आराम करो / गोपालप्रसाद व्यास
एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो
क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो"
हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।
आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है
आराम सुधा की एक बूँद, तन का दुबलापन खोती है
आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।
यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ, है मज़ा मूर्ख कहलाने में
जीवन-जागृति में क्या रक्खा, जो रक्खा है सो जाने में।
मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ
दीप जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ
मेरी गीता में लिखा हुआ, सच्चे योगी जो होते हैं
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।
अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।
मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।
श्रेणियाँ: कविताप्रसिद्ध रचना
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस / गोपालप्रसाद व्यास
है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।।
अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।
लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।।
यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर कहानी है।
जो रक्त कणों से लिखी गई,जिसकी जयहिन्द निशानी है।।
प्यारा सुभाष, नेता सुभाष, भारत भू का उजियारा था ।
पैदा होते ही गणिकों ने जिसका भविष्य लिख डाला था।।
यह वीर चक्रवर्ती होगा , या त्यागी होगा सन्यासी।
जिसके गौरव को याद रखेंगे, युग-युग तक भारतवासी।।
सो वही वीर नौकरशाही ने,पकड़ जेल में डाला था ।
पर क्रुद्ध केहरी कभी नहीं फंदे में टिकने वाला था।।
बाँधे जाते इंसान,कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।
काया ज़रूर बाँधी जाती,बाँधे न इरादे जाते हैं।।
वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था,जो मौका पाकर निकल गया।
वह पारा था अंग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल गया।।
जिस तरह धूर्त दुर्योधन से,बचकर यदुनन्दन आए थे।
जिस तरह शिवाजी ने मुग़लों के,पहरेदार छकाए थे ।।
बस उसी तरह यह तोड़ पींजरा , तोते-सा बेदाग़ गया।
जनवरी माह सन् इकतालिस,मच गया शोर वह भाग गया।।
वे कहाँ गए, वे कहाँ रहे,ये धूमिल अभी कहानी है।
हमने तो उसकी नयी कथा,आज़ाद फ़ौज से जानी है।।
श्रेणी: कविता
साली क्या है रसगुल्ला है / गोपालप्रसाद व्यास
तुम श्लील कहो, अश्लील कहो
चाहो तो खुलकर गाली दो !
तुम भले मुझे कवि मत मानो
मत वाह-वाह की ताली दो !
पर मैं तो अपने मालिक से
हर बार यही वर माँगूँगा-
तुम गोरी दो या काली दो
भगवान मुझे इक साली दो !
सीधी दो, नखरों वाली दो
साधारण या कि निराली दो,
चाहे बबूल की टहनी दो
चाहे चंपे की डाली दो।
पर मुझे जन्म देने वाले
यह माँग नहीं ठुकरा देना-
असली दो, चाहे जाली दो
भगवान मुझे एक साली दो।
वह यौवन भी क्या यौवन है
जिसमें मुख पर लाली न हुई,
अलकें घूँघरवाली न हुईं
आँखें रस की प्याली न हुईं।
वह जीवन भी क्या जीवन है
जिसमें मनुष्य जीजा न बना,
वह जीजा भी क्या जीजा है
जिसके छोटी साली न हुई।
तुम खा लो भले प्लेटों में
लेकिन थाली की और बात,
तुम रहो फेंकते भरे दाँव
लेकिन खाली की और बात।
तुम मटके पर मटके पी लो
लेकिन प्याली का और मजा,
पत्नी को हरदम रखो साथ,
लेकिन साली की और बात।
पत्नी केवल अर्द्धांगिन है
साली सर्वांगिण होती है,
पत्नी तो रोती ही रहती
साली बिखेरती मोती है।
साला भी गहरे में जाकर
अक्सर पतवार फेंक देता
साली जीजा जी की नैया
खेती है, नहीं डुबोती है।
विरहिन पत्नी को साली ही
पी का संदेश सुनाती है,
भोंदू पत्नी को साली ही
करना शिकार सिखलाती है।
दम्पति में अगर तनाव
रूस-अमरीका जैसा हो जाए,
तो साली ही नेहरू बनकर
भटकों को राह दिखाती है।
साली है पायल की छम-छम
साली है चम-चम तारा-सी,
साली है बुलबुल-सी चुलबुल
साली है चंचल पारा-सी ।
यदि इन उपमाओं से भी कुछ
पहचान नहीं हो पाए तो,
हर रोग दूर करने वाली
साली है अमृतधारा-सी।
मुल्ला को जैसे दुःख देती
बुर्के की चौड़ी जाली है,
पीने वालों को ज्यों अखरी
टेबिल की बोतल खाली है।
चाऊ को जैसे च्याँग नहीं
सपने में कभी सुहाता है,
ऐसे में खूँसट लोगों को
यह कविता साली वाली है।
साली तो रस की प्याली है
साली क्या है रसगुल्ला है,
साली तो मधुर मलाई-सी
अथवा रबड़ी का कुल्ला है।
पत्नी तो सख्त छुहारा है
हरदम सिकुड़ी ही रहती है
साली है फाँक संतरे की
जो कुछ है खुल्लमखुल्ला है।
साली चटनी पोदीने की
बातों की चाट जगाती है,
साली है दिल्ली का लड्डू
देखो तो भूख बढ़ाती है।
साली है मथुरा की खुरचन
रस में लिपटी ही आती है,
साली है आलू का पापड़
छूते ही शोर मचाती है।
कुछ पता तुम्हें है, हिटलर को
किसलिए अग्नि ने छार किया ?
या क्यों ब्रिटेन के लोगों ने
अपना प्रिय किंग उतार दिया ?
ये दोनों थे साली-विहीन
इसलिए लड़ाई हार गए,
वह मुल्क-ए-अदम सिधार गए
यह सात समुंदर पार गए।
किसलिए विनोबा गाँव-गाँव
यूँ मारे-मारे फिरते थे ?
दो-दो बज जाते थे लेकिन
नेहरू के पलक न गिरते थे।
ये दोनों थे साली-विहीन
वह बाबा बाल बढ़ा निकला,
चाचा भी कलम घिसा करता
अपने घर में बैठा इकला।
मुझको ही देखो साली बिन
जीवन ठाली-सा लगता है,
सालों का जीजा जी कहना
मुझको गाली सा लगता है।
यदि प्रभु के परम पराक्रम से
कोई साली पा जाता मैं,
तो भला हास्य-रस में लिखकर
पत्नी को गीत बनाता मैं?
श्रेणी: कविता
नमामि मातु भारती / गोपालप्रसाद व्यास
नमामि मातु भारती !
हिमाद्रि-तुंग, श्रींगिनी
त्रिरंग- अंश- रंगिनी
नमामि मातु भारती
सहस्र दीप आरती !
समुद्र- पाद- पल्लवे
विराट विश्व –वल्लभे
प्रबुद्ध बुद्ध की धरा
प्रणम्य हे वसुंधरा !
स्वराज्य – स्वावलंबिनी
सदैव सत्य – संगिनी
अजेय ,श्रेय - मंडिता
समाज-शास्त्र-पण्डिता !
अशोक -चक्र –संयुते
समुज्ज्वले समुन्नते
मनोग्य मुक्ति –मंत्रिणी
विशाल लोकतंत्रिनी !
अपार शस्य – सम्पदे
अजस्र श्री पड़े-पड़े
शुभन्करे - प्रियंवदे
दया - क्षमा वंशवदे !
मनस्विनी – तपस्विनी
रणस्थली – यशस्विनी
कराल- काल- कलिका
प्रचंड मुंड- मालिका .
अमोघ शक्ति – धारिणी
कुराज कष्ट – वारिणी
अदैन्य मंत्र – दायिका
नमामि राष्ट्र – नायिका !
श्रेणी: कविता
पत्नी को परमेश्वर मानो / गोपालप्रसाद व्यास
यदि ईश्वर में विश्वास न हो,
उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको! घर बैठे,
साकार ब्रह्म को पहचानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!
वे अन्नपूर्णा जग-जननी,
माया हैं, उनको अपनाओ।
वे शिवा, भवानी, चंडी हैं,
तुम भक्ति करो, कुछ भय खाओ।
सीखो पत्नी-पूजन पद्धति,
पत्नी-अर्चन, पत्नीचर्या
पत्नी-व्रत पालन करो और
पत्नीवत् शास्त्र पढ़े जाओ।
अब कृष्णचंद्र के दिन बीते,
राधा के दिन बढ़ती के हैं।
यह सदी बीसवीं है, भाई !
नारी के ग्रह चढ़ती के हैं।
तुम उनका छाता, कोट, बैग,
ले पीछे-पीछे चला करो,
संध्या को उनकी शय्या पर
नियमित मच्छरदानी तानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो।
तुम उनसे पहले उठा करो,
उठते ही चाय तयार करो।
उनके कमरे के कभी अचानक,
खोला नहीं किवाड़ करो।
उनकी पसंद के कार्य करो,
उनकी रुचियों को पहचानो,
तुम उनके प्यारे कुत्ते को,
बस चूमो-चाटो, प्यार करो।
तुम उनको नाविल पढ़ने दो
आओ कुछ घर का काम करो।
वे अगर इधर आ जाएं कहीं ,
तो कहो-प्रिये, आराम करो!
उनकी भौंहें सिगनल समझो,
वे चढ़ीं कहीं तो खैर नहीं,
तुम उन्हें नहीं डिस्टर्ब करो,
ए हटो, बजाने दो प्यानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!
तुम दफ्तर से आ गए, बैठिए!
उनको क्लब में जाने दो।
वे अगर देर से आती हैं,
तो मत शंका को आने दो।
तुम समझो वह हैं फूल,
कहीं मुरझा न जाएं घर में रहकर!
तुम उन्हें हवा खा आने दो,
तुम उन्हें रोशनी पाने दो,
तुम समझो 'ऐटीकेट' सदा,
उनके मित्रों से प्रेम करो।
वे कहाँ, किसलिए जाती हैं-
कुछ मत पूछो, ऐ 'शेम' करो !
यदि जग में सुख से जीना है,
कुछ रस की बूँदें पीना है,
तो ऐ विवाहितो, आँख मूँद,
मेरे कहने को सच मानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो।
मित्रों से जब वह बात करें,
बेहतर है तब मत सुना करो।
तुम दूर अकेले खड़े-खड़े,
बिजली के खंबे गिना करो।
तुम उनकी किसी सहेली को
मत देखो, कभी न बात करो।
उनके पीछे उनके दराज से
कभी नहीं उत्पात करो।
तुम समझ उन्हें स्टीम गैस,
अपने डिब्बे को जोड़ चलो।
जो छोटे स्टेशन आएं तुम,
उन सबको पीछे छोड़ चलो।
जो सँभल कदम तुम चले-चले,
तो हिन्दू-सदगति पाओगे,
मरते ही हूरें घेरेंगी,
तुम चूको नहीं, मुसलमानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!
तुम उनके फौजी शासन में,
चुपके राशन ले लिया करो।
उनके चेकों पर सही-सही
अपने हस्ताक्षर किया करो।
तुम समझो उन्हें 'डिफेंस एक्ट',
कब पता नहीं क्या कर बैठें ?
वे भारत की सरकार, नहीं
उनसे सत्याग्रह किया करो।
छह बजने के पहले से ही,
उनका करफ्यू लग जाता है।
बस हुई जरा-सी चूक कि
झट ही 'आर्डिनेंस' बन जाता है।
वे 'अल्टीमेटम' दिए बिना ही
युद्ध शुरू कर देती हैं,
उनको अपनी हिटलर समझो,
चर्चिल-सा डिक्टेटर जानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो।
श्रेणी: कविता
साला ही गरम मसाला है / गोपालप्रसाद व्यास
हे दुनिया के संतप्त जनो,
पत्नी-पीड़ित हे विकल मनो,
कूँआ प्यासे पर आया है
मुझ बुद्धिमान की बात सुनो!
यदि जीवन सफल बनाना है
यदि सचमुच पुण्य कमाना है,
तो एक बात मेरी जानो
साले को अपना गुरु मानो!
छोड़ो मां-बाप बिचारों को
छोड़ो बचपन के यारों को,
कुल-गोत्र, बंधु-बांधव छोड़ो
छोड़ो सब रिश्तेदारों को।
छोड़ो प्रतिमाओं का पूजन
पूजो दिवाल के आले को,
पत्नी को रखना है प्रसन्न
तो पूजो पहले साले को।
गंगा की तारन-शक्ति घटी
यमुना का पानी क्षीण हुआ,
काशी की करवट व्यर्थ हुई
मथुरा भी दीन-मलीन हुआ।
अब कलियुग में ससुराल तीर्थ
जीवित-जाग्रत पहचानो रे!
