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कविवर श्री भूधरदासजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhudhardasji ke Bhajan -2

अब मेरे समकित सावन आयो

(राग मलार)
अब मेरे समकित सावन आयो ।।टेक ।।
बीति कुरीति मिथ्या मति ग्रीषम, पावस सहज सुहायो ।।
अनुभव दामिनि दमकन लागी, सुरति घटा घन छायो ।
बोलै विमल विवेक पपीहा, सुमति सुहागिनि भायो ।।१ ।।अब मेरे. ।।
गुरुधुनि गरज सुनत सुख उपजै, मोर सुमन विहसायो ।
साधक भाव अंकूर उठे बहु, जित तित हरष सवायो ।।२ ।।अब मेरे. ।।
भूल धूल कहिं भूल न सूझत, समरस जल झर लायो ।
`भूधर' को निकसै अब बाहिर, निज निरचू घर पायो ।।३ ।।अब मेरे.

सुनि ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया

(राग सोरठ)
सुनि ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया ।।टेक ।।
टुक विश्वास किया जिन तेरा, सो मूरख पछताया ।।
आपा तनक दिखाय बीज१ ज्यों, मूढमती ललचाया ।
करि मद अंध धर्म हर लीनौं, अन्त नरक पहुँचाया ।।१ ।।सुनि. ।।
केते कंत किये तैं कुलटा, तो भी मन न अघाया ।
किसही सौं नहिं प्रीति निबाही; वह तजि और लुभाया ।।२ ।।सुनि. ।।
`भूधर' छलत फिरै यह सबकों, भौंदू करि जग पाया ।
जो इस ठगनी कों ठग बैठे, मैं तिनको सिर नाया ।।३ ।।सुनि. ।।

अज्ञानी पाप धतूरा न बोय

(राग सोरठ)
अज्ञानी पाप धतूरा न बोय ।।टेक ।।
फल चाखन की बार भरै दृग, मरि है मूरख रोय ।।
किंचित् विषयनि सुख के कारण, दुर्लभ देह न खोय ।
ऐसा अवसर फिर न मिलैगा, इस नींदड़ी न सोय ।।१ ।।अज्ञानी. ।।
इस विरियां मैं धर्म-कल्प-तरु, सींचत स्याने लोय ।
तू विष बोवन लागत तो सम, और अभागा कोय ।।२ ।।अज्ञानी. ।।
जो जग में दुखदायक बेरस, इसही के फल सोय ।
यों मन `भूधर' जानिकै भाई, फिर क्यों भोंदू होय ।।३ ।।अज्ञानी. ।।

ऐसी समझके सिर धूल

ऐसी समझके सिर धूल ।।टेक ।।
धरम उपजन हेत हिंसा, आचरैं अघमूल ।।
छके मत-मद पान पीके रहे मनमें फूल ।
आम चाखन चहैं भोंदू, बोय पेड़ बबूल ।।१ ।।ऐसी. ।।
देव रागी लालची गुरु, सेय सुखहित भूल ।
धर्म नगकी परख नाहीं, भ्रम हिंडोले झूल ।।२ ।।ऐसी. ।।
लाभ कारन रतन विणजै, परखको नहिं सूल ।
करत इहि विधि वणिज `भूधर', विनस जै है मूल ।।३ ।।ऐसी. ।।

चित्त! चेतनकी यह विरियां रे

(राग सोरठ)
चित्त! चेतनकी यह विरियां रे ।।टेक ।।
उत्तम जनम सुतन तरूनापौ, सुकृत बेल फल फरियां रे ।।
लहि सत-संगतिसौं सब समझी, करनी खोटी खरियां रे ।
सुहित संभाल शिथिलता तजिदैं, जाहैं बेली झरियां रे ।।१ ।।चित. ।।
दल बल चहल महल रूपेका, अर कंचनकी कलियां रे ।
ऐसी विभव बढ़ी कै बढ़ि है, तेरी गरज क्या सरियां रे ।।२ ।।चित. ।।
खोय न वीर विषय खल साटैं, ये क्रोड की घरियां रे ।
तोरि न तनक तगा हित `भूधर' मुकताफलकी लरियां रे ।।३ ।।चित. ।।

गरव नहिं कीजै रे, ऐ नर

(राग ख्याल)
गरव नहिं कीजै रे, ऐ नर निपट गंवार ।।टेक ।।
झूठी काया झूठी माया, छाया ज्यों लखि लीजै रे ।।१ ।।गरव. ।।
कै छिन सांझ सुहागरु जोबन, कै दिन जगमें जीजै रे ।।२ ।।गरव. ।।
बेगा चेत विलम्ब तजो नर, बंध बढ़ै थिति छीजै रे ।।३ ।।गरव. ।।
`भूधर' पलपल हो है भारी, ज्यों ज्यों कमरी भीजै रे ।।३ ।।गरव. ।।

निपट गंवार बीरा! थारी बान बुरी परी रे, बरज्यो मानत नाहिं

(राग सोरठ)
बीरा! थारी बान बुरी परी रे, बरज्यो मानत नाहिं ।।टेक ।।
तू हटसौं ऐसै रमै रे, दीवे पड़त पतंग ।।१ ।।बीरा. ।।
ये सुख हैं दिन दोयकै रे, फिर दु:ख की सन्तान ।
करै कुहाड़ी लेइकै रे, मति मारै पग जान ।।२ ।।बीरा. ।।
तनक न संकट सहि सकै रे! छिनमें होय अधीर ।
नरक विपति बहु दोहली रे, कैसे भरि है वीर ।।३ ।।बीरा. ।।
भव सुपना हो जायेगा रे, करनी रहेगी निदान ।
`भूधर' फिर पछतायगा रे, अबही समझि अजान ।।४ ।।बीरा. ।।

मन हंस! हमारी लै शिक्षा हितकारी!

(राग काफी)
मन हंस! हमारी लै शिक्षा हितकारी!
श्रीभगवान चरन पिंजरे वसि, तजि विषयनि की यारी ।।
कुमति कागलीसौं मति राचो, ना वह जात तिहारी ।
कीजै प्रीत सुमति हंसीसौं, बुध हंसन की प्यारी ।।१ ।।मन. ।।
काहेको सेवत भव झीलर, दुखजलपूरित खारी ।
निज बल पंख पसारि उड़ो किन, हो शिव सरवर चारी ।।२ ।।मन. ।।
गुरुके वचन विमल मोती चुन, क्यों निज वान विसारी ।
ह्वै है सुखी सीख सुधि राखें, `भूधर' भूलैं ख्वारी ।।३ ।।मन. ।।

सो मत सांचो है मन मेरे

(राग धनासरी)
सो मत सांचो है मन मेरे ।
जो अनादि सर्वज्ञप्ररूपित, रागादिक बिन जे रे ।।
पुरुष प्रमान प्रमान वचन तिस, कल्पित जान अने रे ।
राग दोष दूषित तिन बायक, सांचे हैं हित तेरे ।।१ ।।सो मत. ।।
देव अदोष धर्म हिंसा बिन, लोभ बिना गुरु वे रे ।
आदि अन्त अविरोधी आगम, चार रतन जहँ ये रे ।।२ ।।सो मत. ।।
जगत भर्यो पाखंड परख बिन, खाइ खता बहुतेरे ।
`भूधर' करि निज सुबुद्धि कसौटी, धर्म कनक कसि ले रे ।।३ ।।सो मत. ।।

मन मूरख पंथी, उस मारग मति जाय रे

(राग ख्याल)
मन मूरख पंथी, उस मारग मति जाय रे ।।टेक ।।
कामिनि तन कांतार जहाँ है, कुच परवत दुखदाय रे ।।
काम किरात बसै तिह थानक, सरवस लेत छिनाय रे ।
खाय खता कीचक से बैठे, अरु रावनसे राय रे ।।१ ।।मन. ।।
और अनेक लुटे इस पैंडे, वरनैं कौन बढ़ाय रे ।
वरजत हों वरज्यौ रह भाई, जानि दगा मति खाय रे ।।२ ।।मन. ।।
सुगुरु दयाल दया करि `भूधर', सीख कहत समझाय रे ।
आगै जो भावै करि सोई, दीनी बात जताय रे ।।३ ।।मन. ।।

सब विधि करन उतावला, सुमरनकौं सीरा

(राग काफी)
सब विधि करन उतावला, सुमरनकौं सीरा ।।टेक ।।
सुख चाहै संसार में, यों होय न नीरा ।।
जैसे कर्म कमावे है, सो ही फल वीरा!
आम न लागै आकके, नग होय न हीरा ।।१ ।।सब विधि. ।।
जैसा विषयनिकों चहै न रहै छिन धीरा ।
त्यों `भूधर' प्रभुकों जपै, पहुँचे भव तीरा ।।२ ।।सब विधि. ।।

आयो रे बुढ़ापो मानी, सुधि बुधि बिसरानी

(राग बंगला)
आयो रे बुढ़ापो मानी, सुधि बुधि बिसरानी ।।टेक ।।
श्रवन की शक्ति घटी, चाल चालै अटपटी,
देह लटी, भूख घटी, लोचन झरत पानी ।।१ ।।आया रे. ।।
दांतनकी पंक्ति टूटी, हाड़नकी संधि छूटी,
कायाकी नगरि लूटी, जात नहिं पहिचानी ।।२ ।।आया रे. ।।
बालोंने वरन फेरा, रोगों ने शरीर घेरा,
पुत्रहू न आवे नेरा, औरोंकी कहा कहानी ।।३ ।।आया रे. ।।
`भूधर' समुझि अब, स्वहित करैगो कब,
यह गति ह्वै है जब, तब पिछतै हैं प्राणी ।।४ ।।आया रे. ।।

चरखा चलता नाहीं (रे) चरखा हुआ पुराना (वे)

(राग आसावरी)
चरखा चलता नाहीं (रे) चरखा हुआ पुराना (वे) ।।
पग खूंटे दो हालन लागे, उर मदरा खखराना ।
छीदी हुई पांखड़ी पांसू, फिरै नहीं मनमाना ।।१ ।।
रसना तकली ने बल खाया, सो अब कैसै खूटै ।
शब्द-सूत सूधा नहिं निकसे, घड़ी-घड़ी पल-पल टूटै ।।२ ।।
आयु मालका नहीं भरोसा, अंग चलाचल सारे ।
रोज इलाज मरम्मत चाहे, वैद्य बढ़ई हारे ।।३ ।।
नया चरखला रंगा-चंगा, सबका चित्त चुरावै ।
पलटा वरन गये गुन अगले, अब देखैं नहिं भावै ।।४ ।।
मोटा मही कातकर भाई!, कर अपना सुरझेरा ।
अंत आग में इंर्धन होगा, `भूधर' समझ सवेरा ।।५ ।।

काया गागरि, जोझरी, तुम देखो चतुर विचार हो

(राग श्रीगौरी)
काया गागरि, जोझरी, तुम देखो चतुर विचार हो ।।टेक ।।
जैसे कुल्हिया कांचकी, जाके विनसत नाहीं वार हो ।।
मांसमयी माटी लई अरु, सानी रुधिर लगाय हो ।
कीन्हीं करम कुम्हारने, जासों काहूकी न वसाय हो ।।१ ।।काया. ।।
और कथा याकी सुनौं, यामैं अध उरध दश ठेह हो ।
जीव सलिल तहाँ थंभ रह्यौ भाई, अद्भुत अचरज येह हो ।।२ ।।काया. ।।
यासौं ममत निवारकैं, नित रहिये प्रभु अनुकूल हो ।
`भूधर' ऐसे ख्याल का भाई, पलक भरोसा भूल हो ।।३ ।।काया. ।।

गाफिल हुवा कहाँ तू डोले, दिन जाते तेरे भरती में

(राग भैरवी)
गाफिल हुवा कहाँ तू डोले, दिन जाते तेरे भरती में ।।
चोकस करत रहत है नाहीं, ज्यों अंजुलि जल झरती में ।
तैसे तेरी आयु घटत है, बचै न बिरिया मरती में ।।१ ।।
कंठ दबै तब नाहिं बनेगो, काज बनाले सरती में ।
फिर पछताये कुछ नहिं होवै, कूप खुदै नहीं जरती में ।।२ ।।
मानुष भव तेरा श्रावक कुल, यह कठिन मिला इस धरती में ।
`भूधर' भवदधि चढ़ नर उतरो, समकित नवका तरती में ।।३ ।।

