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कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan

आतम अनुभव कीजै हो

जनम जरा अरु मरन नाशकै, अनंतकाल लौं जीजै हो ।।आतम. ।।
देव धरम गुरु की सरधा करि, कुगुरु आदि तज दीजै हो ।
छहौं दरब नव तत्त्व परखकै, चेतन सार गहीजै हो ।।आतम. ।।१ ।।
दरब करम नो करम भिन्न करि, सूक्ष्मदृष्टि धरीजै हो ।
भाव करमतैं भिन्न जानिकै, बुधि विलास न करीजै हो ।।आतम. ।।२ ।।
आप आप जानै सो अनुभव, `द्यानत' शिवका दीजै हो ।
और उपाय वन्यो नहिं वनि है, करै सो दक्ष कहीजै हो ।।आतम. ।।३ ।।

आतम अनुभव सार हो, अब जिय सार हो, प्राणी

विषय भोगफेणने तोहि काट्यो, मोह लहर चढ़ी भार हो ।।आतम. ।।१ ।।
याको मंत्र ज्ञान है भाई, जप तप लहरिउतार हो ।।आतम. ।।२ ।।
जनमजरामृत रोग महा ये, तैं दुख सह्यो अपार हो ।।आतम. ।।३ ।।
`द्यानत' अनुभव-औषध पीके, अमर होय भव पार हो ।।आतम. ।।४ ।।

आतम काज सँवारिये, तजि विषय किलोलैं

तुम तो चतुर सुजान हो, क्यों करत अलोलैं।।आतम. ।।
सुख दुख आपद सम्पदा, ये कर्म झकोलैं ।
तुम तो रूप अनूप हो, चैतन्य अमोलैं ।।आतम. ।।१ ।।
तन धनादि अपने कहो, यह नहिं तुम तोलैं ।
तुम राजा तिहुँ लोकके, ये जात निठोलैं ।।आतम. ।।२ ।।
चेत चेत `द्यानत' अबै, इमि सद्गुरु बोलैं ।
आतम निज पर-पर लखौ, अरु बात ढकोलैं ।।आतम. ।।३ ।।

आतम जान रे जान रे जान

जीवनकी इच्छा करै, कबहुँ न मांगै काल । (प्राणी!)
सोई जान्यो जीव है, सुख चाहै दुख टाल ।।आतम. ।।१ ।।
नैन बैनमें कौन है, कौन सुनत है बात । (प्राणी!)
देखत क्यों नहिं आपमें, जाकी चेतन जात ।।आतम. ।।२ ।।
बाहिर ढूंढ़ैं दूर है, अंतर निपट नजीक । (प्राणी!)
ढूंढनवाला कौन है, सोई जानो ठीक ।।आतम. ।।३ ।।
तीन भुवनमें देखिया, आतम सम नहिं कोय । (प्राणी!)
`द्यानत' जे अनुभव करैं, तिनकौं शिवसुख होय ।।आतम. ।।४ ।।

आतम जाना, मैं जाना ज्ञानसरूप

पुद्गल धर्म अधर्म गगन जम, सब जड़ मैं चिद्रूप ।।आतम. ।।१ ।।
दरब भाव नोकर्म नियारे, न्यारो आप अनूप ।।आतम. ।।२ ।।
`द्यानत' पर-परनति कब बिनसै, तब सुख विलसै भूप ।।आतम. ।।३ ।।

आतम जानो रे भाई!

जैसी उज्जल आरसी रे, तैसी आतम जोत ।
काया-करमनसों जुदी रे, सबको करै उदोत ।।आतम. ।।१ ।।
शयन दशा जागृत दशा रे, दोनों विकलपरूप ।
निरविकलप शुद्धातमा रे, चिदानंद चिद्रूप ।।आतम. ।।२ ।।
तन वचसेती भिन्न कर रे, मनसों निज लौं लाय ।
आप आप जब अनुभवै रे, तहाँ न मन वच काय ।।आतम. ।।३ ।।
छहौं दरब नव तत्त्वतैं रे, न्यारो आतमराम ।
`द्यानत' जे अनुभव करैं रे, ते पावैं शिवधाम ।।आतम. ।।४ ।।

आतम महबूब यार, आतम महबूब

देखा हमने निहार, और कुछ न खूब।।आतम. ।।
पंचिन्द्रीमाहिं रहै, पाचों तैं भिन्न ।
बादल में भानु तेज, नहीं खेद खिन्न ।।आतम. ।।१ ।।
तनमें है तजै नाहिं, चेतनता सोय ।
लाल कीच बीच पर्यो, कीचसा न होय ।।आतम. ।।२ ।।
जामें हैं गुन अनन्त, गुनमें है आप ।
दीवे में जोत जोत में है दीवा व्याप ।।आतम. ।।३ ।।
करमोंके पास वसै, करमोंसे दूर ।
कमल वारि माहिं लसै, वारि माहिं जूर ।।आतम. ।।४ ।।
सुखी दुखी होत नाहिं, सुख दुखकेमाहिं ।
दरपनमें धूप छाहिं, धाम शीत नाहिं ।।आतम. ।।५ ।।
जगके व्योहाररूप, जगसों निरलेप ।
अंबरमें गोद धर्यो, व्योमको न चेप ।।आतम. ।।६ ।।
भाजनमें नीर भर्यो, थिरमें मुख पेख ।
`द्यानत' मन के विकार, टार आप देख ।।आतम. ।।७ ।।

