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कविवर श्री द्यानतरायजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Dyantarayji ke Bhajan -5

प्रभु! तुम नैनन-गोचर नाहीं

मो मन ध्यावै भगति बढ़ावै, रीझ न कछु मनमाहीं।।प्रभु. ।।१ ।।
जनम-जरा-मृत-रोग-वैद्य हो, कहा करैं कहां जाहीं।।प्रभु.।।२ ।।
`द्यानत' भव-दुख-आग-माहिंतैं, राख चरण-तरु-छाहीं ।।प्रभु.।।३ ।।

प्रभु तुम सुमरन ही में तारे

सूअर सिंह नौल वानरने, कहौ कौन व्रत धारे।।प्रभु. ।।
सांप जाप करि सुरपद पायो, स्वान श्याल भय जारे ।
भेक वोक गज अमर कहाये, दुरगति भाव विदारे ।।प्रभु. ।।१ ।।
भील चोर मातंग जु गनिका, बहुतनिके दुख टारे ।
चक्री भरत कहा तप कीनौ, लोकालोक निहारे ।।प्रभु. ।।२ ।।
उत्तम मध्यम भेद न कीन्हों, आये शरन उबारे ।
`द्यानत' राग दोष बिन स्वामी, पाये भाग हमारे ।।प्रभु. ।।३ ।।

प्रभु तेरी महिमा किहि मुख गावैं

गरभ छमास अगाउ कनक नग सुरपति नगर बनावैं।।प्रभु. ।।
क्षीर उदधि जल मेरु सिंहासन, मल मल इन्द्र न्हुलावैं ।
दीक्षा समय पालकी बैठो, इन्द्र कहार कहावैं ।।प्रभु. ।।१ ।।
समोसरन रिध ज्ञान महातम, किहिविधि सरब बतावैं ।
आपन जातबात कहा शिव, बात सुनैं भवि जावैं ।।प्रभु. ।।२ ।।
पंच कल्यानक थानक स्वामी, जे तुम मन वच ध्यावैं ।
`द्यानत' तिनकी कौन कथा है, हम देखैं सुख पावैं ।।प्रभु. ।।३ ।।

रे मन! भज भज दीनदयाल

जाके नाम लेत इक छिनमैं, कटैं कोट अघजाल।।रे मन. ।।
परमब्रह्म परमेश्वर स्वामी, देखैं होत निहाल ।
सुमरन करत परम सुख पावत, सेवत भाजै काल ।।रे मन. ।।१ ।।
इंद फनिंद चक्कधर गावैं, जाको नाम रसाल ।
जाको नाम ज्ञान परगासै, नाशै मिथ्याजाल ।।रे मन. ।।२ ।।
जाके नाम समान नहीं कछु, ऊरध मध्य पताल ।
सोई नाम जपो नित `द्यानत', छांडि विषय विकराल ।।रे मन. ।।३ ।।

वीतराग नाम सुमर, वीतराग नाम

भजन बिना किये यार, होगा बदनाम।।वीतराग. ।।
जाको करै धूमधाम, सो तो धूमधाम ।
पातशाह होय चुके, सर्यो कौन काम ।।वीतराग. ।।१ ।।
बातैं परवीन करै, काम करै खाम ।
काल सिंह आवत है, पकर एक ठाम ।।वीतराग. ।।२ ।।
आठ जाम लागि रह्यौ, चाम निरख दाम ।
`द्यानत' कबहूँ न भूल, साहिब अभिराम ।।वीतराग. ।।३ ।।

हम आये हैं जिनभूप! तेरे दरसन को

निकसे घर आरतिकूप, तुम पद परसनको।।हम. ।।१ ।।
वैननिसों सुगुन निरूप, चाहैं दरसनकों।।हम.।।२ ।।
`द्यानत' ध्यावै मन रूप, आनँद बरसन को ।।हम.।।३ ।।

अब समझ कही

कौन कौन आपद विषयनितैं, नरक निगोद सही।।अब. ।।१ ।।
एक एक इन्द्री दुखदानी, पांचौं दुखत नहीं।।हम.।।२ ।।
`द्यानत' संजम कारजकारी, धरौ तरौ सब ही ।।हम.।।३ ।।

आरसी देखत मन आर-सी लागी

सेत बाल यह दूत कालको, जोवन मृग जरा बाघिनि खागी।।आरसी. ।।१ ।।
चक्री भरत भावना भाई, चौदह रतन नवों निधि त्यागी।।आरसी.।।२ ।।
`द्यानत' दीक्षा लेत महूरत, केवलज्ञान कला घट जागी ।।आरसी.।।३ ।।

काहेको सोचत अति भारी, रे मन!

