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परवीन शाकिर की नज़्में : Parveen Shakir Nazm Hindi

इतना मालूम है! : परवीन शाकिर

अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़
सोचती थी कि वो इस वक़्त कहाँ पर होगा
मैं यहाँ हूँ मगर उस कूचा-ए-रंग-ओ-बू में
रोज़ की तरह से वो आज भी आया होगा
और जब उस ने वहाँ मुझ को न पाया होगा!?
आप को इल्म है वो आज नहीं आई हैं?
मेरी हर दोस्त से उस ने यही पूछा होगा
क्यूँ नहीं आई वो क्या बात हुई है आख़िर
ख़ुद से इस बात पे सौ बार वो उलझा होगा
कल वो आएगी तो मैं उस से नहीं बोलूँगा
आप ही आप कई बार वो रूठा होगा
वो नहीं है तो बुलंदी का सफ़र कितना कठिन
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उस ने ये सोचा होगा
राहदारी में हरे लॉन में फूलों के क़रीब
उस ने हर सम्त मुझे आन के ढूँडा होगा
नाम भूले से जो मेरा कहीं आया होगा
ग़ैर-महसूस तरीक़े से वो चौंका होगा
एक जुमले को कई बार सुनाया होगा
बात करते हुए सौ बार वो भूला होगा
ये जो लड़की नई आई है कहीं वो तो नहीं
उस ने हर चेहरा यही सोच के देखा होगा
जान-ए-महफ़िल है मगर आज फ़क़त मेरे बग़ैर
हाए किस दर्जा वही बज़्म में तन्हा होगा
कभी सन्नाटों से वहशत जो हुई होगी उसे
उस ने बे-साख़्ता फिर मुझ को पुकारा होगा
चलते चलते कोई मानूस सी आहट पा कर
दोस्तों को भी किस उज़्र से रोका होगा
याद कर के मुझे नम हो गई होंगी पलकें
''आँख में पड़ गया कुछ'' कह के ये टाला होगा
और घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाह
हर सतर में मिरा चेहरा उभर आया होगा
जब मिली होगी उसे मेरी अलालत की ख़बर
उस ने आहिस्ता से दीवार को थामा होगा
सोच कर ये कि बहल जाए परेशानी-ए-दिल
यूँही बे-वज्ह किसी शख़्स को रोका होगा!
इत्तिफ़ाक़न मुझे उस शाम मिरी दोस्त मिली
मैं ने पूछा कि सुनो आए थे वो? कैसे थे?
मुझ को पूछा था मुझे ढूँडा था चारों जानिब?
उस ने इक लम्हे को देखा मुझे और फिर हँस दी
इस हँसी में तो वो तल्ख़ी थी कि इस से आगे
क्या कहा उस ने मुझे याद नहीं है लेकिन
इतना मालूम है ख़्वाबों का भरम टूट गया!

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी : परवीन शाकिर

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी
रात गहरी है मगर चाँद चमकता है अभी
मेरे माथे पे तिरा प्यार दमकता है अभी
मेरी साँसों में तिरा लम्स महकता है अभी
मेरे सीने में तिरा नाम धड़कता है अभी
ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी
तेरी आवाज़ का जादू है अभी मेरे लिए
तेरे मल्बूस की ख़ुश्बू है अभी मेरे लिए
तेरी बाँहें तिरा पहलू है अभी मेरे लिए
सब से बढ़ कर मिरी जाँ तू है अभी मेरे लिए
ज़ीस्त करने को मिरे पास बहुत कुछ है अभी
आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी!
आज के ब'अद मगर रंग-ए-वफ़ा क्या होगा
इश्क़ हैराँ है सर-ए-शहर-ए-सबा क्या होगा
मेरे क़ातिल तिरा अंदाज़-ए-जफ़ा क्या होगा!
आज की शब तो बहुत कुछ है मगर कल के लिए
एक अंदेशा-ए-बेनाम है और कुछ भी नहीं
देखना ये है कि कल तुझ से मुलाक़ात के ब'अद
रंग-ए-उम्मीद खिलेगा कि बिखर जाएगा
वक़्त पर्वाज़ करेगा कि ठहर जाएगा
जीत हो जाएगी या खेल बिगड़ जाएगा
ख़्वाब का शहर रहेगा कि उजड़ जाएगा

ज़िद : परवीन शाकिर

मैं क्यूँ उस को फ़ोन करूँ!
उस के भी तो इल्म में होगा
कल शब
मौसम की पहली बारिश थी!

