सूरदास जी के पद : Surdas Ji Ke Pad Sangrah
सूरदास के पद (एन.सी. ई.आर.टी)
सूरदास
एक
मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?
किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वै है लाँबी-मोटी।
काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै, नागिनी सी भुइँ लोटी।
काँचौ दूध पियावत पचि-पचि, देति न माखन-रोटी।
सूर चिरजीवौ दोउ भैया, हरि हलधर की जोटी।
दो
तेरैं लाल मेरौ माखन खायौ।
दुपहर दिवस जानि घर सूनो ढूँढ़ि-ढूँढ़ोरि आपही आयौ।
खोलि किवारि, पैठि मंदिर मैं, दूध-दही सब सखनि खवायौ।
ऊखल चढ़ि, सींके कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढरकायौ।
दिन प्रति हानि होति गोरस की, यह ढोटा कौनैं ढँग लायौ।
सूर स्याम कौं हटकि न राखै तैं ही पूत अनोखौ जायौ।
मैया! हौं गाई चरावन जैहौं
सूरदास
मैया! हौं गाई चरावन जैहौं।तू कहि महर नंद बाबा सौं, बड़ौ भयौ न डरैहों॥
रैता, पैता, मना, मनसुखा, हलधर संगहि रैहौं।
बंसीबट तर ग्वालनि कैं सँग, खेलत अति सुख पैहौं॥
ओदन भोजन दै दधि काँवरि, भूख लगे तैं खेहौं।
सूरदास है साखि जमुन-जल सौंह देहु जु नहैहौं॥
मैया मैं नहिं माखन खायो
सूरदास
मैया मैं नहि माखन खायो।भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो।
चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो॥
मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो।
ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो॥
तू माता मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो।
जिय तेरे कछु भेद उपजि हैं, जानि परायो जायो॥
ये ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो।
सूरदास तब बिर्हसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो॥
भजन बिनु कूकर−सूकर−जैसो
सूरदास
भजन बिनु कूकर−सूकर−जैसो।जैसैं घर बिलाव के मूसा, रहत बिषय−बस वैसौ॥
बग−बगुली अरु गीध−गीधिनी, आइ जनम लियौ तैसौ।
उनहू कैं गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ?
जीव मारि कै उदर भरत हैं, तिन कौ लेखौ ऐसौ।
सूरदास भगवंत−भजन बिनु, मनौ ऊँट−बृष−भैंसौ॥
खेलन में को काको गुसैयाँ (एन.सी. ई.आर.टी)
सूरदास
खेलन में को काको गुसैयाँ।हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस हीं कत करत रिसैयाँ॥
जाति-पाँति हमतैं बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ।
अति अधिकार जनावत यातै जातैं अधिक तुम्हारै गैयाँ।
रुहठि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ सब ग्वैयाँ।
सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाऊँ दियौ करि नंद-दुहैयाँ॥
मुरली तऊ गुपालहिं भावति।
सुनि री सखी जदपि नंदलालहिं, नाना भाँति नचावति।
राखति एक पाई ठाढ़ौ करि, अति अधिकार जनावति।
कोमल तन आज्ञा करवावति, कटि टेढ़ौ ह्वै आवति।
अति आधीन सुजान कनौड़े, गिरिधर नार नवावति।
ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी (एन. सी. ई. आर. टी)
सूरदास
एक
ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोर्यौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी॥
दो
मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही॥
तीन
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ 'सूर' तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥
चार
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए॥
आयो घोष बड़ो व्योपारी
सूरदास
आयो घोष बड़ो व्योपारी।लादि खेप गुन ज्ञान-जोग की ब्रज में आन उतारी॥
फाटक दै कर हाटक माँगत भोरै निपट सुधारी।
धुर ही तें खोटी खायो है लये फिरत सिर भारी॥
इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अजानी?
अपनो दूध छाँड़ि को पीवै खार कूप को पानी॥
ऊधो जाहु सबार यहाँ तें बेगि गहरु जनि लावौ।
मुँह माँग्यो पैहो सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावौ॥
अति मलीन वृषभानुकुमारी
सूरदास
अति मलीन वृषभानुकुमारी।हरि-स्रमजल अंतर-तनु भीजे ता लालच न धुआवति सारी॥
अधोमुख रहति उरध नहिं चितति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी।
छूटे चिहुर, बदन कुम्हिलाने, ज्यों नलिनी हिमकर की मारी॥
हरि-संदेस सुनि सहज मृतक भई, इक बिरहिनि दूजे अलि जारी।
सूर स्याम बिनु यों जीवित है ब्रजवनिता सब स्यामदुलारी॥
संदेसनि मधुबन-कूप भरे
सूरदास
संदेसनि मधुबन-कूप भरे।जो कोउ पथिक गए हँ ह्याँ ते फिरि नहिं अवन करे॥
कै वै स्याम सिखाय समोधे कै वै बीच मरे?
अपने नहिं पठवत नंदनंदन हमरेउ फेरि धरे॥
मसि खूँटी कागद जल भींजे, सर दव लागि जरे।
पाती लिखैं कहो क्यों करि जो पलक-कपाट अरे?
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै
सूरदास
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।यह ब्योपार तिहारो ऊधो! ऐसोइ फिरि जैहै।
जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहे।
दाख छाँड़ि कै कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै?
मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै।
सूरदास प्रभु गुनहि छाँड़ि कै को निर्गुन निबैहै?
बिन गोपाल बैरनि भई कुंजैं
सूरदास
बिन गोपाल बैरिनि भई कुंजैं।तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं॥
बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजैं।
पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भईं भुंजैं॥
ए, ऊधो कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं।
सूरदास प्रभु को मन जोवत अँखियाँ भईं बरन ज्यों गुंजैं॥
निरखत अंक स्यामसुंदर के
सूरदास
निरखत अंक स्यामसुंदर के बारबार लावति छाती।लोचन-जल कागद-मसि मिलि कै ह्वै गई स्याम स्याम की पाती॥
गोकुल बसत संग गिरिधर के कबहुँ बयारि लगी नहिं ताती।
तब की कथा कहा कहौं, ऊधो, जब हम बेनुनाद सुनि जाती॥
हरि के लाड़ गनति नहि काहू निसिदिन सुदिन रासरसमाती।
प्राननाथ तुम कब धौं मिलोगे सूरदास प्रभु बालसँघाती॥
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ
सूरदास
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि रिस के मारैं खेलन हौं नहिं जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता को है तेरौ तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी, तू कत स्यामल गात।
चुटुकी दै-दै ग्वाल नवावत, हँसत, सबै मुसुकात॥
तू मोही कौं मारन सीखी, दाउहि कबहुँ न खीझै।
मोहन-मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै॥
सुनहु कान्ह, बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मोहि गोधन की सौं, हौं माता तू पूत॥
हमारे हरि हारिल की लकरी
सूरदास
हमारे हरि हारिल की लकरी।मन बच क्रम नंदनंद सों उर यह दृढ़ करि पकरी॥
जागत, सोबत, सपने सौंतुख कान्ह-कान्ह जक री।
सुनतहि जोग लगत ऐसो अति! ज्यों करुई ककरी॥
सोई व्याधि हमें लै आए देखी सुनी न करी।
यह तौ सूर तिन्हैं लै दीजै जिनके मन चकरी॥
निर्गुन कौन देस को वासी
सूरदास
निर्गुन कौन देस को बासी?मधुकर! हँसि समुझाय, सौंह दै बूझति, साँच, न हाँसी॥
को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी?
कैसो बरन, भेस है कैसो केहि रस कै अभिलासी॥
पावैगो पुनि कियो अपनो जो रे! कहैगो गाँसी॥
सुनत कौन ह्वै रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी॥
अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी
सूरदास
अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी।कैसे रहैं, रूपरसराची ये बतियाँ सुनि रूखी॥
अवधि गनत इकटक मन जोवत तब एती नहिं झूखी।
अब इन जोग-सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी॥
बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी।
सूर सिकत हटि नाव चलायो ये सरिता हैं सूखी॥
काहे को रोकत मारग सूधो
सूरदास
काहे को रोकत मारग सूधो?सुनहु मधुप! निर्गुन-कंटक तें राजपंथ क्यों रूधो?
कै तुम सिखै पठाए कुब्जा, कै कही स्यामघन जू धौं?
वेद पुरान सुमृति सब ढूँढौं जुवतिन जोग कहूँ धौं?
ताको कहा परेखो कीजै जानत छाछ न दूधौ।
सूर मूर अक्रूर गए लै ब्याज निबेरत ऊधौ॥
ऊधो! कोकिल कूजल कानन
सूरदास
ऊधो! कोकिल कूजल कानन।तुम हमको उपदेस करत हौ भस्म लगावन आनन।
औरों सब तजि, सिंगी लै लै टेरन, चढ़त पखानन।
पै नित आनि पपीहा के मसि मदन हनत निज बानन॥
हम तौ निपट अहिरि बावरी जोग दीजिए ज्ञानिन।
कहा कथत मामी के आगे जानत नानी नानन॥
सुन्दरस्याम मनोहर मूरति भावति नीके गानन।
सूर मुकुति कैसे पूजति है वा मुरली की तानन॥
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए
सूरदास
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।समुझी बात कहत मधुकर जो? समाचार कछु पाए?
