नारायण सिंह भाटी की कविताएँ (राजस्थानी) : Narayan Singh Bhati Kavita
अनोखै लाल रौ तबला वादन
आ बोल विहूणै ताल रीउर ईथर थिरकण में।
थिरक थिरक नै थड़ी करती
अनोखै हाथां सू अनोखी
सिरजणा कै—
सूरज ने चंदै रा, दो
कटि छिबता छवोलियां सू
ध्वनि रा फूल उछाळती
पुररवा रै अंतैपुर में
ऊतरै है
अत आतुर-उर उरवसी
सुरंगण!
आरजदळ सांवठी सेन री
अडोमड़ ऊपड़ती अस टापां
इण धर संस्कृति स्रोण में
साखीजै है
जीवण री जोमीली गत
गरजणा
कै
नटराजी-निरत उमंग अगै
विन नतैक नतैण ज्यू
लाखू लास्य जगावती
उद्वैलीजै है
अरथहीण कळा में चिरंतण अरथ री
उद्वैलणा।
बाधौ बिणज
आम आदमी खातरहर छिण आप ताई सिकरावणौ
जीवण विराज है
वो आपरी ही उधेड़ ने सींवे
हर औसर ने आपर मारफत
दूजां तांई सिकरावणो
वधतौ बिणज है
जिको जुग-जांमी ही जीवै
पण कवि पूरै जीवण ने
पूरण खातर सिकरावै, औ
बाधौ बिराज है
पाखरां री अमरता हो पीवै।
च्यार गीत
मिळिया तौ करो रे लोभीडांअपणै आप सूं।
प्यारी रै मन पीव मिलण री
मावड़ पूत सपूत सूं।
ग्यांनी रै मन गुरू मिलण री
पिंडत मिंत प्रवीण सूं।
बिणज करणिये नै नहिं बेळा
जर आछटतै सूप सूं।
करम खेत रा खांतीलां री
राह मिळै ना रूप सूं।
भरियौ पाव आध नै निरखै
पूण पुरीजै आप सूं।
मद री मांखी मद में डूबी
पार पड़ी न पांख सूं।
मिळियां तौ करौ रे लोभीड़ा
अपणै आप सूं।
मिनख मिनख री मजबूरी रौ
गाहक बण गरवीजै।
मजबूरी मोटी मांनेतण
ओढै नितरा पीळा
करमी धरमी पिंडत जोधा
खपग्या के खांतीला।
पगड़ी साटै पीळौ आवै
जद मांनेतण धीजै
साटै सारू हाटां जावै
पांणी पुरसां छीजै।
मिनख मिनख री मजबूरी रौ
गाहक बण गरबीजै।
बिना जुगत जाजम नहिं जमणी
इसौ जगत रौ धारौ
अटकळ बिन आंटौ नहिं आवै
कर कर मैनत हारौ।
बिन जुगती के खप खप मरग्या
धाप धान नहिं खायौ।
घर सायर मिनखां रै घाटौ
सांसै राज जमायौ।
जुग रै मठ री जुगत पुजारण
नखरा जो नर झेलै।
सगळै ही थोकां समरथ व्है
निरभै पासा खेलै।
आखर री औकात किती सी
रस रसणा री धारां
बिन बींध्यौ मोती किम सोहै
सरसत हंदै हारां।
सर सारा भाथोड़ भरीज्या
कोइक पारथ साधै
दस मुख सूंटी इमरत कूंपौ
कोइ रांम नै लाधै।
जीवण सधियां आखर साधै
अरथ न आय उधारा।
जूंझारां री जांन गयां बिन
सजै न सीस उतारा॥
दुर्गादास
धीरज न इत्तौ धारै हियौकै आसरा थारौ जस दरसाऊं प्रबंध मांही,
बंधियौ न किणी बंधेज मन-पत
सौ बंधै किम अमीणा छंद मांही?
दोयण कुण थारा दुर्गदास?
