कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

कविवर श्री भागचन्दजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Bhagchandji ke Bhajan

सन्त निरन्तर चिन्तत ऐसैं

(राग ठुमरी)
सन्त निरन्तर चिन्तत ऐसैं, आतमरूप अबाधित ज्ञानी ।।टेक ।।
रोगादिक तो देहाश्रित हैं, इनतें होत न मेरी हानी ।
दहन दहत ज्यों दहन न तदगत, गगन दहन ताकी विधि ठानी ।।१ ।।
वरणादिक विकार पुद्गलके, इनमें नहिं चैतन्य निशानी ।
यद्यपि एकक्षेत्र-अवगाही, तद्यपि लक्षण भिन्न पिछानी ।।२ ।।
मैं सर्वांगपूर्ण ज्ञायक रस, लवण खिल्लवत लीला ठानी ।
मिलौ निराकुल स्वाद न यावत, तावत परपरनति हित मानी ।।३ ।।
`भागचन्द' निरद्वन्द निरामय, मूरति निश्चय सिद्धसमानी ।
नित अकलंक अवंक शंक बिन, निर्मल पंक बिना जिमि पानी ।।४ ।।

सुमर सदा मन आतमराम

(राग बिलावल)
सुमर सदा मन आतमराम, सुमर सदा मन आतमराम ।।टेक ।।
स्वजन कुटुंबी जन तू पोषै, तिनको होय सदैव गुलाम ।
सो तो हैं स्वारथ के साथी, अंतकाल नहिं आवत काम ।।१ ।।
जिमि मरीचिका में मृग भटकै, परत सो जब ग्रीषम अति घाम ।
तैसे तू भवमाहीं भटकै, धरत न इक छिनहू विसराम ।।२ ।।
करत न ग्लानि अबै भोगन में, धरत न वीतराग परिनाम ।
फिर किमि नरकमाहिं दुख सहसी, जहाँ सुख लेश न आठौं जाम ।।३ ।।
तातैं आकुलता अब तजिकै, थिर ह्वै बैठो अपने धाम ।
`भागचन्द' वसि ज्ञान नगरमें, तजि रागादिक ठग सब ग्राम ।।४ ।।

आतम अनुभव आवै जब निज

(राग गौरी)
आतम अनुभव आवै जब निज, आतम अनुभव आवै ।
और कछू न सुहावै, जब निज आतम आतम अनुभव आवै ।।टेक ।।
रस नीरस हो जात ततच्छिन, अक्ष विषय नहीं भावै ।।१ ।।
गोष्ठी कथा कुतुहल विघटै, पुद्गलप्रीति नसावै ।।२ ।।
राग-दोष जुग चपल पक्षजुत, मन पक्षी मर जावै ।।३ ।।
ज्ञानानन्द सुधारस, उधमै, घट अंतर न समावे ।।४ ।।
`भागचन्द' ऐसे अनुभव के, हाथ जोरि सिर नावै ।।५ ।।

ऐसे विमल भाव जब पावै

(राग काफी)
ऐसे विमल भाव जब पावै, तब हम नरभव सुफल कहावै ।।टेक ।।
दरशबोधमय निज आतम लखि, परद्रव्यनिको नहिं अपनावै ।
मोह-राग-रुष अहित जान तजि, झटित दूर तिनको छुटकावै ।।१ ।।
कर्म शुभाशुभबंध उदयमें, हर्ष विषाद चित्त नहिं ल्यावै ।
निज-हित-हेत विराग ज्ञान लखि, तिनसों अधिक प्रीति उपजावै ।।२ ।।
विषय चाह तजि आत्मवीर्य सजि, दुखदायक विधिबंध खिरावै ।
`भागचन्द' शिवसुख सब सुखमय, आकुलता बिन लखि चित चावै ।।३ ।।

