कविवर श्री भूधरदासजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhudhardasji ke Bhajan
लगी लो नाभिनंदनसों
(राग सोरठ)
लगी लो नाभिनंदन सों ।
जपत जेम चकोर चकई, चन्द भरता को ।।
जाउ तन-धन जाउ जोवन, प्रान जाउ न क्यों ।
एक प्रभु की भक्ति मेरे, रहो ज्यों की त्यों।।१ ।।
और देव अनेक सेवे, कछु न पायो हौं ।
ज्ञान खोयो गाँठिको, धन करत कुवनिज ज्यों ।।२ ।।
पुत्र-मित्र कलत्र ये सब, सगे अपनी गों ।
नरक कूप उद्धरन श्रीजिन, समझ `भूधर' यों।।३ ।।
भगवन्त भजन क्यों भूला रे
== भगवन्त भजन क्यों भूला रे ==
(राग सोरठ)
भगवन्त भजन क्यों भूला रे ।।टेक ।।
यह संसार रैन का सुपना, तन धन वारि बबूला रे ।।
इस जीवन का कौन भरोसा, पावक में तृण-पूलारे ।
काल कुदार लिये सिर ठाड़ा, क्या समझै मन फूला रे ।।१ ।।
स्वारथ साधै पाँच पाँव तू, परमारथ को लूला रे ।
कहु कैसे सुख पैहै प्राणी, काम करै दुखमूला रे ।।२ ।।
मोह पिशाच छल्यो मति मारै, निज कर कंध वसूला रे ।
भज श्रीराजमतीवर `भूधर', दो दुरमति सिर धूला रे ।।३ ।।
जग में जीवन थोरा, रे अज्ञानी जागि
(राग ख्याल)
जग में जीवन थोरा, रे अज्ञानी जागि ।।टेक ।।
जनम ताड़ तरुतैं पड़ै, फल संसारी जीव ।
मौत महीमैं आय हैं, और न ठौर सदीव ।।१ ।।जगमें .।।
गिर-सिर दिवला जोइया, चहुंदिशि बाजै पौन ।
बलत अचंभा मानिया, बुझत अचंभा कौन ।।२ ।।जगमें .।।
जो छिन जाय सो आयुमैं, निशि दिन ढूकै काल ।
बाँधि सकै तो है भला, पानी पहिली पाल ।।३ ।।जगमें .।।
मनुष देह दुर्लभ्य है, मति चूकै यह दाव ।
भूधर राजुल कंतकी, शरण सिताबी आव ।।४ ।।जगमें .।।
मेरे मन सूवा, जिनपद पींजरे वसि, यार लाव न बार रे
(राग सोरठ)
मेरे मन सूवा, जिनपद पिंजरे वसि, यार लाव न बार रे ।।टेक ।।
संसार सेमलवृक्ष सेवत, गयो काल अपार रे ।
विषय फल तिस तोड़ि चाखे, कहा देख्यौ सार रे ।।१ ।।
तू क्यों निचिन्तो सदा तोकों, तकत काल मंजार रे ।
दाबै अचानक आन तब तुझे, कौन लेय उबार रे ।।२ ।।
तू फंस्यो कर्म कुफन्द भाई, छूटै कौन प्रकार रे ।
तैं मोह-पंछी-वधक-विद्या, लखी नाहिं गंवार रे ।।३ ।।
है अजौं एक उपाय `भूधर', छूटै जो नर धार रे ।
रटि नाम राजुल-रमन को, पशुबंध छोड़न हार रे ।।४ ।।
अरे! हाँ चेतो रे भाई
(राग ख्याल)
अरे! हाँ चेतो रे भाई ।।
मानुष देह लही दुलही, सुघरी उघरी सतसंगति पाई।।१ ।।
जे करनी वरनी करनी नहिं, ते समझी करनी समझाई ।।२ ।।
यों शुभ थान जग्यो उर ज्ञान, विषै विषपान तृषा न बुझाई ।।३ ।।
पारस पाय सुधारस `भूधर', भीखके मांहि सु लाज न आई ।।४ ।।
जपि माला जिनवर नामकी
(राग सारङ्ग)
जपि माला जिनवर नाम की ।
भजन सुधारससों नहिं धोई, सो रसना किस काम की ।।जपि. ।।
सुमरन सार और सब मिथ्या, पटतर धूंवा नाम की ।
विषम कमान समान विषय सुख, काय कोथली चाम की ।।१ ।।जपि. ।।
