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कविवर श्री दौलतरामजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Daulatramji ke Bhajan -3

धनि मुनि निज आतमहित कीना

भव प्रसार तप अशुचि विषय विष, जान महाव्रत लीना ।।धनि. ।।
एकविहारी परिग्रह छारी, परीसह सहत अरीना ।
पूरव तन तपसाधन मान न, लाज गनी परवीना।।१ ।।धनि. ।।
शून्य सदन गिर गहन गुफामें, पदमासन आसीना ।
परभावनतैं भिन्न आपपद, ध्यावत मोहविहीना।।२ ।।धनि. ।।
स्वपरभेद जिनकी बुधि निजमें, पागी वाहि लगीना ।
`दौल' तास पद वारिज रजसे, किस अघ करे न छीना।।३ ।।धनि. ।।

देखो जी आदीश्वर स्वामी कैसा ध्यान लगाया है!

कर ऊपरि कर सुभग विराजै, आसन थिर ठहराया है ।।टेक ।।
जगत-विभूति भूतिसम तजकर, निजानन्द पद ध्याया है ।
सुरभित श्वासा, आशा वासा, नासादृष्टि सुहाया है ।।१ ।।
कंचन वरन चलै मन रंच न, सुरगिर ज्यों थिर थाया है ।
जास पास अहि मोर मृगी हरि, जातिविरोध नसाया है ।।२ ।।
शुध उपयोग हुताशन में जिन, वसुविधि समिध जलाया है ।
श्यामलि अलकावलि शिर सोहै, मानों धुआँ उड़ाया है ।।३ ।।
जीवन-मरन अलाभ-लाभ जिन, तृन-मनिको सम भाया है ।
सुर नर नाग नमहिं पद जाकै, `दौल' तास जस गाया है ।।४ ।।

जय श्री ऋषभ जिनंदा! नाश तौ करो स्वामी मेरे दुखदंदा

जय श्री ऋषभ जिनंदा! नाश तौ करो स्वामी मेरे दुखदंदा ।।टेक. ।।
मातु मरुदेवी प्यारे, पिता नाभिके दुलारे ।
वंश तो इक्ष्वाक, जैसे नभवीच चंदा।।१ ।।जय श्री. ।।
कनक वरन तन, मोहत भविक जन ।
रवि शशि कोटि लाजैं, लाजै मकरन्दा।।२ ।।जय श्री. ।।
दोष तौ अठारा नासे, गुन छियालीस भासे ।
अष्ट-कर्म काट स्वामी, भये निरफंदा।।३ ।।जय श्री. ।।
चार ज्ञानधारी गनी, पार नाहिं पावै मुनी ।
`दौलत' नमत सुख चाहत अमंदा।।४ ।।जय श्री. ।।

भज ऋषिपति ऋषभेश

भज ऋषिपति ऋषभेश, ताहि नित नमत अमर असुरा ।
मनमथ मथ दरसावन शिवपथ, वृषरथचक्रघुरा ।।भज. ।।
जा प्रभुगर्भ छमासपूर्व सुर, करी सुवर्णधरा ।
जन्मत सुरगिरधर सुरगणयुत, हरि पय-न्हवन करा।।१ ।।भज. ।।
नटत नृत्यकी विलय देख प्रभु, लहि विराग सु थिरा ।
तब हि देवऋषि आय नाय शिर, जिनपदपुष्प धरा।।२ ।।भज. ।।
केवल समय जास वच रविने, जगभ्रमतिमिरहरा ।
सुदृगबोधचारित्र पोतलहि, भवि भवसिंधुतरा।।३ ।।भज. ।।
योगसंहार निवार शेषविधि, निवसे वसुम धरा ।
`दौलत' जे जाको जस गावे, ते ह्वै अज अमरा।।४ ।।भज. ।।

मेरी सुध लीजै रिषभ स्वाम!