आकुलरहित होय इमि निशदिन

आकुलरहित होय इमि निशदिन, कीजे तत्त्वविचारा हो ।
को मैं कहा रूप है मेरा, पर है कौन प्रकारा हो ।।टेक ।।
को भव-कारण बंध कहा को, आस्रव रोकनहारा हो ।
खिपत कर्मबंधन काहेसों, थानक कौन हमारा हो ।।१ ।।
इमि अभ्यास किये पावत हैं, परमानंद अपारा हो ।
`भागचन्द' यह सार जान करि, कीजै बारंबारा हो ।।२ ।।

सफल है धन्य धन्य वा घरी

(लावनी)
सफल है धन्य धन्य वा घरी,
जब ऐसी अति निर्मल होसी, परम दशा हमरी ।।टेक ।।
धारि दिगंबरदीक्षा सुंदर, त्याग परिग्रह अरी ।
वनवासी कर-पात्र परीषह, सहि हों धीर धरी ।।१ ।।
दुर्धर तप निर्भर नित तप हों, मोह कुवृक्ष करी ।
पंचाचारक्रिया आचरहों, सकल सार सुथरी ।।२ ।।
विभ्रमतापहरन झरसी निज, अनुभव मेघझरी ।
परम शान्त भावनकी तातैं, होसी वृद्धि खरी ।।३ ।।
त्रेसठिप्रकृति भंग जब होसी, जुत त्रिभंग सगरी ।
तब केवलदर्शनविबोध सुख, वीर्यकला पसरी ।।४ ।।
लखि हो सकल द्रव्यगुनपर्जय, परनति अति गहरी ।
`भागचन्द' जब सहजहि मिल है, अचल मुकति नगरी ।।५ ।।

प्रानी समकित ही शिवपंथा

(राग दीपचन्दी सोरठ)
प्रानी समकित ही शिवपंथा । या विन निर्फल सब ग्रंथा ।।टेक ।।
जा बिन बाह्यक्रिया तप कोटिक, सकल वृथा है रंथा ।।१ ।।
हयजुतरथ भी सारथ विन जिमि, चलत नहीं ऋजु पंथा ।।२ ।।
`भागचन्द' सरधानी नर भये, शिवलछमीके कंथा ।।३ ।।

जीवन के परिनामनिकी यह

(राग ठुमरी)
जीवनके परिनामनिकी यह, अति विचित्रता देखहु ज्ञानी ।।टेक ।।
नित्य निगोदमाहितैं कढ़िकर, नर परजाय पाय सुखदानी ।
समकित लहि अंतर्मुहूर्तमें, केवल पाय वरै शिवरानी ।।१ ।।
मुनि एकादश गुणथानक चढ़ि, गिरत तहांतैं चितभ्रम ठानी ।
भ्रमत अर्धपुद्गलप्रावर्तन, किंचित् ऊन काल परमानी ।।२ ।।
निज परिनामनिकी सँभालमें, तातैं गाफिल मत ह्वै प्रानी ।
बंध मोक्ष परिनामनिहीसों, कहत सदा श्रीजिनवरवानी ।।३ ।।
सकल उपाधिनिमित भावनिसों, भिन्न सु निज परनतिको छानी ।
ताहिं जानि रुचि ठानि हो हु थिर, `भागचन्द' यह सीख सयानी ।।४ ।।

परनति सब जीवनकी

परनति सब जीवनकी, तीन भाँति वरनी ।
एक पुण्य एक पाप, एक रागहरनी ।।टेक ।।
तामे शुभ अशुभ अंध, दोय करैं कर्मबंध ।
वीतराग परनति ही, भवसमुद्रतरनी ।।१ ।।
जावत शुद्धोपयोग, पावत नाहीं मनोग ।
तावत ही करन जोग, कही पुण्य करनी ।।२ ।।
त्याग शुभ क्रियाकलाप, करो मत कदाच पाप ।
शुभमें न मगन होय, शुद्धता विसरनी ।।३ ।।
ऊँच ऊँच दशा धारि, चित्त प्रमाद को विडारि ।
ऊँचली दशातैं मति, गिरो अधो धरनी ।।४ ।।
`भागचन्द' या प्रकार, जीव लहै सुख अपार ।
याके निरधार स्याद-वाद की उचरनी ।।५ ।।

