भावों में सरलता
भावों में सरलता रहती है, जहाँ प्रेम की सरिता बहती है ।
हम उस धर्म के पालक हैं, जहाँ सत्य अहिंसा रहती है ।।
जो राग में मूँछे तनते हैं, जड़ भोगों में रीझ मचलते हैं ।
वे भूलते हैं निज को भाई, जो पाप के सांचे ढलते हैं ।।
पुचकार उन्हें माँ जिनवाणी, जहाँ ज्ञान कथायें कहती हैं ।।हम उस. ।।१ ।।
जो पर के प्राण दुखाते हैं, वह आप सताये जाते हैं ।
अधिकारी वे हैं शिव सुख के, जो आतम ध्यान लगाते हैं ।।
`सौभाग्य' सफल कर नर जीवन, यह आयु ढलती रहती है ।।हम उस. ।।१ ।।
निरखी निरखी मनहर मूरत
निरखी निरखी मनहर मूरत तोरी हो जिनन्दा,
खोई खोई आतम निधि निज पाई हो जिनन्दा ।।टेर ।।
ना समझी से अबलो मैंने पर को अपना मान के,
पर को अपना मान के ।
माया की ममता में डोला, तुमको नहीं पिछान के,
तुमको नहीं पिछान के ।।
अब भूलों पर रोता यह मन, मोरा हो जिनन्दा ।।१ ।।
भोग रोग का घर है मैंने, आज चराचर देखा है,
आज चराचर देखा है ।
आतम धन के आगे जग का झूँठा सारा लेखा है,
झूँठा सारा लेखा है ।
अपने में घुल मिल जाऊँ, वर पावूँ जिनन्दा ।।२ ।।
तू भवनाशी मैं भववासी, भव से पार उतरना है,
भव से पार उतरना है ।
शुद्ध स्वरूपी होकर तुमसा, शिवरमणी को वरना है,
शिवरमणी को वरना है ।।
ज्ञानज्योति `सौभाग्य' जगे घट, मोरे हो जिनन्दा ।।३ ।।
मैं हूँ आतमराम
मैं हूँ आतमराम, मैं हूँ आतमराम,
सहज स्वभावी ज्ञाता दृष्टा चेतन मेरा नाम ।।टेर ।।
कुमति कुटिल ने अब तक मुझको निज फंदे में डाला ।
मोहराज ने दिव्य ज्ञान पर, डाला परदा काला ।
डुला कुगति अविराम, खोया काल तमाम ।।सहज ।।१ ।।
जिन दर्शन से बोध हुआ है मुझको मेरा आज ।
पर द्रव्यों से प्रीति बढ़ा निज, कैसे करूँ अकाज ।
दूर हटो जग काम, रागादिक परिणाम ।।सहज ।।२ ।।
आओ अंतर ज्ञान सितारो, आतम बल प्रगटा दो ।
पंचम गति ``सौभाग्य मिले प्रिय आवागमन छुड़ादो ।
पाऊँ सुख ललाम, शिवस्वरूप शिवधाम।।सहज ।।३ ।।
मन महल में दो दो भाव जगे
मन महल में दो दो भाव जगे, इक स्वभाव है, इक विभाव है ।
अपने-अपने अधिकार मिले, इक स्वभाव है, इक विभाव है ।।टेर ।।
बहिरंग के भाव तो पर के हैं, अंतर के स्वभाव सो अपने हैं ।
यही भेद समझले पहले जरा, तू कौन है तेरा कौन यहाँ ।
तू कौन है तेरा कौन यहाँ ।।१ ।।
तन तेल फुलेल इतर भी मले, नित नवला भूषण अंग सजे ।
रस भेद विज्ञान न कंठ धरा नहीं सम्यक् श्रद्धा साज सजे ।
नहीं सम्यक् श्रद्धा साज सजे ।।२ ।।
मिथ्यात्व तिमिर के हरने को, अक्षय आतम आलोक जगा ।