दोयण मां-भोम रा तुझ दोयण
न हिंदुआं हेत हय पाड़िया,
न मुगल बाढवा बाढाळी झाली,
करम-खेतरा मांझी आसोत—
थारी कीरत माणसां पंथ हाली।
काळी घणघोर घटा ऊमटी—
अचांणी तेग-वेग सूं विपदची
धमकिया धू प्राची
औरंग चौरंग घटा ओसरी,
अटा चढ देखियौ नर नारियां
काळी छबकाळी कांठळ विस चूंवणी
कांकड़ कमी।
मां भू भरिया दृग
हिये कंपकंपी
रूं-रूं विस छांवळ हहरियौ
अरडायौ आडावळौ
लूणी सिथळ गात थई
कुरळाया कायर मोर
सरणाटौ चहुं और छायो।
जदै बण आंधी उचटियौ मरू-भोमरा,
आसरे सांस अेक भेळ कीन्हौ
पीन्हौ विस जेण कोड घणै
मां भोम रै उर इमरत दीन्हौ॥
तिण दिन सूं दुर्ग बण दुर्गदास
अड़ियौ आडावळै आंटीलौ,
चढि्यौ न जेण रंग औरंग रंग—
रंग है वां तुरंगा जेण थूं चढ्यौ।
पतै रो चेटक जग चावौ
थें किता चेटक छिटकाया
केण पतौ?
न जाणूं रूप-रंग ज्यांरौ
त्यांरी खुरताळन धम-धमी
अेथ सांभळूं।
बखत रा बखतरां चीरणी
अस-हींस आभड़ै करण-पटां
सोही संगीत सांचौ देस प्रेम चौ
जुगां नगारां बाजणौ॥
भोगिया छप्पन भोग
बिखै रा थें
छप्पन भाखरां
खाई खमखारियां भुज तोलणां
रीस पीणां।
न पूरौ पय पीधौ
मेघ बदळै रा वाद बावळा
थे पाई घड़-फुलवाड़ी
सैल धारां॥
अस रा असवार ऊजळा
रह्यौ ऊजळे वागां
ऊजळी खागां
ऊजळै मनां
राखियौ खत ऊजळौ
पण असल रंगरेज आसरा
थें रंगियो कसूंबल धरा-पोमचौ
बिनां कर रांगियां॥
थें काढिया अबखा ऊनाळा-
उकळतै धोरां,
बळबळतै भाखरां,
कळवळतं नीरां,
प्रचंड लूआं अंग प्रखाळीजियौ।
उकळियौ रगत रंग राचणौ
हीयौ न अकळियौ
म्रग प्यास रा पंथ बांधणा
बांधिया जेथ बंधिया
सर आसरा॥
सरणाती सियाळू रातां
सिहरतै रूखां
हाली हमीरहठ डकरेल डांफरां,
धारा चौ नीर धूजतौ पोढियौ,
पड़तै पाळै केहरी खोह सूता,
करणौत हिये-खोह प्रण जागै,
चंचळां पांखरां नीर चुवै॥
केई—
रस-भींजी
सुहांणी
सुरंग रैणां
आई छाई गई रसा।
पवनियौ प्रीतम संदेस लियां,
नाजुकड़ी नींद रौ पांण गह्यां,
बरसां डूंगरां बनां भटकियौ,
थूं न भेटीजियौ।
विहांणै विहांणै काग उडाया सही कांमणी
पण भुज फड़कणां
तुझ हियो न फड़कियौ॥
प्रण पाळ थू ऊंचौ प्रिथीपाळ सूं
थारौ अस ऊंचौ असमांन सूं
थूं और असवारां नित ऊंचौ,
पण सही जाणजे
आसरा इळा में
थांसूं ही थारौ जस ऊंचौ॥
गवरी रौ गावणौ
थारै कंठां सूं ढळतीआ राग
जाणै उसा ळी सुरंगां सूं
ओटै रळकीजतौ
किरणां रौ कामणियौ उछाळ
काचै रंग रौ
घुळ-घुळ कूंपळां में कांपणौ,
पांगरणौ हेत रौ
पवनियै रै पांख
हेताळू हियै रौ
रसमसियै तालां माथै
रपटणौ,
तीखौड़े तिबारै रै तार सूं
फूटती फुंहार रौ
नखताळी किरणां सूं केळीजणौ,
लखियोड़ै लोटण कबूतर रौ
औळखियै खोळां में
लुट-लुट लोटणौ,
सधियोड़ै जुगल सारंग रो
मींट सूं मींट नै पोवणो
अे भंवर-लैराळी गायण!