तू स्वरूप जाने बिना दुखी

(राग दीपचन्दी धनाश्री)
तू स्वरूप जाने बिना दुखी, तेरी शक्ति न हलकी वे ।।टेक ।।
रागादिक वर्णादिक रचना, सो है सब पुद्गलकी वे ।।१ ।।
अष्ट गुनातम तेरी मूरति, सो केवलमें झलकी वे ।।२ ।।
जगी अनादि कालिमा तेरे, दुस्त्यज मोहन मलकी वे ।।३ ।।
मोह नसैं भासत है मूरत, पँक नसैं ज्यों जलकी वे।।४ ।।
`भागचन्द' सो मिलत ज्ञानसों, स्फूर्ति अखंड स्वबल की वे ।।५ ।।

सत्ता रंगभूमिमें, नटत ब्रह्म नटराय

सत्ता रंगभूमिमें, नटत ब्रह्म नटराय ।।टेक ।।
रत्नत्रय आभूषणमंडित, शोभा अगम अथाय ।
सहज सखा निशंकादिक गुन, अतुल समाज बढ़ाय ।।१ ।।
समता वीन मधुररस बोलै, ध्यान मृदंग बजाय ।
नदत निर्जरा नाद अनूपम, नूपुर संवर ल्याय ।।२ ।।
लय निज-रूप-मगनता-ल्यावत, नृत्य सुज्ञान कराय ।
समरस गीतालापन पुनि जो, दुर्लभ जगमहँ आय ।।३ ।।
`भागचन्द' आपहि रीझत तहाँ, परम समाधि लगाय ।
तहाँ कृतकृत्य सु होत मोक्षनिधि, अतुल इनामहिं पाय ।।४ ।।

सांची तो गंगा यह वीतरागवानी

(राग चर्चरी)
सांची तो गंगा यह वीतरागवानी ।
अविच्छन्न धारा निज धर्मकी कहानी ।।टेक ।।
जामें अति ही विमल अगाध ज्ञानपानी ।
जहाँ नहीं संशयादि पंककी निशानी ।।१ ।।
सप्तभंग जहँ तरंग उछलत सुखदानी ।
संतचित मरालवृंद रमैं नित्य ज्ञानी ।।२ ।।
जाके अवगाहनतैं शुद्ध होय प्रानी ।
`भागचन्द'निहचै घटमाहिं या प्रमानी ।।३ ।।

महिमा है अगम जिनागमकी

(राग ईमन)
महिमा है अगम जिनागम की ।।टेक ।।
जाहि सुनत जड़ भिन्न पिछानी, हम चिन्मूरति आतम की ।।
रागादिक दुखकारन जानें, त्याग बुद्धि दीनी भ्रमकी ।
ज्ञान ज्योति जागी घट अंतर, रुचि बाढ़ी पुनि शमदमकी ।।१ ।।
कर्म बंध की भई निरजरा, कारण परंपरा क्रम की ।
`भागचन्द' शिव लालच लागो, पहुँच नहीं है जहँ जमकी ।।२ ।।

महिमा जिनमतकी

(राग दीपचन्दी)
महिमा जिनमत की, कोई वरन सकै बुधिवान ।।टेक ।।
काल अनंत भ्रमत जिय जा बिन, पावत नहिं निज थान ।
परमानन्दधाम भये तेही, तिन कीनों सरधान ।।१ ।।
भव मरुथल में ग्रीष्मरितु रवि, तपत जीव अति प्रान ।
ताको यह अति शीतल सुंदर, धारा सदन समान ।।२ ।।
प्रथम कुमत मनमें हम भूले, कीनी नाहिं पिछान ।
`भागचन्द' अब याको सेवत, परम पदारथ जान ।।३ ।।

थांकी तो वानी में हो

(राग मल्हार)
थांकी तो वानी में हो, निज स्वपरप्रकाशक ज्ञान ।।टेक ।।
शीतल होत सुबुद्धिमेदिनी, मिटत भवातपपीर ।।१ ।।
करुनानदी बहै चहुँ दिसितैं, भरी सो दोई तीर ।।२ ।।
`भागचन्द' अनुभव मंदिर को, तजत न संत सुधीर ।।३ ।।