हे वीतराग सर्वज्ञ प्रभो, तब दर्शन मन `सौभाग्य' पगा ।
तब दर्शन मन `सौभाग्य' पगा ।।३ ।।
तोरी पल पल निरखें मूरतियाँ
आतम रस भीनी यह सूरतियाँ ।।टेर ।।
घोर मिथ्यात्व रत हो तुम्हें छोड़कर,
भोग भोगे हैं जड़ से लगन जोड़कर ।
चारों गति में भ्रमण, कर कर जामन मरण,
लखि अपनी न सच्ची सूरतियाँ ।।१ ।।
तेरे दर्शन से ज्योति जगी ज्ञान की,
पथ पकड़ी है हमने स्वकल्याण की ।
पद तुझसा महान, लगा आतम का ध्यान,
पावे `सौभाग्य' पावन शिव गतियाँ ।।२ ।।
मत बिसरावो जिनजी
कि अब मैं शरण गहूँ किसकी ।।टेर ।।
भूल मनाये अबलो मैंने, देव तुझे बिसरा करके ।
भोगे भोग अधम तम जग के, मन अति इतरा करके ।।
यह मुझको अभिमान रहा नित अमर रहूँगा आकर के ।
तू सच्चा है आशा झूँठी, प्रीत करी जिसकी ।।१ ।।
संशय विभ्रम मोह मिटा अब, ज्ञान दीपिका जागी है ।
अंतर उज्ज्वल हुये मनोरथ, विषय कालिमा भागी है ।
निजानंद पद पाऊँ तुझसा लगन यही बस लागी ।
सिद्धासन `सौभाग्य' मिले फिर चाह करूँ किसकी ।।२ ।।
तेरी शीतल-शीतल मूरत लख
कहीं भी नजर ना जमें, प्रभू शीतल ।
सूरत को निहारें पल पल तब,
छबि दूजी नजर ना जमें! प्रभू शीतल ।।टेर ।।
भव दु:ख दाह सही है घोर, कर्म बली पर चला न जोर ।
तुम मुख चन्द्र निहार मिली अब, परम शान्ति सुख शीतल ढोर
निज पर का ज्ञान जगे घट में भव बंधन भीड़ थमें प्रभू शीतल ।।१ ।।
सकल ज्ञेय के ज्ञायक हो, एक तुम्ही जग नायक हो ।
वीतराग सर्वज्ञ प्रभू तुम, निज स्वरूप शिवदायक हो ।
`सौभाग्य' सफल हो नर जीवन, गति पंचम धाम धमे प्रभू शीतल ।।२ ।।
तेरे दर्शन से मेरा दिल खिल गया
मुक्ति के महल का सुराज्य मिल गया ।
आतम के सुज्ञान का सुभान हो गया,
भव का विनाशी तत्त्वज्ञान हो गया ।।टेर ।।
तेरी सच्ची प्रीत की यही है निशानी ।
भोगों से छूट बने आतम सुध्यानी ।
कर्मो की जीत का सुसाज मिल गया ।।मुक्ति के ।।१ ।।
तेरी परतीत हरे व्याधियाँ पुरानी ।
जामन मरण हर दे शिवरानी ।
प्रभो सुख शान्ति सुमन आज खिल गया ।।मुक्ति के ।।२ ।।
ज्ञानानन्द अतुल धन राशी ।
सिद्ध समान वरूँ अविनाशी ।
यही 'सौभाग्य' शिवराज मिल गया ।।मुक्ति के ।।३ ।।
स्वामी तेरा मुखड़ा है मन को लुभाना
स्वामी तेरा गौरव है मन को डुलाना ।
देखा ना ऐसा सुहाना-२ ।।स्वामी ।।टेर ।।
ये छवि ये तप त्याग जगत का, भाव जगाता आतम बल का ।
हरता है नरकों का जाना-२ ।।स्वामी ।।१ ।।
जो पथ तूने है अपनाया, वो मन मेरे भी अति भाया ।
पाऊँ मैं तुम पद लुभाना-२ ।।स्वामी ।।२ ।।
