हिंदी का साहित्य सचमुच महान कार्य है, क्योंकि उससे करोड़ों का भला होना है। हम आजकल प्रायः गर्वपूर्वक कहा करते हैं कि हिंदी बोलने वालों की संख्या भारतवर्ष में सबसे अधिक है। मैं समझता हूँ, यह बात चिंता की है, क्योंकि हिंदी बोलने वाले जन-समूह की मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक भूख मिटाने का काम सहज नहीं है।



भारतवर्ष के पड़ोसी देशों में आजकल हिंदी-साहित्य पढ़ने और समझने में तीव्र लालसा जाग्रत हुई है। चीन से, मलय से, सुमात्रा से, जावा से—समस्त एशिया से माँग आ रही है। एशिया के देश अब अंग्रेज़ी पुस्तकों में प्राप्त सूचनाओं से संतुष्ट नहीं हैं। वे देशी दृष्टि से देशी भाषा में लिखा हुआ साहित्य खोजने लगे हैं। आगे यह जिज्ञासा और भी तीव्र होगी। मुझे चिंता होती है कि क्या हम अपने को इस उठती हुई श्रद्धा के उपयुक्त पात्र सिद्ध कर सकेंगे? जिस दिन इतिहास-विधाता हमें ठेलकर विश्व-जनता के दरबार में ला पटकेंगें, उस दिन तक क्या हम इतना भी निश्चय कर सके होंगे कि हमारी भाषा कैसी होगी, उसमें भिन्न-भिन्न भाषाओं के शब्दों का अनुपात क्या होगा और शब्दों के ‘शुद्ध’ और ‘गैर-शुद्ध’ उच्चारणों में से कौन-सा अपनाया जाएगा?



समूचे जनसमूह में भाषा और भाव की एकता और सौहार्द का होना अच्छा है। इसके लिए तर्क-शास्त्रियों की नहीं, ऐसे सेवाभावी व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो समस्त बाधाओं और विघ्नों को शिरसा स्वीकार करके काम करने में जुट जाते हैं। वे ही लोग साहित्य का भी निर्माण करते हैं और इतिहास का भी। आज काम करना बड़ी बात है। इस देश में हिंदू हैं, मुसलमान हैं, स्पृश्य हैं, अस्पृश्य हैं, संस्कृत हैं, फ़ारसी हैं—विरोधों और संघर्षों की विराट वाहिनी है; पर सबके ऊपर मनुष्य है। विरोधों को दिन-रात याद करते रहने की अपेक्षा अपनी शक्ति का संबल लेकर उसकी सेवा में जुट जाना अच्छा है। जो भी भाषा आपके पास है, उससे बस मनुष्य को ऊपर उठाने का काम शुरू कर दीजिए। आपका उद्देश्य आपकी भाषा बना देगा।



अच्छी बात करने वालों की कमी इस देश में कभी नहीं रही है। आज भी बहुत ईमानदारी और सच्चाई के साथ अच्छी बात करने वाले आदमी इस देश में कम नहीं हैं। उन्होंने प्रेम और भ्रातृभाव का मंत्र बताया है। आदिकाल से महापुरुषों ने प्रेम और सौहार्द का संदेश सुनाया है। कहते हैं, व्यासदेव ने अंतिम जीवन में निराश होकर कहा था कि मैं भुजा उठाकर चिल्ला रहा हूँ कि धर्म ही प्रधान वस्तु है, उसी से अर्थ और काम की प्राप्ति होती है, पर मेरी कोई सुन नहीं रहा है—



ऊर्ध्वबाहुविरौम्येष नैव कश्चिच्छुणोति मे।



धर्मादर्थश्च कामश्च स धर्म किं न सेव्यताम्॥



ऐसा क्यों हुआ? इसलिए कि समाज के ऐतिहासिक विकास, आर्थिक संयोजन और सामाजिक संगठन के मूल में ही कुछ ऐसी ग़लती रह गई है कि एक दल जिसे धर्म समझता है, दूसरा उसे नहीं समझ पाता। इस वैषम्य को ध्यान में रखकर ही प्रेम सौहार्द का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। दही में जितना भी दूध डालिए, दही होता जाएगा। शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।



मेरी अल्प बुद्धि में तो यही सूझता है कि समाज के नाना स्तरों के लिए अलग-अलग ढंग की भाषा होगी। नाना उद्देश्यों की सिद्धि के लिए नाना भाँति के प्रयत्न करने होंगे। सारे प्रतीयमान विरोधों का सामंजस्य एक ही बात से होगा—मनुष्य का हित।



भारत के हज़ारों गाँवों और शहरों में फैली हुई सैकड़ों जातियों और उप-जातियों में विभक्त सभ्यता को नाना सीढ़ियों पर खड़ी हुई यह जनता ही हमारे समस्त वक्तव्यों का लक्ष्यीभूत श्रोता है। उसका कल्याण ही साध्य है; बाक़ी सबकुछ साधन है—संस्कृत भी और फ़ारसी भी, व्याकरण भी और छंद भी, साहित्य भी और विज्ञान भी, धर्म भी और ईमान भी। हमारे समस्त प्रयत्नों का एकमात्र लक्ष्य यही मनुष्य है। उसको वर्तमान दुर्गति से बचाकर भविष्य में आत्यंतिक कल्याण की ओर उन्मुख करना ही हमारा लक्ष्य है। यही सत्य है, यही धर्म है। सत्य वह नहीं है जो मुख से बोलते हैं। सत्य वह है जो मनुष्य के आत्यंतिक कल्याण के लिए किया जाता है। नारद ने शुकदेव से कहा था कि सत्य बोलना अच्छा है, पर हित बोलना और भी अच्छा है। मेरे मत से सत्य वह है, जो भूत-मात्र के आत्यंतिक कल्याण का हेतु हो—



सत्यस्य वचनं श्रेय: सत्यादपि हितं वदेत्।



यद्भूतहितमत्यंतमेतत् सत्यं मतं मम्॥



यही सर्वभूत का आत्यंतिक कल्याण साहित्य का चरम लक्ष्य है। जो साहित्य केवल कल्पना-विलास है, जो केवल समय काटने के लिए लिखा जाता है, वह बड़ी चीज़ नहीं है। बड़ी चीज़ वह है, जो मनुष्य को आहार-निद्रा आदि पशु सामान्य धरातल से ऊपर उठाता है। मनुष्य का शरीर दुर्लभ वस्तु है, इसे पाना ही कम तप का फल नहीं है; पर इसे महान लक्ष्य की ओर उन्मुख करना और भी श्रेष्ठ कार्य है।



इधर कुछ ऐसी हवा बही है कि हर सस्ती चीज़ को साहित्य का वाहन माना जाने लगा है। इस प्रवृत्ति को ‘वास्तविकता’ के ग़लत नाम से पुकारा जाने लगा। तरह-तरह की दलीलें देकर यह बताने का प्रयत्न किया जा रहा है कि मनुष्य की लालसोन्मुख वृत्तियाँ ही साहित्य के उपयुक्त वाहन हैं। मुझे किसी मनोरोग के विपक्ष में या पक्ष में कुछ भी नहीं कहना है। मुझे सिर्फ़ इतना ही कहना है कि साहित्य के उत्कर्ष या अपकर्ष के निर्णय की एकमात्र कसौटी यही हो सकती है कि वह मनुष्य का हित साधन करता है या नहीं। जिस बात के कहने से मनुष्य पशु-सामान्य धरातल के ऊपर नहीं उठता, वह त्याज्य है। मैं उसी को सस्ती चीज़ कहता हूँ। सस्ती इसलिए कि उसके लिए किसी प्रकार के संयम या तप की ज़रूरत नहीं होती। धूल में लोटना बहुत आसान है परंतु धूल में लोटने से संसार का कोई बड़ा उपकार नहीं होता और न किसी प्रकार के मानसिक संयम का अभ्यास ही आवश्यक है। और जैसा कि रविंद्रनाथ ने कहा कि यदि कोई नि:संकोच धूल में लोट पड़े तो इसे हम बहुत बड़ा पुरुषार्थ नहीं कह सकते। हम इस बात को डरने योग्य भी नहीं मानेंगे; परंतु यदि दस-पाँच भले आदमी ऊँचे गले से यही कहना शुरू कर दें कि धूल में लोटना ही उस्तादी है तो थोड़ा डरना आवश्यक हो जाता है। भय का कारण इसका सस्तापन है। मनुष्य में बहुत सी आदिम मनोवृत्तियाँ हैं, जो ज़रा-सा सहारा पाते ही झनझना उठती हैं। अगर उनको भी साहित्य-साधना का बड़ा आदर्श कहा जाने लगे तो उस मानने और पालन करने वालों की कमी नहीं रहेगी। ऐसी बातों को इस प्रकार प्रोत्साहित किया जाता है कि मानो यह कोई साहस और वीरता का काम है।



पुरानी सड़ी रूढ़ियों का मैं पक्षपाती नहीं हूँ, परंतु संयम और निष्ठा पुरानी रूढ़ियाँ नहीं हैं। वे मनुष्य के दीर्घ आयास से उपलब्ध गुण हैं और दीर्घ आयास से ही पाए जाते हैं। इनके प्रति विद्रोह प्रगति नहीं है। आदिम युग में मनुष्य की जो वृत्तियाँ अत्यंत प्रबल थीं, वे निश्चय ही अब भी हैं और प्रबल भी हैं। परंतु मनुष्य ने अपनी तपस्या से उनको अपने वश में किया है और वश में करने के कारण वह उनको सुंदर बना सका है। मनुष्य के रंगमंच पर आने के पहले प्रकृति लुढ़कती-पुढ़कती चली आ रही थी। प्रत्येक कार्य अपने पूर्ववर्ती कार्य का परिणाम है। संसार की कार्य-कारण परंपरा में कहीं फाँक नहीं थी। जो वस्तु जैसी होने को है, वह वैसी होगी। इसी समय मनुष्य आया। उसने इस नीरंध्र ठोस कार्य-कारण परंपरा में एक फाँक का आविष्कार किया। जो जैसा है, उसे वैसा ही मानने से उसने इंकार कर दिया। उसे उसने अपने मन के अनुकूल बनाने का प्रयत्न किया। सो मनुष्य की पूर्ववर्ती सृष्टि किसी प्रकार बनती जा रही थी, मनुष्य ने उसे अपने अनुकूल बनाना चाहा—यहीं मनुष्य पशु से अलग हो गया। वह पशु-सामान्य धरातल से ऊपर उठा। बार-बार उसे उसी धरातल की ओर उन्मुख करना प्रगति नहीं, यह पीछे लौटने का काम है। मैं मानता हूँ कि न तो कभी ऐसा समय रहा है, जब लालसा को उत्तेजना देने वाला साहित्य न लिखा गया हो और न कोई ऐसा देश है जहाँ ऐसी बातें न लिखी गई हों; परंतु मेरा विश्वास है कि मनुष्य सामूहिक रूप से इस ग़लती को महसूस करेगा और त्याग देगा। यह ठीक है, कि मनुष्य का इतिहास उसकी ग़लतियों का इतिहास है, पर यह और भी ठीक है कि मनुष्य बराबर ग़लतियों पर विजय पाता आता है। लालसा को उत्तेजना देने वाला साहित्य उसकी ग़लती है। एक-न-एक दिन वह इस पर अवश्य विजय पाएगा।



सत्य अपना पूरा मूल्य चाहता है। उसके साथ समझौता नहीं हो सकता। साहित्य के चरम सत्य को पाने के लिए भी उसका पूरा-पूरा मूल्य चुकाना ही समीचीन है। जो लोग पद-पद पर सहज और सीधे साधनों की दुहाई दिया करते हैं, शायद किसी बड़े लक्ष्य की बात नहीं सोचते। मनुष्य को उसके उच्चतर लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए उसके प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली वृत्तियों के साथ सुलह करने से काम नहीं चलेगा। कठोर संयम और त्याग द्वारा ही उसे बड़ा बनाया जा सकेगा। जो बात एक क्षेत्र में सत्य है, वह सभी क्षेत्रों में सत्य है—साहित्य में, भाषा में, आचार में, विचार में, सर्वत्र। भाषा को ही लीजिए। मनुष्य अपने आहार और निद्रा के साधनों को जुटाने के लिए जिस भाषा का व्यवहार करता है, उसकी अनायास लब्ध भाषा है; परंतु यदि उसे इस धरातल से ऊपर उठाना है तो उतने से काम नहीं चलेगा। सहज भाषा आवश्यक है। पर सहज भाषा का मतलब है सहज ही महान बनाने वाली भाषा, रास्ते में बटोरकर संग्रह की हुई भाषा नहीं।



सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है। स्वदेश और विदेश के वर्तमान और अतीत के समस्त वाङ्मय का रस निचोड़ने से वह सहज भाव प्राप्त होता है। हर अदना आदमी क्या बोलता है या क्या नहीं बोलता, इस बात से सहज भाषा का अर्थ स्थिर नहीं किया जा सकता। क्या कहने या क्या न कहने से मनुष्य उस उच्चतर आदर्श तक पहुँच सकेगा, जिसे संक्षेप में ‘मनुष्यता’ कहा जाता है, यही मुख्य बात है। सहज मनुष्य ही सहज भाषा बोल सकता है। दाता महान होने से दान महान होता है।



जिन लोगों ने गहन साधना करके अपने को सहज नहीं बना लिया है, वे सहज भाषा नहीं पा सकते। व्याकरण और भाषाशास्त्र के बल पर यह भाषा नहीं बनाई जा सकती, कोशों में प्रयुक्त शब्दों के अनुपात पर इसे नहीं गढ़ा जा सकता। कबीरदास और तुलसीदास को यह भाषा मिली थी, महात्मा गांधी को भी यह भाषा मिली, क्योंकि वे सहज हो सके। उनमें दान करने की क्षमता थी! शब्दों का हिसाब लगाने से यह दातृत्व नहीं मिलता, अपन को दलित द्राक्षा के समान निचोड़कर महासहज के समर्पण कर देने से प्राप्त होता है। जो अपने को नि:शेष भाव से दे नहीं सका, वह दाता नहीं हो सकता। आप में अगर देने लायक वस्तु है तो भाषा स्वयं सहज हो जाएगी। पहले सहज भाषा बनेगी, फिर उसमें देने योग्य पदार्थ भरे जाएँगे यह ग़लत रास्ता है। सही रास्ता यह है कि पहले देने की क्षमता उपार्जन करो—इसके लिए तप की ज़रूरत है, साधना की ज़रूरत है, अपने को नि:शेष भाव से दान कर देने की ज़रूरत है।



हिंदी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज़ बनाए रहेगी, जनचित्त में आत्म-बल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी। उसका कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं है, क्योंकि उसकी जीवनी-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने आपकी भीतरी शक्ति से महत्त्वपूर्ण आसन अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।



शायद ही संसार में ऐसी कोई भाषा हो, जिसकी उन्नति में पद-पद पर इतनी बाधा पहुँचाई गई हो, फिर भी जो इस प्रकार अपार शक्ति संचय कर सकी हो। आज वह सैकड़ों ‘प्लेटफ़ार्मों’ से, कोड़ियों से, विद्यालयों से और दर्जनों प्रेसों से नित्य मुखरित होने वाली परम शक्तिशालिनी भाषा है। उसकी जड़ जनता के हृदय में है। वह करोड़ों नर-नारियों की आशा और आकांक्षा, क्षुधा और पिपासा, धर्म और विज्ञान की भाषा है। हिंदी सेवा का अर्थ करोड़ों की सेवा है। इसका अवसर मिलना सौभाग्य की बात है।



(दो)