लेकिन बड़ी देर हो चुकी थी : परवीन शाकिर

इस उम्र के बाद उस को देखा!
आँखों में सवाल थे हज़ारों
होंटों पे मगर वही तबस्सुम!
चेहरे पे लिखी हुई उदासी
लहजे में मगर बला का ठहराओ
आवाज़ में गूँजती जुदाई
बाँहें थीं मगर विसाल-ए-सामाँ!
सिमटी हुई उस के बाज़ुओं में
ता-देर मैं सोचती रही थी
किस अब्र-ए-गुरेज़-पा की ख़ातिर
मैं कैसे शजर से कट गई थी
किस छाँव को तर्क कर दिया था
मैं उस के गले लगी हुई थी
वो पोंछ रहा था मिरे आँसू
लेकिन बड़ी देर हो चुकी थी!

ए'तिराफ़ : परवीन शाकिर

जाने कब तक तिरी तस्वीर निगाहों में रही
हो गई रात तिरे अक्स को तकते तकते
मैं ने फिर तेरे तसव्वुर के किसी लम्हे में
तेरी तस्वीर पे लब रख दिए आहिस्ता से!

आईना : परवीन शाकिर

लड़की सर को झुकाए बैठी
काफ़ी के प्याले में चमचा हिला रही है
लड़का हैरत और मोहब्बत की शिद्दत से पागल
लाँबी पलकों के लर्ज़ीदा सायों को
अपनी आँख से चूम रहा है
दोनों मेरी नज़र बचा कर
इक दूजे को देखते हैं हँस देते हैं
मैं दोनों से दूर
दरीचे के नज़दीक
अपनी हथेली पर अपना चेहरा रखे
खिड़की से बाहर का मंज़र देख रही हूँ
सोच रही हूँ
गए दिनों में हम भी यूँही हँसते थे

एक्सटेसी : परवीन शाकिर

सब्ज़ मद्धम रौशनी में सुर्ख़ आँचल की धनक
सर्द कमरे में मचलती गर्म साँसों की महक
बाज़ुओं के सख़्त हल्क़े में कोई नाज़ुक बदन
सिलवटें मल्बूस पर आँचल भी कुछ ढलका हुआ
गर्मी-ए-रुख़्सार से दहकी हुई ठंडी हवा
नर्म ज़ुल्फ़ों से मुलाएम उँगलियों की छेड़-छाड़
सुर्ख़ होंटों पर शरारत के किसी लम्हे का अक्स
रेशमीं बाँहों में चूड़ी की कभी मद्धम खनक
शर्मगीं लहजों में धीरे से कभी चाहत की बात
दो दिलों की धड़कनों में गूँजती थी इक सदा
काँपते होंटों पे थी अल्लाह से सिर्फ़ इक दुआ
काश ये लम्हे ठहर जाएँ ठहर जाएँ ज़रा!

मुझे मत बताना : परवीन शाकिर

मुझे मत बताना
कि तुम ने मुझे छोड़ने का इरादा किया था
तो क्यूँ
और किस वज्ह से
अभी तो तुम्हारे बिछड़ने का दुख भी नहीं कम हुआ
अभी तो मैं
बातों के वादों के शहर-ए-तिलिस्मात में
आँख पर ख़ुश-गुमानी की पट्टी लिए
तुम को पेड़ों के पीछे दरख़्तों के झुण्ड
और दीवार की पुश्त पर ढूँडने में मगन हूँ
कहीं पर तुम्हारी सदा और कहीं पर तुम्हारी महक
मुझ पे हँसने में मसरूफ़ है
अभी तक तुम्हारी हँसी से नबर्द-आज़मा हूँ
और इस जंग में
मेरा हथियार
अपनी वफ़ा पर भरोसा है और कुछ नहीं
उसे कुंद करने की कोशिश न करना
मुझे मत बताना.....

निक-नेम : परवीन शाकिर

तुम मुझ को गुड़िया कहते हो
ठीक ही कहते हो!
खेलने वाले सब हाथों को मैं गुड़िया ही लगती हूँ
जो पहना दो मुझ पे सजेगा
मेरा कोई रंग नहीं
जिस बच्चे के हाथ थमा दो
मेरी किसी से जंग नहीं
सोचती जागती आँखें मेरी
जब चाहे बीनाई ले लो
कूक भरो और बातें सुन लो
या मेरी गोयाई ले लो
माँग भरो सिन्दूर लगाओ
प्यार करो आँखों में बसाओ
और फिर जब दिल भर जाए तो
दिल से उठा के ताक़ पे रख दो
तुम मुझ को गुड़िया कहते हो
ठीक ही कहते हो!

सिर्फ़ एक लड़की : परवीन शाकिर

अपने सर्द कमरे में
मैं उदास बैठी हूँ
नीम-वा दरीचों से
नम हवाएँ आती हैं
मेरे जिस्म को छू कर
आग सी लगाती हैं
तेरा नाम ले ले कर
मुझ को गुदगुदाती हैं
काश मेरे पर होते
तेरे पास उड़ आती
काश मैं हवा होती
तुझ को छू के लौट आती
मैं नहीं मगर कुछ भी
संग दिल रिवाजों के
आहनी हिसारों में
उम्र-क़ैद की मुल्ज़िम
सिर्फ़ एक लड़की हूँ!

ख़्वाब : परवीन शाकिर

खुले पानियों में घिरी लड़कियाँ
नर्म लहरों के छींटे उड़ाती हुई
बात-बे-बात हँसती हुई
अपने ख़्वाबों के शहज़ादों का तज़्किरा कर रही थीं
जो ख़ामोश थीं
उन की आँखों में भी मुस्कुराहट की तहरीर थी
उन के होंटों को भी अन-कहे ख़्वाब का ज़ाइक़ा चूमता था!
आने वाले नए मौसमों के सभी पैरहन नीलमीं हो चुके थे!
दूर साहिल पे बैठी हुई एक नन्ही सी बच्ची
हमारी हँसी और मौजों के आहंग से बे-ख़बर
रेत से एक नन्हा घरौंदा बनाने में मसरूफ़ थी
और मैं सोचती थी
ख़ुदा-या! ये हम लड़कियाँ
कच्ची उम्रों से ही ख़्वाब क्यूँ देखना चाहती हैं
ख़्वाब की हुक्मरानी में कितना तसलसुल रहा है!

चाँद रात : परवीन शाकिर

गए बरस की ईद का दिन क्या अच्छा था
चाँद को देख के उस का चेहरा देखा था
फ़ज़ा में 'कीट्स' के लहजे की नरमाहट थी
मौसम अपने रंग में 'फ़ैज़' का मिस्रा था
दुआ के बे-आवाज़ उलूही लम्हों में
वो लम्हा भी कितना दिलकश लम्हा था
हाथ उठा कर जब आँखों ही आँखों में
उस ने मुझ को अपने रब से माँगा था
फिर मेरे चेहरे को हाथों में ले कर
कितने प्यार से मेरा माथा चूमा था!
हवा! कुछ आज की शब का भी अहवाल सुना
क्या वो अपनी छत पर आज अकेला था?
या कोई मेरे जैसी साथ थी और उस ने
चाँद को देख के उस का चेहरा देखा था?

एक दोस्त के नाम : परवीन शाकिर

लड़की!
ये लम्हे बादल हैं
गुज़र गए तो हाथ कभी नहीं आएँगे
इन के लम्स को पीती जा
क़तरा क़तरा भीगती जा
भीगती जा तू जब तक इन में नम है
और तिरे अंदर की मिट्टी प्यासी है
मुझ से पूछ
कि बारिश को वापस आने का रस्ता कभी न याद हुआ
बाल सुखाने के मौसम अन-पढ़ होते हैं!