पूरब करमनकी थित बाँधी, सो तो टरत न टारी।।काहे. ।।
सब दरवनिकी तीन कालकी, विधि न्यारीकी न्यारी ।
केवलज्ञानविषैं प्रतिभासी, सो सो ह्वै है सारी ।।काहे. ।।१ ।।
सोच किये बहु बंध बढ़त है, उपजत है दुख ख्वारी ।
चिंता चिता समान बखानी, बुद्धि करत है कारी ।।काहे. ।।२ ।।
रोग सोग उपजत चिंतातैं, कहौ कौन गुनवारी ।
`द्यानत' अनुभव करि शिव पहुँचे, जिन चिंता सब जारी ।।काहे. ।।३ ।।

कौन काम अब मैंने कीनों, लीनों सुर अवतार हो

गृह तजि गहे महाव्रत शिवहित, विफल फल्यो आचार हो।।कौन. ।।१ ।।
संयम शील ध्यान तप क्षय भयो, अव्रत विषय दुखकार हो।।कौन.।।२ ।।
`द्यानत' कब यह थिति पूरी ह्वै, लहों मुकतपद सार हो ।।कौन.।।३ ।।

गलतानमता कब आवैगा

राग-दोष परणति मिट जै है, तब जियरा सुख पावैगा।।गलता. ।।
मैं ही ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय मैं, तीनों भेद मिटावैगा ।
करता किरिया करम भेद मिटि, एक दरव लौं लावैगा ।।गलता. ।।१ ।।
निहचैं अमल मलिन व्योहारी, दोनों पक्ष नसावैगा ।
भेद गुण गुणीको नहिं ह्वै है, गुरु शिख कौन कहावैगा ।।गलता. ।।२ ।।
`द्यानत' साधक साधि एक करि, दुविधा दूर बहावैगा ।
वचनभेद कहवत सब मिटकै, ज्यों का त्यों ठहरावैगा ।।गलता. ।।३ ।।

चाहत है सुख पै न गाहत है धर्म जीव

सुखको दिवैया हित भैया नाहिं छतियाँ।।चाहत. ।।
दुखतैं डरै है पै भरै है अघसेती घट,
दुखको करैया भय दैया दिन रतियाँ ।।चाहत. ।।१ ।।
बोयो है बँबूल मूल खायो चाहै अंब भूल,
दाह ज्वर नासनिको सोवै सेज ततियां ।।चाहत. ।।२ ।।
`द्यानत' है सुख राई दुख मेरुकी कमाई,
देखो राई चेतनकी चतुराई बतियां ।।चाहत. ।।३ ।।

जीव! तैं मूढ़पना कित पायो

सब जग स्वारथको चाहत है, स्वारथ तोहि न भायो।।जीव. ।।
अशुचि अचेत दुष्ट तनमांही, कहा जान विरमायो ।
परम अतिन्द्री निजसुख हरिकै, विषय रोग लपटायो ।।जीव. ।।१ ।।
चेतन नाम भयो जड़ काहे, अपनो नाम गमायो ।
तीन लोकको राज छांडिके, भीख मांग न लजायो ।।जीव. ।।२ ।।
मूढ़पना मिथ्या जब छूटै, तब तू संत कहायो ।
`द्यानत' सुख अनन्त शिव विलसो, यों सद्गुरु बतलायो ।।जीव. ।।३ ।।