इसड़ौ रीझाऊं थारो
काळजियै री कोर सूं गावणौ।
घूमर
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।घूमर घालै जद गौरड़ियां
समदर झोला खाय
चकरी चढती धरणी दीसै
पवन पंथ पलटाय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
डीगा डूंगर डिगमिग डोलै
सूरज निम निम आय
रूंख रमण नै पड़े ताखड़ा
नदियां बळ खा जाय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
चोटी जांणै बासंग छिड़ियौ
लहरियौ लहराय
बाजूबंद में बंधियौ जोबन
लूंबां लग झुर आय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
रंग कसूंबल चुवै हथाळी
लागै पोयण पांव
चंपे केरी डाळ विलूंबै
कदळी बन रै मांय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
कुण जांणै कद कंथ-मोरियौ
बाड़ी घर ले जाय
इण बाबल रै आंगणिये में
दो दिन तो लहराय।
सहेल्यां घूमर रमवा जाय।
जीवता अैनांण
केई कांमरू कोचरियां तो उडगीपण कोचर हाल रैगी है
इग नुवादियोड़ी माणसी रै
डरूं-फरूं हिये हेट,
अै खपणी खोगांळां खाली रियां ही
नवी कुचमाद री कोख रा बचिया
फेरू वां में पांगरै
लारलौ इतियास
इणी जापां रो जोखौ है,
इण खातर इणनै भरण रौ
जाझौ जतन करतां
म्हारी घणी रूपाळी रातां रा
अजपा औजका
सपनीजती पलकां तळै आफळै
नवी पीढी रौ पाणी
पतियांणसी कोई दिन
इण रा अै आखरां में उथलीजता
जीवता अैनांण।
लेणौ देणौ
धरती ने अेक दांणो देवौतो वा सैकडू कणूका पाछा देवै
सत राखणीया समाज सूं लेवं उतरौ हो
नोलो नीठ पाछौ देवै
धरती री धणियाय मोटी
कोई री आ औकात कठे?
पण म्हारो लेणौ इणी समाज सूं
नै देणो सैकड़ा जुगां सारू है
इणी खातर
आज रै समाज रा आंकिया टणकेल!
म्हने अेक रोझड़े जिता ही लखावै
ज्यां रो भागणौ नै भिड़करणो
बहकणी ने बुहारणौ
खावणो ने खिडावणी
आपरै अंग ताई पूगै
म्हां खातर अै जतना रा खेत
अेक सावत सिस्टी है
जिण में हूँ आज ने बाबू तो वो
पीढ़ियां लग पांगरे।
मांड में मूमल री धुन सुणतां
मुळकती चांनणी रा आकळ मोह ज्यूंपिळू-पिळू अन्तर भरी रूप-तळाई माथै-
तिरै थारी प्रीत रौ सतरंग लैरियो
जिण में झीणौ-झीणौ झांकै है-
काजळिया नैणां रौ सम्मोहण-जाळ
नागण वेणी री लय लहरणी मे।
सुरां’ळी रंग रळी रौ रळाव
सुतर-सरोवर डोब डोहण नै
हींजरतै हियै रौ बारण बंध आफळै।
पण मिनख नै समझावणौ दोरौ है।
करसणियै बाप रीकन्यावळ-सी भूख
बाखोटिया- बिछड़ियां
हिरणी री हूक
जिसी ही
पवीतर है
इण धरती री कूख।
जुग जंतर रा आंतरां में
आ ही अपणास छोड जाऊं
तौ मुंआं ही मुखातर पाऊं
जोयोड़ी जोत रौ कांई जोवणौ है
होवतै काम रो काई होवणौ है
अणु नै उधेड़णौ सोरौ है
पण मिनख नै समझावणौ दोरौ है।
हे मन रा करणहार
औ ही करण ने
च्यार दिन फेरूं मांगूं।
मीरां
(लांबी कविता री चौथी किरण रौ अेक अंस)चिड़ियां री चहक सुण
प्राची रै पीळै पोतड़ियां
जागियौ बाळ प्रभात
हौळै-हौळै बीसरै
हालरियां री बात,
नीतरियै अंबर सर
मुख आब उजाळ
बैन बयार आंचळ
चख कंवळ संवार
केळ कणदोरै खिली
कूंपळ कूंवळी रौ
काजळियौ काढ,
चुटकी बजाई कचनार
विहंस सुणी अस हींस।
रांणै विक्रम रा भेज्या
सिरायत सिरदार
तातै तुरंगां आया पूगता।
हेलै सागै राळी मीरां बाग
जांण्यौ-जैमल आयौ होसी
भेळी उतारसां आरती,
पण देखतां मेवाड़ी पागां रा पेच
हुई अंत अणमणी,
धरणी टिकै ना आगै ऊठियोड़ा
हिय हय पौड़
सागे जागा गरणावती आफळै
मन रथ धुरी।
सबद खुलै उण पैल
बंधियौ सरणाटो गाढै गाढ,
थिर पलकां रथ रज थिरकतां
मीरां सुणिया जोजरै कंठ रा
आडा डौढ़ा बोल,
करी बतळावण
मुक्तकेसी कंवराणी सीधै बोल में-
'मोड़ा आया रे मांनीता सिरदार!