पंचम गति का मैं वर चाहूँ, जीवन का ``सौभाग्य दिपाऊँ ।
गूँजे हैं अंतर तराना-२ ।।स्वामी ।।३ ।।
तेरी शांति छवि पे मैं बलि बलि जाऊँ
खुले नयन मारग आ दिल मैं बिठाऊँ ।।
लेखा ना देखा, धर्म पाप जोड़ा,
बना भोग लिप्सा कि चाहों में दौड़ा,
सहे दुख जो जो कहा लो सुनाऊँ - तेरी शांति. ।। १ ।।
तेरा ज्ञान गौरव जो गणधर ने गाया,
वही गीत पावन मुझे आज भाया,
उसी के सुरों में सुनो मैं सुनाऊँ - तेरी शांति छवि. ।। २ ।।
जगी आत्म ज्योति सम्यक्त्व तत्त्व की,
घटी है घटा शाम मिथ्या विकल की,
निजानन्द 'सौभाग्य' सेहरा सजाऊँ-२ ।।३ ।।
जहाँ रागद्वेष से रहित निराकुल
जहाँ रागद्वेष से रहित निराकुल, आतम सुख का डेरा ।
वो विश्व धर्म है मेरा, वो जैन धर्म है मेरा ।
जहाँ पद-पद पर है परम अहिंसा करती क्षमा बसेरा ।
वो विश्व धर्म है मेरा, वो जैनधर्म है मेरा ।।टेर ।।
जहाँ गूंजा करते, सत संयम के गीत सुहाने पावन ।
जहाँ ज्ञान सुधा की बहती निशिदिन धारा पाप नशावन ।
जहाँ काम क्रोध, ममता, माया का कहीं नहीं है घेरा ।।१ ।।
जहाँ समता समदृष्टि प्यारी, सद्भाव शांति के भारी ।
जहाँ सकल परिग्रह भार शून्य है, मन अदोष अविकारी ।
जहाँ ज्ञानानंत दरश सुख बल का, रहता सदा सवेरा ।।२ ।।
जहाँ वीतराग विज्ञान कला, निज पर का बोध कराये ।
जो जन्म मरण से रहित, निरापद मोक्ष महल पधराये ।
वह जगतपूज्य 'सौभाग्य' परमपद, हो आलोकित मेरा ।।३ ।।
तेरे दर्शन को मन दौड़ा
तेरे दर्शन को मन दौड़ा ।।टेर ।।
कोटि-कोटि मुँह से जो तेरी महिमा सुनते आया ।
इससे भी तू है बढ़ा-चढ़ा है यह दर्शन कर पाया ।।
इस पृथ्वी पर बड़ा कठिन है, तुमसा पाना जोड़ा ।।तेरे ।।१ ।।
कर पर कर धर नाशा दृष्टि आसन अटल जमाया ।
परदोष रोष अम्बर आडम्बर रहित तुम्हारी काया ।
वीतराग विज्ञान कला से, जगबन्धन को तोड़ा ।।तेरे ।।२ ।।
पुण्य पाप व्यवहार जगत के हैं सब भव के कारण ।
शुद्ध चिदानन्द चेतन दर्शन निश्चय पार उतारण ।।
निजपद का 'सौभाग्य' श्रेष्ठ पा, कैसे जाये छोड़ा ।।तेरे ।।३ ।।
लहरायेगा-लहरायेगा झंडा महावीर का
लहरायेगा-लहरायेगा झंडा श्री महावीर का ।
फहरायेगा-फहरायेगा झंडा श्री महावीर का ।।
अखिल विश्व का जो है प्यारा,
जैन जाति का चमकित तारा ।
हम युवकों का पूर्ण सहारा, झंडा श्री महावीर का ।।१ ।।
सत्य अहिंसा का है नायक,
शांति सुधारस का है दायक ।
दीनजनों का सदा सहायक, झंडा श्री महावीर का ।।२ ।।
साम्यभाव दर्शाने वाला,
प्रेमक्षीर बरसाने वाला ।
जीवमात्र हर्षाने वाला, झंडा श्री महावीर का ।।३ ।।
