कविवर श्री दौलतरामजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Daulatramji ke Bhajan -2
और अबै न कुदेव सुहावै
और अबै न कुदेव सुहावै, जिन थाके चरनन रति जोरी ।।टेक ।।
कामकोहवश गहैं अशन असि, अंक निशंक धरै तिय गोरी ।
औरनके किम भाव सुधारैं, आप कुभाव-भारधर-धोरी ।।१ ।।
तुम विनमोह अकोहछोहविन, छके शांत रस पीय कटोरी ।
तुम तज सेय अमेय भरी जो, जानत हो विपदा सब मोरी ।।२ ।।
तुम तज तिनै भजै शठ जो सो दाख न चाखत खात निमोरी ।
हे जगतार उधार `दौलको', निकट विकट भवजलधि हिलोरी ।।३ ।।
उरग-सुरग-नरईश शीस जिस, आतपत्र त्रिधरे
कुंदकुसुमसम चमर अमरगन, ढारत मोदभरे ।।उरग. ।।
तरु अशोक जाको अवलोकत, शोकथोक उजरे ।
पारजात संतानकादिके, बरसत सुमन वरे।।१ ।।उरग. ।।
सुमणिविचित्र पीठअंबुजपर, राजत जिन सुथिरे ।
वर्णविगत जाकी धुनिको सुनि, भवि भवसिंधुतरे।।२ ।।उरग. ।।
साढ़े बारह कोड़ जातिके, बाजत तूर्य खरे ।
भामंडलकी दुतिअखंडने, रविशशि मंद करे।।३ ।।उरग. ।।
ज्ञान अनंत अनंत दर्श बल, शर्म अनंत भरे ।
करुणामृतपूरित पद जाके, `दौलत' हृदय धरे।।४ ।।उरग. ।।
सुधि लीज्यौ जी म्हारी, मोहि भवदुखदुखिया जानके
सुधि लीज्यौ जी म्हारी, मोहि भवदुख दुखिया जानके ।।टेक. ।।
तीनलोकस्वामी नामी तुम, त्रिभुवन के दु:खहारी ।
गनधरादि तुम शरन लई लख, लीनी सरन तिहारी।।१ ।।सुधि. ।।
जो विधि अरि करी हमरी गति, सो तुम जानत सारी ।
याद किये दुख होत हिये ज्यौं, लागत कोट कटारी।।२ ।।सुधि. ।।
लब्धि-अपर्यापत निगोद में, एक उसासमंझारी ।
जनममरन नवदुगुन विथाकी, कथा न जात उचारी।।३ ।।सुधि. ।।
भू जल ज्वलन पवन प्रतेक तरु, विकलत्रय तनधारी ।
पंचेंद्री पशु नारक नर सुर, विपति भरी भयकारी।।४ ।।सुधि. ।।
मोह महारिपु नेक न सुखमय, हो न दई सुधि थारी ।
सो दुठ मंद भयौ भागनतैं, पाये तुम जगतारी।।५ ।।सुधि. ।।
यद्यपि विरागि तदपि तुम शिवमग, सहज प्रगट करतारी ।
ज्यौं रविकिरन सहजमगदर्शक, यह निमित्त अनिवारी।।६ ।।सुधि. ।।
नाग छाग गज बाघ भील दुठ, तारे अधम उधारी ।
सीस नवाय पुकारत अबके, `दौल' अधमकी बारी।।७ ।।सुधि. ।।
जय जय जग-भरम-तिमिर
जय जय जग-भरम-तिमिर हरन जिन धुनि ।।टेक. ।।
या बिन समुझे, अजौं न, सौंज निज मुनी ।
यह लखि हम निजपर अविवेकता लुनी।।१ ।।जय जय. ।।
जाको गनराज अंग, पूर्वमय चुनी ।
सोई कही है कुन्दकुन्द, प्रमुख बहु मुनी।।२ ।।जय. जय. ।।
