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कविवर श्री दौलतरामजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Daulatramji ke Bhajan -4

ज्ञानी ऐसी होली मचाई

ज्ञानी ऐसी होली मचाई ।।टेक. ।।
राग कियौ विपरीत विपन घर, कुमति कुसौति सुहाई ।
धार दिगम्बर कीन्ह सु संवर, निज परभेद लखाई ।
घात विषयनिकी बचाई ।।१ ।।
कुमति सखा भजि ध्यानभेद सम, तनमें तान उड़ाई ।
कुंभक ताल मृदंगसौं पूरक, रेचक बीन बजाई ।
लगन अनुभवसौं लगाई ।।२ ।।
कर्मबलीता रूप नाम अरि, वेद सुइन्द्रि गनाई ।
दे तप अग्नि भस्म करि तिनको, धूल अघाति उड़ाई ।
करि शिव तियकी मिलाई ।।३ ।।
ज्ञानको फाग भागवश आवै, लाख करौ चतुराई ।
सो गुरु दीनदयाल कृपाकरि, `दौलत' तोहि बताई ।
नहीं चितसे विसराई ।।४ ।।

मेरो मन ऐसी खेलत होरी

मेरो मन ऐसी खेलत होरी ।।टेक. ।।
मन मिरदंग साज-करि त्यारी, तनको तमूरा बनोरी ।
सुमति सुरंग सरंगी बजाई, ताल दोउ कर जोरी ।
राग पांचौं पद कोरी ।।१ ।।मेरो. ।।
समकित रूप नीर भर झारी, करुना केशर घोरी ।
ज्ञानमई लेकर पिचकारी, दोउ करमाहिं सम्होरी ।
इन्द्रि पांचौं सखि वोरी ।।२ ।।मेरो. ।।
चतुर दानको है गुलाल सो, भरि भरि मूठि चलोरी ।
तप मेवाकी भरी निज झोरी, यशको अबीर उडोरी ।
रंग जिनधाम मचोरी ।।३ ।।मेरो. ।।
`दौल' बाल खेलें अस होरी, भवभव दु:ख टलोरी ।
शरना ले इक श्रीजिनको री, जगमें लाज हो तोरी
मिलै फगुआ शिवगोरी ।।४ ।।मेरो. ।।

जिया तुम चालो अपने देश

जिया तुम चालो अपने देश, शिवपुर थारो शुभ थान ।।टेक. ।।
लख चौरासी में बहु भटके, लह्यौ न सुखको लेश ।।१ ।।जिया. ।।
मिथ्यारूप धरे बहुतेरे, भटके बहुत विदेश ।।२।।जिया. ।।
विषयादिक सेवत दुख पाये, भुगते बहुत कलेश ।।३।।जिया. ।।
भयो तिरजंच नारकी नर सुर, करि करि नाना भेष ।।४।।जिया. ।।
अब तो निजमें निज अबलोको जहां न दु:ख को लेश ।।५ ।।जिया. ।।
`दौलतराम' तोड़ जगनाता, सुनो सुगुरु उपदेश ।।६ ।।जिया. ।।

मत कीज्यौ जी यारी

मत कीज्यौ जी यारी, घिनगेह देह जड़ जान के ।।टेक. ।।
मात-तात रज-वीरजसौं यह, उपजी मलफुलवारी ।
अस्थिमाल पल नसाजाल की, लाल लाल जलक्यारी।।१ ।।मत. ।।
कर्मकुरंगथलीपुतली यह, मूत्र पुरीषभंडारी ।
चर्ममंडी रिपुकर्मघड़ी धन, धर्म चुरावन-हारी।।२ ।।मत. ।।
जे जे पावन वस्तु जगत में, ते इन सर्व बिगारी ।
स्वेद मेद कफ क्लेदमयी बहु, मद गद व्यालपिटारी।।३ ।।मत. ।।
जा संयोग रोगभव तौलौं, जा वियोग शिवकारी ।
बुध तासौं न ममत्व करैं यह, मूढ़मतिन को प्यारी।।४ ।।मत. ।।
जिन पोषी ते भये सदोषी, तिन पाये दुख भारी ।
जिन तपठान ध्यानकर शोषी, तिन परनी शिवनारी।।५ ।।मत. ।।
सुरधनु शरदजलद जलबुदबुद, त्यौं झट विनशनहारी ।
यातैं भिन्न जान निज चेतन, `दौल' होहु शमधारी।।६ ।।मत. ।।