आतमरूप अनूपम है, घटमाहिं विराजै हो

जाके सुमरन जापसों, भव भव दुख भाजै हो।।आतम. ।।
केवल दरसन ज्ञानमैं, थिरतापद छाजै हो ।
उपमाको तिहुँ लोकमें, कोऊ वस्तु न राजै हो ।।आतम. ।।१ ।।
सहै परीषह भार जो, जु महाव्रत साजै हो ।
ज्ञान बिना शिव ना लहै, बहुकर्म उपाजै हो ।।आतम. ।।२ ।।
तिहूँ लोक तिहुँ कालमें, नहिं और इलाजै हो ।
`द्यानत' ताकों जानिये, निज स्वारथकाजै हो ।।आतम. ।।३ ।।

आपा प्रभु जाना मैं जाना

परमेसुर यह मैं इस सेवक, ऐसो भर्म पलाना।।आपा. ।।
जो परमेसुर सो मम मूरति, जो मम सो भगवाना ।
मरमी होय सोइ तो जानै, जानै नाहीं आना ।।आपा. ।।१ ।।
जाकौ ध्यान धरत हैं मुनिगन, पावत हैं निरवाना ।
अर्हत सिद्ध सूरि गुरु मुनिपद, आतमरूप बखाना ।।आपा. ।।२ ।।
जो निगोदमें सो मुझमाहीं, सोई है शिव थाना ।
`द्यानत' निहचैं रंच फेर नहिं, जानै सो मतिवाना ।।आपा. ।।३ ।।

आतमरूप सुहावना, कोई जानै रे भाई ।

जाके जानत पाइये, त्रिभुवन ठकुराई .........
मन इन्द्री न्यारे करौ, मन और विचारौ ।
विषय विकार सबै मिटैं, सहजैं सुख धारौ ।।आतम. ।।१ ।।
वाहिरतैं मन रोककैं, जब अन्तर आया ।
चित्त कमल सुलट्यो तहाँ, चिनमूरति पाया ।।आतम. ।।२ ।।
पूरक कुंभक रेचतैं, पहिलैं मन साधा ।
ज्ञान पवन मन एकता, भई सिद्ध समाधा ।।आतम. ।।३ ।।
जिनि इहि विध मन वश किया, तिन आतम देखा ।
`द्यानत' मौनी व्है रहे, पाई सुखरेखा ।।आतम. ।।४ ।।

आतमज्ञान लखैं सुख होइ

पंचेन्द्री सुख मानत भोंदू, यामें सुखको लेश न कोइ।।आतम. ।।
जैसे खाज खुजावत मीठी, पीछैंतैं दुखतैं दे रोइ ।
रुधिरपान करि जोंक सुखी ह्वै, सूँतत बहुदुख पावै सोई ।।आतम. ।।१ ।।
फरस-दन्ति रस-मीन गंध-अलि, रूप-शलभ मृग-नाद हिलोइ ।
एक एक इन्द्रनितैं प्राणी, दुखिया भये गये तन खोइ ।।आतम. ।।२ ।।
जैसे कूकर हाड़ चचोरै, त्यों विषयी नर भोगै भोइ ।
`द्यानत' देखो राज त्यागि नृप, वन वसि सहैं परीषह जोइ ।।आतम. ।।३ ।।

इस जीवको, यों समझाऊं री!

अरस अफरस अगंध अरूपी, चेतन चिन्ह बताऊं री ।।इस. ।।१ ।।
तत तत तत तत, थेई थेई थेई थेई तन नन री री गाऊं री ।।इस. ।।२ ।।
`द्यानत' सुमत कहै सखियनसों, `सोहं' सीख सीखाऊं री ।।इस. ।।३ ।।

ए मेरे मीत! निचीत कहा सोवै

फूटी काय सराय पायकै, धरम रतन जिन खोवै ।।ए. ।।१ ।।
निकसि निगोद मुकत जैवेको, राहविषैं कहा जोवै ।।ए. ।।२ ।।
`द्यानत' गुरु जागुरू पुकारैं, खबरदार कि न होवै ।।ए. ।।३ ।।