भारत का 'सौभाग्य' बढ़ाता,
स्वावलंब का पाठ पढ़ाता ।
वन्दे वीरम् नाद ।।४ ।।
लिया प्रभू अवतार, जय जय कार जय जय कार
त्रिशलानन्द कुमार जय जय कार जय जय कार ।।टेक ।।
आज खुशी है, आज खुशी है, तुम्हें खुशी है, हमें खुशी है ।
खुशियाँ अपरम्पार । जयजयकार ।।१ ।।
पुष्प और रत्नों की वर्षा, सुरपति करते हर्षा-२ ।
बजा दुंदुभी सार । जयजयकार ।।२ ।।
उमग-२ नरनारी आते, नृत्य भजन संगीत सुनाते ।
इन्द्र शचि ले लार । जयजयकार ।।३ ।।
प्रभू का रूप अनूप सुहाया, निरख निरख छवि हरि ललचाया ।
कीने नेत्र हजार । जयजयकार ।।४ ।।
जन्मोत्सव की शोभा भारी, देखो प्रभू की लगी सवारी ।
जुड़ रही भीड़ अपार । जयजयकार ।।५ ।।
आओ हम प्रभू गुण गावें, सत्य अहिंसा ध्वज लहरावें ।
जो जग मंगलकार । जयजयकार ।।६ ।।
पुण्य योग `सौभाग्य' हमारा, सफल हुआ है जीवन सारा ।
मिले मोक्ष दातार । जयजयकार ।।७ ।।
काहे पाप करे काहे छल
काहे पाप करे काहे छल, जरा चेत ओ मानव करनी से....
तेरी आयु घटे पल पल ।।टेक ।।
तेरा तुझको न बोध विचार है, मानमाया का छाया अपार है ।
कैसे भोंदू बना है संभल, जरा चेत ओ मानव करनी से... ।।१ ।।
तेरा ज्ञाता व दृष्टा स्वभाव है, काहे जड़ से यूं इतना लगाव है ।
दुनियां ठगनी पे अब ना मचल, जरा चेत ओ मानव करनी से... ।।२ ।।
शुद्ध चिद्रूप चेतन स्वरूप तू, मोक्ष लक्ष्मी का `सौभाग्य' भूप तूं ।
बन सकता है यह बल प्रबल, जरा चेत ओ मानव करनी से... ।।३ ।।
ध्यान धर ले प्रभू को ध्यान धर ले
आ माथे ऊबी मौत भाया ज्ञान करले ।।टेक ।।
फूल गुलाबी कोमल काया, या पल में मुरझासी,
जोबन जोर जवानी थारी, सन्ध्या सी ढल जासी ।प्रभू. को... ।।१ ।।
हाड़ मांस का पींजरा पर, या रूपाली चाम,
देख रिझायो बावला, क्यूं जड़ को बण्यो गुलाम ।प्रभू. को... ।।२ ।।
लाम्बो चौड़ो मांड पसारो, कीयां रह्यो है फूल,
हाट हवेली काम न आसी, या सोना की झूल ।प्रभू. को... ।।३ ।।
भाई बन्धु कुटुम्ब कबीलो, है मतलब को सारो,
आपा पर को भेद समझले जद होसी निस्तारो ।प्रभू. को... ।।४ ।।
मोक्ष महल को सांचो मारग, यो छ: जरा समझले,
उत्तम कुल `सौभाग्य' मिल्यो है, आतमराम सुमरलौ ।प्रभू. को... ।।५ ।।
जो आज दिन है वो, कल ना रहेगा, कल ना रहेगा
घड़ी ना रहेगी ये पल ना रहेगा ।
समझ सीख गुरु की वाणी, फिरको कहेगा, फिरको कहेगा,
घड़ी ना रहेगी ये पल ना रहेगा ।।टेक ।।
जग भोगों के पीछे, अनन्तों काल काल बीते हैं ।
इस आशा तृष्णा के अभी भी सपने रीते हैं ।