मत राचो धीधारी

मत राचो धीधारी, भव रंभथंभ सम जानके ।।टेक. ।।
इन्द्रजालको ख्याल मोहठग, विभ्रमपास पसारी ।
चहुँगति विपतिमयी जामें जन, भ्रमत भरत दुख भारी।।१ ।।मत. ।।
रामा मा, मा वामा, सुत पितु, सुता श्वसा, अवतारी ।
को अचंभ जहाँ आप आपके, पुत्र दशा विसतारी।।२ ।।मत. ।।
घोर नरक दुख ओर न छोर न, लेश न सुख विस्तारी ।
सुरनर प्रचुर विषयजुर जारे, को सुखिया संसारी।।३ ।।मत. ।।
मंडल ह्वै आखंडल छिन में, नृप कृमि सधन भिखारी ।
जा सुत विरह मरी ह्वै वाघिनी, ता सुत देह विदारी।।४ ।।तन. ।।
शिशु न हिताहितज्ञान तरुण उर, मदनदहन पर जारी ।
वृद्ध भये विकलांगी थाये, कौन दशा सुखकारी।।५ ।।मत. ।।
यौं असार लख छार भव्य झट, भये मोखमगचारी ।
यातैं होउ उदास `दौल' अब, भज जिनपति जगतारी।।६ ।।मत. ।।

हे मन तेरी को कुटेव यह

हे मन तेरी को कुटेव यह, करनविषय में धावै है ।।टेक ।।
इनहीके वश तू अनादितैं, निजस्वरूप न लखावै है ।
पराधीन छिन छीन समाकुल, दुर्गति विपति चखावै है ।।१ ।।
फरस विषयके कारन बारन, गरत परत दुख पावै है ।
रसनाइन्द्रीवश झष जलमें, कंटक कंठ छिदावै है ।।२ ।।
गन्धलोल पंकज मुद्रित में, अलि निज प्रान खपावै है ।
नयनविषयवश दीप-शिखा में, अंग पतंग जरावै है ।।३ ।।
करन विषयवश हिरन अरनमें, खलकर प्रान लुनावै है ।
`दौलत' तज इनको जिनको भज, यह गुरु सीख सुनावै है ।।४ ।।

मानत क्यों नहिं रे

मानत क्यों नहिं रे, हे नर सीख सयानी ।।टेक ।।
भयौ अचेत मोह-मद पीके, अपनी सुधि बिसरानी ।।
दुखी अनादि कुबोध अब्रततैं, फिर तिनसौं रति ठानी ।
ज्ञानसुधा निजभाव न चाख्यौं, परपरनति मति सानी ।।१ ।।
भव असारता लखै न क्यौं जहँ, नृप ह्वै कृमि विट-थानी ।
सधन निधन नृप दास स्वजन रिपु, दुखिया हरिसे प्रानी ।।२ ।।
देह एह गद-गेह नेह इस, हैं बहु विपति निशानी ।
जड़ मलीन छिनछीन करमकृत-बन्धन शिवसुखहानी ।।३ ।।
चाहज्वलन इंर्धन-विधि-वन-घन, आकुलता कुलखानी ।
ज्ञान-सुधा-सर शोषन रवि ये, विषय अमित मृतुदानी ।।४ ।।
यौं लखि भव-तन-भोग विरचि करि, निजहित सुन जिनवानी ।
तज रुषराग `दौल' अब अवसर, यह जिनचन्द्र बखानी ।।५ ।।

जानत क्यौं नहिं रे

जानत क्यौं नहिं रे, हे नर आतमज्ञानी ।।टेक. ।।
रागदोष पुद्गलकी संपति, निहचै शुद्धनिशानी ।।जानत. ।।
जाय नरकपशुनरसुरगतिमें, यह परजाय विरानी ।
सिद्धसरूप सदा अविनाशी, मानत विरले प्रानी।।१ ।।जानत. ।।
कियौ न काहू हरै न कोई, गुरु-शिख कौन कहानी ।
जनम मरन मलरहित विमल है, कीचबिना जिमि पानी।।२ ।।जानत. ।।
सार पदारथ है तिहुँ जगमें, नहिं क्रोधी नहिं मानी ।
`दौलत' सो घटमाहिं विराजे, लखि हूजे शिवथानी।।३ ।।जानत. ।।