कर कर आतमहित रे प्रानी

जिन परिनामनि बंध होत है, सो परनति तज दुखदानी।।कर. ।।
कौन पुरुष तुम कहाँ रहत हौ, किहिकी संगति रति मानी ।
ये परजाय प्रगट पुद्गलमय, ते तैं क्यों अपनी जानी ।।कर. ।।१ ।।
चेतनजोति झलक तुझमाहीं, अनुपम सो तैं विसरानी ।
जाकी पटतर लगत आन नहिं, दीप रतन शशि सूरानी ।।कर. ।।२ ।।
आपमें आप लखो अपनो पद, `द्यानत' करि तन-मन-वानी ।
परमेश्वरपद आप पाइये, यौं भाषैं केवलज्ञानी ।।कर. ।।३ ।।

कर रे! कर रे! कर रे!, तू आतम हित कर रे

काल अनन्त गयो जग भ्रमतैं, भव भवके दुख हर रे।।कर रे ।।
लाख कोटि भव तपस्या करतैं, जितो कर्म तेरो जर रे ।
स्वास उस्वासमाहिं सो नासै, जब अनुभव चित धर रे ।।कर रे. ।।१ ।।
काहे कष्ट सहै बन माहीं, राग दोष परिहर रे ।
काज होय समभाव बिना नहिं, भावौ पचि पचि मर रे ।।कर रे. ।।२ ।।
लाख सीखकी सीख एक यह, आतम निज, पर पर रे ।
कोटि ग्रंथको सार यही है, `द्यानत' लख भव तर रे ।।कर रे. ।।१ ।।

कर मन! निज-आतम-चिंतौन

जिहि बिनु जीव भ्रम्यो जग-जौन ।।कर. ।।
आतममगन परम जे साधि, ते ही त्यागत करम उपाधि ।।कर. ।।१ ।।
गहि व्रत शील करत तन शोख, ज्ञान बिना नहिं पावत मोख ।।कर. ।।२ ।।
जिहितैं पद अरहन्त नरेश, राम काम हरि इंद फणेश ।।कर. ।।३ ।।
मनवांछित फल जिहितैं होय, जिहिकी पटतर अवर न कोय ।।कर. ।।४ ।।
तिहूँ लोक तिहुँकाल-मँझार, वरन्यो आतमअनुभव सार ।।कर. ।।५ ।।
देव धरम गुरु अनुभव ज्ञान, मुकति नीव पहिली सोपान ।।कर. ।।६ ।।
सो जानैं छिन व्है शिवराय, `द्यानत' सो गहि मन वच काय ।।कर. ।।७ ।।

कारज एक ब्रह्महीसेती

अंग संग नहिं बहिरभूत सब, धन दारा सामग्री तेती।।कारज. ।।
सोल सुरग नव ग्रैविकमें दुख, सुखित सातमें ततका वेती ।
जा शिवकारन मुनिगन ध्यावैं, सो तेरे घट आनँदखेती ।।कारज. ।।१ ।।
दान शील जप तप व्रत पूजा, अफल ज्ञान बिन किरिया केती ।
पंच दरब तोतैं नित न्यारे, न्यारी रागदोष विधि जेती ।।कारज. ।।२ ।।
तू अविनाशी जगपरकासी, `द्यानत' भासी सुकलावेती ।
तजौ लाल! मनके विकलय सब, अनुभव-मगन सुविद्या एती ।।कारज. ।।३ ।।

घटमें परमातम ध्याइये हो, परम धरम धनहेत

ममता बुद्धि निवारिये हो, टारिये भरम निकेत।।घटमें. ।।
प्रथमहिं अशुचि निहारिये हो, सात धातुमय देह ।
काल अनन्त सहे दुखजानैं, ताको तजो अब नेह ।।घटमें. ।।१ ।।
ज्ञानावरनादिक जमरूपी, निजतैं भिन्न निहार ।
रागादिक परनति लख न्यारी, न्यारो सुबुध विचार ।।घटमें. ।।२ ।।
तहाँ शुद्ध आतम निरविकलप, ह्वै करि तिसको ध्यान ।
अलप कालमें घाति नसत हैं, उपजत केवलज्ञान ।।घटमें. ।।३ ।।
चार अघाति नाशि शिव पहुँचे, विलसत सुख जु अनन्त ।
सम्यकदरसनकी यह महिमा, `द्यानत' लह भव अन्त ।।घटमें. ।।४ ।।

चेतनजी! तुम जोरत हो धन, सो धन चलत नहीं तुम लार

जाको आप जान पोषत हो, सो तन जलकै ह्वै है छार।।चेतन. ।।१ ।।
विषय भोगके सुख मानत हो, ताको फल है दु:ख अपार।।चेतन. ।।२।।
यह संसार वृक्ष सेमरको, मान कह्यो हौं कहत पुकार।।चेतन. ।।३ ।।

चेतन! तुम चेतो भाई, तीन जगत के नाथ

ऐसो नरभव पायकैं, काहे विषया लवलाई।।चेतन. ।।१ ।।
नाहीं तुमरी लाइकी, जोवन धन देखत जाई ।
कीजे शुभ तप त्यागकै, `द्यानत' हूजे अकषाई ।।चेतन. ।।२ ।।

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