जे चर जड भये पीय, मोह बारुनी ।
तत्त्व पाय चेते जिन, थिर सुचित सुनी।।३ ।।जय. जय. ।।
कर्ममल पखारनेहि, विमल सुरधुनी ।
तज विलंब अब करो, `दौल' उर पुनी।।४ ।।जय. जय. ।।
थारा तो वैना में सरधान घणो छै
थारा तो वैना में सरधान घणो छै, म्हारे छवि निरखत हिय सरसावै ।
तुमधुनिघन परचहन-दहनहर, वर समता-रस-झर वरसावै ।।थारा. ।।
रूपनिहारत ही बुधि ह्वै सो, निजपरचिह्न जुदे दरसावै ।
मैं चिदंक अकलंक अमल थिर, इन्द्रियसुखदुख जड़फरसावै ।।१ ।।
ज्ञान विराग सुगुनतुम तिनकी, प्रापति हित सुरपति तरसावै ।
मुनि बड़भाग लीन तिनमें नित, `दौल' धवल उपयोग रसावै ।।२ ।।
जिनवैन सुनत, मोरी भूल भगी
जिनवैन सुनत, मोरी भूल भगी ।।टेक. ।।
कर्मस्वभाव भाव चेतनको, भिन्न पिछानन सुमति जगी ।।जिन. ।।
निज अनुभूति सहज ज्ञायकता, सो चिर रुष तुष मैल-पगी ।
स्यादवाद-धुनि-निर्मल-जलतैं, विमल भई समभाव लगी।।१ ।।जिन. ।।
संशयमोहभरमता विघटी, प्रगटी आतमसोंज सगी ।
`दौल' अपूरब मंगल पायो, शिवसुख लेन होंस उमगी।।२ ।।जिन. ।।
सुन जिन वैन श्रवन सुख पायौ
सुन जिन वैन, श्रवन सुख पायौ ।।टेक. ।।
नस्यौ तत्त्व दुर अभिनिवेश तम, स्याद उजास कहायौ ।
चिर विसर्यौ लह्यौ आतम रैन ।।१ ।।सुन. ।।
दह्यौ अनादि असंजम दवतैं, लहि व्रत सुधा सिरायौ ।
धीर धरी मन जीतन मन ।।२ ।।सुन. ।।
भये विभाव अभाव सकल अब, सकल रूप चित लायौ ।
दास लह्यौ अब अविचल जैन ।।३ ।।सुन. ।।
जबतैं आनंदजननि दृष्टि परी माई
तबतैं संशय विमोह भरमता विलाई ।।जबतैं. ।।
मैं हूँ चितचिह्न, भिन्न परतें, पर जड़स्वरूप ।
दोउनकी एकतासु, जानी दुखदाई।।१ ।।जबतैं. ।।
रागादिक बंधहेत, बंधन बहु विपति देत ।
संवर हित जान तासु, हेत ज्ञानताई।।२ ।।जबतैं. ।।
सब सुखमय शिव है तसु, कारन विधिझारन इमि ।
तत्त्व की विचारन जिन-वानि सुधिकराई।।३ ।।जबतैं. ।।
विषयचाह ज्वालतैं, दह्यो अनंतकालतैं ।
सुधांबुस्यात्पदांकगाह तें प्रशांति आई।।४ ।।जबतैं. ।।
या विन जगजाल में, न शरन तीनकाल में ।
सम्हाल चित भजो सदीव, `दौल' यह सुहाई।।५ ।।जबतैं. ।।
और सबै जगद्वन्द मिटावो
और सबै जगद्वन्द मिटावो, लो लावो जिन आगम-ओरी ।।टेक ।।
है असार जगद्वन्द बन्धकर, यह कछु गरज न सारत तोरी ।
कमला चपला, यौवन सुरधनु, स्वजन पथिकजन क्यों रति जोरी ।।१ ।।
विषय कषाय दुखद दोनों ये, इनतैं तोर नेहकी डोरी ।
परद्रव्यनको तू अपनावत, क्यों न तजै ऐसी बुधि भोरी ।।२ ।।
