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कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -6

नहिं ऐसो जनम बारंबार

कठिन कठिन लह्यो मनुष भव, विषय भजि मति हार ।।नहिं. ।।
पाय चिन्तामन रतन शठ, छिपत उदधिमँझार ।
अंध हाथ बटेर आई, तजत ताहि गँवार ।।नहिं. ।।१ ।।
कबहुँ नरक तिरयंच कबहूँ, कबहूँ सुरगबिहार ।
जगतमहिं चिरकाल भ्रमियो, दुर्लभ नर अवतार ।।नहिं. ।।२ ।।
पाय अमृत पाँय धोवै, कहत सुगुरु पुकार ।
तजो विषय कषाय `द्यानत', ज्यों लहो भवपार ।।नहिं. ।।३ ।।

निज जतन करो गुन-रतननिको, पंचेन्द्रीविषय

सत्य कोट खाई करुनामय, वाग विराग छिमा भुवि भर।।निज. ।।१ ।।
जीव भूप तन नगर बसै है, तहँ कुतवाल धरमको कर।।निज.।।२ ।।
`द्यानत' जब भंडार न जावै, तब सुख पावै साहु अमर।।निज.।।३ ।।

परमाथ पंथ सदा पकरौ

कै अरचा परमेश्वरजीकी, कै चरचा गुन चित्त धरौ।।परमारथ. ।।१ ।।
जप तप संजम दान छिमा करि, परधन परतिय देख डरौ।।परमारथ.।।२ ।।
`द्यानत' ज्ञान यही है चोखा, ध्यानसुधामृत पान करौ।।परमारथ.।।३ ।।

प्राणी लाल! छांडो मन चपलाई

देखो तन्दुलमच्छ जु मनतैं, लहै नरक दुखदाई ।।प्राणी. ।।
धारै मौन दया जिनपूजा, काया बहुत तपाई ।
मनको शल्य गयो नहिं जब लों, करनी सकल गँवाई ।।प्राणी. ।।१ ।।
बाहूबलि मुनि ज्ञान न उपज्यो, मनकी खुटक न जाई ।
सुनतैं मान तज्यो मनको तब, केवलजोति जगाई ।।प्राणी. ।।२ ।।
प्रसनचंद रिषि नरक जु जाते, मन फेरत शिव पाई ।
तनतैं वचन वचनतैं मनको, पाप कह्यो अधिकाई ।।प्राणी. ।।३ ।।
देंहिं दान गहि शील फिरैं बन, परनिन्दा न सुहाई ।
वेद पढ़ैं निरग्रंथ रहैं जिय, ध्यान बिना न बड़ाई ।।प्राणी. ।।४ ।।
त्याग फरस रस गंध वरण सुर, मन इनसों लौ लाई ।
घर ही कोस पचास भ्रमत ज्यों, तेलीको वृष भाई ।।प्राणी. ।।५ ।।
मन कारण है सब कारजको, विकलप बंध बढ़ाई ।
निरविकलप मन मोक्ष करत है, सूधी बात बताई ।।प्राणी. ।।६ ।।
`द्यानत' जे निज मन वश करि हैं, तिनको शिवसुख थाई ।
बार बार कहुँ चेत सवेरो, फिर पाछैं पछताई ।।प्राणी. ।।७ ।।

प्राणी लाल! धरम अगाऊ धारौ

जबलौं धन जोवन हैं तेरे, दान शील न बिसारौ ।।प्राणी. ।।
जबलौं कर पद दिढ़ हैं तेरे, पूजा तीरथ सारौ ।
जीभ नैन जबलौं हैं नीके, प्रभु गुन गाय निहारौ ।।प्राणी. ।।१ ।।
आसन श्रवन सबल हैं तोलौं, ध्यान शब्द सुनि धारौ ।
जरा न आवै गद न सतावै, संजम पर उपकारौ ।।प्राणी. ।।२ ।।
देह शिथिल मति विकल न तौलौं, तप गहि तत्त्व विचारौ ।
अन्तसमाधि-पोत चढ़ि अपनो, `द्यानत' आतम तारौ ।।प्राणी. ।।६ ।।

भाई! कहा देख गरवाना रे

गहि अनन्त भव तैं दुख पायो, सो नहिं जात बखाना रे ।।भाई. ।।
माता रुधिर पिताके वीरज, तातैं तू उपजाना रे ।
गरभ वास नवमास सहे दुख, तल सिर पाँव उचाना रे ।।भाई. ।।१ ।।
मात अहार चिगल मुख निगल्यो, सो तू असन गहाना रे ।
जंती तार सुनार निकालै, सो दुख जनम सहाना रे ।।भाई. ।।२ ।।
आठ पहर तन मलि मलि धोयो, पोष्यो रैन बिहाना रे ।
सो शरीर तेरे संग चल्यो नहिं, छिनमें खाक समाना रे ।।भाई. ।।३ ।।
जनमत नारी, बाढ़त भोजन, समरथ दरब नसाना रे ।
सो सुत तू अपनो कर जानै, अन्त जलावै प्राना रे ।।भाई. ।।४ ।।
देखत चित्त मिलाप हरै धन, मैथुन प्राण पलाना रे ।
सो नारी तेरी ह्वै कैसे, मूवें प्रेत प्रमाना रे ।।भाई. ।।५ ।।
पाँच चोर तेरे अन्दर पैठे, तैं ठाना मित्राना रे ।
खाय पीय धन ज्ञान लूटके, दोष तेरे सिर ठाना रे ।।भाई. ।।६ ।।
देव धरम गुरु रतन अमोलक, कर अन्तर सरधाना रे ।
`द्यानत' ब्रह्मज्ञान अनुभव करि, जो चाहै कल्याना रे ।।भाई. ।।७ ।।

भाई काया तेरी दुखकी ढेरी

भाई काया तेरी दुखकी ढेरी, बिखरत सोच कहा है ।
तेरे पास सासतौ तेरो, ज्ञानशरीर महा है ।।भाई ।।
ज्यों जल अति शीतल ह्वै काचौ, भाजन दाह दहा है ।
त्यों ज्ञानी सुखशान्त कालका, दुख समभाव सहा है ।।भाई. ।।१ ।।
बोदे उतरैं नये पहिरतैं, कौंने खेद गहा है ।
जप तप फल परलोक लहैं जे, मरकै वीर कहा है ।।भाई. ।।२ ।।
`द्यानत' अन्तसमाधि चहैं मुनि, भागौं दाव लहा है ।
बहु तज मरण जनम दुख पावक, सुमरन धार बहा है ।।भाई. ।।३ ।।

भाई! ज्ञानका राह दुहेला रे 1

भाई! ज्ञानका राह दुहेला रे
मैं ही भगत बड़ा तपधारी, ममता गृह झकझेला रे ।।भाई. ।।
मैं कविता सब कवि सिरऊपर, बानी पुदगलमेला रे ।
मैं सब दानी मांगै सिर द्यौ, मिथ्याभाव सकेला रे ।।भाई. ।।१ ।।
मृतक देह बस फिर तन आऊं, मार जिवाऊं छेला रे ।
आप जलाऊं फेर दिखाऊं, क्रोध लोभतैं खेला रे ।।भाई. ।।२ ।।
वचन सिद्ध भाषै सोई ह्वै, प्रभुता वेलन वेला रे ।
`द्यानत' चंचल चित पारा थिर, करै सुगुरुका चेला रे ।।भाई. ।।३ ।।

भाई! ज्ञानका राह सुहेला रे 2

भाई! ज्ञानका राह सुहेला रे
दरब न चहिये देह न दहिये, जोग भोग न नवेला रे ।।भाई. ।।
लड़ना नाहीं मरना नाहीं, करना बेला तेला रे ।
पढ़ना नाहीं गढ़ना नाहीं, नाच न गावन मेला रे ।।भाई. ।।१ ।।
न्हानां नाहीं खाना नाहीं, नाहिं कमाना धेला रे ।
चलना नाहीं जलना नाहीं, गलना नाहीं देला रे ।।भाई. ।।२ ।।
जो चित चाहे सो नित दाहै, चाह दूर करि खेला रे ।
`द्यानत' यामें कौन कठिनता, वे परवाह अकेला रे ।।भाई. ।।३ ।।

मानों मानों जी चेतन यह

मानों मानों जी चेतन यह, विषै भोग छांड देहु,
विषै की समान कोऊ, नाहीं विष आन।।टेक ।।
तात मात पुत्र नार, नदी नाव ज्यों निहार,
जोवन गुमान जानों, चपला समान ।।मानांे. ।।१ ।।
हाथी रथ प्यादे बाज, इनसों न तेरो काज,
सुपने समान देख, कहा गरबान ।।मानांे. ।।२ ।।
ये तो देहके मिलापी, तू तो देहसों अव्यापी,
ज्ञान दृष्टि धर देखि, चेतिये सुजान ।।मानांे. ।।३ ।।

मिथ्या यह संसार है, झूठा यह संसार है रे

जो देही षट्ररसों पोषै, सो नहिं संग चलै रे ।
औरनिको तोहि कौन भरोसो, नाहक मोह करै रे, भाई ।।मिथ्या. ।।१ ।।
सुख की बातैं बूझै नाहीं, दुख को सुक्ख लखै रे ।
मूढ़ों माहीं मातों डोलै, साधौं पास डरै रे, भाई ।।मिथ्या. ।।२ ।।
झूठ कमाता झूठी खाता, झूठी जाप जपै रे ।
सच्चा सांई सूझै नांहीं, क्यों करि पार लगैरे, भाई ।।मिथ्या. ।।३ ।।
जमसों डरता फूला फिरता, करता मैं मैं मैं रे ।
`द्यानत' स्याना सोही जाना, जो प्रभु ध्यान धरै रे भाई ।।मिथ्या. ।।४ ।।

मेरी मेरी करत जनम सब बीता

परजय-रत स्वस्वरूप न जान्यो, ममता ठगनी ठग लीता।।मेरी. ।।१ ।।
इंद्री-सुख लखि सुख विसरानौ, पांचों नायक वश नहिं कीता।।मेरी.।।२ ।।
`द्यानत' समता-रसके रागी, विषयनि त्यागी ह्वै जग जीता ।।मेरी.।।३ ।।

मेरे मन कब ह्वै है बैराग

राज समाज अकाज विचारौं, छारौं विषय कारे नाग।।मेरे. ।।१ ।।
मन्दिर वास उदास होयकैं, जाय बसौं बन बाग।।मेरे.।।२ ।।
कब यह आसा कांसा फूटै, लोभ भाव जाय भाग।।मेरे.।।३ ।।
आप समान सबै जिय जानौं, राग दोषकों त्याग।।मेरे.।।४ ।।
`द्यानत' यह विधि जब बनि आवै, सोई घड़ी बड़भाग ।।मेरे.।।५ ।।

मोहि कब ऐसा दिन आय है

सकल विभाव अभाव होंहिंगे, विकलपता मिट जाय है ।।मोहि. ।।
यह परमातम यह मम आतम, भेद-बुद्धि न रहाय है ।
ओरनिकी का बात चलावै, भेद-विज्ञान पलाय है ।।मोहि. ।।१ ।।
जानैं आप आपमें आपा, सो व्यवहार विलाय है ।
नय-परमान-निक्षेपन-माहीं, एक न औसर पाय है ।।मोहि. ।।२ ।।
दरसन ज्ञान चरनके विकलप, कहो कहाँ ठहराय है ।
`द्यानत' चेतन चेतन ह्वै है, पुदगल पुदगल थाय है ।।मोहि. ।।३ ।।

ये दिन आछे लहे जी लहे जी

देव धरम गुरूकी सरधा करि, मोह मिथ्यात दहे जी दहे जी।।ये. ।।१ ।।
प्रभु पूजे सुने आगमको, सतसंगति माहिं रहे जी रहे जी।।ये.।।२ ।।
`द्यानत' अनुभव ज्ञानकला कछु, संजम भाव गहे जी गहे जी ।।ये.।।३ ।।

रे जिय! जनम लाहो लेह

चरन ते जिन भवन पहुँचैं, दान दैं कर जेह।।रे जिय. ।।
उर सोई जामैं दया है, अरु रुधिरको गेह ।
जीभ सो जिन नाम गावै, सांचसौं करै नेह ।।रे जिय. ।।१ ।।
आंख ते जिनराज देखैं, और आँखैं खेह ।
श्रवन ते जिनवचन सुनि शुभ, तप तपै सो देह ।।रे जिय. ।।२ ।।
सफल तन इह भांति ह्वै है, और भांति न केह ।
ह्वै सुखी मन राम ध्यावो, कहैं सदगुरु येह ।।रे जिय. ।।३ ।।

विपतिमें धर धीर, रे नर! विपतिमें धर धीर

सम्पदा ज्यों आपदा रे!, विनश जै है वीर।।रे नर. ।।१ ।।
धूप छाया घटत बढ़ै ज्यों, त्योंहि सुख दुख पीर।।रे मन.।।२ ।।
दोष `द्यानत' देय किसको, तोरि करम-जँजीर।।रे मन.।।३ ।।

समझत क्यों नहिं वानी, अज्ञानी जन

स्यादवाद-अंकित सुखदायक, भाषी केवलज्ञानी ।।समझत. ।।
जास लखैं निरमल पद पावै, कुमति कुगतिकी हानी ।
उदय भया जिहिमें परगासी, तिहि जानी सरधानी ।।समझत. ।।१ ।।
जामें देव धरम गुरु वरनें, तीनौं मुकति निसानी ।
निश्चय देव धरम गुरु आतम, जानत विरला प्रानी ।।समझत. ।।२ ।।
या जगमांहि तुझे तारनको, कारन नाव बखानी ।
`द्यानत' सो गहिये निहचैसों, हूजे ज्यों शिवथानी ।।समझत. ।।३ ।।

संसारमें साता नाहीं वे

छिनमें जीना छिनमें मरना, धन हरना छिनमाहीं वे।।संसार. ।।१ ।।
छिनमें भोगी छिनमें रोगी, छिनमें छय-दुख पाहीं वे।।संसार.।।२ ।।
`द्यानत' लखके मुनि होवैं जे, ते पावैं सुख ठाहीं वे ।।संसार.।।३ ।।

सोग न कीजे बावरे! मरें पीतम लोग

जगत जीव जलबुदबुदा, नदी नाव सँजोग।।सोग. ।।
आदि अन्तको संग नहिं, यह मिलन वियोग ।
कई बार सबसों भयो, सम्बन्ध मनोग ।।सोग. ।।१ ।।
कोट वरष लौं रोइये, न मिलै वह जोग ।
देखैं जानैं सब सुनैं, यह तन जमभोग ।।सोग. ।।२ ।।
हरिहर ब्रह्मासे खये, तू किनमें टोग ।
`द्यानत' भज भगवन्त जो, विनसै यह रोग ।।सोग. ।।३ ।।

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