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कविवर श्री भागचन्दजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhagchandji ke Bhajan -3

करौ रे भाई, तत्त्वारथ सरधान

( राग दीपचन्दी )
करौ रे भाई, तत्त्वारथ सरधान । नरभव सुकुल सुक्षेत्र पायके ।।टेक ।।
देखन जाननहार आप लखि, देहादिक परमान ।।१ ।।
मोह रागरूष अहित जान तजि, बंधहु विधि दुखदान ।।२ ।।
निज स्वरूप में मगन होय कर, लगन विषय दो भान ।।३ ।।
`भागचन्द' साधक ह्वै साधो, साध्य स्वपद अमलान ।।४ ।।

धनि ते प्रानि, जिनके तत्त्वारथ श्रद्धान

( राग दादरा )
धनि ते प्रानि, जिनके तत्त्वारथ श्रद्धान ।।टेक ।।
रहित सप्त भय तत्त्वारथ में, चित्त न संशय आन ।
कर्म कर्मफल की नहिं इच्छा, पर में धरत न ग्लानि ।।१ ।।
सकल भाव में मूढ़दृष्टि तजि, करत साम्यरस पान ।
आतम धर्म बढ़ावैं वा, परदोष न उचरैं वान ।।२ ।।
निज स्वभाव वा, जैनधर्म में, निज पर थिरता दान ।
रत्नत्रय महिमा प्रगटावैं, प्रीति स्वरूप महान ।।३ ।।
ये वसु अंग सहित निर्मल यह, समकित निज गुन जान ।
`भागचन्द' शिवमहल चढ़न को, अचल प्रथम सोपान ।।४ ।।

जिन स्वपरहिताहित चीन्हा

( राग दीपचन्दी जोड़ी )
जिन स्वपर हिताहित चीन्हा, जीव तेही हैं साचै जैनी ।।टेक ।।
जिन बुधछैनी पैनीतैं जड़, रूप निराला कीना ।
परतैं विरच आपमें राचे, सकल विभाव विहीना ।।१ ।।
पुन्य पाप विधि बंध उदय में, प्रमुदित होत न दीना ।
सम्यकदर्शन ज्ञान चरन निज, भाव सुधारस भीना ।।२ ।।
विषयचाह तजि निज वीरज सजि, करत पूर्वविधि छीना ।
`भागचन्द' साधक ह्वै साधत, साध्य स्वपद स्वाधीना ।।३ ।।

यही इक धर्ममूल है मीता!

यही इक धर्ममूल है मीता! निज समकितसार सहीता ।।टेक ।।
समकित सहित नरकपदवासा, खासा बुधजन गीता ।
तहँतें निकसि होय तीर्थंकर, सुरगन जजत सप्रीता ।।१ ।।
स्वर्गवास हू नीको नाहीं, बिन समकित अविनीता ।
तहँतें चय एकेन्द्री उपजत, भ्रमत सदा भयभीता ।।२ ।।
खेत बहुत जोते हु बीज बिन, रहत धान्यसों रीता ।
सिद्धि न लहत कोटि तपहूतें, वृथा कलेश सहीता ।।३ ।।
समकित अतुल अखंड सुधारस, जिन पुरुषन नें पीता ।
`भागचन्द' ते अजर अमर भये, तिनहीनें जग जीता ।।४ ।।

बुधजन पक्षपात तज देखो

( राग ठुमरी )
बुधजन पक्षपात तज देखो, साँचा देव कौन है इनमें ।।टेक ।।
ब्रह्मा दंड कमंडलधारि, स्वांत भ्रांत वशि सुरनारिन में ।
मृगछाला माला-मौंजी पुनि, विषयासक्त निवास नलिनमें ।।१ ।।
शंभू खट्वाअंगसहित पुनि, गिरिजा भोगमगन निशदिनमें ।
हस्त कपाल व्याल भूषन पुनि, रुंडमाल तन भस्म मलिन में ।।२ ।।
विष्णु चक्रधर मदन-बानवश, लज्जा तजि रमता गोपिनमें ।
क्रोधानल ज्वाजल्यमान पुनि, तिनके होत प्रचंड अरिनमें ।।३ ।।
श्री अरहंत परम वैरागी, दूषन लेश प्रवेश न जिनमें ।
`भागचन्द' इनको स्वरूप यह, अब कहो पूज्यपनो है किनमें ।।४ ।।

अरे हो जियरा धर्म में चित्त लगाय रे

( राग प्रभाती )
अरे हो जियरा धर्म में चित्त लगाय रे ।।टेक ।।
विषय विषसम जान भोंदू, वृथा क्यों लुभायरे ।।
संग भार विषाद तोकौं, करत क्या नहि भाय रे ।
रोग-उरग-निवास-वामी, कहा नहिं यह काय रे ।।१ ।।
काल हरिकी गर्जना क्या, तोहि सुन न पराय रे ।
आपदा भर नित्य तोकौं, कहा नहीं दु:ख दायरे ।।२ ।।
यदि तोहि कहा नहीं दुख, नरक के असहाय रे ।
नदी वैतरनी जहाँ जिय, परै अति बिललाय रे ।।३ ।।
तन धनादिक घनपटल सम, छिनकमांहीं बिलाय रे ।
`भागचन्द' सुजान इमि जदु-कुल-तिलक गुन गाय रे ।।४ ।।

भववनमें, नहीं भूलिये भाई!

