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कविवर श्री भागचन्दजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhagchandji ke Bhajan -2

श्रीगुरु हैं उपगारी ऐसे वीतराग गुनधारी वे

(राग खमाच)
श्रीगुरु हैं उपगारी ऐसे वीतराग गुनधारी वे ।।टेक ।।
स्वानुभूति रमनी सँग क्रीड़ैं, ज्ञानसंपदा भारी वे ।।१ ।।
ध्यान पिंजरा में जिन रोकौ, चित खग चंचलचारी वे ।।२ ।।
तिनके चरनसरोरुह ध्यावै, `भागचन्द' अघटारी वे ।।३ ।।

धन धन जैनी साधु अबाधित

धन धन जैनी साधु अबाधित, तत्त्वज्ञानविलासी हो ।।टेक ।।
दर्शन-बोधमयी निजमूरति, जिनकों अपनी भासी हो ।
त्यागी अन्य समस्त वस्तुमें, अहंबुद्धि दुखदा-सी हो ।।१ ।।
जिन अशुभोपयोग की परनति, सत्तासहित विनाशी हो ।
होय कदाच शुभोपयोग तो, तहँ भी रहत उदासी हो ।।२ ।।
छेदत जे अनादि दुखदायक, दुविधि बंधकी फाँसी हो ।
मोह क्षोभ रहित जिन परनति, विमल मयंककला-सी हो ।।३ ।।
विषय-चाह-दव-दाह खुजावन, साम्य सुधारस-रासी हो ।
`भागचन्द' ज्ञानानंदी पद, साधत सदा हुलासी हो ।।४ ।।

शांति वरन मुनिराई वर लखि

(राग जंगला)
शांति वरन मुनिराई वर लखि ।
उत्तर गुनगन सहित मूल-गुन, सुभग बरात सुहाई ।।टेक ।।
तप रथपै आरूढ़ अनूपम, धरम सुमंगलदाई ।।१ ।।
शिवरमनीको पानिग्रहण करि, ज्ञानानन्द उपाई ।।२ ।।
`भागचन्द' ऐसे बनरा को, हाथ जोर सिरनाई ।।३ ।।

श्रीमुनि राजत समता संग

श्रीमुनि राजत समता संग । कायोत्सर्ग समायत अंग ।।टेक ।।
करतैं नहिं कछु कारज तातैं, आलम्बित भुज कीन अभंग ।
गमन काज कछु हू नहिं तातैं, गति तजि छाके निज रसरंग ।।१ ।।
लोचनतैं लखिवौ कछु नाहीं, तातैं नासा दृग अचलंग ।
सुनिवे जोग रह्यो कछु नाहीं, तातैं प्राप्त इकंत सुचंग ।।२ ।।
तहँ मध्यान्हमाहिं निज ऊपर, आयो उग्र प्रताप पतंग ।
कैधौं ज्ञान पवनबल प्रज्वलित, ध्यानानलसौं उछलि फुलिंग ।।३ ।।
चित निराकुल अतुल उठत जहँ, परमानन्द पियूषतरंग ।
`भागचन्द' ऐसे श्रीगुरुपद, वंदत मिलत स्वपद उत्तंग ।।४ ।।

ऐसे जैनी मुनिमहाराज

ऐसे जैनी मुनिमहाराज, सदा उर मो बसो ।।टेक ।।
तिन समस्त परद्रव्यनिमाहीं, अहंबुद्धि तजि दीनी ।
गुन अनन्त ज्ञानादिक मम पुनि, स्वानुभूति लखि लीनी ।।१ ।।
जे निजबुद्धिपूर्व रागादिक, सकल विभाव निवारैं ।
पुनि अबुद्धिपूर्वक नाशनको, अपनें शक्ति सम्हारैं ।।२ ।।
कर्म शुभाशुभ बंध उदय में, हर्ष विषाद न राखैं ।
सम्यग्दर्शन ज्ञान चरनतप, भावसुधारस चाखैं ।।३ ।।
परकी इच्छा तजि निजबल सजि, पूरव कर्म खिरावैं ।
सकल कर्मतैं भिन्न अवस्था सुखमय लखि चित चावैं ।।४ ।।
उदासीन शुद्धोपयोगरत सबके दृष्टा ज्ञाता ।
बाहिजरूप नगन समताकर, `भागचन्द' सुखदाता ।।५ ।।

सम आराम विहारी

(राग परज)
सम आराम विहारी, साधुजन सम आराम विहारी ।।टेक ।।
एक कल्पतरु पुष्पन सेती, जजत भक्ति विस्तारी ।
एक कंठविच सर्प नाखिया, क्रोध दर्पजुत भारी ।
राखत एक वृत्ति दोउनमैं, सबहीके उपगारी ।।१ ।।
सारंगी हरिबाल चुखावै, पुनि मराल मंजारी ।
व्याघ्रबाल करि सहित नन्दिनी, व्याल नकुल की नारी ।
तिनकै चरनकमल आश्रयतैं, अरिता सकल निवारी ।।२ ।।
अक्षय अतुल प्रमोद विधायक, ताकौ धाम अपारी ।
कामधरा विव गढ़ी सो चिरतें, आतमनिधि अविकारी ।
खनत ताहि लैकर करमें जे, तीक्षण बुद्धि कुदारी ।।३ ।।
निज शुद्धोपयोगरस चाखत, पर ममता न लगारी ।
निज सरधान ज्ञान चरनात्मक, निश्चय शिवमगचारी ।
`भागचन्द' ऐसे श्रीपति प्रति, फिर फिर ढोक हमारी ।।४ ।।

ऐसे साधु सुगुरु कब मिल हैं

ऐसे साधु सुगुरु कब मिल हैं ।।टेक ।।
आप तरें अरु परको तारैं, निष्प्रेही निरमल हैं ।।१ ।।
तिलतुषमात्र संग नहिं जाकै, ज्ञान-ध्यान-गुण-बल हैं ।।२ ।।
शान्त दिगम्बर मुद्रा जिनकी, मन्दर तुल्य अचल हैं ।।३ ।।
`भागचन्द' तिनको नित चाहै, ज्यों कमलनि को अलि है ।।४ ।।

गिरिवनवासी मुनिराज

(राग सोरठ मल्हार में)
गिरिवनवासी मुनिराज, मन वसिया हमारैं हो ।।टेक ।।
कारनविन उपगारी जगके, तारन-तरन-जिहाज ।।१ ।।
जनम-जरामृत-गद-गंजन को, करत विवेक इलाज ।।२ ।।
एकाकी जिमि रहत केसरी, निरभय स्वगुन समाज ।।३ ।।
निर्भूषन निर्वसन निराकुल, सजि रत्नत्रय साज ।।४ ।।
ध्यानाध्ययनमाहिं तत्पर नित, `भागचन्द' शिवकाज ।।५ ।।

जे दिन तुम विवेक बिन खोये

( राग सोरठ )
जे दिन तुम विवेक बिन खोये ।।टेक ।।
मोह वारुणी पी अनादितैं, परपदमें चिर सोये ।
सुखकरंड चितपिंड आपपद, गुन अनंत नहिं जोये ।।१ ।।
होय बहिर्मुख ठानि राग रुख, कर्म बीज बहु बोये ।
तसु फल सुख दुख सामग्री लखि, चितमें हरषे रोये ।।२ ।।
धवल ध्यान शुचि सलिलपूरतें, आस्रव मल नहिं धोये ।
परद्रव्यनि की चाह न रोकी, विविध परिग्रह ढोये ।।३ ।।
अब निज में निज जान नियत तहाँ निज परिनाम समोये ।
यह शिव मारग समरस सागर `भागचन्द' हित तो ये ।।४ ।।

अरे हो अज्ञानी तूने कठिन मनुषभव पायो

(राग मल्हार)
अरे हो अज्ञानी तूने कठिन मनुषभव पायो ।।टेक ।।
लोचनरहित मनुषके करमें, ज्यों बटेर खग आयो ।।१ ।।
सो तू खोवत विषयनमाहीं, धरम नहीं चित लायो ।।२ ।।
`भागचन्द' उपदेश मान अब, जो श्रीगुरु फरमायो ।।३ ।।

तेरे ज्ञानावरन दा परदा

(राग दीपचन्दी)
तेरे ज्ञानावरन दा परदा, तातैं सूझत नहिं भेद स्व-पर-दा ।।टेक ।।
ज्ञान बिना भवदुख भोगै तू, पंछी जिमि बिन पर-दा ।।१ ।।
देहादिक में आपौ मानत, विभ्रममदवश परदा ।।२ ।।
`भागचन्द' भव विनसै वासी, होय त्रिलोक उपरदा ।।३ ।।

जीव! तू भ्रमत सदीव अकेला

जीव! तू भ्रमत सदीव अकेला । संग साथी कोई नहिं तेरा ।।टेक ।।
अपना सुखदुख आप हि भुगतै, होत कुटुंब न भेला ।
स्वार्थ भयैं सब बिछुरि जात हैं, विघट जात ज्यों मेला ।।१ ।।
रक्षक कोइ न पूरन ह्वै जब, आयु अंत की बेला ।
फूटत पारि बँधत नहीं जैसें, दुद्धर-जलको ठेला ।।२ ।।
तन धन जीवन विनशि जात ज्यों, इन्द्रजाल का खेला ।
`भागचन्द' इमि लख करि भाई, हो सतगुरु का चेला ।।३ ।।

चेतन निज भ्रमतैं भ्रमत रहै

( राग दादरा )
चेतन निज भ्रमतैं भ्रमत रहै ।।टेक ।।
आप अभंग तथापि अंगके, संग महा दुखपुंज वहै ।
लोहपिंड संगति पावक ज्यों, दुर्धर घन की चोट सहै ।।१ ।।
नामकर्म के उदय प्राप्त कर, नरकादिक परजाय धरै ।
तामें मान अपनपौ विरथा, जन्म जरा मृत्यु पाय डरै ।।२ ।।
कर्ता होय रागरुष ठानै, परको साक्षी रहत न यहै ।
व्याप्य सुव्यापक भाव बिना किमि, परको करता होत न यहै ।।३ ।।
जब भ्रमनींद त्याग निजमें निज, हित हेत सम्हारत है ।
वीतराग सर्वज्ञ होत तब, `भागचन्द' हितसीख कहै ।।४ ।।

सारौ दिन निरफल खोयबौ करै छै

(राग खमाच)
सारौ दिन निरफल खोयबौ करै छै ।
नरभव लहिकर प्रानी बिनज्ञान, सारौ दिन निरफल खोयबौ करै छै ।
परसंपति लखि निजचितमाहीं, विरथा मूरख रोयबौ करै छै ।।१ ।।
कामानलतैं जरत सदा ही, सुन्दर कामिनी जोयबौ करै छै ।।२ ।।
जिनमत तीर्थस्थान न ठानै, जलसों पुद्गल धोयबो करै छै ।।३ ।।
`भागचन्द' इमि धर्म बिना शठ, मोहनींद में सोयबौ करै छै ।।४ ।।

निज कारज काहे न सारै रे

(राग दीपचन्दी)
निज कारज काहे न सारै रे, भूले प्रानी ।।टेक ।।
परिग्रह भार थकी कहा नाहीं, आरत होत तिहारै ।।१ ।।
रोगी नर तेरी वपुको कहा, निस दिन नाहीं जारै रे ।।२ ।।
कूरकृतांत सिंह कहा जगमें, जीवन को न पछारै रे ।।३ ।।
करनविषय विषभोजनवत कहा, अंत विसरता न धारै रे ।।४ ।।
`भागचन्द' भवअंधकूप में धर्म रतन काहे डारै रे ।।५ ।।

हरी तेरी मति नर कौनें हरी

हरी तेरी मति नर कौनें हरी । तजि चिन्तामन कांच गहत शठ ।।टेक ।।
विषय-कषाय रुचत तोकों नित, जे दुखकरन अरी ।।१ ।।
सांचे मित्र सुहितकर श्रीगुरु, तिनकी सुधि विसरी ।।२ ।।
परपरनतिमें आपो मानत, जो अति विपति भरी ।।३ ।।
`भागचन्द' जिनराज भजन कहुँ, करत न एक घरी ।।४ ।।

आवै न भोगनमें तोहि गिलान

आवै न भोगनमें तोहि गिलान ।।टेक ।।
तीरथनाथ भोग तजि दीनें, तिनतैं मन भय आन ।
तू तिनतैं कहुँ डरपत नाहीं, दीसत अति बलवान ।।१ ।।
इन्द्रियतृप्ति काज तू भोगै, विषय महा अघखान ।
सो जैसे घृतधारा डारै, पावकज्वाल बुझान ।।२ ।।
जे सुख तो तीक्षन दुखदाई, ज्यों मधुलिप्त-कृपान ।
ताते `भागचन्द' इनको तजि आत्म स्वरूप पिछान ।।३ ।।

मान न कीजिये हो परवीन

( राग मल्हार )
मान न कीजिये हो परवीन ।।टेक ।।
जाय पलाय चंचला कमला, तिष्ठै दो दिन तीन ।
धनजोवन क्षणभंगुर सब ही, होत सुछिन छिन छीन ।।१ ।।
भरत नरेन्द्र खंड-षट-नायक, तेहु भये मद हीन ।
तेरी बात कहा है भाई, तू तो सहज ही दीन ।।२ ।।
`भागचन्द' मार्दव-रससागर, माहिं होहु लवलीन ।
तातैं जगतजाल में फिर कहूँ, जनम न होय नवीन ।।३ ।।

प्रेम अब त्यागहु पुद्गल का

प्रेम अब त्यागहु पुद्गलका । अहित मूल यह जाना सुधीजन ।।टेक ।।
कृमि-कुल-कलित स्त्रवत नव द्वारन, यह पुतला मलका ।
काकादिक भखते जु न होता, चाम तना खलका ।।१ ।।
काल-व्याल मुख थित इसका नहिं, है विश्वास पल का ।
क्षणिक मात्र में विघट जात है, जिमि बुद्बुद जल का ।।२ ।।
`भागचन्द' क्या सार जानके, तू या सँग ललका ।
तातैं चित अनुभव कर जो तू, इच्छुक शिवफलका ।।३ ।।

यह मोह उदय दुख पावै

( राग दीपचन्दी )
यह मोह उदय दुख पावै, जगजीव अज्ञानी ।।टेक ।।
निज चेतनस्वरूप नहिं जानै, परपदार्थ अपनावै ।
पर परिनमन नहीं निज आश्रित, यह तहँ अति अकुलावै ।।१ ।।
इष्ट जानि रागादिक सेवै, ते विधिबंध बढ़ावै ।
निजहितहेत भाव चित सम्यक्दर्शनादि नहिं ध्यावै ।।२ ।।
इन्द्रियतृप्ति करन के काजै, विषय अनेक मिलावै ।
ते न मिलैं तब खेद खिन्न ह्वै, समसुख हृदय न ल्यावै ।।३ ।।
सकल कर्मछय लक्षण, लक्षित, मोक्षदशा नहिं चावै ।
`भागचन्द' ऐसे भ्रमसेती, काल अनंत गमावै ।।४ ।।

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