नगर में होरी हो रही हो
मेरो पिय चेतन घर नाहीं, यह दुख सुन है को।।नगर. ।।१ ।।
सोति कुमति राच रह्यो है, किहि विध लाऊं सो।।नगर.।।२ ।।
`द्यानत' सुमति कहै जिन स्वामी, तुम कछु शिक्षा दो।।नगर.।।३ ।।
पिया बिन कैसे खेलौं होरी
आतमराम पिया नहिं आये, मोकों होरी कोरी।।पिया. ।।१ ।।
एक बार प्रीतम हम खेलैं, उपशम केसर घोरी।।पिया.।।२ ।।
`द्यानत' वह समयो कब पाऊं, सुमति कहै कर जोरी।।पिया.।।३ ।।
भली भई यह होरी आई, आये चेतनराय
काल बहुत प्रीतम बिन बीते, अब खेलौं मन लाय।।भली. ।।१ ।।
सम्यक रंग गुलाल बरतमें, राग विराग सुहाय।।भली.।।२ ।।
`द्यानत' सुमति महा सुख पायो, सो वरन्यो नहिं जाय।।भली.।।३ ।।
परमगुरु बरसत ज्ञान झरी
हरषि हरषि बहु गरजि गरजिकै, मिथ्यातपन हरी ।।परमगुरु. ।।
सरधा भूमि सुहावनि लागै, संशय बेल हरी ।
भविजन मनसरवर भरि उमड़े, समुझि पवन सियरी ।।परमगुरु. ।।१ ।।
स्यादवाद नय बिजली चमकै, पर-मत-शिखर परी ।
चातक मोर साधु श्रावकके, हृदय सुभक्ति भरी ।।परमगुरु. ।।२ ।।
जप तप परमानन्द बढ़्यो है, सुखमय नींव धरी ।
`द्यानत' पावन पावस आयो, थिरता शुद्ध करी ।।परमगुरु. ।।३ ।।
री! मेरे घट ज्ञान घनागम छायो
शुद्ध भाव बादल मिल आये, सूरज मोह छिपायो ।।री. ।।
अनहद घोर घोर गरजत है, भ्रम आताप मिटायो ।
समता चपला चमकनि लागी, अनुभौ-सुख झर लायो ।।री. ।।१ ।।
सत्ता भूमि बीज समकितको, शिवपद खेत उपायो ।
उद्धत भाव सरोवर दीसै, मोर सुमन हरषायो ।।री. ।।२ ।।
भव-प्रदेशतैं बहु दिन पीछैं, चेतन पिय घर आयो ।
`द्यानत' सुमति कहै सखियनसों, यह पावस मोहि भायो ।।री. ।।३ ।।
कहे सीताजी सुनो रामचन्द्र
कहै सीताजी सुनो रामचन्द्र, संसार महादुखवृक्षकन्द ।।कहै. ।।
पंचेन्द्री भोग भुजंग जानि, यह देह अपावन रोगखानि।।१ ।।
यह राज रजमयी पापमूल, परिग्रह आरँभ में छिन न भूल ।।२ ।।
आपद सम्पद घर बंधु गेह, सुत संकल फाँसी नारि नेह ।।३ ।।
जिय रुल्यो निगोद अनन्त काल, बिनु जानैं ऊरध मधि पाताल ।।४ ।।
तुम जानत करत न आप काज, अरु मोहि निषेधो क्यों न लाज ।।५ ।।
तब केश उपरि सबै खिमाय, दीक्षा धरि कीन्हों तप सुभाय ।।६ ।।
`द्यानत' ठारै दिन ले सन्यास, भयो इन्द्र सोलहैं सुरग बास ।।७ ।।
सुरनरसुखदाई, गिरनारि चलौ भाई
बाल जती नेमीश्वर स्वामी, जहँ शिवरिद्धि कमाई।।सुर. ।।१ ।।
कोड़ बहत्तर सात शतक मुनि, तहँ पंचमगति पाई।।सुर.।।२ ।।
तीरथ महा महाफलदाता, `द्यानत' सीख बताई।।सुर.।।३ ।।
आरति श्रीजिनराज तिहारी, करमदलन संतन हितकारी
सुरनरअसुर करत तुम सेवा । तुमही सब देवनके देवा।।१ ।।
पंचमहाव्रत दुद्धर धारे । रागरोष परिणाम विदारे ।।२ ।।
भवभय भीत शरन जे आये । ते परमारथ पंथ लगाये ।।३ ।।
जो तुम नाथ जपै मन माहीं । जनम मरन भय ताको नाहीं ।।४ ।।
समवसरन संपूरन शोभा । जीते क्रोध मान छल लोभा ।।५ ।।
तुम गुण हम कैसे करि गावैं । गणधर कहत पार नहिं पावैं ।।६ ।।
करुणासागर करुणा कीजे । `द्यानत' सेवक को सुख दीजे ।।७ ।।
करौं आरती वर्द्धमानकी । पावापुर निरवान थान की
राग-बिना सब जग जन तारे । द्वेष बिना सब करम विदारे।।१ ।।
शील-धुरंधर शिव-तियभोगी । मनवचकायन कहिये योगी ।।२ ।।
रतनत्रय निधि परिग्रह-हारी । ज्ञानसुधाभोजनव्रतधारी ।।३ ।।
लोक-अलोक व्याप निजमाही । सुखमय इंद्रिय सुखदुख नाहीं ।।४ ।।
पंचकल्याणकपूज्य विरागी । विमलदिगंबर अंबर-त्यागी ।।५ ।।
गुनमनि-भूषन भूषित स्वामी । जगतउदास जगंतरस्वामी ।।६ ।।
कहै कहां लौं तुम सब जानौ । `द्यानत' की अभिलाष प्रमानौं ।।७ ।।
मंगल आरती आतमराम । तनमंदिर मन उत्तम ठान
समरस जलचंदन आनंद । तंदुल तत्त्वस्वरूप अमंद।।१ ।।
समयसारफूलन की माल । अनुभव-सुख नेवज भरि थाल ।।२ ।।
दीपकज्ञान ध्यानकी धूप । निरमलभाव महाफलरूप ।।३ ।।
सुगुण भविकजन इकरँगलीन । निहचै नवधा भक्ति प्रवीन ।।४ ।।
धुनि उतसाह सु अनहद गान । परम समाधिनिरत परधान ।।५ ।।
बाहिज आतमभाव बहावै । अंतर ह्वै परमातम ध्यावै ।।६ ।।
साहब सेवकभेद मिटाय । `द्यानत' एकमेक हो जाय ।।७ ।।
आरति कीजै श्रीमुनिराजकी, अधमउधारन आतमकाजकी
जा लक्ष्मी के सब अभिलाखी । सो साधन करदम वत नाखी।।१ ।।
सब जग जीत लियो जिन नारी । सो साधन नागनिवत छारी ।।२ ।।
विषयन सब जगजिय वश कीने । ते साधन विषवत तज दीने ।।३ ।।
भुविको राज चहत सब प्रानी । जीरन तृणवत त्यागत ध्यानी ।।४ ।।
शत्रु मित्र दुखसुख सम मानै । लाभ अलाभ बराबर जानै ।।५ ।।
छहोंकाय पीहरव्रत धारें । सबको आप समान निहारें ।।६ ।।
इह आरती पढ़ै जो गावै । `द्यानत' सुरगमुकति सुख पावै ।।७ ।।
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