छांडि दे या बुधि भोरी

छांडि दे या बुधि भोरी, वृथा तनसे रति जोरी ।।टेक. ।।
यह पर है न रहे थिर पोषत, सकल कुमल की झोरी ।
यासौं ममता कर अनादितैं, बंधो कर्मकी डोरी ।
सहै दु:ख जलधि हिलोरी ।।१ ।।छांडि. ।।
यह जड़ है तू चेतन यौं ही, अपनावत बरजोरी ।
सम्यक्दर्शन ज्ञान चरण निधि, ये हैं संपति तोरी ।
सदा विलसौ शिवगोरी ।।२ ।।छांडि. ।।
सुखिया भये सदीव जीव जिन, यासौं ममता तोरी ।
`दौल' सीख यह लीजे पीजे, ज्ञानपियूष कटोरी ।
मिटै परचाह कठोरी ।।३ ।।छांडि. ।।

छांडत क्यौं नहिं रे

छांडत क्यौं नहिं रे, हे नर! रीति अयानी ।
बारबार सिख देत सुगुरु यह, तू दे आनाकानी ।।छांडत ।।
विषय न तजत न भजत बोध व्रत, दुख सुखजाति न जानी ।
शर्म चहै न लहै शठ ज्यौं घृतहेत विलोवत पानी।।१ ।।छांडत. ।।
तन धन सदन स्वजनजन तुझसौं, ये परजाय विरानी ।
इन परिनमन विनश उपजन सों, तैं दु:ख सुख-कर मानी।।२ ।।छांडत. ।।
इस अज्ञानतैं चिरदुख पाये, तिनकी अकथ कहानी ।
ताको तज दृग-ज्ञान-चरन भज, निजपरनति शिवदानी।।३ ।।छांडत. ।।
यह दुर्लभ नर-भव सुसंग लहि, तत्त्व लखावत वानी ।
`दौल' न कर अब पर में ममता, धर समता सुखदानी।।४ ।।छांडत. ।।

लखो जी या जिय भोरे की बातैं

लखो जी या जिय भोरे की बातैं, नित करत अहित हित घातैं ।।टेक ।।
जिन गनधर मुनि देशब्रती समकिती सुखी नित जातैं ।
सो पय ज्ञान न पान करत न, अघात विषयविष खातैं।।१ ।।लखो. ।।
दुखस्वरूप दुखफलद जलदसम, टिकत न छिनक बिलातैं ।
तजत न जगत भजत पतित नित, रचत न फिरत तहांतै।।२ ।।लखो. ।।
देह-गेह-धन-नेह ठान अति, अघ संचत दिनरातैं ।
कुगति विपति फलकी न भीत, निश्चिंत प्रमाददशातैं।।३ ।।लखो. ।।
कबहुँ न होय आपनो पर, द्रव्यादि पृथक चतुघातैं ।
पै अपनाय लहत दुख शठ नभै, हतन चलावत लातैं।।४ ।।लखो. ।।
शिवगृहद्वार सार नरभव यह, लहि दश दुर्लभतातैं ।
खोवत ज्यौं मनि काग उड़ावत, रोवत रंकपनातैं।।५ ।।लखो. ।।
चिदानन्द निद्वंद स्वपद तज, अपद विपद-पद रातैं ।
कहत-सुशिखगुरु गहत नहीं उर, चहत न सुख समतातैं।।६ ।।लखो. ।।
जैनवैन सुन भवि बहु भव हर, छूटे द्वंद दशातैं ।
तिनकी सुकथा सुनत न मुनत न, आतम-बोध कलातैं।।७ ।।लखो. ।।
जे जन समुझि ज्ञानदृगचारित, पावन पयवर्षातैं ।
तापविमोह हर्यो तिनको जस, `दौल' त्रिभोन विख्यातैं।।८ ।।लखो. ।।