इक अति चतुर हुते पहिले ही, अरु करि नेह दिखाए।
जानी बुद्धि बड़ी, जुवतिन को जोग-सँदेस पठाए॥
भले लोग आगे के, सखि री! परहित डोलत धाए।
वे अपने मन फेरि पाइए जे हैं चलत चुराए॥
ते क्यों नीति करत आपुन जे औरनि रीति छुड़ाए?
राज-धर्म सब भए सूर जहँ प्रजा न जायँ सताए॥
लरिकाई को प्रेम कहौ अलि
सूरदास
लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत?कहा कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अंतरगति यों लूटत॥
चंचल चाल मनोहर चितवनि, वह मुसुकानि मंद धुन गावत।
नटवर भेस नंदनंदन को वह विनोद गृह वन तें आवत॥
चरनकमल की सपथ करति हौं यह संदेस मोहि विष सम लागत।
सूरदास मोहि निमिष न बिसरत मोहन मूरति सोवत जागत॥
काहे को गोपीनाथ कहावत
सूरदास
काहे को गोपीनाथ कहावत?जो पै मधुकर कहत हमारे गोकुल काहे न आवत?
सपने की पहिचानि जानि कै हमहि कलंक लगावत।
जो पै स्याम कूबरी रीझे सो किन नाम धरावत?
ज्यों गतराज काज के औसर औरे दसन दिखावत।
कहत सुनन को हम हैं ऊधो सूर अनत बिरमावत॥
मैया, मैं तो चंद−खिलौना लैहौं
सूरदास
मैया, मैं तो चंद-खिलौना लैहौं।जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं॥
सुरी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं।
ह्वैहौं पूत नंद बाबा कौ, तेरौ सुत न कहैहौं॥
आगैं आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहि न जनैहौं।
हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहिया दैहौं॥
तेरी सौं, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं।
सूरदास ह्वै कुटिल बराती, गीत सुमंगल गैहौं॥
ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी
सूरदास
ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी।अपरस रहत सनेहतगा तें, नाहिंन मन अनुरागी॥
पुरइनि-पात रहत जल-भीतर ता रस देह न दाग़ी।
ज्यों जल मांह तेल की गागरि बूँद न ताके लागी॥
प्रीति-नदी में पाँव न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी।
सूरदास अबला हम भोरी गुर चींटी ज्यों पागी॥
देखौ माई! कान्ह हिलकियनि रोवै
सूरदास
देखौ माई! कान्ह हिलकियनि रोवै!इतनक मुख माखन लपटान्यौ, डरनि आँसुवनि धोवै॥
माखन लागि उलूखल बाँध्यौ, सकल लोग ब्रज जोवै।
निरखि कुरुख उन बालनि की दिस, लाजनि अँखियनि गोवै॥
ग्वाल कहैं धनि जननि हमारी, सुकर सुरभि नित नोवै।
बरबस हीं बैठारि गोद में, धारैं बदन निचोवै॥
ग्वालि कहैं या गोरस कारन, कत सुत की पति खोवै?