मेघघटासम श्रीजिनवानी

(राग मल्हार)
मेघघटासम श्रीजिनवानी ।।टेक ।।
स्यात्पद चपला चमकत जामें, बरसत ज्ञान सुपानी ।।१ ।।
धरम सस्य जातैं बहु बाढ़ैं, शिवआनंदफलदानी ।।२ ।।
मोहन धूल दबी सब यातैं, क्रोधानल सुबुझानी ।।३ ।।
`भागचन्द' बुधजन केकीकुल, लखि हरखै चितज्ञानी ।।४ ।।

म्हांकै घट जिनधुनि अब प्रगटी

(राग सोरठ)
म्हांकै घट जिनधुनि अब प्रगटी ।।टेक ।।
जागृत दशा भई अब मेरी, सुप्त दशा विघटी ।
जगरचना दीसत अब मोकों, जैसी रँहटघटी ।।१ ।।
विभ्रम तिमिर-हरन निज दृगकी, जैसी अँजनवटी ।
तातैं स्वानुभूति प्रापतितैं, परपरनति सब हटी ।।२ ।।
ताके बिन जो अवगम चाहै, सो तो शठ कपटी ।
तातैं `भागचन्द' निशिवासर, इक ताहीको रटी ।।३ ।।

अहो यह उपदेशमाहीं

(राग काफी)
अहो यह उपदेशमाहीं, खूब चित्त लगावना ।
होयगा कल्यान तेरा, सुख अनंत बढ़ावना ।।टेक ।।
रहित दूषन विश्वभूषन, देव जिनपति ध्यावना ।
गगनवत निर्मल अचल मुनि, तिनहिं शीस नवावना ।।१ ।।
धर्म अनुकंपा प्रधान, न जीव कोई सतावना ।
सप्ततत्त्वपरीक्षना करि, हृदय श्रद्धा लावना ।।२ ।।
पुद्गलादिकतैं पृथक्, चैतन्य ब्रह्म लखावना ।
या विधि विमल सम्यक्त धरि, शंकादि पंक बहावना ।।३ ।।
रुचैं भव्यनको वचन जे, शठनको न सुहावना ।
चन्द्र लखि जिमि कुमुद विकसै, उपल नहिं विकसावना ।।४ ।।
`भागचन्द' विभाव तजि, अनुभव स्वभावित भावना ।
या बिन शरन्य न अन्य जगतारण्य में कहुँ पावना ।।५ ।।

धन्य धन्य है घड़ी आजकी

धन्य धन्य है घड़ी आजकी, जिनधुनि श्रवन परी ।
तत्त्वप्रतीत भई अब मेरे, मिथ्यादृष्टि टरी ।।टेक ।।
जड़तैं भिन्न लखी चिन्मूरति, चेतन स्वरस भरी ।
अहंकार ममकार बुद्धि पुनि, परमें सब परिहरी ।।१ ।।
पापपुण्य विधिबंध अवस्था, भासी अतिदुखभरी ।
वीतराग विज्ञानभावमय, परिनत अति विस्तरी ।।२ ।।
चाह-दाह विनसी वरसी पुनि, समतामेघझरी ।
बाढ़ी प्रीति निराकुल पदसों, `भागचन्द' हमरी ।।३ ।।

जानके सुज्ञानी जैनवानी की सरधा लाइये

(राग दीपचन्दी कानेर)
जानके सुज्ञानी, जैनवानी की सरधा लाइये ।।टेक ।।
जा बिन काल अनंते भ्रमता, सुख न मिलै कहूँ प्रानी ।।१ ।।
स्वपर विवेक अखंड मिलत है जाहीके सरधानी ।।२ ।।
अखिलप्रमानसिद्ध अविरुद्धत, स्यात्पद शुद्ध निशानी ।।३ ।।
`भागचन्द' सत्यारथ जानी, परमधरम रजधानी ।।४ ।।

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Popular Posts

Categories

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *