कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -4
हम तो कबहुँ न निज घर आये
परघर फिरत बहुत दिन बीते, नाम अनेक धराये ।।हम तो. ।।
परपद निजपद मानि मगन ह्वै, परपरनति लपटाये ।
शुद्ध बुद्ध सुख कन्द मनोहर, चेतन भाव न भाये।।१ ।।हम तो. ।।
नर पशु देव नरक निज जान्यो, परजय बुद्धि लहाये ।
अमल अखण्ड अतुल अविनाशी, आतमगुन नहिं गाये।।२ ।।हम तो. ।।
यह बहु भूल भई हमरी फिर, कहा काज पछताये ।
`दौल' तजौ अजहूँ विषयनको, सतगुरु वचन सुनाये।।३ ।।हम तो. ।।
हो भैया मोरे! कहु कैसे सुख होय
लीन कषाय अधीन विषयके, धरम करै नहिं कोय।।हो भैया. ।।
पाप उदय लखि रोवत भोंदू!, पाप तजै नहिं सोय ।
स्वान-वान ज्यों पाहन सूंघै, सिंह हनै रिपु जोय ।।हो भैया. ।।१ ।।
धरम करत सुख दुख अघसेती, जानत हैं सब लोय ।
कर दीपक लै कूप परत है, दुख पैहै भव दोय ।।हो भैया. ।।२ ।।
कुगुरु कुदेव कुधर्म लुभायो, देव धरम गुरु खोय ।
उलट चाल तजि अब सुलटै जो, `द्यानत' तिरै जग-तोय ।।हो भैया. ।।३ ।।
वे कोई निपट अनारी, देख्या आतमराम
जिनसों मिलना फेरि बिछुरना, तिनसों कैसी यारी ।
जिन कामोंमें दुख पावै है, तिनसों प्रीति करारी ।।वे. ।।१ ।।
बाहिर चतुर मूढ़ता घरमें, लाज सबै परिहारी ।
ठगसों नेह वैर साधुनिसों, ये बातैं विसतारी ।।वे. ।।२ ।।
सिंह दाढ़ भीतर सुख मानै, अक्कल सबै बिसारी ।
जा तरु आग लगी चारौं दिश, वैठि रह्यो तिहँ डारी ।।वे. ।।३ ।।
हाड़ मांस लोहूकी थैली, तामें चेतनधारी ।
`द्यानत' तीनलोकको ठाकुर, क्यों हो रह्यो भिखारी ।।वे. ।।४ ।।
ज्ञाता सोई सच्चा वे, जिन आतम अच्चा
ज्ञान ध्यान में सावधान है, विषय भोगमें कच्चा वे।।ज्ञाता. ।।१ ।।
मिथ्या कथन सुननिको बहरा, जैन वैनमें मच्चा वे ।।ज्ञाता. ।।२ ।।
मूढ़निसेती मुख नहिं बोलै, प्रभुके आगे नच्चा वे।।ज्ञाता. ।।३ ।।
`द्यानत' धरमीको यों चाहै, गाय चहै ज्यों बच्चा वे।।ज्ञाता. ।।४ ।।
ज्ञान सरोवर सोई हो भविजन
भूमि छिमा करुना मरजादा, सम-रस जल जहँ होई।।भविजन. ।।
परनति लहर हरख जलचर बहु, नय-पंकति परकारी ।
सम्यक कमल अष्टदल गुण हैं, सुमन भँवर अधिकारी ।।भविजन. ।।१ ।।
संजम शील आदि पल्लव हैं, कमला सुमति निवासी ।
सुजस सुवास कमल परिचयतैं, परसत भ्रम तप नासी ।।भविजन. ।।२ ।।
भव-मल जात न्हात भविजनका, होत परम सुख साता ।
`द्यानत' यह सर और न जानैं, जानैं बिरला ज्ञाता ।।भविजन. ।।३ ।।
ज्ञान ज्ञेयमाहिं नाहिं, ज्ञेय हू न ज्ञानमाहिं
ज्ञान ज्ञेय आन आन, ज्यों मुकर घट है।।ज्ञान. ।।
ज्ञान रहै ज्ञानीमाहिं, ज्ञान बिना ज्ञानी नाहिं,
दोऊ एकमेक ऐसे, जैसे श्वेत पट है ।।ज्ञान. ।।१ ।।
ध्रुव उतपाद नास, परजाय नैन भास,
दरवित एक भेद, भावको न ठट है ।।ज्ञान. ।।२ ।।
`द्यानत' दरब परजाय विकलप जाय,
तब सुख पाय जब, आप आप रट है ।।ज्ञान. ।।३ ।।
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै
राज सम्पदा भोग भोगवै, बंदीखाना धारै।।ज्ञानी. ।।
धन जोवन परिवार आपतैं, ओछी ओर निहारै ।