जगत जन जूवा हारि चले

(राग विहाग)
जगत जन जूवा हारि चले ।।टेक ।।
काम कुटिल संग बाजी मांडी, उन करि कपट छले ।।जगत. ।।
चार कषायमयी जहँ चौपरि, पासे जोग रले ।
इस सरवस उत कामिनी कौड़ी, इह विधि झटक चले ।।१ ।।जगत. ।।
कूर खिलार विचार न कीन्हों, ह्वै है ख्वार भले ।
बिना विवेक मनोरथ काके, `भूधर' सफल फले ।।२ ।।जगत. ।।

जग में श्रद्धानी जीव जीवन मुकत हैंगे

(राग बङ्गाला)
जगमें श्रद्धानी जीव जीवन मुकत हैंगे ।।टेक ।।
देव गुरु सांचे मानैं, सांचो धर्म हिये आनैं ।
ग्रन्थ ते ही सांचे जानैं, जे जिन उकत हैंगे ।।१ ।।जगमें. ।।
जीवनकी दया पालैं, झूठ तजि चोरी टालें ।
परनारी भालैं नैंन जिनके लुकत हैंगे ।।२ ।।जगमें. ।।
जिय में सन्तोष धारैं, हियैं समता विचारैं ।
आगैंको न बंध पारैं, पाछैंसौं चुकत हैंगे ।।३ ।।जगमें. ।।
बाहिज क्रिया आराधैं, अन्दर सरूप साधैं ।
`भूधर' ते मुक्त लाधैं, कहूँ न रुकत हैंगे ।।४ ।।जगमें. ।।

वे कोई अजब तमासा, देख्या बीच जहान वे, जोर तमासा सुपनेका-सा

जोर तमासा सुपनेका-सा
वे कोई अजब तमासा, देख्या बीच जहान वे, जोर तमासा सुपनेका-सा
एकौंके घर मंगल गावैं, पूरी मनकी आसा ।
एक वियोग भरे बहु रोवैं, भरि भरि नैन निरासा ।।१ ।।वे कोई.।।
तेज तुरंगनिपै चढ़ि चलते, पहिरैं मलमल खासा ।
रंक भये नागे अति डोलैं, ना कोइ देय दिलासा ।।२ ।।वे कोई. ।।
तरकैं राज तखत पर बैठा, था खुश वक्त खुलासा ।
ठीक दुपहरी मुद्दत आई, जंगल कीना वासा ।।३ ।।वे कोई. ।।
तन धन अथिर निहायत जगमें, पानी माहिं पतासा ।
`भूधर' इनका गरब करैं जे, धिक तिनका जनमासा ।।४ ।।वे कोई. ।।

सुनि सुजान! पाँचों रिपु वश करि

(राग कल्याण)
सुनि सुजान! पांचों रिपु वश करि, सुहित करन असमर्थ अवश करि ।
जैसै जड़ खखार का कीड़ा, सुहित सम्हाल सकैं नहिं फंस करि ।।
पांचन को मुखिया मन चंचल, पहले ताहि पकर, रस कस करि ।
समझ देखि नायक के जीतै, जै है भाजि सहज सब लशकरि ।।१ ।।
इंद्रियलीन जनम सब खोयो, बाकी चल्यो जात है खस करि ।
`भूधर' सीख मान सतगुरुकी, इनसों प्रीति तोरि अब वश करि ।।२ ।।

अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी

(राग सोरठ)
अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी । अलख अमूरति की जोरी ।।अहो. ।।
इतमैं आतम राम रंगीले, उतमैं सुबुद्धि किसोरी ।
या कै ज्ञान सखा संग सुन्दर, वाकै संग समता गोरी ।।१ ।।अहो. ।।
सुचि मन सलिल दया रस केसरि, उदै कलश में घोरी ।
सुधी समझि सरल पिचकारी, सखिय प्यारी भरि भरि छोरी ।।२ ।।अहो. ।।
सत गुरु सीख तान धुरपद की, गावत होरा होरी ।
पूरब बंध अबीर उड़ावत, दान गुलाल भर झोरी ।।३ ।।अहो. ।।
`भूधर' आजि बड़े भागिन, सुमति सुहागिन मोरी ।
सो ही नारि सुलक्षिनी जगमैं, जासौं पतिनै रति जोरी ।।४ ।।अहो. ।।

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