जुदाई की पहली रात : परवीन शाकिर

आँख बोझल है
मगर नींद नहीं आती है
मेरी गर्दन में हमाइल तिरी बाँहें जो नहीं
किसी करवट भी मुझे चैन नहीं पड़ता है
सर्द पड़ती हुई रात
माँगने आई है फिर मुझ से
तिरे नर्म बदन की गर्मी
और दरीचों से झिझकती हुई आहिस्ता हवा
खोजती है मिरे ग़म-ख़ाने में
तेरी साँसों की गुलाबी ख़ुश्बू!
मेरा बिस्तर ही नहीं
दिल भी बहुत ख़ाली है
इक ख़ला है कि मिरी रूह में दहशत की तरह उतरा है
तेरा नन्हा सा वजूद
कैसे उस ने मुझे भर रक्खा था
तिरे होते हुए दुनिया से तअल्लुक़ की ज़रूरत ही न थी
सारी वाबस्तगियाँ तुझ से थीं
तू मिरी सोच भी, तस्वीर भी और बोली भी
मैं तिरी माँ भी, तिरी दोस्त भी हम-जोली भी
तेरे जाने पे खुला
लफ़्ज़ ही कोई मुझे याद नहीं
बात करना ही मुझे भूल गया!
तू मिरी रूह का हिस्सा था
मिरे चारों तरफ़
चाँद की तरह से रक़्साँ था मगर
किस क़दर जल्द तिरी हस्ती ने
मिरे अतराफ़ में सूरज की जगह ले ली है
अब तिरे गिर्द मैं रक़्सिंदा हूँ!
वक़्त का फ़ैसला था
तिरे फ़र्दा की रिफ़ाक़त के लिए
मेरा इमरोज़ अकेला रह जाए
मिरे बच्चे, मिरे लाल
फ़र्ज़ तो मुझ को निभाना है मगर
देख कि कितनी अकेली हूँ मैं!

मशवरा : परवीन शाकिर

नन्ही लड़की
साहिल के इतने नज़दीक
रेत से अपने घर न बना
कोई सरकश मौज इधर आई तो
तेरे घर की बुनियादें तक बह जाएँगी
और फिर उन की याद में तू
सारी उम्र उदास रहेगी!

अोथेलो : परवीन शाकिर

अपने फ़ोन पे अपना नंबर
बार बार डायल करती हूँ
सोच रही हूँ
कब तक उस का टेलीफ़ोन इंगेज रहेगा
दिल कुढ़ता है
इतनी इतनी देर तलक
वो किस से बातें करता है!

वही नर्म लहजा : परवीन शाकिर

वही नर्म लहजा
जो इतना मुलाएम है जैसे
धनक गीत बन के समाअ'त को छूने लगी हो
शफ़क़ नर्म कोमल सुरों में कोई प्यार की बात कहने चली हो
किस क़दर रंग-ओ-आहंग का किस क़दर ख़ूबसूरत सफ़र
वही नर्म लहजा
कभी अपने मख़्सूस अंदाज़ में मुझ से बातें करेगा
तो ऐसा लगे
जैसे रेशम के झूले पे कोई मधुर गीत हलकोरे लेने लगा हो
वही नर्म लहजा
किसी शोख़ लम्हे में उस की हँसी बन के बिखरे
तो ऐसा लगे
जैसे क़ौस-ए-क़ुज़ह ने कहीं पास ही अपनी पाज़ेब छनकाई है
हँसी को वो रिम-झिम
कि जैसे फ़ज़ा में बनफ़्शी चमकदार बूंदों के घुंघरू छनकने लगे हों
कि फिर
उस की आवाज़ का लम्स पा के
हवाओं के हाथों में अन-देखे कंगन खनकने लगे हों
वही नर्म लहजा मुझे छेड़ने पर जब आए
तो ऐसा लगेगा
जैसे सावन की चंचल हवा
सब्ज़ पत्तों के झाँझन पहन
सुर्ख़ फूलों की पायल बजाती हुई
मेरे रुख़्सार को
गाहे गाहे शरारे से छूने लगे
मैं जो देखूँ पलट के तो वो
भाग जाए मगर
दूर पेड़ों में छुप कर हँसे
और फिर नन्हे बच्चों की मानिंद ख़ुश हो के ताली बजाने लगे
वही नर्म लहजा
कि जिस ने मिरे ज़ख़्म-ए-जाँ पे हमेशा शगुफ़्ता गुलाबों की शबनम रखी है
बहारों के पहले परिंदे की मानिंद है
जो सदा आने वाले नए सुख के मौसम का क़ासिद बना है
उसी नर्म लहजे ने फिर मुझ को आवाज़ दी है

ड्यूटी : परवीन शाकिर

जान
मुझे अफ़्सोस है
तुम से मिलने शायद इस हफ़्ते भी न आ सकूँगा
बड़ी अहम मजबूरी है
जान
तुम्हारी मजबूरी को
अब तो मैं भी समझने लगी हूँ
शायद इस हफ़्ते भी
तुम्हारे चीफ़ की बीवी तन्हा होगी

फ़बेअय्ये आलाए रब्बिकमा तुकज़्ज़िबान : परवीन शाकिर

दिल-आज़ारी भी इक फ़न है
और कुछ लोग तो
सारी ज़िंदगी इसी की रोटी खाते हैं
चाहे उन का बुर्ज कोई हो
अक़रब ही लगते हैं
तीसरे दर्जे के पीले अख़बारों पर ये
अपनी यर्क़ानी सोचों से
और भी ज़र्दी मलते रहते हैं
माला बारी केबिन हों या पाँच सितारा होटल
कहीं भी क़य करने से बाज़ नहीं आते
ऊपर से इस अमल को
फ़िक़रे-बाज़ी कहते हैं
जिस का पहला निशाना उमूमन
बिल को अदा करने वाला साथी होता है!
अपने अपने कुँवें को बहर-ए-आज़म कहने और समझने वाले
ये नन्हे मेंडक
हर हाथी को देख के फूलने लगे हैं
और जब फटने वाले हों तो
हाथी की आँखों पर फबती कसने लगे हैं
कव्वे भी अंडे खाने के शौक़ को अपने
फ़ाख़्ता के घर जा कर पूरा करते हैं
लेकिन ये वो साँप हैं जो कि
अपने बच्चे
ख़ुद ही चट कर जाते हैं
कभी कभी मैं सोचती हूँ कि
साँपों की ये ख़सलत
मालिक-ए-जिंन-ओ-इन्स की, इंसानों के हक़ में
कैसी बे-पायाँ रहमत है!

वाहिमा : परवीन शाकिर

तुम्हारा कहना है
तुम मुझे बे-पनाह शिद्दत से चाहते हो
तुम्हारी चाहत
विसाल की आख़िरी हदों तक
मिरे फ़क़त मेरे नाम होगी
मुझे यक़ीं है मुझे यक़ीं है
मगर क़सम खाने वाले लड़के!
तुम्हारी आँखों में एक तिल है!

वो बाग़ में मेरा मुंतज़िर था : परवीन शाकिर

वो बाग़ में मेरा मुंतज़िर था
और चाँद तुलू'अ हो रहा था
ज़ुल्फ़-ए-शब-ए-वस्ल खुल रही थी
ख़ुश्बू साँसों में घुल रही थी
आई थी मैं अपने पी से मिलने
जैसे कोई गुल हवा से खिलने
इक उम्र के ब'अद मैं हँसी थी
ख़ुद पर कितनी तवज्जोह दी थी!
पहना गहरा बसंती जोड़ा
और इत्र-ए-सुहाग में बसाया
आईने में ख़ुद को फिर कई बार
उस की नज़रों से मैं ने देखा
संदल से चमक रहा था माथा
चंदन से बदन महक रहा था
होंटों पे बहुत शरीर लाली
गालों पे गुलाल खेलता था
बालों में पिरोए इतने मोती
तारों का गुमान हो रहा था
अफ़्शाँ की लकीर माँग में थी
काजल आँखों में हँस रहा था
कानों में मचल रही थी बाली
बाँहों से लिपट रहा था गजरा
और सारे बदन से फूटता था
उस के लिए गीत जो लिखा था!
हाथों में लिए दिए की थाली
उस के क़दमों में जा के बैठी
आई थी कि आरती उतारूँ
सारे जीवन को दान कर दूँ!
देखा मिरे देवता ने मुझ को
ब'अद इस के ज़रा सा मुस्कुराया
फिर मेरे सुनहरे थाल पर हाथ
रक्खा भी तो इक दिया उठाया
और मेरी तमाम ज़िंदगी से
माँगी भी तो एक शाम माँगी

ख़ुद से मिलने की फ़ुर्सत किसे थी : परवीन शाकिर

अपनी पिंदार की किर्चियाँ
चुन सकूँगी
शिकस्ता उड़ानों के टूटे हुए पर समेटूँगी
तुझ को बदन की इजाज़त से रुख़्सत करूँगी
कभी अपने बारे में इतनी ख़बर ही न रक्खी थी
वर्ना बिछड़ने की ये रस्म कब की अदा हो चुकी होती
मिरा हौसला
अपने दिल पर बहुत क़ब्ल ही मुन्कशिफ़ हो गया होता
लेकिन यहाँ
ख़ुद से मिलने की फ़ुर्सत किसे थी!

ताज-महल : परवीन शाकिर

संग-ए-मरमर की ख़ुनुक बाँहों में
हुस्न-ए-ख़्वाबीदा के आगे मिरी आँखें शल हैं
गुंग सदियों के तनाज़ुर में कोई बोलता है
वक़्त जज़्बे के तराज़ू पे ज़र-ओ-सीम-ओ-जवाहिर की तड़प तौलता है!
हर नए चाँद पे पत्थर वही सच कहते हैं
उसी लम्हे से दमक उठते में उन के चेहरे
जिस की लौ उम्र गए इक दिल-ए-शब-ज़ाद को महताब बना आई थी!
उसी महताब की इक नर्म किरन
साँचा-ए-संग में ढल पाई तो
इश्क़ रंग-ए-अबदिय्यत से सर-अफ़राज़ हुआ
क्या अजब नींद है
जिस को छू कर
जो भी आता है खुली आँख लिए आता है
सो चुके ख़्वाब-ए-अबद देखने वाले कब के
और ज़माना है कि उस ख़्वाब की ताबीर लिए जाग रहा है अब तक!

बुलावा : परवीन शाकिर

मैं ने सारी उम्र
किसी मंदिर में क़दम नहीं रक्खा
लेकिन जब से
तेरी दुआ में
मेरा नाम शरीक हुआ है
तेरे होंटों की जुम्बिश पर
मेरे अंदर की दासी के उजले तन में
घंटियाँ बजती रहती हैं!

पज़ीराई : परवीन शाकिर

अभी मैं ने दहलीज़ पर पाँव रक्खा ही था कि
किसी ने मिरे सर पे फूलों भरा थाल उल्टा दिया
मेरे बालों पे आँखों पे पलकों पे, होंटों पे
माथे पे, रुख़्सार पर
फूल ही फूल थे
दो बहुत मुस्कुराते हुए होंट
मेरे बदन पर मोहब्बत की गुलनार मोहरों को यूँ सब्त करते
चले जा रहे थे
कि जैसे अबद तक
मिरी एक इक पोर का इंतिसाब
अपनी ज़ेबाई के नाम ले कर रहेंगे
मुझे अपने अंदर समो कर रहेंगे!

गए जनम की सदा : परवीन शाकिर

वो एक लड़की
कि जिस से शायद मैं एक पल भी नहीं मिली हूँ
मैं उस के चेहरे को जानती हूँ
कि उस का चेहरा
तुम्हारी नज़्मों तुम्हारी गीतों की चिलमनों से उभर रहा है
यक़ीन जानो
मुझे ये चेहरा तुम्हारे अपने वजूद से भी अज़ीज़-तर है
कि उस की आँखों में
चाहतों के वही समुंदर छुपे हैं
जो मेरी अपनी आँखों में मौजज़न हैं
वो तुम को इक देवता बना कर मिरी तरह पूजती रही है
उस एक लड़की का जिस्म
ख़ुद मेरा ही बदन है
वो एक लड़की
जो मेरे अपने गए जनम की मधुर सदा है

एक मंज़र : परवीन शाकिर

कच्चा सा इक मकाँ कहीं आबादियों से दूर
छोटा सा एक हुज्रा फ़राज़-ए-मकान पर
सब्ज़े से झाँकती हुई खपरेल वाली छत
दीवार-ए-चोब पर कोई मौसम की सब्ज़ बेल
उतरी हुई पहाड़ पे बरसात की वो रात
कमरे में लालटैन की हल्की सी रौशनी
वादी में घूमता हुआ बारिश का जल-तरंग
साँसों में गूँजता हुआ इक अन-कही का भेद!

सलाम : परवीन शाकिर

गरचे लिखी हुई थी शहादत इमाम की
लेकिन मेरे हुसैन ने हुज्जत तमाम की
ज़ैनब की बे-रिदाई ने सर मेरा ढक दिया
आग़ाज़-ए-सुब्ह-ए-नौ हुई वो शाम शाम की
इक ख़्वाब-ए-ख़ास चश्म-ए-मोहम्मद में था छुपा
ता'बीर नूर-ए-ऐन-ए-मोहम्मद ने आम की
बच्चों की प्यास मालिक-ए-कौसर पे शाक़ थी
साक़ी को वर्ना मय की ज़रूरत न जाम की
हुर सा नसीब बादशहों को नहीं नसीब
आक़ा से मिल रही थी गवाही ग़ुलाम की
दरिया पे तिश्ना-लब हैं पे सहरा में शाद-काम
दुनिया अजब है उन के सफ़र और क़याम की
दे कर रज़ा जो चेहरा-ए-शब्बीर ज़र्द है
थी इल्तिजा-ए-जंग ये किस लाला-फ़ाम की

कंगन बेले का : परवीन शाकिर

उस ने मेरे हाथ में बाँधा
उजला कंगन बेले का
पहले प्यार से थामी कलाई
बा'द इस के हौले हौले पहनाया
गहना फूलों का
फिर झुक कर हाथ को चूम लिया
फूल तो आख़िर फूल ही थे
मुरझा ही गए
लेकिन मेरी रातें उन की ख़ुशबू से अब तक रौशन हैं
बाँहों पर वो लम्स अभी तक ताज़ा है
शाख़-ए-सनोबर पर इक चाँद दमकता है
फूल का गहना
प्रेम का कंगन
प्यार का बंधन
अब तक मेरी याद के हाथ से लिपटा हुआ है

नहीं मेरा आँचल मैला है : परवीन शाकिर

नहीं मेरा आँचल मेला है
और तेरी दस्तार के सारे पेच अभी तक तीखे हैं
किसी हवा ने इन को अब तक छूने की जुरअत नहीं की है
तेरी उजली पेशानी पर
गए दिनों की कोई घड़ी
पछतावा बन के नहीं फूटी
और मेरे माथे की सियाही
तुझ से आँख मिला कर बात नहीं कर सकती
अच्छे लड़के
मुझे न ऐसे देख
अपने सारे जुगनू सारे फूल
सँभाल के रख ले
फटे हुए आँचल से फूल गिर जाते हैं
और जुगनू
पहला मौक़ा पाते ही उड़ जाते हैं
चाहे ओढ़नी से बाहर की धूप कितनी ही कड़ी हो!