दान शील तप भाव आपतैं, ऊंचेमाहिं चितारै ।।ज्ञानी. ।।१ ।।
दुख आये धीरज धर मनमें, सुख वैराग सँभारै ।
आतम दोष देखि नित झूरै, गुन लखि गरब बिडारै ।।ज्ञानी. ।।२ ।।
आप बड़ाई परकी निन्दा, मुखतैं नाहिं उचारै ।
आप दोष परगुन मुख भाषै, मनतैं शल्य निवारै ।।ज्ञानी. ।।३ ।।
परमारथ विधि तीन जोगसौं, हिरदै हरष विथारै ।
और काम न करै जु करै तो, जोग एक दो हारै ।।ज्ञानी. ।।४ ।।
गई वस्तुको सोचै नाहीं, आगमचिन्ता जारै ।
वर्तमान वर्तै विवेकसौं, ममता बुद्धि विसारै ।।ज्ञानी. ।।५ ।।
बालपने विद्या अभ्यासै, जोवन तप विस्तारै ।
वृद्धपने सन्यास लेयकै, आतम काज सँभारै ।।ज्ञानी. ।।६ ।।
छहों दरब नव तत्त्वमाहिंतैं, चेतन सार निकारै ।
`द्यानत' मगन सदा तिसमाहीं, आप तरै पर तारै ।।ज्ञानी. ।।७ ।।
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै 2
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै
नारि नपुंसक नर पद काया, आप अकाय निहारै।।ज्ञानी. ।।
बामन वैश्य शुद्र औ क्षत्री, चारों भग लिँग लागे ।
भग विनाशी भोग विनाशी, हम अविनाशी जागे ।।ज्ञानी. ।।१ ।।
पंडित मूरख पोथिनिमाहीं, पोथी नैनन सूझै ।
नैन जोति रवि चन्द उदयतैं, तेऊ अस्तत बूझै ।।ज्ञानी. ।।२ ।।
कायर सूर लड़नमें गिनिये, लड़त जीव दुख पावै ।
सब हममें हम हैं सबमाहीं, मेरे कौन सतावै ।।ज्ञानी. ।।३ ।।
कौन बजावे अरु को गावै, नाचै कौन नचावै ।
सुपने सा जग ख्याल मँडा है, मेरे मन यों आवै ।।ज्ञानी. ।।४ ।।
एक कमाऊ एक निखट्टू, दोनों दरब पसारा ।
आवै सुख जावै दुख पावै, मैं सुख दुखसों न्यारा ।।ज्ञानी. ।।५ ।।
एक कुटुम्बी एक फकीरा, दोनों घर वन चाहैं ।
घर भी काको वन भी काको, ममता-दाहनि-दाहैं ।।ज्ञानी. ।।६ ।।
सोवत जागत व्रत अरु खातैं, गर्व निगर्व निहारै ।
`द्यानत' ब्रह्म मगन निशि वासर, करम-उपाधि बिडारै ।।ज्ञानी. ।।७ ।।
अरहंत सुमर मन बावरे
ख्याति लाभ पूजा तजि भाई, अन्तर प्रभु लौ लाव रे।।अरहंत. ।।
नरभव पाय अकारथ खोवै, विषय भोग जु बढ़ाव रे ।
प्राण गये पछितैहै मनवा, छिन छिन छीजै आव रे ।।अरहंत. ।।१ ।।
जुवती तन धन सुत मित परिजन, गज तुरंग रथ चाव रे ।
यह संसार सुपनकी माया, आँख मीचि दिखराव रे ।।अरहंत. ।।२ ।।
ध्याव ध्याव रे अब है दावरे, नाहीं मंगल गाव रे ।
`द्यानत' बहुत कहाँ लौं कहिये, फेर न कछू उपाव रे ।।अरहंत. ।।३ ।।
ए मान ये मन कीजिये भज प्रभु तज सब बात हो
मुख दरसत सुख बरसत प्रानी, विघन विमुख ह्वै जात हो।।ए मन. ।।१ ।।
सार निहार यही शुभ गतिमें, छह मत मानै ख्यात हो ।।ए मन. ।।२ ।।
`द्यानत' जानत स्वामि नाम धन, जस गावैं उठि प्रात हो।।ए मन. ।।३ ।।
चौबीसौं को वंदना हमारी
भवदुखनाशक, सुखपरकाशक, विघनविनाशक मंगलकारी।।१ ।।
तीनलोक तिहुँकालनिमाहीं, इन सम और नहीं उपगारी।।२ ।।
पंच कल्यानक महिमा लखकै, अद्भुत हरष लहैं नरनारी।।३ ।।
`द्यानत' इनकी कौन चलावै, बिंब देख भये सम्यकधारी ।।४ ।।
जिन के भजन में मगन रहु रे!
