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कविवर श्री बुधजनजी के भजन लिरिक्स : Kavivar Shri Budhjanji ke Bhajan

और ठौर क्यों हेरत प्यारा, तेरे हि घट में जानन हारा

(राग तिताला)
और ठौर क्यों हेरत प्यारा, तेरे हि घटमें जाननहारा ।।और. ।।टेक ।।
चलन हलन थल वास एकता, जात्यान्तरतैं न्यारा न्यारा ।।१ ।।और. ।।
मोह उदय रागी द्वेषी ह्वै, क्रोधादिक का सरजनहारा ।
भ्रमत फिरत चारौं गति भीतर, जनम मरन भोगत-दुख भारा ।।२ ।।और. ।।
गुरु उपदेश लखै पद आपा, तबहिं विभाव करै परिहारा ।
ह्वै एकाकी बुधजन निश्चल, पावै शिवपुर सुखद अपारा ।।३ ।।और. ।।

काल अचानक ही ले जायगा

(राग तिताला)
काल अचानक ही ले जायगा,
गाफिल होकर रहना क्या रे ।।काल. ।।टेक ।।
छिन हूँ तोकूं नाहिं बचावै, तौ सुभटनका रखना क्या रे ।।१ ।।काल. ।।
रंच स्वाद करिनके काजै, नरकनमें दुख भरना क्या रे ।
कुलजन पथिकनि के हितकाजै, जगत जाल में परना क्या रे ।।२ ।।काल. ।।
इंद्रादिक कोउ नाहिं बचैया, और लोकका शरना क्या रे ।
निश्चय हुआ जगतमें मरना, कष्ट परै तब डरना क्या रे ।।३ ।।काल. ।।
अपना ध्यान करत खिर जावै, तौ करमनिका हरना क्या रे ।
अब हित करि आरत तजि बुधजन, जन्म जन्ममें जरना क्या रे ।।४ ।।काल. ।।

तन देख्या अथिर घिनावना

(राग सारंग)
तन देख्या अथिर घिनावना ।।तन. ।।टेक ।।
बाहर चाम चमक दिखलावै, माहीं मैल अपावना ।
बालक जवान बुढ़ापा मरना, रोगशोक उपजावना ।।१ ।।तन. ।।
अलख अमूरति नित्य निरंजन, एकरूप निज जानना ।
वरन फरस रस गंध न जाकै, पुन्य पाप विन मानना ।।२ ।।तन. ।।
करि विवेक उर धारि परीक्षा, भेद-विज्ञान विचारना ।
`बुधजन' तनतैं ममत मेटना, चिदानंद पद धारना ।।३ ।।तन. ।।

तेरो करि लै काज वक्त फिरना

(राग सारंग लूहरी)
तेरो करि लै काज बक्त फिरना ।।तेरी. ।।टेक ।।
नरभव तेरे वश चालत है, फिर परभव परवश परना ।।१ ।।तेरो. ।।
आन अचानक कंठ दबैंगे, तब तोकौं नाही शरना ।
यातैं विलम न ल्याय बावरै, अब ही कर जो है करना ।।२ ।।तेरो. ।।
सब जीवनकी दया धार उर, दान सुपात्रनि कर धरना ।
जिनवर पूजि शास्त्र सुनि नित प्रति, बुधजन संवर आचरना ।।३ ।।तेरो. ।।

भजन बिन यौं ही जनम गमायो

(राग सारंग पूरबी)
भजन बिन यौं ही जनम गमायो ।।भजन. ।।टेक ।।
पानी पहिल्यां पाल न बांधी, फिर पीछैं पछतायो ।।१ ।।भजन. ।।
रामा-मोह भये दिन खोवत, आशा पाश बंधायो ।
जप तप संजम दान न दीनौं, मानुष जनम हरायो ।।२ ।।भजन. ।।
देह शीश जब कांपन लागी, दसन चला चल थायो ।
लागी आगि भुजावन कारन, चाहत कूप खुदायो ।।३ ।।भजन. ।।
काल अनादि गुमायो भ्रमतां, कबहुँ न थिर चित ल्यायो ।
हरी विषय सुख भरम भुलानो, मृग तिसना-वश धायो ।।४ ।।भजन. ।।

