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कविवर श्री सौभाग्यमलजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Saubhagyamalji ke Bhajan -2

धोली हो गई रे काली कामली माथा की थारी

धोली हो गई रे काली कामली,
सुरज्ञानी चेतो, धोली हो गई रे काली कामली ।।टेर ।।
वदन गठीलो कंचन काया, लाल बूँद रंग थारो ।
हुयो अपूरव फेर फार सब, ढांचो बदल्यो सारो ।।१ ।।
नाक कान आँख्या की किरिया सुस्त पड़ गई सारी ।
काजू और अखरोट चबे नहिं दाँता बिना सुपारी जी ।।२ ।।
हालण लागी नाड़ कमर भी झुक कर बणी कवानी ।
मुंडो देख आरसी सोचो ढल गई कयां जवानी जी ।।३ ।।
न्याय नीति ने तजकर छोड़ी भोग संपदा भाई ।
बात-बात में झूठ कपट छल, कीनी मायाचारी ।।४ ।।
बैठ हताई तास चोपड़ा खेल्यो बुला खिलाय ।
लड़या पराया भोला भाई फूल्या नहीं समाय ।।५ ।।
प्रभू भक्ति में रूचि न लीनी नहीं करूणा चितधारी ।
वीतराग दर्शन नहीं रूचियो उमर खोदई सारी जी ।।६ ।।
पुन्य योग `सौभाग्य' मिल्यो है नरकुल उत्तम प्यारो ।
निजानंद समता रस पील्यो होसी भव निस्तारो ।।७ ।।

पर्वराज पर्यूषण आया दस धर्मो की ले माला

मिथ्यातम में दबी आत्मनिधि अब तो चेत परख लाला ।।टेर ।।
तू अखंड अविनाशी चेतन ज्ञाता दृष्टा सिद्ध समान ।
रागद्वेष परपरणति कारण स्व सरूप को कर्यो न भान ।।
मोहजाल की भूल भुलैया समझ नरक सी है ज्वाला ।।१ ।।
परम अहिंसक क्षमा भाव भर, तज दे मिथ्या मान गुमान ।
कपट कटारी दूर फैंक दे जो चाहे अपनो कल्याण ।।
सत्य शौच संयम तप अनुपम है अमृत भर पी प्याला ।।२ ।।
परिग्रह त्याग ब्रह्म में रमजा वीतराग दर्शन गायो ।
चिंतामणी सू काग उड़ा मत नरकुल उत्तम तू पायो ।।
शिवरमणी `सौभाग्य' दिखा रही तुझ अनश्वर सुखशाला ।।३ ।।

नित उठ ध्याऊँ, गुण गाऊँ, परम दिगम्बर साधु

नित उठ ध्याऊं, गुण गाऊं, परम दिगम्बर साधु ।
महाव्रतधारी-२, महाव्रतधारी ।।टेक ।।
रागद्वेष नहीं लेश जिन्हों के मन में है, मन में हैं ।
कनककामिनी मोह काम नहीं, तन में है, तन में हैं ।
परिग्रह रहित निरारंभी, ज्ञानी व ध्यानी तपसी ।
नमो हितकारी भारी, नमो हितकारी ।।१ ।।
शीतकाल सरिता के तट पर, जो रहते, जो रहते ।
ग्रीष्मऋतु गिरिराज शिखर चढ़ अघ दहते, अघ दहते ।
तरूतल रहकर वर्षा में, विचलित ना होते लखभय ।
बन अंधियारी, यारी बन अंधियारी ।।२ ।।
कंचन काँच मसान महल सम, जिनके है जिनके हैं ।
अरि अपमान मान मित्र सम, तिनके है तिनके हैं ।
समदर्शी समता धारी, नग्न दिगम्बर मुनि हैं ।
भवजल तारी, तारी भवजल तारी ।।३ ।।
ऐसे परम तपो निधि जहाँ-२, जाते हैं जाते हैं ।
परम शांति सुख लाभ जीव सब, पाते हैं पाते हैं ।
भव-भव में `सौभाग्य' मिले, गुरू पद पूजूं ध्याऊं ।
वरू शिवनारी नारी शिवनारी ।।४ ।।

परम दिगम्बर यती, महागुण व्रती, करो निस्तारा

नहीं तुम बिन कौन हमारा ।।टेक ।।
तुम बीस आठ गुणधारी हो, जग जीवमात्र हितकारी हो ।
बाईस परीषह जीत धरम रखवारा ।।१ ।।नहीं तुम.
तुम आतमध्यानी ज्ञानी हो, शुचि स्वपर भेद विज्ञानी हो ।
है रत्नत्रय गुणमंडित हृदय तुम्हारा ।।२ ।।नहीं तुम.
तुम क्षमाशील समता सागर, हो विश्व पूज्य वर रत्नाकर ।
है हितमित सत उपदेश तुम्हारा प्यारा ।।३ ।।नहीं तुम.
तुम प्रेममूर्ति हो समदर्शी, हो भव्य जीव मन आकर्षी ।
है निर्विकार निर्दोष स्वरूप तुम्हारा ।।४ ।।नहीं तुम.
है यही अवस्था एक सार, जो पहुँचाती है मोक्ष द्वार ।
`सौभाग्य' आपसा बाना होय हमारा ।।५ ।।नहीं तुम.

पल पल बीते उमरिया रूप जवानी जाती

पल पल बीते उमरिया रूप जवानी जाती, प्रभु गुण गाले,
गाले प्रभु गुण गाले ।।टेर ।।
पूरब पुण्य उदय से नर तन तुझे मिला, तुझे मिला ।
उत्तम कुल सागर मैं आ तू कमल खिला, कमल खिला ।।
अब क्यों गर्व गुमानी हो धर्म भुलाया अपना, पड़ा पाप पाले पाले ।।१ ।।
नश्वर धन यौवन पर इतना मत फूले, मत फूले ।
पर सम्पत्ति को देख ईर्षा मत झूले, मत झूले ।।
निज कर्त्तव्य विचार कर, पर उपकारी होकर पुण्य कमाले, कमाले ।।२ ।।
देवादिक भी मनुष जनम को तरस रहे, तरस रहे ।
मूढ़! विषय भोगों में, सौ सौ बरस रहे, बरस रहे ।।
चिंतामणि को पाकर रे कीमत नहीं जानी तूने, गिरा कीच नाले नाले ।।३ ।।
बीती बात बिसार चेत तू, सुरज्ञानी, सुरज्ञानी ।
लगा प्रभु से ध्यान सफल हो, जिंदगानी, जिंदगानी ।।
धन वैभव `सौभाग्य' बढ़े आदर हो जग में तेरा, खुले मोक्ष ताले ताले ।।४ ।।

त्रिशला के नन्द तुम्हें वंदना हमारी

त्रिशला के नन्द तुम्हें वंदना हमारी है ।।टेर ।।
दुनिया के जीव सारे तुम को निहार रहे ।
पल पल पुकार रहे, हितकर चितार रहे ।।
कोई कहे वीर प्रभु कोई वर्द्धमान कहे ।
सनमति पुकार कहे तूं ही उपकारी है ।।१ ।।त्रिशला ।।
मंगल उपदेश तेरा, कर्मो का काटे घेरा ।
भव भव का मेटे फेरा, शिवपुर में डाले डेरा ।।
आत्म सुबोध करें, रत्नत्रय चित्त धरें ।
शिव तिय `सौभाग्य' वरें ये ही दिल धारी हैं ।।२ ।।त्रिशला ।।

धन्य धन्य आज घड़ी कैसी सुखकार है

वीर जिन पधारे देखो रथ हो सवार हैं ।।टेर ।।
खुशियां अपार आज हर दिल पे छाई है ।
दर्शन के हेतु सब जनता अकुलाई है ।।
ठोर ठोर देखलो भीड बेशुमार है, वीर जिन पधारे ।
देखो रथ हो सवार है ।।१ ।।
भक्ति से नृत्य गान कोई हैं कर रहे ।
आतम सुबोध कर पापों से डर रहे ।।
पल पल पुण्य का भरे भंडार हैं, वीर जिन पधारे ।
देखो रथ हो सवार हैं ।।२ ।।
जय जय के नाद से गूंजा आकाश है ।
छूटेंगे पाप सब निश्चय यह आश है ।।
देखलो `सौभाग्य' खुला आज मुक्ति द्वार है, वीर जिन पधारे ।
देखो रथ हो सवार है ।।३ ।।