वा बेळा तौ कदे बीतगी,
म्हारी सार सुरछा रौ
कांई बतावौ मूंछळां मोद
मीरां तौ मार लिया जग छळ मीर
अै अमीर भलांई भंवौ
किरण रौ कांई कर लै कांवळा।'
'थे कांई देवौ बर बर में
सातियां री साख,
थांरी अरधंगी नै सूंपियौ
थे सेजां रौ नै चिता रौ ई आध
जे वै जूंझती जीवण थारै जोड़
थे जग रौ कोई समर नीं हारता।
पण वांरा कर कुरियोड़ा रैग्या
गढपतियां रै बारणै
चिता लग रह्यौ-
वारै चित रौ चोज,
म्हारा कर खुला किरतार रै बारणै
मुक्त चित्त चीन्हौ है चक्रधर चाल में।'
कहजो राणाजी नै
सावळ संभाळ राखै
मतां नै मेवाड़ कांई है कवै रै कांसां रौ
भेळौ मोह?
हूं तौ मिंदर मिंदर मूरत संवार
कर लेसूं प्राण पाळणा।
हमें नहीं म्हरा हाडकां में
मेड़तियां रौ सीर
सीसोद्यां रौ कदेको ही ऊठग्यौ,
मोड़ियां मुड़ै ना लागी लगन
रथवाह म्हांरी सांसां रौ सौदागर
सांम्ही आयग्यौ।
नारी हठ जांण रावत कह्या
जूनी जाजम रा ठीमर बोल-
'थां में नहीं म्हांरो सीर
पण म्हांरौ तौ है
थांरी सौ पीढियां री लाज में।'
'लाज तौ रैसी नरां!
आतम रै आपांण
ना रहै-
नारी रै नथ घालियां।
थे लेजौ थांरौ पीढियां सूं सीर
मीरां तौ मैरांण तिर आई अेकली
अेकली ही जावै है अगलै धांम,
थांरा अरथ अडांणां सूं
ढबिया ढबै ना
इण पथ रा-
अै पांणी पंथा घोड़ला।
मूमल
जुगां री जोत रूप री रासमिनख रै सपनां रो सिणगार
झुरै है रंग री महफिल बीच
माड़ेची मूमल थारै लार
जुगां रो धरती है रैवास
जिकण में रूप रंग नै राग
आपरै मझ जोबन ऊफाण
चढंतां ऊतरिया दिन लाग
पण कोई मूमल थारै रूप
मिनख रै हियै घालियो हाथ
मरग्या माणस करै बखाण
अमर है थारी रंग-भर रात
फूल्यो किण बाड़ी में फूल
हिये किण सजियो कंवळै हार,
भटकै भंवरा आज अधीर
राग नै सौरम रै मझदार
राग री पांख्यां लागी रूप
उडी जद जुग रा अंबर चीर
करोड़ां कंठां कियो रैवास
अलेखां हिवड़ां री थूं पीड़
जदे लग बन में बासग नाग
बाड़ियां चंपो, दाड़म, दाख
लुळकती कंवळी केळू-कांब
जकां री भरै सूवटा साख
जदे लग हिंगळू हाटां मांय
मिनख रै कंठ हियो अर नैण
तदे लग कर-कर मूमल कोड
सांईणी-झुरसी थारा सैण
मुमतांज रौ मोह
सौ बकरां रा रगत सूं फळेअेक अंगूर-बेल
केई जूनी कैवत औगाळतां औगाळतां
केई सुहाग रातां रा मसोसिया गीत
अेकण सागै आज इज
थारी कबर सूं बरकता बारै आया,
जोबनिये री जूनी मजबूरी मोरिया
जिसमी-फूल
इतिहास री बिलखती बावळ बिगताया।
उरण रूप रूधणी
मुगल मनसब री मुकळाई रौ काट
सेवट वां सांकळां नै खायगौ,
हजार बरसां रै इतियास रौ
मेछ मांगीगर वीर हजारौ
हमें घणी फुरसत में
नीची नाड़ कियां
इण धौळियै भाटां बैठी
धौळी धट रातां में रमी रमै।
उण अतीत रौ इतरौ निसरडौ धीजौ
अठै आतां
इतरै मरियोड़ै पाणी री गुमटाई गूंग नै
इण ढालै
मकरांणी पैठ सूं परोटै॥
पासाण सुंदरी
थूं कुण ऊभीहे सयाण सूरत
पासाण मूरत
नगन देह
भगन गेह
अतीत री कळा द्रस्टि तळै
जोवै केई जुग सूं
भाव भंगिमा भरिया
थारा अंग-अंग
झलती जोड़ी रा
प्राण पिया री बाट
हे प्रीतपनी परणेतण पूतळी
केई नैण निरख-निरख
निकळिया होसी
थारै गेह बार
पण हूं बतळाऊं
अबोली बोल!
कण थनैं मिलण वचन दे’र
वचन हारियो
जिणरो—
अेक पग ऊभी
अेकटक
थूं पंथ निहारै
हे ओळूं उळझी
संकोचण सुंदरी
इण ऊंचै पयोधरां
ऊंडी धीरज धरण कळा
किण सूं सीखी?
हे कळाजायी कामणी
म्हे तो गीत सुण्यो
काव्य पढ्यो
आंख देख्यो—
केई'क झुरती विरहणियां रा
वैरी विरह ताप
लाखीणा तन खीण किया
पण थूं तो
जुग बित्यां ही
जोबन मदमाती
अर अजै लग गमकै
निरत रत काम री कामण धुनी
थारै अंग-अंग री
मिजाज-भरी मंगेजण मरोड़ में...
हे उफणतै जोबन री
पासाण गोरड़ी!
थळ जायी
विरह ताप झुळसी
सकल गजगमण गोरियां रा
तरळ नैण मोती
किण किरतार कारीगर रै
प्रिया रूप साधना सांचै
आय सांगळिया
जिण खांतीलै
अमर खांत कर
थनैं सिरजी संवारी—
उरज पीण
कठी खीण
वसन हीण
वचन बंध अचंचळ सुंदरी
विरह समंद तळबळती
चिर प्रीत अगन री—
अखंड जोत
काळ हथेळी बिच
थां आगळ अस्टपौर जगै
तिण सूं पड़ियै काजळ रा कूंपला
किण चतर नार चोरिया
हे सयनहीण
पंथ लीण
पासाण सुंदरी!
समै रौ रींछ
रींछ री खाल ओड्यांऔ समै
सदियां सदियां रा सिराणा सूंघतौ
चाल्यौ इज जावै है
पण कोई नै ठा कोनी
किण दिस?
नै क्यूं?
केई भूसागड़जी दरसणिया दाव
लगाय लगाय टुरग्या
अर इण री गत परखता परखता
खुद बिगतीजग्या।
औ कितरा हो करमां रा कीड़ीनगरौ
थूंड री अेक रूंबड़ी सूं थूं डाय
अदीठ पेट दाखल करै,
कितरा ही ओढाई रा रूखां माथै
ऊंधौ चढ
इंसानी ऊरबां रा मद-जाळा चूस
कोरै उसासां रौ छछौ अंबरा छोडतौ जावै।
सगळी चीजां
ठावौ-ठाव दीसै जद लग इज दीसै
पण इण री रमत-रीछीं री अेक रपट में
परलं रा पंख पसरता दीसै।
तौ ई धर रै धोरी में धीजै री सांस है
रींछ रै राज में इज मदारी रौ बास है।
समै रो गज
मिनखा जूण री अेकल पड़हाडकां रै रावण हत्थै री
तांत हेटै
मढ़ी मढ़ाई मजबूरियां रो
पलट-पलट नै पीड़ीजतौ
रीकणौ रियाज है।
पण अचंभौ इणरौ कोनी
और तौ इणरौ है कै
अंकोड़ै सूं लेय
ओटम तक लांबौ
समै रै तुजरबै रौ गज
फेरूं ही आदमी रै हाथ में है
कवि जद चावै
उणरौ पुणचौ पकड़
रियाज रौ रूपक बदळ देवै
पण अै औसर रा आड़तिया
समै माथै आवतै सुर में
आपरौ अठताळौ
मांडै ही ऊंधाय देवै।