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कविवर श्री दौलतरामजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Daulatramji ke Bhajan -5

अरे जिया, जग धोखे की टाटी

झूठा उद्यम लोक करत है, जिसमें निशदिन घाटी ।।टेक. ।।
जान बूझके अन्ध बने हैं, आंखन बांधी पाटी ।।१ ।।अरे. ।।
निकल जायेंगे प्राण छिनकमें, पड़ी रहैगी माटी ।।२ ।।अरे. ।।
`दौलतराम' समझ मन अपने, दिल की खोल कपाटी ।।३ ।।अरे. ।।

हम तो कबहूँ न हित उपजाये

सुकुल-सुदेव-सुगुरु सुसंग हित, कारन पाय गमाये! ।।हम तो. ।।
ज्यों शिशु नाचत, आप न माचत, लखनहारा बौराये ।
त्यों श्रुत वांचत आप न राचत, औरनको समुझाये।।१ ।।हम तो. ।।
सुजस-लाहकी चाह न तज निज, प्रभुता लखि हरखाये ।
विषय तजे न रजे निज पदमें, परपद अपद लुभाये।।२ ।।हम तो. ।।
पापत्याग जिन-जाप न कीन्हौं, सुमनचाप-तप ताये ।
चेतन तनको कहत भिन्न पर, देह सनेही थाये।।३ ।।हम तो. ।।
यह चिर भूल भई हमरी अब कहा होत पछताये ।
`दौल' अजौं भवभोग रचौ मत, यौं गुरु वचन सुनाये।।४ ।।हम तो. ।।

हम तो कबहुँ न निजगुन भाये

तन निज मान जान तनदुखसुख में बिलखे हरखाये ।।हम तो. ।।
तनको गरन मरन लखि तनको, धरन मान हम जाये ।
या भ्रम भौंर परे भवजल चिर, चहुँगति विपत लहाये।।१ ।।हम तो. ।।
दरशबोधव्रतसुधा न चाख्यौ, विविध विषय-विष खाये ।
सुगुरु दयाल सीख दइ पुनि पुनि, सुनि, सुनि उर नहि लाये।।२ ।।हम तो. ।।
बहिरातमता तजी न अन्तर-दृष्टि न ह्वै निज ध्याये ।
धाम-काम-धन-रामाकी नित, आश-हुताश जलाये।।३ ।।हम तो. ।।
अचल अनूप शुद्ध चिद्रूपी, सब सुखमय मुनि गाये ।
`दौल' चिदानंद स्वगुन मगन जे, ते जिय सुखिया थाये।।४ ।।हम तो. ।।

हम तो कबहुँ न निज घर आये

परघर फिरत बहुत दिन बीते, नाम अनेक धराये ।।हम तो. ।।
परपद निजपद मानि मगन ह्वै, परपरनति लपटाये ।
शुद्ध बुद्ध सुख कन्द मनोहर, चेतन भाव न भाये।।१ ।।हम तो. ।।
नर पशु देव नरक निज जान्यो, परजय बुद्धि लहाये ।
अमल अखण्ड अतुल अविनाशी, आतमगुन नहिं गाये।।२ ।।हम तो. ।।
यह बहु भूल भई हमरी फिर, कहा काज पछताये ।
`दौल' तजौ अजहूँ विषयनको, सतगुरु वचन सुनाये।।३ ।।हम तो. ।।

हे हितवांछक प्रानी रे

हे हितवांछक प्रानी रे, कर यह रीति सयानी ।।टेक ।।
श्रीजिनचरन चितार धार गुन, परम विराग विज्ञानी ।।
हरन भयामय स्वपर दयामय, सरधौ वृष सुखदानी ।
दुविध उपाधि बाध शिवसाधक, सुगुरु भजौ गुणथानी ।।१ ।।
मोह-तिमिर-हर मिहर भजो श्रुत, स्यात्पद जास निशानी ।
सप्ततत्त्व नव अर्थ विचारह, जो वरनै जिनवानी ।।२ ।।
निज पर भिन्न पिछान मान पुनि, होहु आप सरधानी ।
जो इनको विशेष जानन सो, ज्ञायकता मुनि मानी ।।३ ।।
फिर व्रत समिति गुपति सजि अरु तजि, प्रवृति शुभास्रवदानी ।
शुद्ध स्वरूपाचरन लीन ह्वै, `दौल' वरौ शिवरानी ।।४ ।।