आनि देहिं अपने घर तैं हम, चाहति जितौ जसोवै॥
जब-जब बंधन छोरायौ चाहतिं, सूर कहै यह को वै।
मन माधौ तन, चित गोरस में, इहिं बिधि महरि बिलोवै॥
कहन लागे मोहन मैया-मैया
सूरदास
कहन लागे मोहन मैया-मैया।नंद महर सौं बाबा-बाबा, अरु हलधर सौं भैया॥
ऊँचे चढ़ि-चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया।
दूरि खेलन जनि जाहु लला रे, मारैगी काहु की गैया॥
गोपी-ग्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति बधैया।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ, चरननि की बलि जैया॥
अब हौं माया-हाथ बिकानौ
सूरदास
अब हौं माया-हाथ बिकानौ।परबस भयौ पसू ज्यौं रजु-बस, भज्यौ न श्रीपति रानौ॥
हिंसा-मद-ममता-रस भूल्यौ, आसाहीं लपटानौ।
याही करत अधीन भयौ हौं, निद्रा अति न अघानौ॥
अपने हीं अज्ञान-तिमिर मैं, बिसर्यौ परम ठिकानौ।
सूरदास की एक आँखि है, ताहू मैं कछु कानौ॥
जसोदा हरि पालनैं झुलावै
सूरदास
जसोदा हरि पालनैं झुलावै।हलरावै, दुलरावै मल्हावै, जोइ-जोइ कछु गावै॥
मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै।
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै॥
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि, करि-करि सैन बतावै॥
इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नंद-भामिनि पावै॥
गोकुल सबै गोपाल उपासी
सूरदास
गोकुल सबै गोपाल उपासी।जोग-अंग साधत जे ऊधो ते सब बसत ईसपुर कासी॥
यद्यपि हरि हम तजि अनाथ करि तदपि रहति चरननि रसरासी।
अपनी सीतलताहि न छाँडत यद्यपि है ससि राहु-गरासी॥
का अपराध जोग लिखि पठवत प्रेम भजन तजि करत उदासी।
सूरदास ऐसी को बिरहिन माँगति मुक्ति तले गुनरासी॥
आए जोग सिखावन पाँडे
सूरदास
आए जोग सिखावन पाँडे।परमारथी पुराननि लादे ज्यों बनजारे टाँड़े॥
हमरी गति पति कमलनयन की जोग सिखैं ते राँड़े।
कहौ मधुप, कैसे समायँगे एक म्यान दो खाँड़े।
कहु षटपट, कैसे खैयतु है हाथिन के संग गाड़े।
काकी भूख गई बयारि भखि बिना दूध घृत डाँड़े॥
काहे जो झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डाँड़े।
सूरदास तीनों नहि उपजत धनिया धान कुम्हाँड़े॥
अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल
सूरदास
अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल॥
महामोह के नूपुर बाजत, चलत असंगत चाल॥
भ्रम-भोयौ मन भयौ, पखावज, चलत असंगत चाल॥
तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना बिधि दै ताल।
माया कौ कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल॥
कोटिक कला काछि दिखाराई जल-थल सुधि नहिं काल।
सूरदास की सबै अविद्या दूरि करौ नँदलाल॥
खेलत मैं को काको गुसैयाँ
सूरदास
खेलत में को काको गुसैयाँ।हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबसहीं कत करत रिसैयाँ॥
जाति-पाँति हम ते बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ।
अति अधिकार जनावत यातैं, जातैं अधिक तुम्हारैं गैयाँ!
रुहठि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ सब ग्वैयाँ।
सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाऊँ दियौ करि नंद-दुहैयाँ॥
उर में माखन-चोर गड़े
सूरदास
उर में माखन-चोर गड़े।अब कैसेहू निकसत नहिं ऊधो! तिरछे ह्वै जु अड़े॥
जदपि अहीर जसोदानंदन तदपि न जात छँड़े।
वहाँ बने जदुबंस महाकुल हमहिं न लगत बड़े।
को वसुदेव, देवकी है को, ना जानै औ बूझैं।
सूर स्यामसुंदर बिनु देखे और न कोऊ सूझैं॥
हरि हौं सब पतितनि को नायक
सूरदास
हरि, हौं सब पतितनि को नायक।को करि सकै बराबरि मेरी, और नहीं कोउ लायक॥
जो प्रभु अजामील कौं दीन्हौ, सो पाटौ लिखित पाऊँ।
तौ बिस्वास होइ मन मेरैं, औरौ पतित बुलाऊँ।
बचन बाँह लै चलौं गाँठि दै, पाऊँ सुख अति भारी।
यह मारग चौगुनौ चलाऊँ, तौ पूरौ ब्यौपारी॥
यह सुनि जहाँ-तहाँ तैं सिमिटैं, आइ होइ इक ठौर।
अब कैं तौ आपुन लै आयौ, बेर बहुर की और॥
होड़ा-होड़ी मनहि भावते किए पाप भारि पेट।
ते सब पतित पाय तर डारौं, यहै हमारी भेंट॥
बहुत भरोसौ जानि तुम्हारौ, अध कीन्हें भरि भाँड़ौ।
लीजै बेगि निबेरि तुरतहीं सूर पतित कौ टाँड़ौं॥
मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी
सूरदास
मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वैहै लाँबी-मोटी।
काढ़त-गुहत-न्हवावत जैहै नागिनि-सी भुइँ लोटी॥
काँचौ दूध पियावति पचि-पचि, देति न माखन-रोटी।
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी॥
चरन-कमल बंदौं हरि−राइ
सूरदास
चरन-कमल बंदौं हरि-राइ।जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौं सब कछु दरसाइ॥
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ॥
हमारे निर्धन के धन राम
सूरदास
हमारे निर्धन के धन राम।चोर न लेत, घटत नहिं कबहूँ, आबत गाढ़ैं काम॥
जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसो हरि-नाम।
बैकुँठनाथ सकल सुख दाता, सूरदास सुख-धाम॥
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