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साँप (कहानी) | Saanp : जॉन अर्नेस्ट स्टैनबेक

झुटपुटे का-सा समय था। डॉक्टर फिलिप्स ने झटके से घुमाकर झोला कंधे पर लादा और बाढ़ के पानी से भर जाने वाली पोखर जैसी जगह से चल पड़ा। पहले पत्थर के ढोके पर चढ़कर कुछ रास्ता पार किया और फिर रबर के बूटों से छप-छप करता सड़क पर निकल आया। मोंटेरी की मछलियों और दूसरी खाद्य सामग्री को टिन के डिब्बों में भरने वाली सड़क पर उसकी अपनी छोटी-सी पेशेवर प्रयोगशाला थी। वहाँ तक आते-आते सड़क की बत्तियाँ जल चुकी थीं। दबा-भिंचा-सा छोटा-सा मकान था—इसका कुछ हिस्सा खाड़ी के पानी के ऊपर लट्ठों के खंभे और पुल लगाकर बना था और कुछ ज़मीन पर था। बड़े-बड़े लहरदार, लोहे की चादरों के बने मछलीवाले, गंधाते गोदामों ने इसे दोनों ओर से बुरी तरह घेर और भींच रखा था। काठ की सीढ़ियाँ चढ़कर डॉ० फिलिप्स ने दरवाज़ा खोला। सफ़ेद चूहे अपने पिंजरे में तार के ऊपर-नीचे ज़ोर-ज़ोर से उछल-कूद मचाने लगे और छोटे-छोटे बाड़ों में बंद क़ैदी बिल्लियाँ दूध के लिए म्याऊँ-म्याऊँ करने लगीं। डॉक्टर फिलिप्स ने अपनी चीर-फाड़ की मेज़ पर तेज़ चौंधिया देने वाली रोशनी जला दी और उस लिसलिसे झोले को धम्म से धरती पर पटक दिया। फिर वह खिड़की के पास रखे शीशे के पिंजरों क...