विषयोंदा मद भानै, ऐसा है कोई वे

विषयोंदा मद भानै, ऐसा है कोई वे ।।टेक ।।
विषय दु:ख अर दुखफल तिनको, यौं नित चित्त में ठानै ।।१ ।।
अनुपयोग उपयोग स्वरूपी, तन चेतनको मानै ।।२ ।।
वरनादिक रागादि भावतैं, भिन्न रूप तिन जानैं ।।३ ।।
स्वपर जान रुषराग हान, निजमें निज परनति सानै ।।४ ।।
अन्तर बाहर को परिग्रह तजि, `दौल' वसै शिवथानै ।।५ ।।

कुमति कुनारि नहीं है भली रे

कुमति कुनारि नहीं है भली रे, सुमति नारि सुन्दर गुनवाली ।।टेक ।।
वासौं विरचि रचौ नित यासौं, जो पावो शिवधाम गली रे ।
वह कुबजा दुखदा, यह राधा, बाधा टारन करन रली रे ।।१ ।।
वह कारी परसौं रति ठानत, मानत नाहिं न सीख भली रे ।
यह गोरी चिदगुण सहचारिनि, रमत सदा स्वसमाधि-थली रे ।।२ ।।
वा संग कुथल कुयोनि वस्यौ नित, तहाँ महादुखबेल फली रे ।
या संग रसिक भविनकी निजमें, परिनति `दौल' भई न चली रे ।।३ ।।

घड़ि-घड़ि पल-पल छिन-छिन निशदिन

घड़ि-घड़ि पल-पल छिन-छिन निशदिन, प्रभुजी का सुमिरन करले रे ।।
प्रभु सुमिरेतैं पाप कटत हैं, जनम मरन दुख हरले रे ।।१ ।।घड़ि ।।
मनवचकाय लगाय चरन चित, ज्ञान हिये विच धर ले रे ।।२ ।।घड़ि ।।
`दौलतराम' धर्मनौका चढ़ि, भवसागर तैं तिर ले रे ।।३ ।।घड़ि ।।

जम आन अचानक दावैगा

जम आन अचानक दावैगा ।।टेक ।।
छिनछिन कटत घटत थित ज्यौं जल, अंजुलिको झर जावैगा ।
जन्म तालतरूतैं पर जियफल, कोंलग बीच रहावैगा ।
क्यौं न विचार करै नर आखिर, मरन महीमें आवैगा ।।१ ।।
सोवत मृत जागत जीवत ही, श्वासा जो थिर थावैगा ।
जैसैं कोऊ छिपै सदासौं, कबहूँ अवशि पलावैगा ।।२ ।।
कहूँ कबहूँ कैसें हू कोऊ, अंतक से न बचावैगा ।
सम्यकज्ञान पियूष पिये सौं, `दौल' अमरपद पावैगा ।।३ ।।

तू काहेको करत रति तनमें

तू काहे को करत रति तनमें, यह अहितमूल जिम कारासदन ।।टेक ।।
चरमपिहित पलरुधिरलिप्त मल, - द्वार स्रवै छिन छिन में ।।१ ।।
आयु-निगड फँसि विपति भरै, सो क्यों न चितारत मनमें ।।२ ।।
सुचरन लाग त्याग अब याको, जो न भ्रमै भववन में ।।३ ।।
`दौल' देहसों नेह देहको, - हेतु कह्यौ ग्रन्थनमें ।।४ ।।

निपट अयाना, तैं आपा नहीं जाना

निपट अयाना, तैं आपा नहीं जाना, नाहक भरम भुलाना बे ।।टेक ।।
पीय अनादि मोहमद मोह्यो, परपदमें निज माना बे ।।
चेतन चिह्न भिन्न जड़तासों ज्ञानदरश रस-साना बे ।
तनमें छिप्यो लिप्यो न तदपि ज्यों, जलमें कजदल माना बे ।।२ ।।
सकलभाव निज निज परनतिमय, कोई न होय बिराना बे ।
तू दुखिया परकृत्य मानि ज्यौं, नभताड़न-श्रम ठाना बे ।।३ ।।
अजगनमें हरि भूल अपनपो, भयो दीन हैराना बे ।
`दौल' सुगुरु धुनि सुनि निजमें निज, पाय लह्यो सुखथाना बे ।।४ ।।

निजहितकारज करना भाई!

निजहित कारज करना भाई! निजहित कारज करना ।।टेक. ।।
जनममरन दुख पावत जातैं, सो विधिबंध कतरना ।
ज्ञानदरस अर राग फरस रस, निजपर चिह्न भ्रमरना ।
संधिभेद बुधिछैनीतैं कर, निज गहि पर परिहरना।।१ ।।निज. ।।
परिग्रही अपराधी शंकै, त्यागी अभय विचरना ।
त्यौं परचाह बंध दुखदायक, त्यागत सबसुख भरना।।२ ।।निज. ।।
जो भवभ्रमन न चाहे तो अब, सुगुरुसीख उर धरना ।
`दौलत' स्वरस सुधारस चाखो, ज्यौं विनसै भवभरना।।३ ।।निज. ।।

मनवचतन करि शुद्ध भजो जिन

मनवचतन करि शुद्ध भजो जिन, दाव भला पाया ।
अवसर मिलै नहिं ऐसा, यौ सतगुरु गाया ।।
बस्यो अनादिनिगोद निकसि फिर, थावर देह धरी ।
काल असंख्य अकाज गमायो, नेक न समुझि परी ।।१ ।।
चिंतामनि दुर्लभ लहिये ज्यौं, त्रस परजाय लही ।
लट पिपिल अलि आदि जन्ममें, लह्यो न ज्ञान कहीं ।।२ ।।
पंचेन्द्रिय पशु भयो कष्टतैं, तहाँ न बोध लह्यो ।
स्वपर विवेकरहित बिन संयम, निशदिन भार वह्यो ।।३ ।।
चौपथ चलत रतन लहिये ज्यौं, मनुजदेह पाई ।
सुकुल जैनवृष सतसंगति यह, अतिदुर्लभ भाई ।।४ ।।
यौं दुर्लभ नरदेह कुधी जे, विषयन संग खोवैं ।
ते नर मूढ अजान सुधारस, पाय पाँव धोवैं ।।५ ।।
दुर्लभ नरभव पाय सुधी जे, जैन धर्म सेवैं ।
`दौलत' ते अनंत अविनाशी, सुख शिवका वेवैं ।।६ ।।

मोहिड़ा रे जिय!

मोहिड़ा रे जिय! हितकारी न सीख सम्हारै ।
भववन भ्रमत दुखी लखि याको, सुगुरुदयालु उचारै ।।मोहिड़ा. ।।
विषय भुजंगमय संग न छोड़त, जो अनन्तभव मारै ।
ज्ञान विराग पियूष न पीवत, जो भवव्याधि विडारै।।१ ।।मोहिड़ा. ।।
जाके संग दुरैं अपने गुन, शिवपद अन्तर पारै ।
ता तनको अपनाय आप चिन-मूरतको न निहारै।।२ ।।मोहिड़ा. ।।
सुत दारा धन काज साज अघ, आपन काज विगारै ।
करत आपको अहित आपकर, ले कृपान जल दारै।।३ ।।मोहिड़ा. ।।
सही निगोद नरककी वेदन, वे दिन नाहिं चितारै ।
`दौल' गई सो गई अबहू नर, धर दृग-चरन सम्हारै।।४ ।।मोहिड़ा. ।।

सौ सौ बार हटक नहिं मानी

सौ सौ बार हटक नहिं मानी, नेक तोहि समझायो रे ।।टेक. ।।
देख सुगुरुकी परहित में रति, हित उपदेश सुनायो रे ।।
विषयभुजंगसेय दुखपायो, फुनि तिनसों लपटायो रे ।
स्वपदविसार रच्यो परपदमें, मदरत ज्यों बोरायो रे ।।१ ।।
तन धन स्वजन नहीं है तेरे, नाहक नेह लगायो रे ।
क्यों न तजै भ्रम चाख समामृत, जो नित संतसुहायो रे ।।२ ।।
अब हू समझ कठिन यह नरभव, जिनवृष बिना गमायो रे ।
ते विलखैं मणिडार उदधिमें, `दौलत' को पछतायो रे ।।३ ।।

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