बना मूढ़ कबलों मन पर, चलता रहेगा-२ ।।घड़ी ।।१ ।।
अरे इस माटी के तन पे, वृथा अभिमान है तेरा ।
पड़ा रह जायगा वैभव, उठेगा छोड़ जब डेरा ।
नहीं साथ आया न जाते, कोई संग रहेगा-२ ।।घड़ी ।।२ ।।
ज्ञानदृग खोलकर चेतन, भेदविज्ञान घट भर ले ।
सहज `सौभाग्य' सुख साधन, मुक्ति रमणी सखा वर ले ।
यही एक पद है प्रियवर, अमर जो रहेगा-२ ।।घड़ी ।।३ ।।
संसार महा अघसागर में
संसार महा अघसागर में, वह मूढ़ महा दु:ख भरता है ।
जड़ नश्वर भोग समझ अपने, जो पर में ममता करता है ।
बिन ज्ञान जिया तो जीना क्या, बिन ज्ञान जिया तो जीना क्या ।
पुण्य उदय नर जन्म मिला शुभ, व्यर्थ गमों फल लीना क्या ।।टेक ।।
कष्ट पड़ा है जो जो उठाना, लाख चौरासी में गोते खाना ।
भूल गया तूं किस मस्ती में उस दिन था प्रण कीना क्या ।।१ ।।
बचपन बीता बीती जवानी, सर पर छाई मौत डरानी ।।
ये कंचन सी काया खोकर, बांधा है गाँठ नगीना क्या ।।२ ।।
दिखते जो जग भोग रंगीले, ऊपर मीठे हैं जहरीले ।
भव भय कारण नर्क निशानी, है तूने चित दीना क्या ।।३ ।।
अंतर आतम अनुभव करले, भेद विज्ञान सुधा घट भरले ।
अक्षय पद `सौभाग्य' मिलेगा, पुनि पुनि मरना जीना क्या ।।४ ।।
कहा मानले ओ मेरे भैया
कहा मानले ओ मेरे भैया, भव भव डुलने में क्या सार है ।
तू बनजा बने तो परमात्मा, तेरी आत्मा की शक्ति अपार है ।।
भोग बुरे हैं त्याग सजन ये, विपद करें और नरक धरें ।
ध्यान ही है एक नाव सजन जो, इधर तिरें और उधर वरें ।
झूँठी प्रीति में तेरी ही हार है, वाणी गणधर की ये हितकार है ।।१ ।।
लोभ पाप का बाप सजन क्यों राग करे दु:खभार भरे ।
ज्ञान कसौटी परख सजन मत छलियों का विश्वास करे ।।
ठग आठों की यहाँ भरमार है, इन्हें जीते तो बेड़ा पार है ।।२ ।।
नरतन का `सौभाग्य' सजन ये हाथ लगे ना हाथ लगे ।
कर आतमरस पान सजन जो जनम भगे और मरण भगे ।।
मोक्ष महल का ये ही द्वार है, वीतरागी हो बनना सार है ।।३ ।।
आज सी सुहानी सु घड़ी इतनी
कल ना मिलेगी ढूँढ़ो चाहे जितनी ।।टेक ।।
आया कहाँ से है जाना कहाँ, सोचो तुम्हारा ठिकाना कहाँ ।
लाये थे क्या है कमाया यहाँ, ले जाना तुमको है क्या-२ वहाँ ।।१ ।।
धारे अनेकों है तूने जनम, गिनावें कहाँ लो है आती शरम ।
नरदेह पाकर अहो पुण्य धन, भोगों में जीवन क्यों करते खतम ।।२ ।।
प्रभू के चरण में लगा लो लगन, वही एक सच्चे हैं तारणतरण ।
छूटेगा भव दु:ख जामन मरण, 'सौभाग्य' पावोगे मुक्ति रमण ।।३ ।।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें