वह अपना मुँह ख़ामोशी से भींच लेता और चक्के के गोल पहियों के चारों ओर घूमता हुआ सिर्फ़ अपने दाँतों का अस्तित्व अनुभव करता, जहाँ केवल एक ख़ामोश आगंतुक का आगमन होता था और थी उसकी ज़बान। वह अपनी मुट्ठियाँ भींचता और दाँत पीसता। क्रोध से लाल हुई आँखों और भारी पलकों से फाड़-फाड़कर देखता। नींद और थकान से उसके पपोटे फूल गए थे। कुछ भी भयानक घट सकता था। उसके बग़ल में पुल की सीढ़ी पर बैठी उसकी पत्नी उसके बोलने की प्रतीक्षा कर रही थी। पुल बड़ा था—गर्मियों में उस छोटी-सी नदी के लिए बहुत बड़ा, लेकिन सर्दियों में, जब नदियाँ चढ़ जाती हैं, तो यह लोहे का होने के बावजूद कीड़े की तरह काँपने लगता था। काइदूना उसकी ओर देख नहीं रही थी, वह पास ही था। उसकी ओर देखकर क्या होता? जो कुछ भी बोलने को था, वह यही था कि कुछ ग़लत हुआ। आँसुओं से भरी आँखों को बंद करके वह अपने बेटों के बारे में सोचती रही। अनाक्लेतो और सेरापीतो कल शाम अँधेरा घिरने पर पहाड़ों में चले गए थे ताकि सैनिकों के हाथ न पड़ जाएँ। वे अब उनके साथ नहीं थे, कहाँ थे, मालूम नहीं। जो भी सैनिकों के हाथ पड़ जाता, उसे बग़ैर नाम पूछे गोली से उड़ा दिया जाता। सिर्फ़ उस...