अरे हाँ रे तैं तो सुधरी बहुत बिगारी

(राग गौड़ी ताल)
अरे हाँ रे तैं तो सुधरी बहुत बिगारी ।।अरे. ।।टेक ।।
ये गति मुक्ति महलकी पौरी, पाय रहत क्यौं पिछारी ।।१ ।।अरे. ।।
परकौं जानि मानि अपनो पद, तजि ममता दुखकारी ।
श्रावक कुल भवदधि तट आयो, बूड़त क्यौंरे अनारी ।।२ ।।अरे. ।।
अबहूँ चेत गयो कुछ नाहीं, राखि आपनी बारी ।
शक्ति समान त्याग तप करिये, तब बुधजन सिरदारी ।।३ ।।अरे. ।।

मैंने देखा आतमराम

(राग काफी कनड़ी)
मैंने देखा आतमरामा ।।मैंने. ।।टेक ।।
रूप फरस रस गंधतैं न्यारा, दरस-ज्ञान-गुनधामा ।
नित्य निरंजन जाकै नाहीं, क्रोध लोभ मद कामा ।।१ ।।मैंने. ।।
भूख प्यास सुख दुख नहिं जाकै, नाहिं बन पुर गामा ।
नहिं साहिब नहिं चाकर भाई, नहीं तात नहिं मामा ।।२ ।।मैंने. ।।
भूलि अनादि थकी जग भटकत, लै पुद्गल का जामा ।
`बुधजन' संगति जिनगुरुकी तैं, मैं पाया मुझ ठामा ।।३ ।।मैंने. ।।

अब अघ करत लजाय रे भाई

(राग काफी कनड़ी - ताल पसतो)
अब अघ करत लजाय रे भाई ।।अब. ।।टेक ।।
श्रावक घर उत्तम कुल आयो, भैंटे श्री जिनराय ।।१ ।।अब. ।।
धन वनिता आभूषन परिग्रह, त्याग करौ दुखदाय ।
जो अपना तू तजि न सकै पर, सेयां नरकन जाय ।।२ ।।अब. ।।
विषय काज क्यौं जनम गुमावै, नरभव कब मिलि जाय ।
हस्ती चढ़ि इंर्धन ढोवे, बुधजन कौन वसाय ।।३ ।।अब. ।।

तोकौं सुख नहिं होगा लोभीड़ा!

(राग काफी कनड़ी)
तोकौं सुख नहिं होगा लोभीड़ा! क्यौं भूल्या रे परभावनमें ।।तोकौं. ।।टेक ।।
किसी भाँति कहूँका धन आवै, डोलत है इन दावनमें।।१ ।।तोकौं. ।।
ब्याह करूँ सुत जस जग गावै, लग्यौ रहे या भावनमें।।२ ।।तोकौं. ।।
दरव परिनमत अपनी गौंत तू क्यों रहत उपायनमें ।।३ ।।तोकौं. ।।
सुख तो है संतोष करनमें, नाहीं चाह बढ़ावनमें ।।४ ।।तोकौं. ।।
कै सुख है बुधजनकी संगति, कै सुख शिवपद पावनमें।।५ ।।तोकौं. ।।

नरभव पाय फेरि दुख भरना

(राग बिलावल धीमा तेतालो)
नरभव पाय फेरि दुख भरना, ऐसा काज न करना हो ।।नरभव. ।।टेक ।।
नाहक ममत ठानि पुद्गलसौं, करम जाल क्यौं परना हो ।।१ ।।नरभव. ।।
यह तो जड़ तू ज्ञान अरूपी, तिल तुष ज्यौं गुरु वरना हो ।
राग दोष तजि भजि समताकौं, कर्म साथके हरना हो ।।२ ।।नरभव. ।।
यो भव पाय विषय-सुख सेना, गज चढ़ि इंर्धन ढोना हो ।
`बुधजन' समुझि सेय जिनवर पद, ज्यौं भवसागर तरना हो ।।३ ।।नरभव. ।।