बीत जाय सागरथिति सुरकी, नरपरजायतनी अति थोरी ।
अवसर पाय `दौल' अब चूको, फिर न मिलै मणि सागर बोरी ।।३ ।।
जिनवानी जान सुजान रे
जिनवानी जान सुजान रे ।।टेक ।।
लाग रही चिरतैं विभावता, ताको कर अवसान रे ।।जिनवानी. ।।
द्रव्य क्षेत्र अरु काल भावकी, कथनीको पहिचान रे ।
जाहि पिछाने स्वपरभेद सब, जाने परत निदान रे।।१ ।।जिनवानी. ।।
पूरब जिन जानी तिनहीने, भानी संसृतिवान रे ।
अब जानै अरु जानैंगे जे, ते पावैं शिवथान रे।।२ ।।जिनवानी. ।।
कह `तुषमाष' सुनी शिवभूती, पायो केवलज्ञान रे ।
यौ लखि `दौलत' सतत करो भवि, जिनवचनामृतपान रे ।।३ ।।जिनवानी. ।।
नित पीज्यौ धीधारी, जिनवानि
नित पीज्यौ धीधारी, जिनवानि सुधासम जानके ।।टेक. ।।
वीरमुखारविंदतैं प्रगटी, जन्मजरागद टारी ।
गौतमादिगुरु-उरघट व्यापी, परम सुरुचि करतारी।।१ ।।नित. ।।
सलिल समान कलिलमल गंजन बुधमन रंजनहारी ।
भंजन विभ्रमधूलि प्रभंजन, मिथ्याजलदनिवारी।।२ ।।नित. ।।
कल्यानक तरु उपवनधरिनी, तरनी भवजलतारी ।
बंधविदारन पैनी छैनी, मुक्ति नसैनी सारी।।३ ।।नित. ।।
स्वपरस्वरूप प्रकाशनको यह, भानु कला अविकारी ।
मुनिमन-कुमुदिनि-मोदन-शशिभा, शम-सुख सुमनसुबारी।।४ ।।नित. ।।
जाको सेवत बेवत निजपद, नशत अविद्या सारी ।
तीनलोकपति पूजत जाको, जान त्रिजग हितकारी।।५ ।।नित. ।।
कोटि जीभसौं महिमा जाकी, कहि न सके पविधारी ।
`दौल' अल्पमति केम कहै यह, अधम उधारनहारी।।६ ।।नित. ।।
धन धन साधर्मीजन मिलनकी घरी
बरसत भ्रमताप हरन ज्ञानघनझरी ।।टेक. ।।
जाके विन पाये भवविपति अति भरी ।
निज परहित अहित की कछू न सुधि परी।।१ ।।धन. ।।
जाके परभाव चित्त सुथिरता करी ।
संशय भ्रम मोहकी कु वासना टरी।।२ ।।धन. ।।
मिथ्या गुरुदेवसेव टेव परिहरी ।
वीतरागदेव सुगुरुसेव उरघरी।।३ ।।धन. ।।
चारों अनुयोग सुहितदेश दिठपरी ।
शिवमगके लाह की सुचाह विस्तरी।।४ ।।धन. ।।
सम्यक् तरु धरनि येह करन करिहरी ।
भवजलको तरनि समर-भुजंग विषजरी।।५ ।।धन. ।।
पूरवभव या प्रसाद रमनि शिव वरी ।
सेवो अब `दौल' याहि बात यह खरी।।६ ।।धन. ।।
अब मोहि जानि परी
अब मोहि जानि परी, भवोदधि तारनको है जैन ।।टेक. ।।
मोह तिमिर तैं सदा कालके, छाय रहे मेरे नैन ।
ताके नाशन हेत लियो, मैं अंजन जैन सु ऐन।।१ ।।अब. ।।
मिथ्यामती भेषको लेकर, भाषत हैं जो वैन ।
सो वे बैन असार लखे मैं, ज्यों पानी के फैन।।२ ।।अब. ।।
मिथ्यामती वेल जग फैली, सो दुख फलकी दैन ।
सतगुरु भक्तिकुठार हाथ लै, छेद लियो अति चैन।।३ ।।अब. ।।
जा बिन जीव सदैव कालतैं, विधि वश सुखन लहै न ।
अशरन-शरन अभय `दौलत' अब, भजो रैन दिन जैन।।४ ।।अब. ।।
ऐसा मोही क्यों न अधोगति जावै
ऐसा मोही क्यों न अधोगति जावै, जाको जिनवानी न सुहावै ।।टेक. ।।
वीतरागसे देव छोड़कर, भैरव यक्ष मनावै ।
कल्पलता दयालुता तजि, हिंसा इन्द्रायनि वावै।।१ ।।ऐसा. ।।
रुचै न गुरु निर्ग्रन्थ भेष बहु, - परिग्रही गुरु भावै ।
परधन परतियको अभिलाषै, अशन अशोधित खावै।।२ ।।ऐसा. ।।
परकी विभव देख ह्वै सोगी, परदुख हरख लहावै ।
धर्म हेतु इक दाम न खरचै, उपवन लक्ष बहावै।।३ ।।ऐसा. ।।
ज्यों गृह में संचै बहु अघ त्यों, वनहू में उपजावै ।
अम्बर त्याग कहाय दिगम्बर, बाघम्बर तन छावै।।४ ।।ऐसा. ।।
आरम्भ तज शठ यंत्र मंत्र करि, जनपै पूज्य मनावै ।
धाम वाम तज दासी राखै, बाहिर मढ़ी बनावै।।५ ।।ऐसा. ।।
नाम धराय जती तपसी मन, विषयनिमें ललचावै ।
`दौलत' सो अनन्त भव भटकै, ओरनको भटकावै।।६ ।।ऐसा. ।।
ऐसा योगी क्यों न अभयपद पावै
ऐसा योगी क्यों न अभयपद पावै, सो फेर न भवमें आवै ।।टेक. ।।
संशय विभ्रम मोह-विवर्जित, स्वपर स्वरूप लखावै ।
लख परमातम चेतनको पुनि, कर्मकलंक मिटावै।।१ ।।ऐसा. ।।
भवतनभोगविरक्त होय तन, नग्न सुभेष बनावै ।
मोहविकार निवार निजातम-अनुभव में चित लावै।।२ ।।ऐसा. ।।
त्रस-थावर-वध त्याग सदा, परमाद दशा छिटकावै ।
रागादिकवश झूठ न भाखै, तृणहु न अदत गहावै।।३ ।।ऐसा. ।।
बाहिर नारि त्यागि अंतर, चिद्ब्रह्म सुलीन रहावै ।
परमाकिंचन धर्मसार सो, द्विविध प्रसंग बहावै।।४ ।।ऐसा. ।।
पंच समिति त्रय गुप्ति पाल, व्यवहार-चरनमग धावै ।
निश्चय सकल कषाय रहित ह्वै, शुद्धातम थिर थावै।।५ ।।ऐसा. ।।
कुंकुम पंक दास रिपु तृण मणि, व्याल माल सम भावै ।
आरत रौद्र कुध्यान विडारे, धर्मशुकलको ध्यावै।।६ ।।ऐसा. ।।
जाके सुखसमाज की महिमा, कहत इन्द्र अकुलावै ।
`दौल' तासपद होय दास सो, अविचलऋद्धि लहावै।।७ ।।ऐसा. ।।
कबधौं मिलै मोहि श्रीगुरु मुनिवर
कबधौं मिलै मोहि श्रीगुरु मुनिवर, करि हैं भवोदधि पारा हो ।।टेक. ।।
भोगउदास जोग जिन लीनों, छाँडि परिग्रहभारा हो ।
इन्द्रिय दमन वमन मद कीनो, विषय कषाय निवारा हो।।१ ।।कबधौं. ।।
कंचन काँच बराबर जिनके, निंदक बंदक सारा हो ।
दुर्धर तप तपि सम्यक निज घर, मनवचतनकर धारा हो।।२ ।।कबधौं. ।।