जो छिन खोवै बातनिमांहिं, सो छिन भजन करैं अघ जाहिं।।१ ।।
भजन भला कहतैं क्या होय, जाप जपैं सुख पावै सोय।।२ ।।
बुद्धि न चहिये तन दुख नाहिं, द्रव्य न लागै भजनकेमाहिं।।३ ।।
षट दरसनमें नाम प्रधान, `द्यानत' जपैं बड़े धनमान ।।४ ।।
जिन जपि जिन जपि, जिन जपि जीयरा
प्रीति करि आवै सुख, भीति करि जावै दुख,
नित ध्यावै सनमुख, ईति न आवे नीयरा ।।जिन. ।।१ ।।
मंगल प्रवाह होय, विघनका दाह धोय,
जस जागै तिहुँ लोय, शांत होय हीयरा ।।जिन. ।।२ ।।
`द्यानत' कहाँ लौं कहै, इन्द्र चन्द्र सेवा बहै,
भव दुख पावकको, भक्ति नीर सीयरा ।।जिन. ।।३ ।।
जिन नाम सुमर मन! बावरे! कहा इत उत भटकै
विषय प्रगट विष-बेल हैं, इनमें जिन अटकै।।जिन नाम. ।।
दुर्लभ नरभव पायकै, नगसों मत पटकै ।
फिर पीछैं पछतायगो, औसर जब सटकै ।।जिन नाम. ।।१ ।।
एक घरी है सफल जो, प्रभु-गुन-रस गटकै ।
कोटि वरष जीयो वृथा, जो थोथा फटकै ।।जिन नाम. ।।२ ।।
`द्यानत' उत्तम भजन है, लीजै मन रटकै ।
भव भवके पातक सबै, जै हैं तो कटकै ।।जिन नाम. ।।३ ।।
जिनरायके पाय सदा शरनं
भव जल पतित निकारन कारन, अन्तरपापतिमिर हरनं।।जिन. ।।१ ।।
परसी भूमि भई तीरथ सो, देव-मुकुट-मनि-छवि धरनं।।जिन.।।२ ।।
`द्यानत' प्रभु-पद-रज कब पावै, लागत भागत है मरनं ।।जिन.।।३ ।।
जिनवरमूरत तेरी, शोभा कहिय न जाय
रोम रोम लखि हरष होत है, आनँद उर न समाय।।जिन. ।।१ ।।
शांतरूप शिवराह बतावै, आसन ध्यान उपाय।।जिन.।।२ ।।
इंद फनिंद नरिंद विभौ सब, दीसत है दुखदाय।।जिन. ।।३ ।।
`द्यानत' पूजै ध्यावै गावै, मन वच काय लगाय ।।जिन.।।४ ।।
तू ही मेरा साहिब सच्चा सांई
काल अनन्त रुल्यो जगमाहीं, आपद बहुविधि पाइंर्।।तू ही. ।।१ ।।
तुम राजा हम परजा तेरे, कीजिये न्याव न काइंर्।।तू ही.।।२ ।।
`द्यानत' तेरा करमनि घेरा, लेहु छुड़ाय गुसाइंर् ।।तू ही.।।३ ।।
तेरी भगति बिना धिक है जीवना
जैसे बेगारी दरजीको, पर घर कपड़ोंका सीवना।।तेरी. ।।१ ।।
मुकुट बिना अम्बर सब पहिरे, जैसे भोजनमें घीव ना।।तेरी.।।२ ।।
`द्यानत' भूप बिना सब सेना, जैसे मंदिरकी नींव ना ।।तेरी.।।३ ।।
मानुष जनम सफल भयो आज
सीस सफल भयो ईश नमत ही, श्रवन सफल जिनवचन समाज।।मानुष. ।।
भाल सफल जु दयाल तिलकतैं, नैन सफल देखे जिनराज ।
जीभ सफल जिनवानि गानतैं, हाथ सफल करि पूजन आज ।।मानुष. ।।१ ।।
पाँय सफल जिन भौन गौनतैं, काय सफल नाचैं बल गाज ।
वित्त सफल जो प्रभुकौं लागै, चित्त सफल प्रभु ध्यान इलाज ।।मानुष. ।।२ ।।
चिन्तामणि चिंतित-वर-दाइंर्, कलपवृक्ष कलपनतैं काज ।
देत अचिंत अकल्प महासुख, `द्यानत' भक्ति गरीबनिबाज ।।मानुष. ।।३ ।।
मैं नूं भावैजी प्रभु चेतना, मैं नूं भावै जी
गुण रतनत्रय आदि विराजै, निज गुण काहू देत ना।।मैं नूं. ।।१ ।।
सिद्ध विशुद्ध सदा अविनाशी, परगुण कबहूं लेत ना।।मैं नूं.।।२ ।।
`द्यानत' जो ध्याऊं सो पाऊं, पुद्गलसों कछु हेत ना ।।मैं नूं.।।३ ।।
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