आगै कहा करसी भैया

(राग आसावरी जलद तेतालो)
आगैं कहा करसी भैया, आजासी जब काल रे ।।आगैं. ।।टेक ।।
यहां तौ तैनैं पोल मचाई, वहाँ तौ होय सम्हाल रे ।।१ ।।आगैं. ।।
झूठ कपट करि जीव सताये, हर्या पराया माल रे ।
सम्पति सेती धाप्या नाहीं, तकी विरानी बाल रे ।।२ ।।आगैं. ।।
सदा भोग में मगन रह्या तू, लख्या नहीं निज हाल रे ।
सुमरन दान किया नहिं भाई, हो जासी पैमाल रे ।।३ ।।आगैं. ।।
जोवन में जुवती संग भूल्या, भूल्या जब था बाल रे ।
अब हुँ धारो बुधजन समता, सदा रहहु खुश हाल रे ।।४ ।।आगैं. ।।

बाबा मैं न काहूका

बाबा! मैं न काहूका, कोई नहीं मेरा रे ।।बाबा. ।।टेक ।।
सुर नर नारक तिरयक गति मैं, मोकों करमन घेरा रे ।।१ ।।बाबा. ।।
मात पिता सुत तिय कुल परिजन, मोह गहल उरझेरा रे ।
तन धन बसन भवन जड़ न्यारे, हूँ चिन्मूरत न्यारा रे ।।२ ।।बाबा. ।।
मुझ विभाव जड़ कर्म रचत हैं, करमन हमको फेरा रे ।
विभाव चक्र तजि धारि सुभावा अब आनन्दघन हेरा रे ।।३ ।।बाबा. ।।
खरच खेद नहीं अनुभव करते, निरखि चिदानन्द तेरा रे ।
जप तप व्रत श्रुत सार यही है, बुधजन कर न अबेरा रे ।।४ ।।बाबा. ।।

धर्म बिन कोई नहीं अपना

सब सम्पत्ति धन थिर नहिं जगमें, जिसा रैन सपना ।।धर्म. ।।टेक ।।
आगैं किया सो पाया भाई, याही है निरना ।
अब जो करैगा सो पावैगा, तातैं धर्म करना ।।१ ।।धर्म. ।।
ऐसै सब संसार कहत है, धर्म कियैं तिरना ।
परपीड़ा बिसनादिक सेवैं, नरकविषैं परना ।।२ ।।धर्म. ।।
नृपके घर सारी सामग्री, ताकैं ज्वर तपना ।
अरु दारिद्रीकैं हू ज्वर है, पाप उदय थपना ।।३ ।।धर्म. ।।
नाती तो स्वारथ के साथी, तोहि विपत भरना ।
वन गिरि सरिता अगनि युद्धमैं, धर्महिका सरना ।।४ ।।धर्म. ।।
चित बुधजन सन्तोष धारना, पर चिन्ता हरना ।
विपति पड़ै तो समता रखना, परमातम जपना ।।५ ।।धर्म. ।।

निजपुर में आज मची होरी

निजपुर में आज मची होरी ।।निज. ।।टेक ।।
उमँगि चिदानँदजी इत आये, उत आई सुमतीगोरी ।।१ ।।निज. ।।
लोकलाज कुलकानि गमाई, ज्ञान गुलाल भरी झोरी ।।२ ।।निज. ।।
समकित केसर रंग बनायो । चारित की पिचुकी छोरी ।।३ ।।निज. ।।
गावत अजपा गान मनोहर, अनहद झरसौं बरस्यो री ।।४ ।।निज. ।।
देखन आये बुधजन भीगे, निरख्यौ ख्याल अनोखो री ।।५ ।।निज. ।।

मेरा साँई तौ मोमैं नाहीं न्यारा

(राग-खंमाच)
मेरा सांई तौ मोमैं नाहीं न्यारा, जानैं सो जाननहारा ।।मेरा. ।।टेक ।।
पहले खेद सह्यौ बिन जानैं । अब सुख अपरम्पारा ।।१ ।।मेरा. ।।
अनंत-चतुष्टय-धारक ज्ञायक, गुन परजै द्रव सारा ।
जैसा राजत गंधकुटीमें, तैसा मुझमें म्हारा ।।२ ।।मेरा. ।।
हित अनहित मम पर विकलपतैं, करम बंध भये भारा ।
ताहि उदय गति गति सुख दुखमैं, भाव किये दु:खकारा ।।३ ।।मेरा. ।।
काल लब्धि जिन आगम सेती, संशयभरम विदारा ।
बुधजन जान करावन करता, हौं ही एक हमारा ।।४ ।।मेरा. ।।

उत्तम नरभव पायकै

(राग-कनड़ी)
उत्तम नरभव पायकै, मति भूलै रे रामा ।।मति भू. ।।टेक ।।
कीट पशूका तन जब पाया, तब तू रह्या निकामा ।
अब नरदेही पाय सयाने, क्यौं न भजै प्रभुनामा ।।१ ।।मति भू. ।।
सुरपति याकी चाह करत उर, कब पाऊँ नरजामा ।
ऐसा रतन पायकैं भाई, क्यौं खोवत विनकामा ।।२ ।।मति भू. ।।
धन जोबन तन सुन्दर पाया, मगन भया लखि भामा ।
काल अचानक झटक खायगा, परे रहैंगे ठामा ।।३ ।।मति भू. ।।
अपने स्वामीके पदपंकज, करो हिये बिसरामा ।
मैंटि कपट भ्रम अपना बुधजन, ज्यौं पावौ शिवधामा ।।४ ।।मति भू. ।।

जिनबानी के सुनैसौं मिथ्यात मिटै

मिथ्यात मिटै समकित प्रगटै ।।जिनबानी. ।।टेक ।।
जैसैं प्रात होत रवि ऊगत, रैन तिमिर सब तुरत फटै ।।१ ।।जिनबानी. ।।
अनादि कालकी भूलि मिटावै, अपनी निधि घट घटमैं उघटे ।
त्याग विभाव सुभाव सुधारै, अनुभव करतां करम कटै ।।२ ।।जिनबानी. ।।
और काम तजि सेवो याकौं, या बिन नाहिं अज्ञान घटै ।
बुधजन याभव परभव मांहीं, बाकी हुंडी तुरत पटे ।।३ ।।जिनबानी. ।।

मति भोगन राचौ जी

(राग-सोरठ)
मति भोगन राचौ जी, भव भव मैं दुख देत घना ।।मति. ।।टेक ।।
इनके कारन गति गति मांहीं नाहक नाचौ जी ।
झूठे सुखके काज धरममैं पाड़ौ खाँचौजी ।।१ ।।मति. ।।
पूरवकर्म उदय सुख आयां, राजौ माचौ जी ।
पाप उदय पीड़ा भोगनमैं, क्यौं मन काचौ जी ।।२ ।।मति. ।।
सुख अनन्तके धारक तुम ही, पर क्यौं जांचौं जी ।
बुधजन गुरुका वचन हिया में, जानौ सांचौ जी ।।३ ।।मति. ।।

सम्यग्ज्ञान बिना, तेरो जनम अकारथ जाय

सम्यग्ज्ञान बिना, तेरो जनम अकारथ जाय ।।सम्यग्ज्ञान. ।।टेक ।।
अपने सुखमैं मगन रहत नहिं परकी लेत बलाय ।
सीख सुगुरु की एक न मानें भव भवमैं दुख पाय ।।१ ।।सम्य. ।।
ज्यौं कपि आप काठ लीलाकरि, प्रान तजै बिललाय ।
ज्यौं निज मुखकरि जाल मकरिया, आप मरै उलझाय ।।२ ।।सम्य. ।।
कठिन कमायो सब धन ज्वारी, छिनमैं देत गमाय ।
जैसे रतन पायके भोंदू, विलखे आप गमाय ।।३ ।।सम्य. ।।
देव शास्त्र गुरुको निहचैकरि, मिथ्यामत मति ध्याय ।
सुरपति बाँछा राखत याकी, ऐसी नर परजाय ।।४ ।।सम्य. ।।

भोगारां लोभीड़ा, नरभव खोयौ रे अज्ञान

(राग-सोरठ)
भोगांरा लोभीड़ा, नरभव खोयौ रे अजान ।।भोगांरा. ।।टेक ।।
धर्मकाजकौ कारन थौ यौ, सो भूल्यौ तू बान ।
हिंसा अनृत परतिय चोरी, सेवत निजकरि जान ।।१ ।।भोगांरा. ।।
इन्द्रीसुखमैं मगन हुवौ तू, परकौं आतम मान ।
बन्ध नवीन पड़ै छै यातैं, होवत मौटी हान ।।२ ।।भोगांरा. ।।
गया न कछु जो चेतौ बुधजन, पावौ अविचल थान ।
तन है जड़ तू दृष्टा ज्ञाता, कर लै यौं सरधान ।।३ ।।भोगांरा. ।।

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