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ग्रीटिंग कार्ड और राशन कार्ड – Greeting Card aur Ration Card | Harishankar Parsai

 मेरी टेबिल पर दो कार्ड पड़े हैं- इसी डाक से आया दिवाली ग्रीटिंग कार्ड और दुकान से लौटा राशन कार्ड. ग्रीटिंग कार्ड में किसी ने शुभेच्छा प्रगट की है कि मैं सुख और समृद्धि प्राप्त करूँ. अभी अपने शुभचिन्तक बने हुए हैं जो सुख दिए बिना चैन नहीं लेंगे. दिवाली पर कम से कम उन्हें याद तो आती है कि इस आदमी का सुखी होना अभी बकाया है. वे कार्ड भेज देते हैं कि हम तो सुखी हैं ही, अगर तुम भी हो जाओ, तो हमें फिलहाल कोई एतराज़ नहीं.


मेरा राशन कार्ड मेरे सुख की कामना कर रहा है. मगर राशन कार्ड बताता है कि इस हफ़्ते से गेहूँ की मात्रा आधी हो गयी है. राशन कार्ड मे ग्रीटिंग कार्ड को काट दिया. ऐसा तमाचा मारा कि खूबसूरत ग्रीटिंग कार्डजी के कोमल कपोल रक्तिम हो गए.शुरु से ही राशन कार्ड इस ग्रीटिंग कार्ड की ओर गुर्राकर देख रहा था. जैसे ही मैं ग्रीटिंग कार्ड पढ़कर खुश हुआ, राशन कार्ड ने उसकी गर्दन दबाकर कहा- क्यों बे साले, ग्रीटिंग कार्ड के बच्चे, तू इस आदमी को सुखी करना चाहता है? जा, इसका गेहूँ आधा कर दिया गया. बाकी काला-बाज़ार से खरीदे या भूखा रहे.


बेचारा ग्रीटिंग कार्ड दीनता से मेरी ओर देख रहा है. मैं क्या करूँ? झूठों की रक्षा का ठेका मुझे थोड़े ही मिला है. जिन्हें मिला है उनके सामने हाथ जोड़ो. मेरे राशन कार्ड को तेरी झूठ बर्दाश्त नहीं हुई. इन हालात में सुख का झूठी आशा लेकर तू क्यों आया? ग्रीटिंग कार्ड राष्ट्रसंघ के शान्ति प्रस्तावों की तरह सुन्दर पर प्रभावहीन है. राशन कार्ड खुरदरा और बदसूरत है, पर इसमें अनाज है. मेरे लिए यही सत्य है. और इस रंगीन चिकनाहट में सत्यहीन औपचारिक शुभेच्छा है. ग्रीटिंग कार्ड सत्य होता अगर इसके साथ एक राशन कार्ड भी भेजा गया होता और लिखा होता- हम चाहते हैं कि तुम सुख प्राप्त करो. इस हेतु हम एक मरे हुए आदमी के नाम से जाली राशन कार्ड बनवाकर भेज रहे हैं. जब तक धाँधली चले सस्ता अनाज लेते जाना और सुखी रहना. पकड़े जाने पर हमारा नाम मत बताना. संकट के वक्त शुभचिंतक का नाम भूल जाना चाहिए.


मित्रों से तो मैं कहना चाहता हूँ कि ये कार्ड ने भेजें. शुभकामना इस देश में कारगर नहीं हो रही हैं. यहाँ गोरक्षा का जुलूस सात लाख का होता है और मनुष्य रक्षा का सिर्फ एक लाख का. दुनिया भर में शुभकामना बोझ हो गयी है. पोप की शुभकामना से एक बम कम नहीं गिरता. मित्रों की ही इच्छा से कोई सफल, सुखी और समृद्ध कैसे हो जाएगा? सफलता के महल का प्रवेश द्वार बंद है. इसमें पीछे के नाबदान से ही घुसा जा सकता है. जिन्हें घुसना है नाक पर रुमाल रखकर घुस जाते हैं. पास ही इत्र सने रुमालों के ठेले खड़े हैं. रुमाल खरीदो, नाक पर रखो और नाबदान में से घुस जाओ सफलता और सुख के महल में. एक आदमी खड़ा देख रहा है. कोई पूछता है- घुसते क्यों नहीं? वह कहता है- एक नाक होती तो घुस जाते. हमारा तो हर रोम एक नाक है. कहाँ-कहाँ रुमाल लपेटें.


एक डर भी है. सफलता, सुख और समृद्धि प्राप्त भी हो जाए, तो पता नहीं कितने लोग बुरा मान जाएँ. संकट में तो शत्रु भी मदद कर देते हैं. मित्रता की सच्ची परीक्षा संकट में नहीं, उत्कर्ष में होती है. जो मित्र के उत्कर्ष को बर्दाश्त कर सके, वही सच्चा मित्र होता है. संकट में तपी हुई मित्रता उत्कर्ष में खोटी निकलती मैंने देखी है. एक बेचारे की चार कविताएँ छप गईं, तो चार मित्र टूट गए. आठ छपने पर पूरे आठ टूट गये. दो कवि सम्मेलनों में जमने से एक स्थानीय कवि के कवि-मित्र रूठ गए. तीसरे कवि सम्मेलन में जब वह ‘हूट’ हुआ, तब जाकर मित्रता अपनी जगह लौटी.


ग्रीटिंग कार्डों पर अपना भरोसा नहीं. 20 सालों से इस देश को ग्रीटिंग कार्डों के सहारे चलाया गया है. अम्बार लग गए हैं. हर त्योहार पर देशवासियों को ग्रीटिंग कार्ड दिए जाते हैं- 15 अगस्त और 26 जनवरी पर, संसद के अधिवेशन पर, पार्टी के सम्मेलन पर. बढ़िया सुनहले रंगों के मीठे शब्दों के ग्रीटिंग्स- देशवासियों, बस इस साल तुम सुखी और समृद्ध हो जाओ. ग्रीटिंग कार्डों के ढेर लगे हैं, मगर राशन कार्ड छोटा होता जाता है.


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