मेरी सुध लीजै रिषभस्वाम! मोहि कीजै शिवपथगाम ।।टेक. ।।
मैं अनादि भवभ्रमत दुखी अब, तुम दुख मेटत कृपाधाम ।
मोहि मोह घेरा कर चेरा, पेरा चहुँगति विदित ठाम।।१ ।।मेरी. ।।
विषयन मन ललचाय हरी मुझ, शुद्धज्ञान-संपति ललाम ।
अथवा यह जड़ को न दोष मम, दुखसुखता, परनति सुकाम।।२ ।।मेरी. ।।
भाग जगे अब चरन जपे तुम, वच सुनके गहे सुगुनग्राम ।
परमविराग ज्ञानमय मुनिजन, जपत तुमारी सुगुनदाम।।३ ।।मेरी. ।।
निर्विकार संपति कृति तेरी, छविपर वारों कोटिकाम ।
भव्यनिके भव हारन कारन, सहज यथा तमहरन घाम।।४ ।।मेरी. ।।
तुम गुनमहिमा कथन करनको, गिनत गनी निजबुद्धि खाम ।
`दोलतनी' अज्ञान परनती, हे जगत्राता कर विराम।।५ ।।मेरी. ।।

जगदानंदन जिन अभिनंदन

जगदानंदन जिन अभिनंदन, पदअरविंद नमूं मैं तेरे ।।टेक ।।
अरुणवरन अघताप हरन वर, वितरन कुशल सु शरन बडेरे ।
पद्मासदन मदन-मद-भंजन, रंजन मुनिजन मन अलिकेरे ।।१ ।।
ये गुन सुन मैं शरनै आयो, मोहि मोह दुख देत घनेरे ।
ता मदभानन स्वपर पिछानन, तुम विन आन न कारन हेरे ।।२ ।।
तुम पदशरण गही जिनतैं ते, जामन-जरा-मरन-निरवेरे ।
तुमतैं विमुख भये शठ तिनको, चहुँ गति विपत महाविधि पेरे ।।३ ।।
तुमरे अमित सुगुन ज्ञानादिक, सतत मुदित गनराज उगेरे ।
लहत न मित मैं पतित कहों किम, किन शशकन गिरिराज उखेरे ।।४ ।।
तुम बिन राग दोष दर्पनज्यों, निज निज भाव फलैं तिनकेरे ।
तुम हो सहज जगत उपकारी, शिवपथ-सारथवाह भलेरे ।।५ ।।
तुम दयाल बेहाल बहुत हम, काल-कराल व्याल-चिर-घेरे ।
भाल नाय गुणमाल जपों तुम, हे दयाल, दुखटाल सबेरे ।।६ ।।
तुम बहु पतित सुपावन कीने, क्यों न हरो भव संकट मेरे ।
भ्रम-उपाधि हर शम समाधिकर, `दौल' भये तुमरे अब चेरे ।।७ ।।

पद्मसद्म पद्मापद पद्मा

पद्मसद्म पद्मापद पद्मा, मुक्तिसद्म दरशावन है ।
कलि-मल-गंजन मन अलि रंजन, मुनिजन शरन सुपावन है ।।
जाकी जन्मपुरी कुशंबिका, सुर नर-नाग रमावन है ।
जास जन्मदिनपूरब षटनव, मास रतन बरसावन है ।।१ ।।
जा तपथान पपोसागिरि सो, आत्म-ज्ञान थिर थावन है ।
केवलजोत उदोत भई सो, मिथ्यातिमिर-नशावन है ।।२ ।।
जाको शासन पंचाननसो, कुमति मतंग नशावन है ।
राग बिना सेवक जन तारक, पै तसु रुषतुष भाव न है ।।३ ।।
जाकी महिमा के वरननसों, सुरगुरु बुद्धि थकावन है ।
`दौल' अल्पमति को कहबो जिमि, शशक गिरिंद धकावन है ।।४ ।।

चन्द्रानन जिन चन्द्रनाथ के

चन्द्रानन जिन चन्द्रनाथ के, चरन चतुर-चित ध्यावतु हैं ।
कर्म-चक्र-चकचूर चिदातम, चिनमूरत पद पावतु हैं ।।टेक ।।
हाहा-हूहू-नारद-तुंबर, जासु अमल जस गावतु हैं ।
पद्मा सची शिवा श्यामादिक, करधर बीन बजावतु हैं ।।१ ।।
बिन इच्छा उपदेश माहिं हित, अहित जगत दरसावतु हैं ।
जा पदतट सुर नर मुनि घट चिर, विकट विमोह नशावतु हैं ।।२ ।।
जाकी चन्द्र बरन तनदुतिसों, कोटिक सूर छिपावतु हैं ।
आतमजोत उदोतमाहिं सब, ज्ञेय अनंत दिपावतु हैं ।।३ ।।
नित्य-उदय अकलंक अछीन सु, मुनि-उडु-चित्त रमावतु हैं ।
जाकी ज्ञानचन्द्रिका लोका-लोक माहिं न समावतु हैं ।।४ ।।
साम्यसिंधु-वर्द्धन जगनंदन, को शिर हरिगन नावतु हैं ।
संशय विभ्रम मोह `दौल' के, हर जो जगभरमावतु हैं ।।५ ।।