यदि अपनी सुफल मनानी है
साले को पंडा मानो रे!
इस भवसागर से तरने को
साला ही तरल त्रिवेणी है,
भव-बाधाओं पर चढ़ने को
साला मजबूत नसैनी है।
गृह-कलह-कष्ट काटन के हित
साला ही तेज कतरनी है,
पत्नी-भक्तों की माला में
साला ही श्रेष्ठ सुमरनी है।
इस अग-जग के अंधियारे में
साला ही सिर्फ उजाला है,
विधना की कौतुक रचना में
साले का ठाठ निराला है।
साला ही सुख की कुंजी है,
पत्नी तो केवल ताला है,
भाई हो सकता ढाल मगर
साला तो पैना भाला है।
वह जिस उर में छिद गया
प्राण उसके ही हरने वाला है,
वह जिस घर में घुस गया
वहां से नहीं निकलने वाला है।
इसलिए जगत के जीजाओ,
अब अपनी खैर मनाओ तुम
दुनिया में सुख से रहना है
साले को शीश नवाओ तुम।
यदि साले से परहेज किया
तो हरदम साले जाओगे,
जिंदगी कोफ्त हो जाएगी
तुम बड़े कसाले जाओगे।
साड़ियां फटेंगी रोज-रोज
बंदर बर्तन ले जाएंगे,
हर रोज दर्द सिर में होगा
तुम दवा कहां से लाओगे?
हफ्तों तक उनकी जीजी से
बातों में मेल नहीं होगा,
चेहरे पर चमक नहीं होगी
बालों में तेल नहीं होगा।
दालों में कंकर निकलेंगे
सब्जी में होगा नमक तेज,
घरनी की कृपा बिना घर में
रहना कुछ खेल नहीं होगा।
इसलिए भाइयो, मत नाहक
अपनी ताकत अजमाओ रे!
देवी जी से लेकर सलाह
साले को घर ले आओ रे!
तुम स्वयं बैठ जाओ नीचे
आसन पर उसे बिठाओ रे!
खुद पानी पर संतोष करो
साले को दूध पिलाओ रे!
तुम केवल 'हाँ' कहना सीखो
मत 'ना' जुबान पर लाओ रे!
अपने कमीज सींकर पहनो
साले को सूट सिलाओ रे!
वाणी में मिश्री घोल चलो
मीठे ही बोल सुनाओ रे!
दादा को चाहे डैम कहो
साले को डियर बताओ रे!
साले को गैर नहीं मानो
साले को समझो जिगरी रे!
साले को गाली मत मानो
मानो बी0 ए0 की डिगरी रे!
साले के परम पराक्रम को
अब तक किस कवि ने कूता है!
ए डाक्टरेट लेने वालो!
देखो, यह विषय अछूता है।
कुछ सोचा है इस चंदा का
छाया किसलिए उजाला है?
शंकर भोले ने इसे किसलिए
अपने शीश बिठाला है?
क्यों आसमान पर चढ़ा हुआ
क्यों इसका रुतबा आला है?
यह भी लक्ष्मी का भाई है
भगवान विष्णु का साला है।
यह तो सब लोग जानते हैं
कान्हा गोकुल के ग्वाले थे,
मक्खन तक चोरी करते थे
सूरत से बेहद काले थे।
पर, इसीलिए इस दुनिया ने
पूजा भगवान मान करके
गांडीव धनुर्धर पराक्रमी
योद्धा अर्जुन के साले थे।
क्या कहें कि हम तो जीवन में
यारो किस्मत वाले न हुए,
कोरे बामन के बैल रहे
धनवानों के लाले न हुए।
हम हुए अकेले ही पैदा
भाई-बहनों वाले न हुए,
जिंदगी हाय बेकार गई
मंत्रीजी के साले न हुए।
पर गई हमारी जाने दो
अपनी तो बात बनाओ तुम,
अपनों के नहीं, दूसरों के
अनुभव से लाभ उठाओ तुम।
यदि नहीं नौकरी मिलती है
या नहीं तरक्की होती है,
तो जो भी अपना अफसर हो
साले उसके बन जाओ तुम।
परमिट मिलने में दिक्कत हो
ठेके में चांस न आता हो,
बिजनिस में दाल न गलती हो
या हर सौदे में घाटा हो।
तो पूछो नहीं पंडितों से
फौरन ही टिकट कटाओ रे!
तुम फौरन दिल्ली आओ रे!
नुस्खा अचूक अजमाओ रे!
तुम नहीं किसी को अर्जी दो
तुम नहीं किसी पर जाओ रे!
तुम नहीं किसी की बात सुनो
अपनी भी नहीं बताओ रे!
कुछ साड़ी लो, कुछ लो मीठा
कुछ फल लो, लो कुछ फूल-पान,
लग जाए दांव, आफीसर की
पत्नी को बहन बनाओ रे!
बच्चों के मामा बन जाओ
बच्ची को गोद खिलाओ रे!
उनकी माता के चरण छुओ
दादा के पैर दबाओ रे!
मत खाली हाथ घुसो घर में
कुछ लाओ रे, कुछ लाओ रे!
बाबूजी अगर डाँट भी दें
बोलो मत, पूँछ हिलाओ रे
यदि इसी तरह चालीस दिवस
संयम से ध्यान लगाओगे,
दिन में बे-नागा चार बार
बाबूजी के घर जाओगे।
तो स्वयं बहनजी पिघलेंगी
बहनोई होंगे मेहरबान,
सच कहता हूँ तुम घर बैठे
चारों पदार्थ पा जाओगे।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ
साला पर सबसे आला है,
हैं और सभी रिश्ते फीके
साला बस गरम मसाला है।
खुल गए भाग्य उस जीजा के
तर गईं पीढ़ियां तीन-तीन
जिसके घर में होकर प्रसन्न
साले ने डेरा डाला है।
नामुकिन जिसको सर करना
साला वह लोहे का गढ़ है,
साले की पहुँच दूर तक है
साले की चूल्हे में जड़ है।
तुमने भी यह माना होगा
तुमने भी पहचाना होगा,
है सकल खुदाई एक तरफ
जोरू का भाई एक तरफ।
श्रेणी: कविता
सास नहीं, भारत माता हैं / गोपालप्रसाद व्यास
हिन्दी के कवियों को जैसे
गीत-गवास लगा करती है
या नेता टाइप लाला को
नाम-छपास लगा करती है।
मथुरा के पंडों को लगती
है खवास औरों के घर पर
उसी तरह श्रोतागण पाकर
मुझे कहास लगा करती है।
पढ़ते वक्त मुझे बचपन में
अक्सर प्यास लगा करती थी,
और गणित का घंटा आते
शंका खास लगा करती थी।
बड़ा हुआ तो मुझे इश्क के
दौरे पड़ने लगे भंयकर,
हर लड़की की अम्मा मुझको
अपनी सास लगा करती थी।
कसम आपकी सच कहता हूं
मुझको सास बहुत प्यारी है,
जिसने मेरी पत्नी जाई
उस माता की बलिहारी है!
जरा सोचिए, अगर विधाता
जग में सास नहीं उपजाते,
तो हम जैसे पामर प्राणी
बिना विवाह ही रह जाते।
कहो कहां से मुन्नी आती?
कहो कहां से मुन्ना आता?
इस भारत की जनसंख्या में
अपना योगदान रह जाता।
आधा दर्जन बच्चे कच्चे
अगर न अपना वंश बढ़ाते,
अपना क्या है, नेहरू चाचा
बिना भतीजों के रह जाते।
एक-एक भारतवासी के
पीछे दस-दस भूत न होते,
तो अपने गुलजारी नंदा
भार योजनाओं का ढोते।
क्या फिर बांध बनाए जाते?
क्या फिर अन्न उगाए जाते?
कर्जे-पर-कर्जे ले-लेकर
क्या मेहमान बुलाए जाते?
यह सब हुआ सास के कारण
बीज-रूप है वही भवानी,
सेओ इनको नेता लोगो!
अगर सफलता तुमको पानी।
श्वसुर-प्रिया, सब सुखदाता हैं
भव-भयहारिणि जगदाता हैं
सुजलां सुफलां विख्याता है
सास नहीं, भारत माता है।
श्रेणी: कविता
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम! / गोपालप्रसाद व्यास
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम!
शब्दकोश में प्रिये, और भी
बहुत गालियां मिल जाएंगी
जो चाहे सो कहो, मगर तुम
मेरी उमर की डोर गहो तुम!
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम!
क्या कहती हो-दांत झड़ रहे?
अच्छा है, वेदान्त आएगा।
दाँत बनाने वालों का भी
अरी भला कुछ हो जाएगा।
बालों पर आ रही सफेदी,
टोको मत, इसको आने दो।
मेरे सिर की इस कालिख को
शुभे, स्वयं ही मिट जाने दो।
जब तक पूरी तरह चांदनी
नहीं चांद पर लहराएगी,
तब तक तन के ताजमहल पर
गोरी नहीं ललच पाएगी।
झुकी कमर की ओर न देखो
विनय बढ़ रही है जीवन में,
तन में क्या रक्खा है, रूपसि,
झांक सको तो झांको मन में।
अरी पुराने गिरि-श्रृंगों से
ही बहता निर्मल सोता है,
कवि न कभी बूढ़ा होता है।
मेरे मन में सुनो सुनयने
दिन भर इधर-उधर होती है,
और रात के अंधियारे में
बेहद खुदर-पुदर होती है।
रात मुझे गोरी लगती है,
प्रात मुझे लगता है बूढ़ा,
बिखरे तारे ऐसे लगते
जैसे फैल रहा हो कूड़ा।
सुर-गंगा चंबल लगती है,
सातों ऋषि लगते हैं डाकू,
ओस नहीं, आ रहे पसीने,
पौ न फटी, मारा हो चाकू।
मेरे मन का मुर्गा तुमको
हरदम बांग दिया करता है,
तुम जिसको बूढ़ा कहतीं, वह
क्या-क्या स्वांग किया करता है।
बूढ़ा बगुला ही सागर में
ले पाता गहरा गोता है।
कवि न कभी बूढ़ा होता है।
भटक रहे हो कहां?
वृद्ध बरगद की छांह घनी होती है,
अरी, पुराने हीरे की कीमत
दुगुनी-तिगुनी होती है।
बात पुरानी है कि पुराने
चावल फार हुआ करते हैं,
और पुराने पान बड़े ही
लज्जतदार हुआ करते हैं।
फर्म पुरानी से 'डीलिंग'
करना सदैव चोखा होता है,
नई कंपनी से तो नवले
अक्सर ही धोखा होता है।
कौन दाँव कितना गहरा है,
नया खिलाड़ी कैसे जाने?
अरी, पुराने हथकंडों को
नया बांगरू क्या पहचाने?
किए-कराए पर नौसिखिया
फेर दिया करता पोता है।
कवि न कभी बूढ़ा होता है।
वर्ष हजारों हुए राम के
अब तक शेव नहीं आई है!
कृष्णचंद्र की किसी मूर्ति में
तुमने मूंछ कहीं पाई है?
वर्ष चौहत्तर के होकर भी
नेहरू कल तक तने हुए थे,
साठ साल के लालबहादुर
देखा गुटका बने हुए थे।
अपने दादा कृपलानी को
कोई बूढ़ा कह सकता है?
बूढ़े चरणसिंह की चोटें,
कोई जोद्धा सह सकता है?
मैं तो इन सबसे छोटा हूँ
क्यों मुझको बूढ़ा बतलातीं?
तुम करतीं परिहास, मगर
मेरी छाती तो बैठी जाती।
मित्रो, घटना सही नहीं है
यह किस्सा मैना-तोता है।
कवि न कभी बूढ़ा होता है।
श्रेणी: कविता
नई क्रांति / गोपालप्रसाद व्यास
कल मुझसे मेरी 'वे' बोलीं
"क्योंजी, एक बात बताओगे?"
"हाँ-हाँ, क्यों नहीं!" जरा मुझको
इसका रहस्य समझाओगे?
देखो, सन् सत्तावन बीता,
सब-कुछ ठंडा, सब-कुछ रीता,
कहते थे लोग गदर होगा,
आदमी पुनः बंदर होगा।
पर मुन्ना तक भी डरा नहीं।
एक चूहा तक भी मरा नहीं!
पहले जैसी गद्दारी है,
पहले-सी चोरबजारी है,
दिन-दिन दूनी मक्कारी है,
यह भ्रांति कहो कब जाएगी?
अब क्रांति कहो कब आएगी?
यह भी क्या पूछी बात, प्रिये!
लाओ, कुछ आगे हाथ प्रिये!
हाँ, शनि मंगल पर आया है,
उसने ही प्रश्न सुझाया है।
तो सुनो, तुम्हें समझाता हूँ,
अक्कल का बटन दबाता हूँ,
पर्दा जो पड़ा उठाता हूँ,
हो गई क्रांति बतलाता हूँ।
होगए मूर्ख विद्वान, प्रिये!
गंजे बन गए महान प्रिये!
दल्लाल लगे कविता करने,
कवि लोग लगे पानी भरने,
तिकड़म का ओपन गेट प्रिये!
नेता से मुश्कल भेंट प्रिये!
मंत्री का मोटा पेट, प्रिये!
यह क्रांति नहीं तो क्या है जी?
यह गदर नहीं तो क्या है जी?
"लो लिख लो मेरी बातों को,
क्रांति के नए उत्पातों को।
अब नर स्वतंत्र, नारी स्वतंत्र,
शादी स्वतंत्र, यारी स्वतंत्र,
कपड़े की हर धारी स्वतंत्र,
घर-घर में फैला प्रजातंत्र।
पति बेचारे का ह्रास हुआ।
क्या खूब कोढ़ बिल पास हुआ!
अब हर घर की खाई समाप्त,
रुपया, आना, पाई समाप्त ।
पिछला जो कुछ था झूठा है,
अगला ही सिर्फ अनूठा है,
अणु फैल-फैलकर फूटा है,
दसखत की जगह अंगूठा है।
यह क्रांति नहीं तो क्या है जी?
यह गदर नहीं तो क्या है जी?"
"आदमी कहीं मरता है, जी,
बंदूकों से तलवारों से?
आदमी कहीं डरता है, जी,
गोली-गोलों की मारों से?
बढ़ते जाते ये (बन) मानुष,
युद्धों से कब घबराते हैं?
खुद को ही स्वयं मिटाने को,
हथियार बनाए जाते हैं।
इसलिए नहीं अब दुश्मन को
सम्मुख ललकारा जाता है,
बस, शीतयुद्ध में दूर-दूर
से ही फटकारा जाता है,
मुस्काकर फाँसा जाता है,
हॅंसकर चुमकारा जाता है,
पीछे से घोंपा जाता है,
मिल करके मारा जाता है,
यह क्रांति नहीं तो क्या है, जी?
यह गदर नहीं तो क्या है, जी?"
"अभिनेत्री बनतीं सीता जी,
अखबार बने हैं गीता जी।
चेले गुरुओं को डांट रहे,
अंधे खैरातें बंट रहे,
महलों में कुत्ते रोते हैं,
अफसर दफ्तर में सोते हैं।
भगवान अजायबघर में हैं,
पंडे बैठे मंदिर में हैं।
गीदड़ कुर्सी पा जाते हैं,
बगुले पाते हैं वोट यहाँ,
कौए गिनते हैं नोट यहाँ।
उल्लू चिड़ियों का राजा है,
भोंपू ही बढ़िया बाजा है।
गदही ही श्रेष्ठ गायिका है।
लायक अब सिर्फ 'लायका' है।
यह क्रांति नहीं तो क्या है, जी?
यह गदर नहीं तो क्या है, जी?"
श्रेणी: कविता
चले आ रहे हैं / गोपालप्रसाद व्यास
है कद इनका गुटका
मगर पेट मटका,
अजब इनकी बोली,
गज़ब इनका लटका,
है आंखों में सुरमा,
औ' कानों में बाला,
ये ओढ़े दुशाला चले आ रहे हैं!
ये लाली के लाला चले आ रहे हैं!
कभी ये न अटके,
कभी ये न भटके,
खरे ही चले इनके
सिक्के गिलट के।
खरे ये न खोटे,
लुढ़कने ये लोटे,
बिना पंख देखो उड़े जा रहे हैं!
ये लाली के लाला चले आ रहे हैं!
है ओठों पे लाली,
रुखों पर गुलाली,
घड़ी जेब में है,
छड़ी भी निराली,
ये सोने में पलते,
ये चांदी में चलते,
ये लोहे में ढलते हैं गरमा रहे हैं!
ये लाली के लाला चले आ रहे हैं!
ये कम नापते हैं,
ये कम तोलते हैं,
ये कम जांचते हैं,
ये कम बोलते हैं,
ये 'ला' ही पढ़े हैं,
तभी तो बढ़े हैं,
न छेड़ो इन्हें, हाय शरमा रहे हैं!
ये लाली के लाला चले आ रहे हैं!
ये पोले नहीं हैं,
बड़ा इनमें दम है,
ये भोले नहीं हैं,
छंटी ये रकम हैं,
बड़ा हाज़मा है,
इन्हें सब हज़म है
हैं बातें बहुत, हम न कह पा रहे हैं!
ये लाली के लाला चले आ रहे हैं!
पढ़ें इनके नौकर,
अजी, ये गुने हैं,
किसी भाड़ में ये न
अब तक भुने हैं,
हो सरदार कोई,
या सरकार कोई,
ये बढ़ते रहे हैं, बढ़े जा रहे हैं,
ये लाली के लाला चले आ रहे हैं।
श्रेणी: कविता
बोए गुलाब / गोपालप्रसाद व्यास
आँसू नीम चढ़े
खून पड़ा काला!
कानों में लाख जड़ी
जीभ पर छाला!
और तुम कहते हो, हंसो!
सड़ी हुई सभ्यता पर फब्तियां कसो!
कागज की व्यवस्था चर गई,
स्याही
सफेद को काला करते-करते
गुजर गई!
चश्मे ने
कर दिया देखना बंद,
और कलम!
अपनी मौत खुद मर गई
और तुम कहते हो लिखो?
समाज में बुद्धिजीवी तो दिखो!
छिलके-पर-छिलके
पर्त-पर-पर्त,
काई और कीचड़
गर्त-ही-गर्त
और तुम कहते हो उठो और चलो!
बहारों का मौसम है
मचलो, उछलो!
बोए गुलाब, उग आए कांटे!
सांपों और बिच्छुओं ने
दंश-डंक बांटे,
नागफनी हंसी,
तुलसी मुरझाई!
खंडित किनारों पर
लहरों की चोटें,
और तुम कहते हो नाचो,
युग की रामायण का
सुंदरकांड बांचो!
कुंभकरणी दोपहरी, मंदोदरी सांझ,
रात शूर्पणखा-सी बेहया, बांझ,
मेघनाद छाया है
दसों दिशा क्रुद्ध!
चाह रहीं बीस भुजा
तापस से युद्ध,
और तुम कहते हो
सृजन को संवारो!
कंटकित करीलों की
आरती उतारो!
प्रतिभा के पंखों पर
सुविधा के पत्थर!
कमलों पर जा बैठे नाली के मच्छर!
गमलों में खिलते हैं
कागज के फूल!
चप्पल पर पालिश है,
टोपी पर धूल!
और तुम कहते हो आंसू मत बोओ!
सुमनों को छेद-छेद माला पिरोओ!
दफ्तर में खटमल की वंश-बेल फैली
कुर्सी पर बैठ गई चुपके से थैली!
बोतल से बहती है गंगा की धारा,
मंझधार सूख गई, डूबता किनारा!
द्रौपदी को जुए में धर्मराज हारा!
अर्जुन से गांडीव कर गया किनारा!
और तुम कहते हो
छोड़ दो निराशा?
होने दो होता है
जो भी तमाशा?
श्रेणी: कविता
अब मूर्ख बनो! / गोपालप्रसाद व्यास
बन चुके बहुत तुम ज्ञानचंद,
बुद्धिप्रकाश, विद्यासागर?
पर अब कुछ दिन को कहा मान,
तुम लाला मूसलचंद बनो!
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
यदि मूर्ख बनोगे तो प्यारे,
दुनिया में आदर पाओगे।
जी, छोड़ो बात मनुष्यों की,
देवों के प्रिय कहलाओगे!
लक्ष्मीजी भी होंगी प्रसन्न,
गृहलक्ष्मी दिल से चाहेंगी।
हर सभा और सम्मेलन के
अध्यक्ष बनाए जाओगे!
पढ़ने-लिखने में क्या रक्खा,
आंखें खराब हो जाती हैं।
चिंतन का चक्कर ऐसा है,
चेतना दगा दे जाती है।
इसलिए पढ़ो मत, सोचो मत,
बोलो मत, आंखें खोलो मत,
तुम अब पूरे स्थितप्रज्ञ बनो,
सच्चे संपूर्णानन्द बनो ।
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
मत पड़ो कला के चक्कर में,
नाहक ही समय गंवाओगे।
नाहक सिगरेटें फूंकोगे,
नाहक ही बाल बढ़ाओगे ।
पर मूर्ख रहे तो आस-पास,
छत्तीस कलाएं नाचेंगी,
तुम एक कला के बिना कहे ही,
छह-छह अर्थ बताओगे।
सुलझी बातों को नाहक ही,
तुम क्यों उलझाया करते हो?
उलझी बातों को अमां व्यर्थ में,
कला बताया करते हो!
ये कला, बला, तबला, सारंगी,
भरे पेट के सौदे हैं,
इसलिए प्रथमतः चरो,
पुनः विचरो, पूरे निर्द्वन्द्व बनो,
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
हे नेताओ, यह याद रखो,
दुनिया मूर्खों पर कायम है।
मूर्खों की वोटें ज्यादा हैं,
मूर्खों के चंदे में दम है।
हे प्रजातंत्र के परिपोषक,
बहुमत का मान करे जाओ!
जब तक हम मूरख जिन्दा हैं,
तब तक तुमको किसका ग़म है?
इसलिए भाइयो, एक बार
फिर बुद्धूपन की जय बोलो!
अक्कल के किवाड़ बंद करो,
अब मूरखता के पट खोलो।
यह विश्वशांति का मूलमंत्र,
यह राम-राज्य की प्रथम शर्त,
अपना दिमाग गिरवीं रखकर,
खाओ, खेलो, स्वच्छंद बनो!
अब मूर्ख बनो, मतिमंद बनो!
श्रेणी: कविता
साँप ही तो हो... / गोपालप्रसाद व्यास
साँप,
दो-दो जीभें होने पर भी
भाषण नहीं देते?
आदमी न होकर भी
पेट के बल चलते हो
यार!
हम तुम्हारे फूत्कार से नहीं डरते
साँप ही तो हो,
भारत के रहनुमा तो नहीं हो!
श्रेणी: कविता
सत्ता / गोपालप्रसाद व्यास
सत्ता अंधी है
लाठी के सहारे चलती है।
सत्ता बहरी है
सिर्फ धमाके सुनती है।
सत्ता गूंगी है
सिर्फ माइक पर हाथ नचाती है।
कागज छूती नहीं
आगे सरकाती है।
सत्ता के पैर भारी हैं
कुर्सी पर बैठे रहने की बीमारी है।
पकड़कर बिठा दो
मारुति में चढ़ जाती है।
वैसे लंगड़ी है
बैसाखियों के बल चलती है।
सत्ता अकड़ू है
माला पहनती नहीं, पकड़ू है।
कोई काम करती नहीं अपने हाथ से,
चल रही है चमचों के साथ से।
सत्ता जरूरी है
कुछ के लिए शौक है
कुछ के लिए मजबूरी है।
सत्ता सती नहीं, रखैल है
कभी इसकी गैल है तो कभी उसकी गैल है।
सत्ता को सलाम करो
पानी मिल जाए तो पीकर आराम करो।
सत्ता को कीर्तन पसंद है
नाचो और गाओ !
सिंहासन पर जमी रहो
मरकर ही जाओ।
और जनता?
हाथ जोड़े, समर्थन में हाथ उठाए,
आश्वासन लेना हो तो ले,
नहीं भाड़ में जाए!
सत्ता शाश्वत है, सत्य है,
जनता जड़ है, निर्जीव है-
ताली और खाली पेट बजाना
उसका परम कर्तव्य है।
श्रेणी: कविता
क्या सोचा, क्या हुआ / गोपालप्रसाद व्यास
मैं हिन्दी का अदना कवि हूं,
कलम घिसी है, गीत रचे हैं।
व्यंग्य और उपहास किए हैं,
बहुत छपे हैं, बहुत बचे हैं।
मैंने भी सपने देखे थे,
स्वतंत्रता से स्वर्ग मिलेगा।
मुरझाए जन-मन-मानस में,
प्रसन्नता का कलम खिलेगा।
इसीलिए ही लाठी खाईं,
घर-जमीन भी फिसल गई थीं।
गोरों की गोलियां बगल से,
सन-सन करती निकल गई थीं।
पत्नी की परवाह नहीं की,
बच्चे भी अनाथ डोले थे।
पर स्वतंत्रता के आते ही,
नेताओं की जय बोले थे।
लाखों जन ऐसे भी निकले,
जो कि सुबह थे, शाम हो गए।
जिनके घर नीलाम हो गए,
सर भी कत्ले-आम हो गए।
और हजारों ऐसे भी थे,
जो अपनापन भूल गए थे।
हंसते-हंसते कोड़े खाए,
फिर फांसी पर झूल गए थे।
जो जंगल-जंगल भटके थे,
छिपे-छिपे सब-कुछ करते थे।
आजादी की आग लगी थी,
और मारकर ही मरते थे।
कुछ उनमें फाकानशीन थे,
जिंदा रहने की मशीन थे,
झंडे पर कुर्बान होगए,
भारत मां की शान होगए।
जिनके लिए जेल मंदिर था,
सदा पैर उसके अंदर था।
पराधीनता ही डायन थी,
हर गोरा उनको बंदर था।
जो सिर का सौदा करते थे,
नाम सुना दुश्मन डरते थे।
कुछ होली, कुछ ईद होगए,
लाखों वीर शहीद होगए।
मेरी तरह सभी ने यारो,
रात-रात सपने बोए थे।
भारत मां की दीन-दशा पर,
ज़ार-ज़ार हम सब रोए थे।
सिर्फ इसलिए- अपना भारत
फिर से शोषणहीन हो सके।
मिटे विषमता, सरसे समता,
जन-गण स्वस्थ, अदीन हो सके।
उन्हें क्या पता, यह स्वतंत्रता,
कुछ वर्षों में ऐसी होगी।
पुलिस और भी जालिम होगी
सत्ता बन जाएगी रोगी।
जनता द्वारा चुनकर नेता,
फिर से भोगी बन जाएंगे।
अफसर लोभी हो जाएंगे,
ढोंगी योगी बन जाएंगे।
राजा अंधा हो जाएगा,
अंधी हो जाएगी रानी।
अंधे रायबहादुर होंगे,
अंधे बन जाएंगे ज्ञानी।
अंधी पुलिस, प्रशासन अंधा,
अंधे वोटर, अंधा चंदा।
कहाँ-कहाँ तक मित्र गिनाएं,
अंधी पीसें कुत्ते खाएं।
अंधों की दुनिया में यारो,
अब अंधों की ही कीमत है।
अंधे लोग रेबड़ी बांटें,
अंधों का ही अब बहुमत है।
क्यों करते आश्चर्य, कमाई
अंधी है, सब जोड़ रहे हैं।
जिसकी जहाँ आँख खुलती है,
उसकी मिलकर फोड़ रहे हैं।
ये विकास है, यही प्रगति है,
यही योजना का वितान है।
सबको अंधा करते जाओ,
स्वतंत्रता का नवविहान है।
आजादी का यही सुफल है,
अरे शहीदो, नाचो-गाओ!
आसमान से फूल नहीं तो,
थोड़े से आँसू टपकाओ!
अब तिजाब ही गंगाजल है,
जुल्मों का पर्याय पुलिस है।
जो इसको असत्य कहता है,
वह झूठा है, वही फुलिश है।
श्रेणी: कविता
कवि हूँ प्रयोगशील / गोपालप्रसाद व्यास
ग़लत न समझो, मैं कवि हूँ प्रयोगशील,
खादी में रेशम की गांठ जोड़ता हूँ मैं।
कल्पना कड़ी-से-कड़ी, उपमा सड़ी से सड़ी,
मिल जाए पड़ी, उसे नहीं छोड़ता हूँ मैं।
स्वर को सिकोड़ता, मरोड़ता हूँ मीटर को
बचना जी, रचना की गति मोड़ता हूँ मैं।
करने को क्रिया-कर्म कविता अभागिनी का,
पेन तोड़ता हूँ मैं, दवात फोड़ता हूँ मैं ॥
श्रोता हजार हों कि गिनती के चार हों,
परंतु मैं सदैव 'तारसप्तक' में गाता हूँ।
आँख मींच साँस खींच, जो भी लिख देता,
उसे आपकी कसम! नई कविता बताता हूँ।
ज्ञेय को बनाता अज्ञेय, सत्-चित् को शून्य,
देखते चलो मैं आग पानी में लगाता हूँ।
अली की, कली की बात बहुत दिनों चली,
अजी, हिन्दी में देखो छिपकली भी चलाता हूँ।
मुझे अक्ल से आँकिए 'हाफ' हूँ मैं,
जरा शक्ल से जांचिए साफ हूँ मैं।
भरा भीतर गूदड़ ही है निरा,
चढ़ा ऊपर साफ गिलाफ हूँ मैं ॥
अपने मन में बड़ा आप हूँ मैं,
अपने पुरखों के खिलाफ़ हूँ मैं।
मुझे भेजिए जू़ में, विलंब न कीजिए,
आदमी क्या हूँ, जिराफ हूँ मैं ॥
बच्चे शरमाते, बात बकनी बताते जिसे,
वही-वही करतब अधेड़ करता हूँ मैं।
बिना बीज, जल, भूमि पेड़ करता हूँ मैं,
फूंक मार केहरी को भेड़ करता हूँ मैं।
बिना व्यंग्य अर्थ की उधेड़ करता हूँ, और
बिना अर्थ शब्दों की रेड़ करता हूँ मैं।
पिटने का खतरा उठाकर भी 'कामरेड'
कालिज की छोरियों से छेड़ करता हूँ मैं॥
श्रेणी: कविता
लालाजी के कुत्ते / गोपालप्रसाद व्यास
लालाजी ने कुत्ते पाले!
ये झबरे हैं, चितकबरे हैं,
कुछ थुल-थुल, कुछ मरगिल्ले हैं
बनते हैं बुलडॉग दोगले,
लेकिन सब देसी पिल्ले हैं।
ये टुकड़ों पर पलने वाले,
बोटी देख मचलने वाले।
अपने को ही छलने वाले,
महावीर हैं, बड़े उग्र हैं,
मन के मैले, तन के काले!
लालाजी ने कुत्ते पाले!
लालाजी ने कहा कि गाओ,
तो भूं-भूं भुंकियाने वाले।
लालाजी ने कहा कि रोओ,
तो कूं-कूं किकियाने वाले।
लालाजी ने कहा कि काटो,
तो पीछे पिल जाने वाले।
लालाजी ने कहा कि चाटो,
तो थूथरी हिलाने वाले।
घर के शेर, शहर के गीदड़,
पिटकर पूंछ हिलाने वाले,
लालाजी ने कुत्ते पाले!
लालाजी के सम्मुख इनका,
आओ, पूँछ हिलाना देखो।
लालाजी के घर पर इनका,
शेरों-सा गुर्राना देखो।
आओ ठाठ जनाना देखो।
लगते ही लकड़ी खुपड़ी पर,
पूछ दबा भग जाना देखो।
ये उनके ही संगी-साथी,
जो इनको नित टुकड़े डाले।
लालाजी ने कुत्ते पाले!
बुद्धिमान हैं, हर खटके पर
आँख खोल चौंका करते हैं।
समझदार हैं, पहले से ही
ये ताका मौका करते हैं।
बड़े विचारक, बात-बात में,
ये अपनी छौंका करते हैं।
पूंजी वालों के प्रहरी हैं
हमको सदा सताते साले,
लालाजी ने कुत्ते पाले!
श्रेणी: कविता
चला जा! / गोपालप्रसाद व्यास
गरीबों के घर का तो मालिक खुदा है
तू अपना ही रुतबा बढ़ाता चला जा।
बग़ावत से रह दूर, जा रेडियो पर
तू जंगी तराने सुनाता चला जा।
गरीबों से क्या पाएगा तू तरक्की
अमीरों से दिल को मिलाता चला जा।
तू बच्चे से उनके मुहब्बत किए जा
हरम की हुकूमत उठाता चला जा।
ये उर्दू न हिन्दी कभी बन सकेगी
तू अपनी कमाई कमाता चला जा।
निराशा से जो छोड़ बैठे हैं जी को
उन्हें राह अपनी दिखाता चला जा।
ये मुमकिन नहीं तू हटे, हार जाए
खुशामद के बस गुल खिलाता चला जा।
अगर तुझको साहब कभी गालियाँ दें
उन्हें झेलता मुस्कराता चला जा।
अगर काम बनता है सर को झुकाए
तो सौ बार सर को झुकाता चला जा।
अगर हेड बनना है दफ्तर में तुझको,
शिकायत किए जा, सुझाता चला जा।
जहां भी अंधेरा नज़र आए तुझको
तू मौके के दीए जलाता चला जा।
तू लीडर बनेगा कहा मान मेरा,
बयानों को शाया कराता चला जा।
गुलामी से मत डर, मिनिस्टर बनेगा
कि बस, हां-में-हां तू मिलाता चला जा।
न डर देशभक्तों से, बकते हैं ये तो
कदम अपना आगे बढ़ाता चला जा।
ये अखबार वाले अगर तुझको छेड़ें
तो परवाह न कर, लड़खड़ाता चला जा।
श्रेणी: कविता
सुकुमार गधे / गोपालप्रसाद व्यास
मेरे प्यारे सुकुमार गधे!
जग पड़ा दुपहरी में सुनकर
मैं तेरी मधुर पुकार गधे!
मेरे प्यारे सुकुमार गधे!
तन-मन गूंजा-गूंजा मकान,
कमरे की गूंज़ीं दीवारें ,
लो ताम्र-लहरियां उठीं मेज
पर रखे चाय के प्याले में!
कितनी मीठी, कितनी मादक,
स्वर, ताल, तान पर सधी हुई,
आती है ध्वनि, जब गाते हो,
मुख ऊंचा कर, आहें भर कर
तो हिल जाते छायावादी
कवि की वीणा के तार, गधे!
मेरे प्यारे...!
तुम दूध, चांदनी, सुधा-स्नात,
बिल्कुल कपास के गाले-से ,
हैं बाल बड़े ही स्पर्श सुखद,
आंखों की उपमा किससे दूं ?
वे कजरारे, आयत लोचन,
दिल में गड़-गड़कर रह जाते,
कुछ रस की, बेबस की बातें,
जाने-अनजाने कह जाते,
वे पानीदार कमानी-से,
हैं 'श्वेत-स्याम-रतनार' गधे!
मेरे प्यारे...!
हैं कान कमल-सम्पुट से थिर,
नीलम से विजड़ित चारों खुर,
मुख कुंद-इंदु-सा विमल कि
नथुने भंवर-सदृश गंभीर तरल,
तुम दूध नहाए-से सुंदर,
प्रति अंग-अंग से तारक-दल
ही झांक रहे हो निकल-निकल,
हे फेनोज्ज्वल, हे श्वेत कमल,
हे शुभ्र अमल, हिम-से उज्ज्वल,
तेरी अनुपम सुंदरता का
मैं सहस कलम ले करके भी
गुणगान नहीं कर सकता हूं,
फिर तेरे रूप-सरोवर का
मैं कैसे पाऊं पार गधे!
मेरे प्यारे...!
तुम अपने रूप-शील-गुण से
अनजान बने रहते हो क्यों ?
हे लात फेंकने में सकुशल!
पगहा-बंधन सहते हो क्यों ?
हे साधु, स्वयं को पहचानो,
युग जाग गया, तुम भी जागो!
मन की कायरता को त्यागो,
रे, जागो, रे, जागो, जागो!
इस भारत के धोबी-कुम्हार
भी शासक पूंजीवादी हैं।
तुम क्रांति करो लादी पटको!
बर्तन फोड़ो, घर से भागो!
हे प्रगतिशील युग के प्राणी
तुम रचो नया संसार गधे!
मेरे प्यारे...!
श्रेणी: कविता

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