झूठा सपना यह संसार

दीसत है विनसत नहिं बार ।।झूठा. ।।
मेरा घर सवतैं सिरदार, रह न सके पल एक मँझार।।झूठा. ।।१ ।।
मेरे धन सम्पति अति सार, छांडि चलै लागै न अबार।।झूठा.।।२ ।।
इन्द्री विषै विषैफल धार, मीठे लगैं अन्त खयकार ।।झूठा. ।।३ ।।
मेरो देह काम उनहार, सो तन भयो छिनक में छार ।।झूठा. ।।४ ।।
जननी तात भ्रात सुत नार, स्वारथ बिना करत हैं ख्वार ।।झूठा. ।।५ ।।
भाई शत्रु होंहिं अनिवार, शत्रु भये भाई बहु प्यार ।।झूठा. ।।६ ।।
`द्यानत' सुमरन भजन अधार, आग लगैं कछु लेहु निकार ।।झूठा.।।७ ।।

त्यागो त्यागो मिथ्यातम, दूजो नहीं जाकी सम

तोह दुख दाता तिहूँ, लोक तिहूँ काल ।।त्यागो. ।।
चेतन अमलरूप, तीन लोक ताको भूप,
सो तो डार्यो भवकूप, दे नहिं निकाल ।।त्यागो. ।।१ ।।
एकसौ चालीस आठ, प्रकृतिमें यह गाँठ,
जाके त्यागैं पावै शिव, गहैं भव जाल ।।त्यागो. ।।२ ।।
`द्यानत' यही जतन, सुनो तुम भविजन,
भजो जिनराज तातैं, भाज जै है हाल ।।त्यागो. ।।३ ।।

तू तो समझ समझ रे!

निशिदिन विषय भोग लपटाना, धरम वचन न सुहाई ।।तू तो. ।।
कर मनका लै आसन माड्यो, वाहिज लोक रिझाई ।
कहा भयो बक-ध्यान धरेतैं, जो मन थिर न रहाई ।।तू तो. ।।१ ।।
मास मास उपवास किये तैं, काया बहुत सुखाई ।
क्रोध मान छल लोभ न जीत्या, कारज कौन सराई ।।तू तो. ।।२ ।।
मन वच काय जोग थिर करकैं, त्यागो विषयकषाई ।
`द्यानत' सुरग मोख सुखदाई, सद्गुरु सीख बताई ।।तू तो. ।।३ ।।

तेरो संजम बिन रे, नरभव निरफल जाय

बरष मास दिन पहर महूरत, कीजे मन वच काय।।तेरो. ।।१ ।।
सुरग नरक पशु गतिमें नाहीं, कर आलस छिटकाय।।तेरो.।।२ ।।
`द्यानत' जा बिन कबहुँ न सीझैं, राजबिषैं जिनराय।।तेरो.।।३ ।।

दियैं दान महा सुख पावै

कूप नीर सम घर धन जानौं, कढ़ैं बढ़ैं अकढ़ैं सड़ जावै।।१ ।।
मिथ्याती पशु दानभावफल, भोग-भूमि सुरवास बसावै।।२ ।।
`द्यानत' गास अरध चौथाई, मन-वांछित विधि कब बनि आवै।।३ ।।

दुरगति गमन निवारिये, घर आव सयाने नाह हो

पर घर फिरत बहुत दिन बीते, सहित विविध दुखदाह हो।।१ ।।
निकसि निगोद पहुँचवो शिवपुर, बीच बसैं क्या लाह हो।।२ ।।
`द्यानत' रतनत्रय मारग चल, जिहिं मग चलत हैं साह हो।।३ ।।

धिक! धिक! जीवन समकित बिना

दान शील तप व्रत श्रुतपूजा, आतम हेत न एक गिना ।।धिक. ।।
ज्यों बिनु कन्त कामिनी शोभा, अंबुज बिनु सरवर ज्यों सुना ।
जैसे बिना एकड़े बिन्दी, त्यों समकित बिन सरब गुना ।।धिक. ।।१ ।।
जैसे भूप बिना सब सेना, नीव बिना मन्दिर चुनना ।
जैसे चन्द बिहूनी रजनी, इन्हैं आदि जानो निपुना ।।धिक. ।।२ ।।
देव जिनेन्द्र, साधु गुरू, करुना, धर्मराग व्योहार भना ।
निहचै देव धरम गुरु आतम, `द्यानत' गहि मन वचन तना ।।धिक. ।।३ ।।

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