भाखूँ हित तेरा, सुनि हो मन मेरा

भाखूँ हित तेरा, सुनि हो मन मेरा ।।टेक. ।।
नरनरकादिक चारौं गति में, भटक्यो तू अधिकानी ।
परपरणति में प्रीति करी, निज परनति नाहिं पिछानी ।
सहै दुख क्यों न घनेरा ।।१ ।।भाखूँ. ।।
कुगुरु कुदेव कुपंथ पंकफंसि, तैं बहु खेद लहायो ।
शिवसुख दैन जैन जगदीपक, सो तैं कबहुँ न पायो ।
मिट्यो न अज्ञान अंधेरा ।।२ ।।भाखूँ. ।।
दर्शनज्ञानचरण तेरी निधि, सौ विधिठगन ठगी है ।
पाँचों इंद्रिन के विषयन में, तेरी बुद्धि लगी है ।
भया इनका तू चेरा ।।३ ।।भाखूँ. ।।
तू जगजाल विषै बहु उरझ्यो, अब कर ले सुरझेरा ।
`दौलत' नेमिचरन पंकज का, हो तू भ्रमर सबेरा ।
नशै ज्यों दुख भवकेरा ।।४ ।।भाखूँ. ।।

आतम रूप अनूपम अद्भुत

आतम रूप अनूपम अद्भुत, याहि लखैं भव सिंधु तरो ।।टेक ।।
अल्पकाल में भरत चक्रधर, निज आतमको ध्याय खरो ।
केवलज्ञान पाय भवि बोधे, ततछिन पायौ लोकशिरो ।।१ ।।
या बिन समुझे द्रव्य-लिंगमुनि, उग्र तपनकर भार भरो ।
नवग्रीवक पर्यन्त जाय चिर, फेर भवार्णव माहिं परो ।।२ ।।
सम्यग्दर्शन ज्ञान चरन तप, येहि जगत में सार नरो ।
पूरव शिवको गये जाहिं अब, फिर जैहैं, यह नियत करो ।।३ ।।
कोटि ग्रन्थको सार यही है, ये ही जिनवानी उचरो ।
`दौल' ध्याय अपने आतमको, मुक्तिरमा तब वेग बरो ।।४ ।।

चिन्मूरत दृग्धारी की मोहे

चिन्मूरत दृग्धारीकी मोहे, रीति लगत है अटापटी ।।टेक ।।
वाहिर नारकिकृत दुख भोगै, अंतर सुखरस गटागटी ।
रमत अनेक सुरनि संग पै तिस, परनतितैं नित हटाहटी ।।१ ।।
ज्ञानविरागशक्ति तैं विधि-फल, भोगत पै विधि घटाघटी ।
सदननिवासी तदपि उदासी, तातैं आस्रव छटाछटी ।।२ ।।
जे भवहेतु अबुधके ते तस, करत बन्धकी झटाझटी ।
नारक पशु तिय षँढ विकलत्रय, प्रकृतिन की ह्वै कटाकटी ।।३ ।।
संयम धर न सकै पै संयम, धारन की उर चटाचटी ।
तासु सुयश गुनकी `दौलतके' लगी, रहै नित रटारटी ।।४ ।।

आप भ्रमविनाश आप

आप भ्रमविनाश आप आप जान पायौ ।
कर्णधृत सुवर्ण जिमि चितार चैन थायौ ।।आप. ।।
मेरो मन तनमय, तन मेरो मैं तनको ।
त्रिकाल यौं कुबोध नश, सुबोधभान जायौ।।१ ।।आप. ।।
यह सुजैनवैन ऐन, चिंतन पुनि पुनि सुनैन ।
प्रगटो अब भेद निज, निवेदगुन बढ़ायौ।।२ ।।आप. ।।
यौं ही चित अचित मिश्र, ज्ञेय ना अहेय हेय ।
इंधन धनंजय जैसे, स्वामियोग गायौ।।३ ।।आप. ।।
भंवर पोत छुटत झटति, बांछित तट निकटत जिमि ।
रागरुख हर जिय, शिवतट निकटायौ।।४ ।।आप. ।।
विमल सौख्यमय सदीव, मैं हूँ नहिं अजीव ।
द्योत होत रज्जु में, भुजंग भय भगायौ।।५ ।।आप. ।।
यौं ही जिनचंद सुगुन, चिंतत परमारथ गुन ।
`दौल' भाग जागो जब, अल्पपूर्व आयौ।।६ ।।आप. ।।

चेतन यह बुधि कौन सयानी

चेतन यह बुधि कौन सयानी, कही सुगुरु हित सीख न मानी ।।
कठिन काकताली ज्यौं पायौ, नरभव सुकुल श्रवन जिनवानी ।।चेतन. ।।
भूमि न होत चाँदनीकी ज्यौ, त्यौं नहिं धनी ज्ञेयको ज्ञानी ।
वस्तुरूप यौं तू यौं ही शठ, हटकर पकरत सोंज विरानी।।१ ।।चेतन. ।।
ज्ञानी होय अज्ञान राग-रुषकर निज सहज स्वच्छता हानी ।
इन्द्रिय जड़ तिन विषय अचेतन, तहाँ अनिष्ट इष्टता ठानी।।२ ।।चेतन. ।।
चाहै सुख, दुख ही अवगाहै, अब सुनि विधि जो है सुखदानी ।
`दौल' आपकरि आप आपमैं, ध्याय ल्याय लय समरससानी।।३ ।।आप. ।।

चेतन कौन अनीति गही रे

चेतन कौन अनीति गही रे, न मानैं सुगुरु कही रे ।
जिन विषयनवश बहु दुख पायो, तिनसौं प्रीति ठही रे ।।चेतन. ।।
चिन्मय ह्वै देहादि जड़नसौं, तो मति पागि रही रे ।
सम्यग्दर्शनज्ञान भाव निज, तिनकौं गहत नहीं रे।।१ ।।चेतन. ।।
जिनवृष पाय विहाय रागरुष, निजहित हेत यही रे ।
`दौलत' जिन यह सीख धरी उर, तिन शिव सहज लही रे।।२ ।।चेतन. ।।

चेतन तैं यौं ही भ्रम ठान्यो

चेतन तैं यौं ही भ्रम ठान्यो, ज्यों मृग मृगतृष्णा जल जान्यो ।
ज्यौं निशितममैं निरख जेवरी, भुजंग मान नर भय उर आन्यो ।।
ज्यौं कुध्यान वश महिष मान निज, फंसि नर उरमाहीं अकुलान्यौ ।
त्यौं चिर मोह अविद्या पेर्यो, तेरों तैं ही रूप भुलान्यो ।।१ ।।
तोय तेल ज्यौं मेल न तनको, उपज खपज मैं सुखदुख मान्यो ।
पुनि परभावनको करता ह्वै, तैं तिनको निज कर्म पिछान्यो ।।२ ।।
नरभव सुथल सुकुल जिनवानी, काललब्धि बल योग मिलान्यो ।
`दौल' सहज भज उदासीनता, तोष-रोष दुखकोष जु भान्यो ।।३ ।।

चेतन अब धरि सहजसमाधि

चेतन अब धरि सहजसमाधि, जातैं यह विनशै भव ब्याधि ।।चेतन. ।।
मोह ठगौरी खायके रे, परको आपा जान ।
भूल निजातम ऋद्धिको तैं, पाये दु:ख महान।।१ ।।चेतन. ।।
सादि अनादि निगोद दोयमें, पर्यो कर्मवश जाय ।
श्वासउसासमँझार तहाँ भव, मरन अठारह थाय।।२ ।।चेतन. ।।
कालअनन्त तहाँ यौं वीत्यो, जब भइ मन्द कषाय ।
भूजल अनिल अनल पुन तरु ह्वै, काल असंख्य गमाय।।३ ।।चेतन. ।।
क्रमक्रम निकसि कठिन तैं पाई, शंखादिक परजाय ।
जल थल खचर होय अघ ठाने, तस वश श्वभ्र लहाय।।४ ।।चेतन. ।।
तित सागरलों बहु दुख पाये, निकस कबहुँ नर थाय ।
गर्भ जन्मशिशु तरुणवृद्ध दुख, सहे कहे नहिं जाय।।५ ।।चेतन. ।।
कबहूँ किंचित पुण्यपाकतैं चउविधि देव कहाय ।
विषयआश मन त्रास लही तहं, मरन समय विललाय।।६ ।।चेतन. ।।
यौं अपार भवखारवार में, भ्रम्यो अनन्ते काल ।
`दौलत' अब निजभाव नाव चढ़ि, लै भवाब्धिकी पाल।।७ ।।चेतन. ।।

चिदरायगुन सुनो मुनो

चिदरायगुन सुनो मुनो प्रशस्त गुरुगिरा ।
समस्त तज विभाव, हो स्वकीयमें थिरा ।।चिदरायगुन. ।।
निजभावके लखाव बिन, भवाब्धिमें परा ।
जामन मरन जरा त्रिदोष, अग्निमें जरा।।१ ।।चिदरायगुन. ।।
फिर सादि औ अनादि दो, निगोदमें परा ।
तहँ अंकके असंख्यभाग, ज्ञान ऊबरा।।२ ।।चिदरायगुन. ।।
तहाँ भव अन्तरमुहूर्तके कहे गनेश्वरा ।
छयासठ सहस त्रिशत छतीस, जन्म धर मरा।।३ ।।चिदरायगुन. ।।
यौं वशि अनंतकाल फिर, तहांतै नीसरा ।
भूजल अनिल अनल प्रतेक, तरुमें तन धरा।।४ ।।चिदरायगुन. ।।
अनुंधरीसु कुंथु कानमच्छ अवतरा ।
जल थल खचर कुनर नरक, असुर उपज मरा।।५ ।।चिदरायगुन. ।।
अबके सुथल सुकुल सुसंग, बोध लहि खरा ।
`दौलत' त्रिरत्न साध लाध, पद अनुत्तरा।।६ ।।चिदरायगुन. ।।

चित चिंतकैं चिदेश कब

चित चिंतकैं चिदेश कब, अशेष पर वमू ।
दुखदा अपार विधि दुचार की चमू दमू ।।
तजि पुण्यपाप थाप आप, आपमें रमू ।।
कब राग-आग शर्म-बाग, दागिनी शमू ।।१ ।।
दृग-ज्ञानभानतैं मिथ्या, अज्ञानतम दमू ।
कब सर्व जीव प्राणिभूत, सत्त्वसौं छमू ।।२ ।।
जल मल्ललिप्त कल सुकल, सुबल्ल परिनमू ।
दलके त्रिशल्ल मल्ल कब, अटल्लपद पमू ।।३ ।।
कब ध्याय अज अमरको फिर न, भवविपिन भमू ।
जिन पूर कौल `दौल' को यह, हेतु हौं नमू ।।४ ।।

राचि रह्यो परमाहिं तू अपनो

राचि रह्यो परमाहिं तू अपनो, रूप न जानै रे ।।टेक ।।
अविचल चिनमूरत विनमूरत, सुखी होत तस ठानै रे ।।
ये पर इनहिं वियोग योग में, यौं ही सुख दुख मानै रे ।।१ ।।
चाह न पाये पाये तृष्णा, सेवत ज्ञान जघानै रे ।
विपतिखेत विधिवंधहेत पै, जान विषय रस खानै रे ।।२ ।।
नर भव जिनश्रुतश्रवण पाय अब, कर निज सुहित सयानै रे ।
`दौलत' आतम ज्ञान-सुधारस, पीवो सुगुरु बखानै रे ।।३ ।।

मेरे कब ह्वै वा दिन की सुघरी

मेरे कब ह्वै वा दिन की सुघरी ।।टेक ।।
तन विन वसन असनविन वनमें, निवसों नासादृष्टिधरी ।।
पुण्यपाप परसौं कब विरचों, परचों निजनिधि चिरविसरी ।
तज उपाधि सजि सहजसमाधी, सहों घाम हिम मेघझरी ।।१ ।।
कब थिरजोग धरों ऐसो मोहि, उपल जान मृग खाज हरी ।
ध्यान-कमान तान अनुभव-शर, छेदों किहि दिन मोह अरी ।।२ ।।
कब तृनकंचन एक गनों अरु, मनिजडितालय शैलदरी ।
`दौलत' सत गुरुचरन सेव जो, पुरवो आश यहै हमरी ।।३ ।।

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