ग्रीषम गिरि हिम सरिता तीरै, पावस तरुतल ठारा हो ।
करुणाभीन चीन त्रसथावर, ईर्यापंथ समारा हो।।३ ।।कबधौं. ।।
मार मार व्रत धार शील दृढ़, मोह महामल टारा हो ।
मास छमास उपास वास वन, प्रासुक करत अहारा हो।।४ ।।कबधौं. ।।
आरत रौद्रलेश नहिं जिनके, धर्म शुकल चित धारा हो ।
ध्यानारूढ़ गूढ़ निज आतम, शुधउपयोग विचारा हो।।५ ।।कबधौं. ।।
आप तरहिं औरनको तारहिं, भवजलसिंधु अपारा हो ।
`दौलत' ऐसे जैन-जतिनको, नितप्रति धोक हमारा हो।।६ ।।कबधौं. ।।
गुरु कहत सीख इमि बार बार
गुरु कहत सीख इमि बार बार, विषसम विषयनको टार टार ।।टेक. ।।
इन सेवत अनादि दुख पायो, जनम मरन बहु धार धार ।।१ ।।गुरु. ।।
कर्माश्रित बाधा-जुत फाँसी, बन्ध बढ़ावन द्वंदकार ।।२ ।।गुरु. ।।
ये न इन्द्रिके तृप्तिहेतु जिमि, तिस न बुझावत क्षारवार ।।३ ।।गुरु. ।।
इनमें सुख कलपना अबुधके, बुधजन मानत दुख प्रचार ।।४ ।।गुरु. ।।
इन तजि ज्ञानपियूष चख्यौ तिन, `दौल' लही भववार पार ।।५ ।।गुरु. ।।
जिन रागद्वेष त्यागा वह सतगुरु हमारा
जिन रागद्वेष त्यागा वह सतगुरु हमारा ।।टेक ।।
तज राजरिद्ध तृणवत निज काज सँभारा ।।जिन राग. ।।
रहता है वह वनखंड में, धरि ध्यान कुठारा ।
जिन मोह महा तरुको, जड़मूल उखारा।।१ ।।जिन राग. ।।
सर्वांग तज परिग्रह, दिगअंबर धारा ।
अनंतज्ञानगुन समुद्र, चारित्र भँडारा।।२ ।।जिन राग. ।।
शुक्लाग्नि को प्रजाल के, वसु कानन जारा ।
ऐसे गुरु को `दौल' है, नमोऽस्तु हमारा।।३ ।।जिन राग. ।।
धनि मुनि जिन की लगी लौ शिवओरनै
सम्यग्दर्शनज्ञानचरननिधि, धरत हरत भ्रमचोरनै ।।धनि. ।।
यथाजातमुद्राजुत सुन्दर, सदन विजन गिरिकोरनै ।
तृन-कंचन अरि-स्वजन गिनत सम, निंदन और निहोरनै।।१ ।।धनि. ।।
भवसुख चाह सकल तजि वल सजि, करत द्विविध तप घोरनै ।
परम विरागभाव पवितैं नित, चूरत करम कठोरनै।।२ ।।धनि. ।।
छीन शरीर न हीन चिदानन, मोहत मोहझकोरनै ।
जग-तप-हर भवि कुमुद निशाकर, मोदन `दौल' चकोरनै।।३ ।।धनि. ।।
धनि मुनि जिन यह, भाव पिछाना
तनव्यय वांछित प्रापति मानी, पुण्य उदय दुख जाना ।।धनि. ।।
एकविहारी सकल ईश्वरता, त्याग महोत्सव माना ।
सब सुखको परिहार सार सुख, जानि रागरुष भाना।।१ ।।धनि. ।।
चित्स्वभावको चिंत्य प्रान निज, विमल ज्ञानदृगसाना ।
`दौल' कौन सुख जान लह्यौ तिन, करो शांतिरसपाना।।२ ।।धनि. ।।
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