वास्तव में हमारे अध्ययन की सामग्री प्रत्यक्ष मनुष्य है। आपने इतिहास में इसी मनुष्य की धारावाहिक जययात्रा की कहानी पढ़ी है, साहित्य में इसी के आवेगों, उद्वेगों और उल्लासों का स्पंदन देखा है, राजनीति में इसकी लुका-छिपी के खेल का दर्शन किया है, अर्थशास्त्र में इसी की रीढ़ की शक्ति का अध्ययन किया है। यह मनुष्य ही वास्तविक लक्ष्य है। आप इससे सीधा संबंध जोड़ने जा रहे हैं। यह जो प्रत्यक्ष मनुष्य का पढ़ना है, वही बड़ी बात है। हमारी शिक्षा का अधिक भाग जिन सब दृष्टांतों का आश्रय लेता है, वे हमारे सामने नहीं आते। हमारा इतिहास पढ़ना तब तक व्यर्थ है, जब तक हम उसे इस जीवंत मानव-प्रवाह के साथ एक करके न देख सकें। हमारे देश का इतिहास—यदि वह सचमुच ही हमारे देश का है—आज भी निश्चय ही हमारे घरों में, गाँवों में, जातियों में, खंडहरों में और इस देश के ज़र्रे-ज़र्रे में अपना चिह्न छोड़ता जा रहा है। जब तक देश के इन प्रत्येक कणों से हमारा प्रत्यक्ष संबंध नहीं स्थापित होता तब तक हम इतिहास का वास्तविक ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकेंगे? हममें से जो कोई भी अपने को शिक्षित समझता हो, उसे अपनी उच्च अट्टालिका से नीचे उतरकर अपने देश के इर्द-गिर्द फैले हुए विशाल जनसमूह, विस्तृत भूखंड और सजीव चिंता-प्रवाह को ही प्रधान पाठ्य-पुस्तक बनाना होगा। पुस्तकें इसी महाग्रंथ को समझाने का साधन मानी जानी चाहिए। नोटों और कुंजियों को उत्पन्न करने वाली मनोवृत्ति का निर्दयतापूर्वक दमन कर देना चाहिए। हम लोग नृतत्त्व के ग्रंथ न पढ़ते हों सो बात नहीं है, किंतु जब हम देखते हैं कि ग्रंथ पढ़ने के कारण हमारे घरों के निकट जो चमार, धीवर, कोढ़ी, कुम्हार लोग रहते हैं, उनके पूरे परिचय पाने के लिए हमारे हृदयों में ज़रा भी उत्सुकता नहीं उत्पन्न होती तब अच्छी तरह समझ में आ जाता है कि पुस्तकों के संबंध में हमें कितना अंध-विश्वास हो गया है, पुस्तकों को हम कितना बड़ा समझते हैं और पुस्तकें वस्तुतः जिनकी छाया हैं, उनको कितना तुच्छ मानते हैं। यह ढंग ग़लत है। इसमें सुधार होना चाहिए। विद्या के क्षेत्र में ‘सेकेंड हैंड’ ज्ञान की प्रधानता स्थापित होना वांछनीय नहीं है। दुर्भाग्यवश अपने देश में ऐसे ही ज्ञान की प्रधानता स्थापित हो गई है। हमें यदि सचमुच कुछ नया करना है तो बड़े विकट प्रयास करने पड़ेंगे। समूचे देश के मस्तिष्क में जो जड़-संस्कार पैदा कर दिए गए, उनसे जूझना पड़ेगा, इसका समर्थन तभी हो सकता है, जब हम दृढ़ होकर प्रत्यक्ष ज्ञान की ओर अग्रसर हों।



आप में से अधिकांश का मार्ग शायद मातृभाषा और उसके साहित्य द्वारा देश की सेवा करना हो। यह बड़ा उत्तम मार्ग है। परंतु हमें अच्छी तरह समझ लेने की आवश्यकता है कि साहित्य-सेवा या मातृभाषा की सेवा का क्या अर्थ है। किसे सामने रखकर आप साहित्य लिखने जा रहे हैं? आपके वक्तव्यों का लक्ष्यीभूत श्रोता कौन है? हिंदी भाषा कोई देवी-देवता की मूर्ति का नाम नहीं है। हिंदी की सेवा करने का अर्थ हिंदी की प्रतिमा बनाकर पूजना नहीं है। यह लाक्षणिक प्रयोग है। इसका अर्थ है—हिंदी के माध्यम द्वारा समझने वाली विशाल जनता की सेवा। कभी-कभी हम लोग इस भाषा से प्राप्त होने वाले अन्यायों से विक्षुब्ध होकर ग़लत ढंग के स्वभाषा-प्रेम का परिचय देते हैं। अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने साहित्य से प्रेम होना बुरी बात नहीं है, पर जो प्रेम ज्ञान द्वारा चालित और श्रद्धा द्वारा अनुगमित होता है, वही प्रेम अच्छा है। केवल ज्ञान बोझ है, केवल श्रद्धा अंधा बना देती है। हिंदी के प्रति जो हमारा प्रेम है, वह भी ज्ञान द्वारा चालित और श्रद्धा द्वारा अनुगमित होना चाहिए। हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है? हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है कि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकता है। हमारे पूर्वजों ने दीर्घकाल की तपस्या और मनन से जो ज्ञानराशि संचित की है, उसे सुरक्षित रखने का यह सबसे मज़बूत पात्र है, अकारण और सकारण शोषित और पोषित, मूढ़, निर्वाक जनता तक आशा और उत्साह का संदेश इसी जीवंत और समर्थ भाषा के द्वारा पहुँचाया जा सकता है। यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जनसाधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है। यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो ‘हिंदी-हिंदी’ चिल्लाना व्यर्थ है। यदि वह यह काम कर सकती है तो उसका भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। यदि वह इन महान उद्देश्यों के अनुकूल है तो फिर वह इस देश में हिमालय की भाँति अचल होकर रहेगी। हिमालय की ही भाँति उन्नत, उतनी ही महान हिंदी जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह जनता के चित्त में आत्मबल संचारित करती रहेगी, उसके हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाती रहेगी, तब तक उसका जीवन सार्थक है। जो लोग इस भाषा और उसके साहित्य की सेवा करने का व्रत करने जा रहे हों, उन्हें यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए।



भारतवर्ष क्या है? अनादिकाल के नाना जातियाँ अपने नाना भाँति के संस्कार, रीति-रस्म आदि लेकर इस देश में आती रही हैं। यहाँ भी अनेक प्रकार के मानवीय समूह विद्यमान रहे हैं। ये जातियाँ कुछ देर तक झगड़ती रही हैं और फिर रगड़-झगड़कर, ले-देकर पास-ही-पास बस गई हैं—भाइयों की तरह। इन्हीं नाना जातियों, नाना संस्कारों, नाना धर्मों, नाना रीति-रस्मों का जीवंत समन्वय यह भारतवर्ष है। विदेशी पराधीनता ने इसके स्वाभाविक विकास में बाधा पहुँचाई है। उसका बाह्यरूप विचित्र-सा दिखाई दे रहा है। इसी वैचित्र्यपूर्ण जनसमूह को आशा और उत्साह का संदेश देना साहित्य-सेवा का लक्ष्य है। हज़ारों गाँवों और शहरों में फैली हुई, शताधित जातियों और उप-जातियों में विभक्त, सभ्यता के नाना स्तरों पर ठिठकी हुई यह जनता ही हमारे समस्त प्रयत्नों का लक्ष्य है। इसका कल्याण ही साध्य है। बाक़ी सब कुछ साधन है। आपने जो अपनी भाषा पर अधिकार प्राप्त किया है, वह अपने आप में अपना अंत नहीं है। वह साधन है। इसे भाषा के सहारे आपको इस जनता तक पहुँचना है। इसको निराशा और पस्त हिम्मती से बचाना आपका कर्तव्य है; परंतु यह कोई सरल काम नहीं है। केवल कुछ अच्छा करने की इच्छा मात्र से यह काम नहीं होगा। आज की समस्याएँ बड़ी उलझनदार और जटिल हैं। बिजली की बत्ती मुँह से फूँककर नहीं बुझाई जाती है। यह समझने की ज़रूरत है कि जो दुर्गति आज हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं, उसका वास्तविक कारण क्या है? साहित्य का साधक केवल कल्पना की दुनिया में विचरण करके, केवल ‘हाय-हाय’ को या ‘वाह-वाह’ की पुकार करके अपने सामने की कुत्सित कुरूपता को नहीं बदल सकता। हमें उस समूची विद्या को सीखना पड़ेगा, जो विश्व-रहस्य से नए-नए द्वार खोल रही है, जो प्रकृति के समस्त गुप्त भंडार पर धावा बोलने के लिए बद्धपरिकर है, जो मनुष्य को असीम सुख और समृद्धि तक ले जा सकती है, फिर हमें उस स्वार्थ-शक्ति को भी समझना है, जो इस विद्या का ग़लत प्रयोग करने वाले मनुष्य को सर्वत्र लांछित और अपमानित कर रही है। साहित्य का कारोबार मनुष्य के समूचे जीवन को लेकर है। जो लोग आज भी यह सोचते हैं कि साहित्य के लिए कुछ ख़ास-ख़ास विषय ही पढ़ने के हैं, वे बड़ी ग़लती करते हैं। आज की जनता की दुर्दशा को यदि आप सचमुच ही उखाड़ फेंकना चाहते हैं तो आप चाहे जो भी मार्ग लें, राजनीति से अलग होकर नहीं रह सकते, अर्थनीति की उपेक्षा नहीं कर सकते और विज्ञान की नई प्रवृत्तियों से अपरिचित रहकर कुछ भी नहीं कर सकते। साहित्य केवल बुद्धि विलास नहीं है। वह जीवन की वास्तविकता की उपेक्षा करके सजीव नहीं रह सकता।



साहित्य के उपासक अपने पैर के नीचे की मिट्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते। हम सारे बाह्य जगत को असुंदर छोड़कर सौंदर्य की सृष्टि नहीं कर सकते। सुंदरता सामंजस्य का नाम है। जिस दुनिया में छोटाई और बड़ाई में, धनी और निर्धन में, ज्ञानी और अज्ञानी में, आकाश-पाताल का अंतर हो वह दुनिया बाह्य सामंजस्य नहीं कही जा सकती और इसलिए वह सुंदर भी नहीं है। इस बाह्य असुंदरता के ढूह में खड़े होकर आंतरिक सौंदर्य की उपासना नहीं हो सकती। हमें उस बाह्य असौंदर्य को देखना ही पड़ेगा। निरन्न, निर्वसन जनता के बीच खड़े होकर आप परियों के सौंदर्य-लोक की कल्पना नहीं कर सकते। साहित्य सुंदर का उपासक है; इसलिए असामंजस्य को दूर करने का प्रयत्न पहले करना होगा; अशिक्षा और कुशिक्षा से लड़ना होगा; भय और ग्लानि से लड़ना होगा। सौंदर्य और असौंदर्य का कोई समझौता नहीं हो सकता। सत्य अपना पूरा मूल्य चाहता है। उसे पाने का सीधा और एकमात्र रास्ता उसकी क़ीमत चुका देना ही है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं है। हमारे देश का बाह्य रूप न तो आँखों की प्रीति देने लायक है, न कानों को, न मन को न बुद्धि को। यह सचाई है।



यदि किसी देश का बाह्य रूप सम्मान योग्य तथा सुंदर नहीं बन सका है तो समझना चाहिए कि उस राष्ट्र की आत्मा में एक उच्च जगत का निर्माण किया जाना शुरू नहीं हुआ है, अर्थात् वहाँ सच्चे साहित्य के निर्माण का श्रीगणेश नहीं हुआ है। साहित्य ही मनुष्य को भीतर से सुसंस्कृत तथा उन्नत बनाता है और तभी उसका बाह्य रूप भी साफ़ और स्वस्थ दिखाई देता है। और साथ ही बाह्य रूप के साफ़ और स्वस्थ होने से आंतरिक स्वास्थ्य का भी आरंभ होता है। दोनों ही बातें अन्योन्याश्रित हैं। जबकि हमारे देश में नाना भाँति के कुसंस्कार और गंदगी वर्तमान है जबकि हमारे समाज का आधा अंग पर्दे में ढका हुआ है, जब कि हमारी नब्बे फ़ीसदी जनता अज्ञान के मलबे के नीचे दबी हुई है तब हमें मानना चाहिए कि अभी दिल्ली बहुत दूर है। हम साहित्य के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं और जो कुछ दे रहे हैं, उसमें कहीं बड़ी भारी कमी रह गई है। हमारा भीतर और बाहर आप ही साफ़-स्वस्थ नहीं है। साहित्य की साधना तब तक बाध्य ही रहेगी जब तक हम पाठकों में एक ऐसी अदमनीय आकांक्षा जाग्रत न कर दें जो सारे मानव-समाज को भीतर से और बाहर से सुंदर तथा सम्मान योग्य देखने के लिए सदा व्याकुल रहे। अगर यह आकांक्षा जागृत हो सकी तो हममें से प्रत्येक अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार उन सामग्रियों को ज़रूर संग्रह कर लेगा जो उक्त इच्छा की पूर्ति की सहायक हैं। अगर यह आकांक्षा जाग्रत नहीं हुई तो कितनी भी विद्या क्यों न पढ़ी हो, वह एक जंजाल मात्र सिद्ध होगी और दुनियादारी और चालाकी का ढकोसला ही बनी रहेगी। जो साहित्यिक-निष्ठा के साथ इच्छा को लेकर रास्ते पर निकल पड़ेगा वह स्वयं अपना रास्ता खोज निकालेगा। साधन की अल्पता से कोई महती इच्छा आज तक नहीं रुकी है। भूख होनी चाहिए, एक बार भूख होने पर खाद्य-सामग्री जुट ही जाती है पर खाद्य-सामग्री के भरे रहने पर भूख नहीं लगती है। गरुड़ ने उत्पन्न होते ही कहा, “माँ, बहुत भूख लगती है।” माता विनता घबराकर विलाप करने लगी कि इस प्रचंड क्षुधाशाली पुत्र को अन्न कहाँ से दें। पिता कश्यप ने आश्वासन देकर कहा था, “कोई चिंता की बात नहीं। महान् पुत्र उत्पन्न हुआ है; क्योंकि उसकी भूख महान् है।” हमारी भाषा को भी इस समय प्रचंड साहित्यिक क्षुधा वाले महान पुत्र की आवश्यकता है। जब तक हमारी मातारूपी भाषा के गर्भ से ऐसे कृती पत्र पैदा नहीं होते, तभी तक वह विनता की तरह कष्ट पा रही है। जिस दिन ऐसे पुत्र पैदा होंगे, उस दिन मातृभाषा धन्य हो जाएगी।



इस देश में हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ब्राह्मण हैं, चांडाल हैं, धनी हैं, ग़रीब हैं—विरुद्ध संस्कारों और विरोधी स्वार्थों की विराट वाहिनी हैं। इसमें पद-पद पर ग़लत समझे जाने का अंदेशा है, प्रतिक्षण विरोधी स्वार्थों के संघर्ष में पिस जाने का डर है, संस्कारों और भावावेशों का शिकार हो जाने का अंदेशा है; परंतु इन समस्त विरोधों और संघातों से बड़ा और सबको छापकर विराज रहा है मनुष्य। इस मनुष्य की भलाई के लिए आप अपने आपको नि:शेष भाव से देकर ही सार्थक हो सकते हैं। सारा देश आपका है। भेद और विरोध ऊपरी हैं। भीतरी मनुष्य एक हैं। इस एक को दृढ़ता के साथ पहचानने का यत्न कीजिए। जो लोग भेद-भाव को पकड़कर ही अपना रास्ता निकालना चाहते हैं, वे ग़लती करते हैं। विरोधी रहे हैं तो उन्हें आगे भी बने ही रहना चाहिए, यह कोई काम की बात नहीं हुई। हमें नए सिरे से सब कुछ गढ़ना है; तोड़ना नहीं है, टूटे को जोड़ना है। भेद-भाव की जयमाला से हम पार नहीं उतर सकते। कबीर ने हैरान होकर कहा था—



कबीर इस संसार को समझाऊँ कैं बार।



पूंछ जु पकड़ें भेद का, उतरा चाहै पार॥



मनुष्य एक है। उसके सुख-दुःख को समझना, उसे मनुष्यता के पवित्र आसन पर बैठाना ही हमारा कर्तव्य है।

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