सुनो जिया ये सतगुरु की बातैं

सुनो जिया ये सतगुरु की बातैं, हित कहत दयाल दया तैं ।।टेक ।।
यह तन आन अचेतन है तू, चेतन मिलत न यातैं ।
तदपि पिछान एक आतमको, तजत न हठ शठ-तातैं।।१ ।।सुनो. ।।
चहुँगति फिरत भरत ममताको, विषय महाविष खातैं ।
तदपि न तजत न रजत अभागै, दृग व्रत बुद्धिसुधातैं।।२ ।।सुनो. ।।
मात तात सुत भ्रात स्वजन तुझ, साथी स्वारथ नातैं ।
तू इन काज साज गृहको सब, ज्ञानादिक मत घातै।।३ ।।सुनो. ।।
तन धन भोग संजोग सुपन सम, वार न लगत विलातैं ।
ममत न कर भ्रम तज तू भ्राता, अनुभव-ज्ञान कलातैं।।४ ।।सुनो. ।।
दुर्लभ नर-भव सुथल सुकुल है, जिन उपदेश लहा तैं ।
`दौल' तजो मनसौं ममता ज्यों, निवडो द्वंद दशातैं।।५ ।।सुनो. ।।

मोही जीव भरम तमतैं नहिं

मोही जीव भरम तमतैं नहिं, वस्तुस्वरूप लखै है जैसैं ।।टेक ।।
जे जे जड़ चेतन की परनति, ते अनिवार परिनवै वैसे ।
वृथा दु:खी शठ कर विकलप यौं, नहिं परिनवैं परिनवैं ऐसैं ।।१ ।।
अशुचि सरोग समल जड़मूरत, लखत विलात गगनघन जैसैं ।
सो तन ताहि निहार अपनपो, चहत अबाध रहै थिर कैसैं ।।२ ।।
सुत-पित-बंधु-वियोगयोग यौं, ज्यौं सराय जन निकसै पैसैं ।
विलखत हरखत शठ अपने लखि, रोवत हँसत मत्तजन जैसैं ।।३ ।।
जिन-रवि-वैन किरन लहि जिन निज, रूप सुभिन्न कियौ पर में सैं ।
सो जगमौल `दौल' को चिर-थित, मोहविलास निकास हृदैसैं ।।४ ।।

ज्ञानी जीव निवार भरमतम

ज्ञानी जीव निवार भरमतम, वस्तुस्वरूप विचारत ऐसैं ।।टेक ।।
सुत तिय बंधु धनादि प्रगट पर, ये मुझतैं हैं भिन्नप्रदेशैं ।
इनकी परनति है इन आश्रित, जो इन भाव परनवैं वैसे।।१ ।।ज्ञानी. ।।
देह अचेतन चेतन मैं, इन परनति होय एकसी कैसैं ।
पूरनगलन स्वभाव धरै तन, मैं अज अचल अमल नभ जैसैं।।२ ।।ज्ञानी. ।।
पर परिनमन न इष्ट अनिष्ट न, वृथा रागरुष द्वंद भयेसैं ।
नसै ज्ञान निज फँसै बंधमें, मुक्त होय समभाव लयेसैं।।३ ।।ज्ञानी. ।।
विषयचाहदवदाह नसै नहिं, विन निज सुधा सिंधुमें पैसैं ।
अब जिनवैन सुने श्रवननतैं, मिटे विभाव करूं विधि तैसैं।।४ ।।ज्ञानी. ।।
ऐसो अवसर कठिन पाय अब, निजहितहेत विलम्ब करेसैं ।
पछताओ बहु होय सयाने चेतन, `दौल' छुटो भव भयसैं।।५ ।।ज्ञानी. ।।

अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ

ज्यौं शुक नभचाल विसरि नलिनी लटकायो ।।अपनी. ।।
चेतन अविरुद्ध शुद्ध, दरश बोधमय विशुद्ध ।
तजि जड़-रस-फरस रूप, पुद्गल अपनायौ।।१ ।।अपनी. ।।
इन्द्रियसुख दुख में नित्त, पाग राग रुख में चित्त ।
दायकभव विपति वृन्द, बन्धको बढ़ायौ।।२ ।।अपनी. ।।
चाह दाह दाहै, त्यागौ न ताहि चाहै ।
समतासुधा न गाहै जिन, निकट जो बतायौ।।३ ।।अपनी. ।।
मानुषभव सुकुल पाय, जिनवर शासन लहाय ।
`दौल' निजस्वभाव भज, अनादि जो न ध्यायौ।।४ ।।अपनी. ।।

जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा

जीव तू अनादिहीतैं भूल्यौ शिवगैलवा ।।टेक ।।
मोहमदवार पियौ, स्वपद विसार दियौ, पर अपनाय लियौ ।
इन्द्रिसुख में रचियौ, भवतैं न भियौ, न तजियौ मनमैलवा।।१ ।।जीव. ।।
मिथ्या ज्ञान आचरन धरिकर कुमरन, तीन लोककी धरन ।
तामें कियो है फिरन पायो न शरन, न लहायौ सुख शैलवा।।२ ।।जीव. ।।
अब नरभव पायौ, सुथल सुकुल आयौ जिन उपदेश भायौ ।
`दौल' झट झिटकायौ, परपरनति दुखदायिनी चुरेलवा।।३ ।।जीव. ।।

शिवपुर की डगर समरससौं भरी

शिवपुर की डगर समरससौं भरी, सो विषय विरसरचि चिरविसरी । ।टेक ।।
सम्यकदरश बोध-व्रतमय भव, दुखदावानल-मेघझरी ।।
ताहि न पाय तपाय देह बहु, जनम मरन करि विपति भरी ।
काल पाय जिनधुनि सुनि मैं जब, ताहि लहूँ सोई धन्य घरी ।।१ ।।
ते जन धनि या मांहि चरत नित, तिन कीरति सुरपति उचरी ।
विषयचाह भवराह त्याग अब, `दौल' हरो रजरहसअरी ।।२ ।।

तोहि समझायो सौ सौ बार

तोहि समझायो सौ सौ बार, जिया तोहि समझायो ।
देख सुगुरु की परहित में रति, हितउपदेश सुनायो ।।तोहि. ।।
विषयभुजंग सेय दुख पायो, पुनि तिनसौं लपटायो ।
स्वपद विसार रच्यौ परपदमें, मद रत ज्यौं बोरायो।।१ ।।तोहि. ।।
तन धन स्वजन नहीं हैं तेरे, नाहक नेह लगायो ।
क्यों न तजै भ्रम चाख समामृत, जो नित संतसुहायो।।२ ।।तोहि. ।।
अबहू समझ कठिन यह नरभव, जिन वृष बिना गमायो ।
ते विलखैं मनि डार उदधिमें, `दौलत' को पछतायो।।३ ।।तोहि. ।।

न मानत यह जिय निपट अनारी

न मानत यह जिय निपट अनारी, सिख देत सुगुरु हितकारी ।।टेक ।।
कुमतिकुनारि संग रति मानत, सुमतिसुनारि बिसारी ।।
नर परजाय सुरेश चहैं सो, चख विषविषय विगारी ।
त्याग अनाकुल ज्ञान चाह, पर-आकुलता विसतारी ।।१ ।।
अपनी भूल आप समतानिधि, भवदुख भरत भिखारी ।
परद्रव्यन की परनति को शठ, वृथा वनत करतारी ।।२ ।।
जिस कषाय-दव जरत तहाँ, अभिलाष छटा घृत डारी ।
दुखसौं डरै करै दुखकारनतैं नित प्रीति करारी ।।३ ।।
अतिदुर्लभ जिनवैन श्रवनकरि, संशयमोह निवारी ।
`दौल' स्वपर-हित-अहित जानके, होवहु शिवमग चारी ।।४ ।।

हे नर, भ्रमनींद क्यों न छांडत दुखदाई

सेवत चिरकाल सोंज, आपनी ठगाई ।।हे नर. ।।
मूरख अघ कर्म कहा, भेदै नहिं मर्म लहा ।
लागै दुखज्वालकी न, देहकै तताई।।१ ।।हे नर. ।।
जमके रव बाजते, सुभैरव अति गाजते ।
अनेक प्रान त्यागते, सुनै कहा न भाई।।२ ।।हे नर. ।।
पर को अपनाय आप-रूपको भुलाय हाय ।
करन विषय दारु जार, चाहदौं बढ़ाई।।३ ।।हे नर. ।।
अब सुन जिनवान, राग-द्वेषको जघान ।
मोक्षरूप निज पिछान `दौल', भज विरागताई।।४ ।।हे नर. ।।

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