तोड़ विषियों से मन जोड़ प्रभु से लगन

आज अवसर मिला ।।टेर ।।
रंग दुनियां के अब तक न समझा है तू ।
भूल निज को हा! पर मैं यों रीझा है तू ।
अब तो मुँह खोल चख, स्वाद आतम का लख ।
शिव पयोधर मिला ।।१ ।।
हाथ आने की फिर ये सु-घड़ियाँ नहीं ।
प्रीति जड़ से लगाना है अच्छा नहीं ।।
देख पुद्गल का घर, नहीं रहता अमर ।
जग चराचर मिला ।।२ ।।
ज्ञान ज्योति हृदय में अब तो जगा ।
देख `सौभाग्य' जग में न कोई सगा ।।
तजदे मिथ्या भरम, तुझे सच्चे धरम का ।
है अवसर मिला ।।३ ।।

प्रभु दर्शन कर जीवन की, भीड़ भगी मेरे कर्मन की

प्रभु दर्शन कर जीवन की, भीड़ भगी मेरे कर्मन की ।।टेर ।।
भव बन भ्रमता हारा था पाया नहीं किनारा था ।
घड़ी सुखद आई सुवरण की ।।१ ।।भीड़ भगी ।।
शान्त छबी मन भाई है, नैनन बीच समाई है ।
दूर हटूँ नहीं पल छिन भी ।।२ ।।भीड़ भगी ।।
निज पद का `सौभाग्य' वरूं, अरु न किसी की चाह करूँ ।
सफल कामना हो मन की ।।३ ।।भीड़ भगी ।।

भाया थारी बावली जवानी चाली रे

भगवान भजन तूं कद करसी थारी गरदन हाली रे ।।टेक ।।
लाख चोरासी जीवाजून में मुश्किल नरतन पायो ।
तूं जीवन ने खेल समझकर बिरधा कीयां गमायो ।।
आयो मूठी बाँध मुसाफिर जासी हाथा खाली रे ।।१ ।।
झूँठ कपट कर जोड़ जोड़ धन कोठा भरी तिजोरी रे ।
धर्म कमाई करी न दमड़ी कोरी मूँछ मरोड़ी रे ।।
है मिथ्या अभिमान आँख की थोथी थारी लाली रे ।।२ ।।
कंचन काया काम न आसी थारा गोती नाती रे ।
आतमराम अकेलो जासी पड़ी रहेगी माटी रे ।।
जन्तर मन्तर धन सम्पत से मोत टले नहीं टाली रे ।।३ ।।
आपा पर को भेद समझले खोल हिया की आँख रे ।
वीतराग जिन दर्शन तजकर अठी उठी मत झाँक रे ।।
पद पूजा `सौभाग्य' करेली शिव रमणी ले थाली रे ।।४ ।।

तेरी सुन्दर मूरत देख प्रभो

तेरी सुन्दर मूरत देख प्रभो, मैं जीवन दुख सब भूल गया ।
यह पावन प्रतिमा देख प्रभो ।।टेक ।।
ज्यों काली घटायें आती हैं, त्यों कोयल कूक मचाती है ।
मेरा रोम रोम त्यों हर्षित है, हाँ हर्षित है ।।
यह चन्द्र छवि जिन देख प्रभो ।।१ ।।
दोष के हरनेवाले, हो तुम मोक्ष के वरनेवाले ।
मेरा मन भक्ति में लीन हुआ, हाँ, लीन हुआ ।।
इसको तो निभाना देख प्रभो ।।२ ।।
हर श्वांस में तेरी ही लय हो, कर्मो पर सदा विजय भी हो ।
यह जीवन तुझसा जीवन हो, हाँ जीवन हो ।।
`सौभाग्य' यह ही लिख लेख प्रभो ।।३ ।।

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