भववनमें, नहीं भूलिये भाई । कर निज थलकी याद ।।टेक ।।
नर परजाय पाय अति सुंदर, त्यागहु सकल प्रमाद ।
श्रीजिनधर्म सेय शिव पावत, आतम जासु प्रसाद ।।१ ।।
अबके चूकत ठीक न पड़सी, पासी अधिक विषाद ।
सहसी नरक वेदना पुनि तहाँ, सुनसी कौन फिराद ।।२ ।।
`भागचन्द' श्रीगुरु शिक्षा बिन, भटका काल अनाद ।
तू कर्ता तूही फल भोगत, कौन करै बकवाद ।।३ ।।

अति संक्लेश विशुद्ध शुद्ध पुनि

अति संक्लेश विशुद्ध शुद्ध पुनि, त्रिविध जीव परिनाम बखाने ।।टेक ।।
तीव्र कषाय उदय तैं भावित, दर्वित हिंसादिक अघ ठाने ।
सो संक्लेश भावफल नरकादिक गति दुख भोगत असहाने ।।१ ।।
शुभ उपयोग कारनन में जो, रागकषाय मंद उदयाने ।
सो विशुद्ध तसु फल इंद्रादिक, विभव समाज सकल परमाने ।।२ ।।
परकारन मोहादिकतैं च्युत, दरसन ज्ञान चरन रस पाने ।
सो है शुद्ध भाव तसु फलतैं, पहुँचत परमानंद ठिकाने ।।३ ।।
इनमें जुगल बंधके कारन, परद्रव्याश्रित हेयप्रमाने ।
`भागचन्द' स्वसमय निज हित लखि, तामैं रम रहिये भ्रम हाने ।।४ ।।

जे सहज होरी के खिलारी

जे सहज होरी के खिलारी, तिन जीवन की बलिहारी ।।टेक ।।
शांतभाव कुंकुम रस चन्दन, भर ममता पिचकारी ।
उड़त गुलाल निर्जरा संवर, अंबर पहरैं भारी ।।१ ।।
सम्यकदर्शनादि सँग लेकै, परम सखा सुखकारी ।
भींज रहे निज ध्यान रंगमें, सुमति सखी प्रियनारी ।।२ ।।
कर स्नान ज्ञान जलमें पुनि, विमल भये शिवचारी ।
`भागचन्द' तिन प्रति नित वंदन, भावसमेत हमारी ।।३ ।।

सहज अबाध समाध धाम तहाँ

सहज अबाध समाध धाम तहाँ, चेतन सुमति खेलैं होरी ।।टेक ।।
निजगुन चंदनमिश्रित सुरभित, निर्मल कुंकुम रस घोरी ।
समता पिचकारी अति प्यारी, भर जु चलावत चहुँ ओरी ।।१ ।।
शुभ संवर सुअबीर आडंबर, लावत भरभर कर जोरी ।
उड़त गुलाल निर्जरा निर्भर, दुखदायक भव थिति टोरी ।।२ ।।
परमानन्द मृदंगादिक धुनि, विमल विरागभावधोरी ।
`भागचन्द' दृग-ज्ञान-चरनमय, परिनत अनुभव रँग बोरी ।।३ ।।

सुन्दर दशलक्षन वृष

सुन्दर दशलक्षन वृष, सेय सदा भाई ।
जासतैं ततक्षन जन, होय विश्वराई ।।टेक ।।
क्रोध को निरोध शांत, सुधाको नितांत शोध ।
मानको तजौ भजौ स्वभाव कोमलाई ।।१ ।।
छल बल तजि सदा विमलभाव सरलताई भजि ।
सर्व जीव चैन दैन, वैन कह सुहाई ।।२ ।।
ज्ञान तीर्थ स्नान दान, ध्यान भान हृदय आन ।
दया-चरन धारि करन-विषय सब बिहाई ।।३ ।।
आलस हरि द्वादश तप, धारि शुद्ध मानस करि ।
खेहगेह देह जानि, तजौ नेहताई ।।४ ।।
अंतरंग बाह्य संग, त्यागि आत्मरंग पागि ।
शीलमाल अति विशाल, पहिर शोभनाई ।।५ ।।
यह वृष-सोपान-राज, मोक्षधाम चढ़न काज ।
शिवसुख निजगुनसमाज, केवली बताई ।।६ ।।

षोडशकारन सुहृदय

( प्रभाती )
षोडशकारन सुहृदय, धारन कर भाई!
जिनतें जगतारन जिन, होय विश्वराई ।।टेक ।।
निर्मल श्रद्धान ठान, शंकादिक मल जघान ।
देवादिक विनय सरल-भावतैं कराई ।।१ ।।
शील निरतिचार धार, मारको सदैव मार ।
अंतरंग पूर्ण ज्ञान, रागको विंधाई ।।२ ।।
यथाशक्ति द्वादश तप, तपो शुद्ध मानस कर ।
आर्त रौद्र ध्यान त्यागि, धर्म शुक्ल ध्याई ।।३ ।।
जथाशक्ति वैयावृत्त, धार अष्टमान टार ।
भक्ति श्रीजिनेन्द्र की, सदैव चित्त लाई ।।४ ।।
आरज आचारज के, वंदि पाद-वारिजकों ।
भक्ति उपाध्याय की, निधाय सौख्यदाई ।।५ ।।
प्रवचन की भक्ति जतनसेति बुद्धि धरो नित्य ।
आवश्यक क्रिया में न, हानि कर कदाई ।।६ ।।
धर्म की प्रभावना सु, शर्मकर बढ़ावना सु ।
जिनप्रणीत सूत्रमाहिं, प्रीति कर अघाई ।।७ ।।
ऐसे जो भावत चित, कलुषता बहावत तसु ।
चरनकमल ध्यावत बुध, `भागचन्द' गाई ।।८ ।।

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