जैसे चित्र-नाग के मांथै, थिर मूरति चित्राम की ।
चित आरूढ़ करो प्रभु ऐसे, खोय गुंडी परिनाम की ।।२ ।।जपि. ।।
कर्म बैरि अहनिशि छल जोवैं, सुधि न परत पल जाम की ।
`भूधर' कैसैं बनत विसारैं, रटना पूरन राम की ।।३ ।।जपि. ।।
थाँकी कथनी म्हानै
(राग ख्याल)
थांकी कथनी म्हानै प्यारी लगै जी, प्यारी लगै म्हारी भूल भगै जी ।।
तुम हित हांक बिना हो श्रीगुरु, सूतो जियरो कांई जगै जी ।।
मोहनिधूलि मेलि म्हारे मांथै, तीन रतन म्हारा मोह ठगै जी ।
तुम पद ढोकत सीस झरी रज, अब ठगको कर नाहिं वगै जी ।।१ ।।
टूट्यो चिर मिथ्यात महाज्वर, भागां मिल गया वैद्य मगै जी ।
अन्तर अरुचि मिटी मम आतम, अब अपने निजदर्व पगै जी ।।२ ।।
भव वन भ्रमत बढ़ी तिसना तिस, क्योंहि बुझै नहिं हियरा दगै जी ।
`भूधर' गुरु उपदेशामृतरस, शान्तमई आनंद उमगै जी ।।३ ।।
भवि देखि छबी भगवान की
(राग सारङ्ग)
भवि देखि छबी भगवान की ।।टेक ।।
सुन्दर सहज सोम आनन्दमय, दाता परम कल्यानकी ।।भवि. ।।
नासादृष्टि मुदित मुखवारिज, सीमा सब उपमान की ।
अंग अडोल अचल आसन दिढ़, वही दशा निज ध्यान की ।।१ ।।भवि. ।।
इस जोगासन जोगरीतिसौं, सिद्धि भई शिवथानकी ।
ऐसें प्रगट दिखावै मारग, मुद्रा धात पखान की ।।२ ।।भवि. ।।
जिस देखें देखन अभिलाषा, रहत न रंचक आनकी ।
तृपत होत `भूधर' जो अब ये, अंजुलि अम्रतपान की ।।३ ।।भवि. ।।
जिनराज चरन मन मति बिसरै
जिनराज चरन मन मति बिसरै ।।टेक ।।
को जानैं किहिंवार कालकी, धार अचानक आनि परै ।।
देखत दुख भजि जाहिं दशौं दिश पूजन पातकपुंज गिरै ।
इस संसार क्षारसागरसौं, और न कोई पार करै ।।१ ।।
इक चित ध्यावत वांछित पावत, आवत मंगल विघन टरै ।
मोहनि धूलि परी माँथे चिर, सिर नावत ततकाल झरै ।।२ ।।
तबलौं भजन संवार सयानैं, जबलौं कफ नहिं कंठ अरै ।
अगनि प्रवेश भयो घर `भूधर', खोदत कूप न काज सरै ।।३ ।।
जिनराज ना विसारो, मति जन्म वादि हारो
(राग पंचम)
जिनराज ना विसारो, मति जन्म वादि हारो ।
नर भौ आसान नाहिं, देखो सोच समझ वारो।।जिनराज ।।
सुत मात तात तरुनी, इनसौं ममत निवारो ।
सबहीं सगे गरजके, दुखसीर नहिं निहारो ।।१ ।।जिनराज ।।
जे खायं लाभ सब मिलि, दुर्गति में तुम सिधारो ।
नट का कुटंब जैसा यह खेल यों विचारो ।।२ ।।जिनराज ।।
नाहक पराये काजै, आपा नरक में पारो ।
`भूधर' न भूल जगमैं, जाहिर दगा है यारो ।।३ ।।जिनराज ।।
पुलकन्त नयन चकोर पक्षी
(हरिगीतिका)
पुलकन्त नयन चकोर पक्षी, हँसत उर इन्दीवरो ।
दुर्बुद्धि चकवी बिलख बिछुरी, निविड़ मिथ्यातम हरो ।।
आनन्द अम्बुज उमगि उछर्यो, अखिल आतम निरदले ।
जिनवदन पूरनचन्द्र निरखत, सकल मनवांछित फले ।।१ ।।
मुझ आज आतम भयो पावन, आज विघ्न विनाशियो ।
संसार सागर नीर निवट्यो, अखिल तत्त्व प्रकाशियो ।।
अब भई कमला किंकरी मुझ, उभय भव निर्मल ठये ।
दु:ख जरो दुर्गति वास निवरो, आज नव मंगल भये ।।२ ।।
मनहरन मूरति हेरि प्रभुकी, कौन उपमा लाइये ।
मम सकल तनके रोम हुलसे, हर्ष और न पाइये ।।
कल्याणकाल प्रतक्ष प्रभुको, लखें जो सुर नर घने ।
तिस समय की आनन्द महिमा, कहत क्यों मुखसों बने ।।३ ।।
भर नयन निरखे नाथ तुमको, और बांछा ना रही ।
मन ठठ मनोरथ भये पूरन, रंक मानो निधि लही ।।
अब होय, भव-भव भक्ति तुम्हरी, कृपा ऐसी कीजिये ।
कर जोर `भूधरदास' बिनवै, यही वर मोहि दीजिये ।।४ ।।
नैननि को वान परी, दरसन की
(राग ख्याल)
नैननि को वान परी, दरसन की ।।टेक ।।
जिन मुखचन्द चकोर चित मुझ, ऐसी प्रीति करी ।।नैन. ।।
और अदेवन के चितवनको अब चित चाह टरी ।
ज्यों सब धूलि दबै दिशि दिशिकी, लागत मेघझरी ।।१ ।।नैन. ।।
छबि समाय रही लोचनमें, विसरत नाहिं घरी ।
`भूधर' कह यह टेव रहो थिर, जनम जनम हमरी ।।२ ।।नैन. ।।
प्रभु गुन गाय रै, यह औसर फेर न पाय रे
(राग ख्याल)
प्रभु गुन गाय रै, यह औसर फेर न पाय रे ।।टेक ।।
मानुष भव जोग दुहेला, दुर्लभ सतसंगति मेला ।
सब बात भली बन आई, अरहन्त भजौ रे भाई ।।१ ।।प्रभु. ।।
पहले चित-चीर संभारो कामादिक मैल उतारो ।
फिर प्रीति फिटकरी दीजे, तब सुमरन रंग रंगीजे ।।२ ।।प्रभु. ।।
धन जोर भरा जो कूवा, परिवार बढ़ै क्या हूवा ।
हाथी चढ़ि क्या कर लीया, प्रभु नाम बिना धिक जीया ।।३ ।।प्रभु. ।।
यह शिक्षा है व्यवहारी, निहचै की साधनहारी ।
`भूधर' पैडी पग धरिये, तब चढ़ने को चित करिये ।।४ ।।प्रभु. ।।
सुन ज्ञानी प्राणी, श्री गुरु सीख सयानी
(राग सोरठ)
सुन ज्ञानी प्राणी, श्री गुरु सीख सयानी ।।टेक ।।
नरभव पाय विषय मति सेवो, ये दुरगति अगवानी ।।सुन. ।।
यह भव कुल यह तेरी महिमा, फिर समझी जिनवानी ।
इस अवसर में यह चपलाई, कौन समझ उर आनी ।।१ ।।सुन. ।।
चंदन काठ-कनक के भाजन, भरि गंगा का पानी ।
तिल खलि रांधत मंदमती जो, तुझ क्या रीस बिरानी ।।२ ।।सुन. ।।
`भूधर' जो कथनी सो करनी, यह बुद्धि है सुखदानी ।
ज्यों मशालची आप न देखै, सो मति करै कहानी ।।३ ।।सुन. ।।
वे मुनिवर कब मिलि है उपगारी
(राग मलार)
वे मुनिवर कब मिलि है उपगारी ।।टेक ।।
साधु दिगम्बर नगन निरम्बर, संवर भूषणधारी ।।वे मुनि. ।।
कंचन-काच बराबर जिनकैं, ज्यौं रिपु त्यौं हितकारी ।
महल-मसान मरन अरु जीवन, सम गरिमा अरु गारी ।।१ ।।वे मुनि. ।।
सम्यग्ज्ञान प्रधान पवन बल, तप पावक परजारी ।
सेवत जीव सुवर्ण सदा जै, काय-कारिमा टारी ।।२ ।।वे मुनि. ।।
जोरि जुगल कर `भूधर' बिनवै, तिन पद ढोक हमारी ।
भाग उदय दरसन जब पाऊँ, ता दिनकी बलिहारी ।।३ ।।वे मुनि. ।।
सो गुरुदेव हमारा है साधो
(राग सोरठ)
सो गुरुदेव हमारा है साधो ।।टेक ।।
जोग-अगनि मैं जो थिर राखैं, यह चित्त चंचल पारा है ।।
करन-कुरंग खरे मदमाते, जप-तप खेत उजारा है ।
संजम-डोर-जोर वश कीने, ऐसा ज्ञान-विचारा है ।।१ ।।सो गुरु. ।।
जा लक्ष्मीको सब जग चाहै, दास हुआ जग सारा है ।
सो प्रभु के चरनन की चेरी, देखो अचरज भारा है ।।२ ।।सो गुरु. ।।
लोभ-सरप के कहर जहर की, लहरि गई दु:ख टारा है ।
`भूधर' ता रिषि का शिष्य हूजे, तब कछु होय सुधारा है ।।३ ।।सो गुरु. ।।
अब पूरी कर नींदड़ी, सुन जिया रे! चिरकाल
अब पूरी कर नींदड़ी, सुन जिया रे! चिरकाल तू सोया ।
माया मैली रातमें, केता काल विगोया ।।अब. ।।
धर्म न भूल अयान रे! विषयों वश वाला ।
सार सुधारस छोड़के, पीवै जहर पियाला ।।१ ।।अब. ।।
मानुष भवकी पैठ में जग विणजी आया ।
चतुर कमाई कर चले, मूढ़ौं मूल गुमाया ।।२ ।।अब. ।।
तिसना तज तप जिन किया, तिन बहु हित जोया ।
भोग मगन शठ जे रहे, तिन सरवस खोया ।।३ ।।अब. ।।
काम विथा पीड़ित जिया, भोगहि भले जानैं ।
खाज खुजावत अंगमें, रोगी सुख मानैं ।।४ ।।अब. ।।
राग उरगनी जोरतैं, जग डसिया भाई!
सब जिय गाफिल हो रहे, मोह लहर चढ़ाई ।।५ ।।अब. ।।
गुरु उपगारी गारुड़ी, दुख देख निवारैं ।
हित उपदेश सुमंत्रसों, पढ़ि जहर उतारैं ।।६ ।।अब. ।।
गुरु माता गुरु ही पिता, गुरु सज्जन भाई ।
`भूधर' या संसारमें, गुरु शरनसहाई ।।७ ।।अब. ।।
भलो चेत्यो वीर नर तू, भलो चेत्यो वीर
(राग सोरठ)
भलो चेत्यो वीर नर तू, भलो चेत्यो वीर ।।टेक ।।
समुझि प्रभुके शरण आयो, मिल्यो ज्ञान वजीर ।।भलो. ।।
जगतमें यह जनम हीरा, फिर कहाँ थो धीर ।
भलीवार विचार छांड्यो, कुमति कामिनी सीर ।।१ ।।भलो. ।।
धन्य धन्य दयाल श्रीगुरु सुमरि गुणगंभीर ।
नरक परतैं राखि लीनों, बहुत कीनी भीर ।।२ ।।भलो. ।।
भक्ति नौका लही भागनि, कितक भवदधि नीर ।
ढील अब क्यों करत `भूधर', पहुँच पैली तीर ।।३ ।।भलो. ।।
देखो भाई! आतमदेव बिराजै
(राग गौरी)
देखो भाई! आतमदेव बिराजै ।।टेक ।।
इसही हूठ हाथ देवलमैं, केवलरूपी राजै ।।
अमल उजास जोतिमय जाकी, मुद्रा मंजुल छाजै ।
मुनिजनपूज अचल अविनाशी, गुण बरनत बुधि लाजै ।।१ ।।देखो. ।।
परसंजोग समल प्रतिभासत, निज गुण मूल न त्याजै ।
जैसे फेटक पखान हेतसों, श्याम अरुन दुति साजैं ।।२ ।।देखो. ।।
`सोऽहं' पद समतासो ध्यावत, घटहीमैं प्रभु पाजै ।
`भूधर' निकट निवास जासुको, गुरु बिन भरम न भाजै ।।३ ।।देखो. ।।
अन्तर उज्जवल करना रे भाई!
(राग सोरठ)
अन्तर उज्जल करना रे भाई! ।।टेक ।।
कपट कृपान तजै नहिं तबलौ, करनी काज न सरना रै ।।
जप-तप-तीरथ-यज्ञ-व्रतादिक आगम अर्थ उचरना रे ।
विषय-कषाय कीच नहिं धोयो, यों ही पचि पचि मरना रे ।।१ ।।अन्तर. ।।
बाहिर भेष क्रिया उर शुचिसों, कीये पार उतरना रे ।
नाहीं है सब लोक-रंजना, ऐसे वेदन वरना रे ।।२ ।।अन्तर. ।।
कामादिक मनसौं मन मैला, भजन किये क्या तिरना रे ।
`भूधर' नील वसन पर कैसैं, केसर रंग उछरना रे ।।३ ।।अन्तर. ।।
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