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प्रेम में भगवान (कहानी) | Prem Mein Bhagavaan : लियो टॉल्स्टॉय

एक नगर में मार्टिन नाम का एक मोची रहा करता था। नीचे के तल्ले में एक तंग कोठरी उसकी थी। वहाँ से खिड़की की राह सड़क नजर आती, जहाँ आने-जानेवालों के चेहरे तो नहीं, पर पैर दिखाई दिया करते थे। मार्टिन लोगों के जूतों से ही उनको पहचानने का आदी हो गया था। क्योंकि वहाँ एक मुद्दत से रहता था और बहुतेरे लोगों को जानता था। पास-पड़ोस में शायद कोई जोड़ा जूता होगा जो उसके हाथों न निकला हो। सो खिड़की की राह वह अपना ही काम देखा करता। कुछ जोड़ियों में उसने तला बैठाया था तो कुछ में और मरम्मत की थी। कुछ ऐसे भी होते कि पूरे-के-पूरे उसी के बनाए हुए। काम की मार्टिन को कमी नहीं थी, क्योंकि काम वह सच्चाई से करता था। माल अच्छा लगाता और दाम भी वाजिब से ज़्यादा नहीं लेता था। बड़ी बात यह थी कि वह वचन का पक्का था। जिस दिन की माँग होती अगर उस दिन पूरा करके दे सकता तो वह काम ले लेता था, नहीं तो साफ़ कह देता था। वादे करके झुठलाता नहीं था। इसलिए आस-पास सरनाम था और काम की उसके पास कभी कमी नहीं होती थी।
यों आदमी वह नेक था और नीति की राह उसने कभी नहीं छोड़ी। और उमर ज़्यादा होने पर तो वह और भी आत्मा की भलाई की और ईश्वर की बातें सोचने लग गया था। अपना निजी काम शुरू करने का वक़्त आने से पहले ही, यानी जब वह दूसरे के यहाँ मजूरी पर काम किया करता था, तभी उसकी स्त्री का देहांत हो गया था। पीछे एक तीन बरस का बच्चा वह छोड़ गई थी। बालक तो और भी हुए थे, पर छुटपन में ही सब जाते रहे थे। पहले तो मार्टिन ने सोचा कि बच्चे को देहात में बहन के यहाँ भेज दूँ। पर, फिर बालक को पास से हटाने को उसका जी नहीं हुआ। 'वहाँ दूसरे के घर बालक को जाने क्या भुगतना पड़े, क्या नहीं! इससे चलो अपने पास ही जो रहने दूँ।'
सो मार्टिन नौकरी छोड़, घर किराए पर ले, बच्चे के साथ वहीं रहने और अपना काम करने लगा। पर बालक का सुख उसकी किस्मत में न लिखा था। बालक बारह बरस का हो चला था और उम्मीद बँधने लगी थी कि बाप के काम में अब कुछ सहाई होने लगेगा कि तभी आया बुख़ार, हफ़्ते भर रहा होगा, और बालक उसमें चल बसा! मार्टिन ने बच्चे को दफ़नाया; लेकिन मन में उसके ऐसा दुःख समा गया, ऐसा दुःख कि ईश्वर तक को कोसने को जी होता था। दुःख में बार-बार वह कहता कि हे भगवान, मुझे भी उठा लो। तुम कैसे हो कि मेरा इकलौता, नन्हीं-सी उमर का, जो मेरे प्यार का बच्चा था, उसे तो तुमने उठा लिया और मुझ बूढ़े को छोड़ दिया! सो इस करनी पर जैसे उसने हठ ठान कर परमात्मा को अपने से बिसार दिया।
एक दिन उसी के गाँव के एक बुज़ुर्ग, जो घर छोड़ पिछले आठ बरस से तीरथ-तीरथ घूम रहे थे, यात्रा की राह में मार्टिन के पास आए। मार्टिन ने अपने दिल का घाव उनके आगे खोल दिया और सब दुःख कह सुनाया। बोला, “अब भाई, मुझे जीने की भी चाह नहीं रह गई है। बस भगवान करे मैं जल्दी यहाँ से उठ जाऊँ। तुम्हीं कहो जग में अब कौन आस मुझे बाक़ी है?”
उन वृद्ध यात्री ने कहा, “ऐसी बात मुँह से नहीं कहते, मार्टिन। ईश्वर की लीला भला हम क्या जानें! कोई हमारा चाहा यहाँ थोड़े ही होता है। ईश्वर की मर्ज़ी ही चलती है। उनकी ऐसी ही मर्ज़ी है कि बच्चा चला जाए और तुम जीओ, तो इसी में कोई भलाई होगी। और जो निराशा की बात करते हो सो वजह है कि तुम अपने ही सुख के लिए रहना चाहते हो।”
मार्टिन ने पूछा, “नहीं तो भला किसके लिए रहना चाहिए?” वृद्ध ने कहा, “ईश्वर के लिए, मार्टिन। उसने हमें जीवन दिया। सो उसी के लिए हमें रहना चाहिए। उसके निमित्त रहना सीख जाओ कि फिर कोई क्लेश भी न रहे। फिर सब सहल हो जाए।”
सुनकर मार्टिन कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “पर ईश्वर के लिए रहना कैसे होगा?”
वृद्ध ने उत्तर दिया, “संत लोगों के चरित से पता लग सकता है कि ईश्वर के लिए जीने का भाव क्या है। अच्छा तुम बाँच तो सकते हो न? तो इंजील की एक पोथी ले आना। उसे पढ़ना। उसमें सब लिखा है। उससे पता लग जाएगा कि ईश्वर की मर्ज़ी के अनुसार रहना कैसा होता है?”
ये वचन मार्टिन के मन में बस गए। उसी दिन वह गया और बड़े छापे की इंजील की पोथी ले आया और पढ़ना शुरू कर दिया।
पहले विचार था कि छुट्टी के दिन सातवें रोज़ पढ़ा करूँगा; लेकिन एक बार पढ़ना शुरू किया कि उसका मन बड़ा हलका मालूम हुआ। सो वह रोज़-रोज़ पढ़ने लगा। कभी तो पढ़ने में इतना दत्तचित्त हो जाता कि लालटेन की बत्ती धीमी पड़ते—
पड़ते बुझ तक जाती, तब कहीं पोथी हाथ से छूटती। देर रात तक पढ़ता रहता। और जितना पढ़ता उसे साफ़ दिखता कि ईश्वर की आदमी से क्या चाहना है और ईश्वर में होकर आदमी को कैसे जीवन बिताना चाहिए। उसका दिल ख़ूब हलका हो गया था। पहले रात को जब सोने लेटता तो मन पर बहुत बोझ मालूम हुआ करता था।
बच्चे की याद करके वह बड़ा शोक मानता था। लेकिन अब वह बार-बार हलके चित्त से यही कहता कि हे भगवान, तू ही है। तू ही जगदाधार है। तेरा ही चाहा हो।
उस समय से मार्टिन की सारी ज़िंदगी बदल गई। पहले चाय पिया करता था और कभी-कभी दारू भी ले लेता था। पहले कभी ऐसा भी हो गया है कि किसी साथी के साथ ज़रा ज़्यादा चढ़ा आए और आकर वाही-तबाही बकने लगे और खरी-खोटी कहने लगे। लेकिन अब यह सब बात जाती रही। जीवन में उसके अब शांति आ गई और आनंद रहने लगा। सबेरे वह अपने काम पर बैठ जाता और दिनभर काम करने के बाद साँझ हुई कि दिया लिया और इंजील की पोथी खोल बाँचने बैठ गया। जितना पढ़ता उतनी ही उसकी बुद्धि साफ़ होती और मन खुलकर प्रसन्न होता हुआ मालूम होता।
एक बार ऐसा हुआ कि इंजील की पुस्तक लेकर मार्टिन रात बहुत देर तक बैठा रह गया। संत ल्यूक की कथनी वह पढ़ रहा था। छठे अध्याय में उसने बाँचा—”जो तुझे एक गाल पर मारे, तू दूसरा भी उसके आगे कर दे। जो कोट उतारना चाहे, कुरता भी उसे सौंप दे। जो माँगे सबको दे। और जो ले जाए उससे तू वापस कुछ न माँग। और जो तू चाहता है कि लोग तुझसे ऐसे बरतें, वैसे ही तू उनसे बरत।”
फिर वह प्रसंग उसने पढ़ा, जहाँ प्रभु मसीह कहते हैं—
“तुम 'प्रभु', 'प्रभु' तो मुझे कहते हो, पर मेरा कहा करते नहीं हो। जो मेरे पास आता है, मेरा कहा सुनता है और सुना करता है, वह उस आदमी के समान है, जिसने गहरे खोद अपने मकान की नींव चट्टान पर जमाई है। बाढ़ आई और लहरें टकरा-टकराकर हार गईं, पर मकान नहीं हिला। क्यों नींव चट्टान पर खड़ी थी। पर सुनता है और करता नहीं, वह उस आदमी के समान है जिसने धरती पे मकान खड़ा किया, पर बुनियाद न दी। आई पानी की बाढ़ और टकराना था कि मकान ढह पड़ा। उसका सब डूब गया, कुछ बाक़ी न रहा।”
मार्टिन ने ये वचन पढ़े तो मन भीतर से गद्गद् हो गया। आँख से ऐनक उतार उसने पोथी पर रख दी और माथे पर अँगुली देकर उस कथन पर वह गहरा सोच करने लगा। उन वचनों से वह अपने जीवन की तोल-परख कर रहा था।
अपने से ही वह पूछने लगा कि अब मेरा मकान चट्टान पर है कि रेत पर खड़ा है। चट्टान पर है तो ठीक है। पर यहाँ इकले में बैठे तो सब सही-दुरुस्त मालूम होता है। जैसे ईश्वर की मर्ज़ी के मुताबिक़ ही मैं चल रहा हूँ। लेकिन आँख झपकी कि मन में विकार हो आता है। तो भी जतन मुझे छोड़ना नहीं चाहिए, जतन में ही आनंद है। हे भगवान, तुम्हीं मालिक हो।
यह सब विचार कर वह फिर सोने को हुआ। पर पोथी उससे नहीं छूटती थी। सो फिर वह सातवाँ अध्याय बाँचने लगा। वहाँ जहाँ कि सौ बरस का बूढ़ा प्रभु के पास आता है और विधवा के पुत्र का जिक्र है और संत जॉन के शिष्य लोग मिलते हैं। पढ़ते-पढ़ते फिर वह जगह आई जहाँ एक धनी-मानी ईशु मसीह को अपने घर भोजन देते हैं। फिर वह स्थल कि जहाँ एक पापिनी आँसुओं से उनके चरण पखारती और केशों से पोंछती है। उस समय प्रभु उसका पक्ष लेते और उसे आशीष और आशा देते हैं। पुस्तक का चवालीसवाँ बंध आया और मार्टिन ने पढ़ा—”तब प्रभु उस स्त्री की ओर होकर साइमन से बोले, 'इस स्त्री को देखो। मैं तुम्हारे घर अतिथि हूँ। पर तुमने मेरे पैरों पर पानी नहीं दिया। और यह है कि अपने आँसुओं से इसने मेरे पैर धोए हैं और केशों से उन्हें पोंछा है। तुम मुझसे बचे हो और जबसे मैं आया हूँ, यह मेरे पैरों को ही चूमती रही है। तुमने मेरे सिर पर भी तेल नहीं दिया, और यह है कि मेरे पाँव स्नेह से भिगोती रही है।”
ये शब्द पढ़ते-पढ़ते मार्टिन सोचने लगा, “उसने पैरों पर पानी नहीं दिया, उन्हें छूने से बचा। सिर को तेल नहीं दिया...” मार्टिन ने ऐनक उतार वहीं पोथी पर रख दी और सोच में डूब गया।
“वह आदमी मेरी तरह का रहा होगा। अपनी-ही-अपनी सोचता होगा। कैसे ख़ुद अच्छा खा लेना और आराम से रह लेना। बस, अपना ही सोच, मेहमान की चिंता नहीं। कुछ अपना-ही-अपना उसे ख़याल था। मेहमान की तनिक परवाह नहीं थी। और कौन मेहमान? स्वयं भगवान। जो कहीं वह मेरे यहाँ पधार जाएँ तो क्या मैं भी वैसा ही करूँ?”
उस समय दोनों बाँह चौकी पर डाल उसी पर मार्टिन ने अपना सिर टेक दिया। ऐसे बैठे-बैठे जाने कब उसे नींद आ गई।
इतने में जैसे बिलकुल कान के पास से बड़े सूक्ष्म सुर में किसी ने कहा, 'मार्टिन!'
मार्टिन मानो नींद से चौंककर उठा। बोला, “कौन है? मुड़कर दरवाज़े के बाहर झाँका, पर कोई न था। उसने फिर पुकारा। पुकार के जवाब में उसे साफ़-साफ़ सुनाई दिया: “मार्टिन, कल गली पर ध्यान रखना। मैं आऊँगा।”
अब मार्टिन उठा। खड़ा हो गया, आँखें मलीं। समझ नहीं सका कि ये शब्द जागते में सुने थे कि सपने में। फिर उसने दिया बुझा दिया और सो गया।
अगले दिन तड़का फूटने से पहले ही उठा और भजन-प्रार्थना कर, आग जला, अँगीठी पर खाना चढ़ा दिया। फिर अपनी खिड़की के तले आकर काम में जुट गया।
काम करते-करते रात की बात सोचने लगा। कभी तो उसे मालूम होता कि वह सब सपना था। कभी जान पड़ता कि सचमुच की ही आवाज़ उसने सुनी थी। सोचा कि ऐसी बातें पहले भी तो घटती रही हैं।
खिड़की के तले बैठा, रह-रहकर वह सड़क पर देखने लगता था। काम से ज़्यादा उसे किसी के आने का ध्यान था। अनपहचाने जूते गली पर चलते देखता तो झाँक उठता कि उनको पहनने वाला जाने कौन है। इस तरह एक झल्लीवाला नए चमचमाते जूतों में उधर को निकला। फिर एक कहार गया। इतने में एक बूढ़ा सिपाही, जिसने पुराने राजा का राज देखा था, उस गली में आया। हाथ में उसके फावड़ा था। जूतों से मार्टिन उसे पहचान गया। पुरानी चाल के घिसे से जूते थे। पहनने वाले का नाम स्टेपान था। एक पड़ोसी लालाजी के घर में वह रहता था और उनका कुछ काम-धाम निबाह दिया करता था—यही झाड़-सफ़ाई वग़ैरह कर देना। दया-भाव से लाला ने उसे रखा हुआ था। वही स्टेपान गली में आकर शहर से बर्फ़ हटाने लग गया था। रात बर्फ़ ख़ूब पड़ी थी और जमा हो गई थी। मार्टिन ने उसे एक निगाह देखा। कुछ देर देखते रहकर फिर नीचे सिर डाल अपने काम में लग गया।
मन-ही-मन वह हँस पड़ा। बोला, “मैं भी उमर से बुढ़ा गया हूँ, नहीं तो क्या! देखो कि मैं भी कैसा बहकने लगा हूँ! आया तो स्टेपान है गली साफ़ करने, और मुझे सूझा कि मसीह प्रभु ही आ गए हैं! है न बात कि मैं सठिया गया हूँ!''
लेकिन कुछ टांके भरे होंगे कि खिड़की की राह वह फिर बाहर देख उठा। देखा कि फावड़ा जरा टेककर दीवार का सहारा ले स्टेपान या तो सुस्ता रहा है, या फिर गरम होने के लिए साँस ले रहा है। स्टेपान की उमर काफ़ी थी। कमर झुक चली थी और देह में कस बहुत नहीं रहा था। बर्फ़ हटाने के लायक़ भी दम नहीं था। वह हाँफ-सा रहा था।
मार्टिन ने सोचा, “बुलाकर मैं उसे चाय को पूछूँ तो कैसा! चाय बनी हुई है ही।”
सो, आरी को वहीं जूते में उड़सा छोड़, खड़े होकर झटपट चाय की सब तैयारी कर डालने लगा। फिर खिड़की के पास जाकर थपथपाकर स्टेपान को इशारा किया। स्टेपान सुनकर खिड़की पर आया। मार्टिन ने उसे अंदर बुलाया और आगे बढ़कर दरवाज़ा खोल दिया। बोला, “आओ थोड़ा गरमा न लो। तुम्हें ठंड लग रही मालूम होती है।”
स्टेपान बोला, “भगवान तुम्हारा भला करें। हाँ, मेरी देह में सर्दी बैठ गई है और जोड़ दर्द करते हैं।”
यह कहकर स्टेपान अंदर आया और देह की बर्फ़ द्वार के बाहर ही झाड़ दी।
फिर यह सोचकर कि कहीं फ़र्श पर निशान न पड़े, वह बाहर ही पैर पोंछने लगा। इसमें देह उसकी मुश्किल से सँभली रह सकी और गिरते-गिरते बचा।
मार्टिन बोला, “रहने दो, रहने भी दो। फ़र्श झड़ जाएगा। सफ़ाई तो रोज़ होती ही है। कोई बात नहीं भाई, आ जाओ। बैठो, लो चाय पियो।”
दो गिलास भरकर एक मार्टिन ने स्टेपान के आगे सरका दिया और रक़ाबी में डालकर दूसरे में से ख़ुद पीने लगा।
स्टेपान ने अपना गिलास ख़त्म कर औंधा रख दिया। वह चाय के लिए बहुत धन्यवाद देने लगा। लेकिन प्रकट था कि और भी एक गिलास मिल जाए तो बुरी बात न होगी।
मार्टिन ने गिलास भरते हुए कहा, “एक गिलास और लो, अरे, लो भी।” कहकर साथ ही उसने अपना भी गिलास भर दिया। पर पीता जाता था और रह-रहकर मार्टिन सड़क की तरफ़ देखता जाता था।
स्टेपान ने पूछा, “क्या किसी की बाट जोहते हो?”
“बाट? भई, क्या बताऊँ! कहते लाज आती है। सच पूछो तो इंतज़ार तो नहीं है, पर रात एक आवाज़ सुनी थी, जो मन से दूर नहीं होती है। वह सचमुच कोई था, या सपना था, कह नहीं सकता। कल रात की बात है कि मैं धर्म-पुस्तक इंजील बाँच रहा था। उसमें प्रभु ईसा का वर्णन है न! कि कैसे उन्होंने दुःख उठाए और किस भाँति वह इस धरती पर प्रेम और भक्ति से रहे। सो तुमने भी ज़रूर सुना होगा।”
स्टेपान ने कहा, “सुना तो मैंने है। पर मैं अपढ़ आदमी हूँ और समझता-बूझता कम हूँ।”
“तो सुनो भाई। उनके जीवन के विषय की बात है। मैं पढ़ रहा था। पढ़ते-पढ़ते वह प्रसंग आया, जहाँ मसीह एक धनवान आदमी के यहाँ जाते हैं। वह धनी आदमी मन से उनकी आवभगत नहीं करता। अब तुम्हें मैं क्या कहूँ? मैं सोचने लगा कि उस आदमी ने उनका पूरा आदर कैसे नहीं किया! मैंने सोचा कि कहीं मैं होता तो जाने क्या न करता? पर देखो कि उस आदमी ने मामूली भी कुछ नहीं किया।
इसी तरह की बात सोचते-सोचते मुझे नींद आ गई। फिर एकाएक जो जागकर उठा तो ऐसा लगा कि कोई मुझे नाम लेकर धीमे-से कह रहा है कि देखना, इंतज़ार में रहना, मैं कल आऊँगा। ऐसा दो बार हुआ। सच कहूँ तो भाई, वह बात मेरे मन में बैठ गई। यों तो मुझे ख़ुद शर्म आ रही है, पर क्या बताऊँ, मन में आस लगी ही है कि वह भगवान कहीं न आते हों!!”
स्टेपान सुनकर चुप रहा, और सिर हिला दिया। फिर गिलास की चाय ख़त्म कर गिलास को अलग रख दिया। लेकिन मार्टिन ने सीधा कर फिर उसे चाय से भर दिया।
“लो, लो भाई। पीओ भी। हाँ, मैं सोच रहा था कि इस पृथ्वी पर मसीह प्रभु कैसे रहते थे। नफ़रत किसी से नहीं करते थे और मामूली-से मामूली लोगों के बीच मिल-जुलकर रहते थे।
साथी उनके साधारण जन थे और हम जैसे अधम और पापी लोगों को उन्होंने शरण देकर उठाया था। उन्होंने कहा कि जो तनेगा उसका सिर नीचा होगा। जो झुकेगा वही उठेगा। उन्होंने कहा, तुम मुझे बड़ा कहते हो। और मैं हूँ कि तुम्हारे पैर धोऊँगा। कहा, कि सबसे आगे वही गिना जाएगा जो सबसे पीछे रहकर सेवा करेगा। क्योंकि जो दीन हैं और दयावान हैं, और प्रीत रखते हैं, वही धनी हैं।”
स्टेपान सुनते-सुनते अपनी चाय भूल गया। बुड्डा आदमी था और जल्दी उसे आँसू आ जाते थे। सो वहाँ बैठे-बैठे भगवद्-वाणी सुनकर उसके दोनों गालों पर आँसू ढुलकने लगे।
मार्टिन ने कहा, “लो, लो। बस एक और।”
लेकिन स्टेपान ने माफ़ी माँगी, धन्यवाद दिया, और गिलास को अलग कर उठ खड़ा हुआ!
“तुम्हारा मुझ पर बड़ा अहसान हुआ, मार्टिन। तुमने मेरे तन और मन दोनों को ख़ुराक दी और सुख पहुँचाया है।”
मार्टिन बोला, “कब तो अतिथि मिलते हैं। भाई, फिर भी इधर आया करना। मुझे बड़ी ख़ुशी होगी।”
स्टेपान चला गया। उसके बाद बाक़ी बची चाय मार्टिन ने निबटाई, फैला सामान सँगवाया और काम पर आ बैठा।
बैठकर वह आरी से जूते के तले की सीवन ठीक करने लगा। तला सीता जाता था और खिड़की से बाहर देखता जाता था। ईशु की तस्वीर उसके मन में भी और उन्हीं की करनी और कथनी की याद से उसका अंतःकरण भरा था।
इतने में दो सिपाही उधर से निकले। एक सरकारी जोड़ी पहने था। दूसरे के पैरों में देसी जूते थे। फिर पड़ोस के एक मकान-मालिक निकले, जिनका बढ़िया कामदार जोड़ा था। फिर एक झाबा लिए नानबाई उधर से गुज़रा। ऐसे बहुत-से लोग चलते हुए गए। बाद में एक स्त्री आई जिसके पैरों में देहाती जूतियाँ थीं। वह खिड़की के सामने से गुज़री; लेकिन आगे दीवार के पास जाते-जाते रुक गई! मार्टिन ने खिड़की में से उसे देखा। वह इधर के लिए अनजान मालूम होती थी। कपड़े मामूली थे और गोद में बच्चा था। दीवार के पास वह हवा को पीठ देकर खड़ी हो गई थी। बच्चे को हवा की शीत से बचाने को वह उसे बार-बार ढकने का जतन करने लगी। लेकिन उढ़ाने को कपड़ा उसके पास नहीं के बराबर था। इन जाड़े के दिनों में गरमी के-से कपड़े वह पहने थी। यह भी झीने और फटे थे। खिड़की में से मार्टिन ने बच्चे का रोना सुना। स्त्री उसे मना-मनाकर चुप कराना चाहती थी और वह चुप नहीं होता था। मार्टिन उठा और द्वार से बाहर जाकर वोला, “सुनना माई। इधर सुनो।”
स्त्री सुनकर मुड़ी।
“वहाँ सरदी में खुले में बच्चे को लेकर क्यों खड़ी हो? अंदर आ जाओ, यहाँ बच्चे को ठीक तरह उढ़ा भी लेना। इधर आओ, इधर।”
एक बुड्डा आदमी, नाक पर ऐनक चढ़ाए इस तरह उसे बुला रहा है, यह देखकर स्त्री को अचरज हुआ। लेकिन वह चलती आई।
साथ-साथ दोनों अंदर आए और कमरे में पहुँचे। वहाँ मार्टिन ने हाथ से बताकर कहा, “वह खाट है, वहाँ बैठ जाओ। आग है ही, ज़रा गरमा लो और बच्चे को भी दूध पिला लो।”
“दूध मेरे कहाँ है सबेरे से मैंने कुछ खाया ही नहीं है।” यह कहने पर भी बच्चे को उसने छाती से लगा ही लिया।
मार्टिन ने सिर खुजलाया। फिर रोटी निकाली और एक तश्तरी। फिर अँगीठी से उतारकर कुछ शोरबा रक़ाबी में दे दिया। दलिए की पतीली भी उतारी; लेकिन वह अभी हुआ नहीं था। सो, बस रोटी-रसा ही सामने कर दिया।
“लो, बैठ जाओ और शुरू करो। बच्चा लाओ मुझे दो। देखती क्या हो, बच्चे क्या मुझे हुए नहीं हैं? देख लेना, मैं बच्चों को ख़ूब मना लेता हूँ।”
स्त्री बैठकर खाने लगी। मार्टिन ने बच्चे को बिछौने पर लिटा दिया और ख़ुद बैठ गया। वह तरह-तरह से बच्चे को बहलाने लगा। कभी कैसी आवाज़ निकालता और कभी कुछ बोली बोलता। लेकिन दाँत थे नहीं और आवाज़ उससे ठीक नहीं निकलती थी। सो बच्चे का रोना जारी रहा। तब उँगली दे-देकर वह बच्चे को गुदगुदाने लगा। फिर एक खेल किया। उँगली सीधी बच्चे के मुँह तक ले जाता, फिर चट से खींच लेता। यह उसने बार-बार किया पर उँगली बालक को मुँह में नहीं लेने दी। क्योंकि उसकी उँगली काम से तमाम काली हो रही थी। मोम–वोम जाने क्या उसमें लगा था! बच्चा पहले तो इस उँगली के खेल को ध्यान से देखने लगा और चुप हो गया। फिर तो वह एकदम हँस पड़ा। मार्टिन यह देख बड़ा ही
ख़ुश हुआ।
स्त्री बैठी खाती जाती थी और बतलाती जाती थी कि कौन हूँ और क्यों ऐसी हालत में हूँ।
बोली, “मेरे आदमी की सिपाही की नौकरी थी। फिर कोई आठ महीने हुए जाने उन्हें कहाँ भेजा गया। तब से कुछ ख़बर उनकी नहीं मिली। उसके बाद मैंने रोटी पकाने की नौकरी कर ली। रोटी बनाती थी; लेकिन यह बालक होने को हुआ तो मुझे उन्होंने काम से हटा दिया। तीन महीने से मैं भटक रहीं हूँ कि नौकरी मिल जाए। जो पास था, पेट के ख़ातिर सब बेच चुकी। अब कौड़ी नहीं रह गई है। सोचा, मैं धाय बन जाऊँ। लेकिन कोई मुझे रखने को राज़ी नहीं हुआ। कहते थे कि मैं बहुत दुबली और दुखिया दिखती हूँ, सो दूध क्या उतरेगा। मैं यहाँ एक लालाइन की बात पर आई थी। वहाँ हमारे गाँव की एक नौकरानी है। उन्होंने मुझे रखने को कहा था। मैं समझती थी कि सब ठीक-ठाक है। पर वहाँ गई तो कहा कि अगले हफ़्ते तक हमें फ़ुर्सत नहीं है, फिर आना। वह दूर जगह थी और आते-जाते मेरा दम हार गया है। बच्चा बिचारा भूखा है, देखो कैसी आँखें हो गई हैं। भाग्य की बात है कि वह तो मकान की मालकिन दयालु हैं, भाड़ा नहीं लेतीं। नहीं तो, मेरा ठौर-ठिकाना न था।”
मार्टिन ने सुनकर साँस भरी। पूछा, “कोई गरम कपड़े पास नहीं हैं?” बोली, “गरम कपड़ा कहाँ से हो? अभी कल ही छह आने में अपना चदरा गिरबी रख चुकी हूँ।”
इतना कहकर स्त्री बढ़ी और बच्चे को गोद में ले लिया। मार्टिन खड़ा हो गया और अपने कपड़ों में खोज-छान करने लगा। आख़िर एक बड़ा गरम चोगा उसने निकाला और कहा, “यह लो। चीज़ तो फटी-पुरानी है; पर चलो बच्चे के कुछ काम तो आ ही जाएगी।”
स्त्री ने उस चोगे को देखा। फिर उस दयावान बूढ़े की तरफ़ आँख उठाई, फिर चोगे को हाथ में लेते-लेते वह रो पड़ी।
मार्टिन ने मुड़कर खाट के नीचे झुककर वहाँ से एक छोटा-सा बक्स निकाला! उसमें इधर-उधर कुछ खोजा और फिर नीचे सरकाकर बैठ गया।
स्त्री बोली, “भगवान तुम्हारा भला करे, बाबा। सचमुच ईश्वर ने ही मुझे इधर भेज दिया। नहीं तो बच्चा ठिठुरकर मर चुका होता। मैं चली, तब सर्दी इतनी नहीं थी। अब तो कैसी ग़ज़ब की ठंडी बयार चल रही है। ज़रूर यह ईश्वर की करनी है कि तुमने खिड़की से बाहर झाँका और मुझ ग़रीबनी पर दया की।”
मार्टिन मुस्कुराया। बोला, “यह सच बात है। उसी ने मुझे आज इधर देखने को कहा था। कोई यह संयोग ही नहीं है कि मैंने तुम्हें देखा।”
यह कहकर मार्टिन ने उसे अपनी सपने की बात सुनाई। बताया कि कैसे ईश्वर की वाणी हुई थी कि इंतज़ार करना, मैं आऊँगा।
स्त्री बोली, “कौन जाने? ईश्वर क्या नहीं कर सकता।” वह उठी और अपने बच्चे को चारों ओर से ढकते हुए चोगा कंधों पर डाल लिया। तब झुककर मार्टिन को फिर एक बार धन्यवाद दिया।
“प्रभु के नाम पर—यह लो।”
मार्टिन ने कहा और चदरा गिरवी से छुड़ाने के लिए छह आने स्त्री के हाथ में थमा दिए। स्त्री ने ईशु प्रभु को स्मरण किया। मार्टिन ने प्रभु का नाम लिया और फिर उसे बाहर पहुँचा आया।
स्त्री के चले जाने पर मार्टिन ने देगची उतार कुछ खाया-पीया, बासन-वस्त्र सँभालकर रख दिए और फिर काम करने बैठ गया। वह बैठा रहा, बैठा रहा और काम करता रहा। लेकिन खिड़की को नहीं भूला। छाया कोई खिड़की पर पड़ती कि वह तुरंत निगाह करता कि देखें, कौन जा रहा है। उनमें कुछ जान के लोग निकले तो कुछ अनपहचाने भी। पर कोई ख़ास नज़र नहीं आया।
थोड़ी देर बाद एक सेबवाली स्त्री को मार्टिन ने ठीक अपनी खिड़की के सामने रुकते देखा। वह एक बड़ी टोकरी लिए थी; लेकिन सेब उसमें बहुत नहीं रह गए दिखते थे। साफ़ था कि वह बहुत कुछ उसमें से बेच चुकी है। उसकी कमर पर एक बोरा था जिसमें छिपटियाँ भरी थीं। उसे वह घर ले जा रही थी। कहीं इमारत की मदद लगी होगी, सो वहीं से बटोरकर लाई होगी। बोरा उसे चुभ आया था और एक कंधे से दूसरे पर उसे बदलना चाहती थी। सो बोरे को उसने रास्ते के एक ओर रख दिया और टोकरी को किसी खंभे से टिका दिया। फिर बोरे की छिपटियों को हलहलाने लगी। लेकिन तभी फटी-सी टोपी ओढ़े एक लड़का उधर दौड़ा और टोकरी से एक सेब ले भागने को हुआ। पर बुढ़िया ने देख लिया और मुड़कर चट से उसकी बाँह पकड़ ली। लड़के ने बहुतेरी खींचातानी की कि छूट जाए, लेकिन बुढ़िया ने अपने हाथ जमाए रखे। टोपी बालक की उतारकर फेंक दी और उसे बालों से पकड़कर झँझोटने लगी। लड़का चिल्लाया जिस पर बुढ़िया और धिक्कार उठी। यह देख मार्टिन ने हाथ की आरी उड़सी भी नहीं कि हाथ से उसे वहीं डाल झट से दरवाज़े के बाहर आ गया। जल्दी में ऐनक भी छूटी। लड़खड़ाते पैरों वह सीढी उत्तर और दौड़ सड़क पर आ खड़ा हुआ। बुढ़िया लड़के के बाल झँझोट रही थी और गालियाँ दे रही थी। कहती थी, “तुझे पुलिस में दूँगी।” लड़का छूटने को मचल रहा था। चिल्ला रहा था कि “मैंने कुछ नहीं लिया, मुझे क्यों मार रही हो? मुझे छोड़ दो।”
मार्टिन ने आकर उन्हें अलग कर दिया। लड़के को हाथ से लेकर कहा, “जाने दो, माई। भगवान के लिए उसे अब माफ़ कर दो।”
“अजी, मैं उसे दिखा दूँगी। जिससे साल-एक याद तो रखे। बदमाश को थाने ले जाऊँगी!”
मार्टिन बुढ़िया को निहारने लगा।
“जाने दो, माई। फिर ऐसा नहीं करेगा। भगवान के लिए उसे जाने दो।” बुढ़िया ने लड़के को छोड़ दिया। लड़का भाग जाने को हुआ। लेकिन मार्टिन ने उसे रोक लिया।
लड़का रो उठा और माफ़ी माँगने लगा।
“ठीक। और यह तो अब अपने लिए एक सेब!” कहते हुए मार्टिन ने टोकरी से एक सेब लिया और लड़के को दे दिया। फिर बोला, “इसके पैसे मैं दूँगा तुम्हें माई।”
“इस तरह इन छोकरों को तुम बिगाड़ दोगे।” बुढ़िया बोली, “इसे कोड़े लगने चाहिए थे कि हफ़्ते भर तो याद रहती।”
“ओह, माई,” मार्टिन कह उठा, “छोड़ो-छोड़ो। यह तरीक़ा हम लोगों का हो, ईश्वर का यह तरीक़ा नहीं है। अगर एक सेब की चोरी के लिए उसे कोड़े लगने चाहिए तो हमें अपने पापों के लिए क्या मिलना चाहिए, सोचो तो?”
बुढ़िया चुप रह गई।
तब मार्टिन ने उसे उस कथा की याद दिलाई जहाँ प्रभु तो अपने सेवक पर सारा ऋण छोड़ देते हैं, पर वह दास ज़रा से के लिए अपने कर्ज़दार का गला जा दबोचता है। बुढ़िया ने यह सब सुना और लड़का भी पास खड़ा सुनता रहा।
“सो प्रभु की बानी है कि हम माफ़ करें। मार्टिन ने कहा, “नहीं तो हम भी माफ़ी नहीं पाएँगे। हर किसी को माफ़ करो। अनजान बालक को तो और भी पहले माफ़ी मिलनी चाहिए।”
बुढ़िया ने सिर डुलाया और साँस भरी।
बोली, “यह तो सच है। लेकिन वे इतने बिगड़े जो जा रहे हैं।”
मार्टिन बोला, “यह तो हम बड़ों पर है न कि अपने उदाहरण से उन्हें हम अच्छी राह दिखाएँ।”
“यही तो मैं कहती हूँ,” बुढ़िया बोली, “मेरे ख़ुद सात हो चुके हैं। उनमें सिर्फ़ अब एक लड़की है। बुढ़िया बताने लगी कि कैसे और कहाँ वह अपनी बेटी के साथ रहा करती थी और कितने धेवती-धेवते उसके थे। बोली, “यह देखो, अब मुझमें अगर्चे कुछ कस नहीं रह गया है, फिर भी उनके लिए मैं काम में जुटी ही रहती हूँ। और बच्चे भी वे भले हैं। उन्हें छोड़ और कोई भी तो मेरे पास नहीं लगता। नन्हीं ऐनी तो अब मुझे छोड़ किसी के पास जाएगी ही नहीं। कहेगी, ‘हमारी नानी, हमारी प्यारी अच्छी नानी’। “...और ऐनी की यह याद आते ही बुढ़िया की आँखें एकदम भीग गईं।
लड़के के लिए बोली, “सच तो है। बिचारे का बचपन था, और क्या। ईश्वर उसका सहाई हो।”
यह कहकर जैसे ही वह बोरा उठाकर अपनी कमर पर रखने को हुई कि लड़का कूदकर उसके सामने आ खड़ा हुआ और बोला, “लाओ, यह मैं ले चलूँ माँ। मैं उसी तरफ़ जा रहा हूँ।”
बुढ़िया ने 'हाँ' में सिर हिलाया और बोरा लड़के की कमर पर रख दिया। फिर दोनों साथ-साथ गली से चलते चले। मार्टिन से सेब के पैसे माँगना बुढ़िया बिलकुल ही भूल गई। दोनों आपस में बोलते-चालते वहाँ से गए, और मार्टिन खड़ा-खड़ा उन्हें देखता रहा।
आँख से वे ओझल हो गए तो मार्टिन घर वापस आया। जीने पर उसे अपनी ऐनक पड़ी मिली जो कि टूटी नहीं थी। उसे उठा और आरी हाथ में ले वह फिर काम पर बैठ गया। थोड़ा-सा काम किया था कि चमड़े के सूराख़ों से सुआ निकालना उसकी आँखों को मुश्किल होने लगा। तभी बाहर क्या देखता है कि लैंपवाला गली के लैंप जलाने गली से निकला जा रहा है।
सोचा—रोशनी का समय हो गया दिखता है। सो उसने भी लैंप ठीक किया, उसे टाँगा और फिर अपने काम पर बैठ गया। एक जूता उसने पूरा कर लिया। फिर अदल-बदलकर उसे जाँचने लगा। सब दुरुस्त था। सो उसने अपने औज़ारों को समेटा, कटनी-छटनी को बुहार दिया और मोम-धागा और सब चीज़-वस्तु को ठीक-ठाक रख दिया। फिर लैंप उतार मेज़ पर रख और आले से अपनी इंजील की पोथी ली। चाहता था कि वहीं से खोलूँ जहाँ पहले दिन निशान लगा छोड़ा था। लेकिन किताब दूसरी जगह खुल गई। उसे खोलना था कि कल का सपना फिर मार्टिन के सामने आ रहा। साथ ही उसे पैरों की आहट-सी सुन मिली, मानो कोई उसके पीछे चल-फिर रहा हो। मार्टिन मुड़ा। उसे लगा जैसे अँधेरे कोने में कई आदमी खड़े हों। लेकिन वह चिह्न न सका कि कौन हैं। उसी समय एक आवाज़ फुसफुसाकर मानो कान में बोली, “मार्टिन, मार्टिन, क्या तुम मुझे नहीं पहचानते?”
मार्टिन संदेह के सुर में बोला, “कौन?”
आवाज़ बोली, “यह मैं।”
कहने के साथ अँधियारे कोने से निकल स्टेपान आ आगे हुआ। वह मुस्कुराया! और बादल की भाँति फिर अंतर्धान हो गया।
फिर आवाज़ हुई, “और यह मैं।”
और इस पर अँधेरे में से वह स्त्री गोद में बच्चा लिए आ निकली। वह मुस्कुराई, बच्चा हँसा और ये दोनों अंतर्धान हो गए।
फिर तीसरी आवाज़ आई, “और यह मैं।”
और कहने के साथ ही वह बुढ़िया और सेब लिए वह लड़का आ सामने हुए, दोनों मुस्कुराए और अंतर्धान हो गए।
इस पर मार्टिन का हृदय आनंद से भर आया। उसने प्रभु को स्मरण किया, ऐनक आँखों पर रखी और ठीक जहाँ इंजील खुली थी, पढ़ने लगा। सफे के ऊपर ही पड़ा—
“मैं भूखा था और तूने मुझे खाना दिया। मैं प्यासा था, तूने मुझे पानी दिया। मैं अजनबी था और तूने मुझे ग्रहण किया।”
और सफे के अंत में पढ़ा—
“इन भाइयों में से एक के लिए, अदना-से-अदना के लिए, जो तूने किया वह मुझको किया समझ। जो दिया मुझे पहुँचा समझ।”
उस समय मार्टिन को प्रत्यक्ष हुआ कि उसका सपना सच्चा हुआ है। उसको प्रतीत हुई कि रक्षक प्रभु सचमुच ही उसके घर पधारे थे और उन्हीं ने उसका आतिथ्य पाया था।

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