मसअला : परवीन शाकिर

''पत्थर की ज़बाँ'' की शाएरा ने
इक महफ़िल-ए-शेर-ओ-शायरी में
जब नज़्म सुनाते मुझ को देखा
कुछ सोच के दिल में मुस्कुराई
जब मेज़ पर हम मिले तो उस ने
बढ़ कर मिरे हाथ ऐसे थामे
जैसे मुझे खोजती हो कब से
फिर मुझ से कहा कि आज, 'परवीन'!
जब शेर सुनाते तुम को देखा
मैं ख़ुद को बहुत ही याद आई
वो वक़्त कि जब तुम्हारी सूरत
मैं भी यूँही शेर कह रही थी
लिखती थी इसी तरह की नज़्में
पर अब तो वो सारी नज़्में ग़ज़लें
गुज़रे हुए ख़्वाब की हैं बातें!
मैं सब को डिसओन कर चुकी हूँ!
''पत्थर की ज़बाँ'' की शाएरा के
चम्बेली से नर्म हाथ थामे
''ख़ुश्बू'' की सफ़ीर सोचती थी
दर-पेश हवाओं के सफ़र में
पल पल की रफ़ीक़-ए-राह मेरे
अंदर की ये सादा-लौह 'ऐलिस'
हैरत की जमील वादियों से
वहशत के मुहीब जंगलों में
आएगी तो उस का फूल-लहजा
क्या जब भी सबा-नफ़स रहेगा!?
वो ख़ुद को डिसओन कर सकेगी!?

नाटक : परवीन शाकिर

रुत बदली तो भंवरो ने तितली से कहा
आज से तुम आज़ाद हो
परवाजों की सारी सम्तें तुम्हारे नाम हुईं
जाओ
जंगल की मग़रूर हवा के साथ उड़ो
बादल के हमराह सितारे छू आओ
ख़ुशबू के बाज़ू थामो और रक़्स करो
रक़्स करो
कि इस मौसम के सूरज की किरनों का ताज तुम्हारे सर है
लहराओ
कि इन रातों का चाँद तुम्हारी पेशानी पर अपने हाथ से दुआ लिखेगा
गाओ
इन लम्हों की हवाएँ तुम को तुम्हारे गीतों पर संगीत देंगी
पत्ते कड़े बजाएँगे
और फूलों के हाथों में दफ़ होगा
तितली मा'सूमाना हैरत से सरशार
सियह शाख़ों के हल्क़े से निकली
सदियों के जकड़े हुए रेशमी पर फैलाए और उड़ने लगी
खुली फ़ज़ा का ज़ाइक़ा चक्खा
नर्म हवा का गीत सुना
अन-देखे कोहसारों की क़ामत नापी
रौशनियों का लम्स पिया
ख़ुशबू के हर रंग को छू कर देखा
लेकिन रंग हवा और ख़ुशबू का विज्दान अधूरा था
कि रक़्स का मौसम ठहर गया
रुत बदली
और सूरज की किरनों का ताज पिघलने लगा
चाँद के हाथ दुआ के हर्फ़ ही भूल गए
हवा के लब बर्फ़ीले सुमों में नीले पड़ कर अपनी सदाएँ खो बैठे
पत्तों की बाँहों के सर बे-रंग हुए
और तन्हा रह गए फूलों के हाथ
बर्फ़ की लहर के हाथों तितली को लौट आने का पैग़ाम गया
भौंरे शबनम की ज़ंजीरें ले कर दौड़े
और बेचैन परों में अन-चखी परवाजों की आशुफ़्ता प्यास जला दी
अपने काले नाख़ूनों से
तितली के पर नोच के बोले
अहमक़ लड़की
घर वापस आ जाओ
नाटक ख़त्म हुआ
ख़्वातीन का आलमी साल

नए साल की पहली नज़्म : परवीन शाकिर

अंदेशों के दरवाज़ों पर
कोई निशान लगाता है
और रातों रात तमाम घरों पर
वही सियाही फिर जाती है
दुख का शब ख़ूँ रोज़ अधूरा रह जाता है
और शनाख़्त का लम्हा बीतता जाता है
मैं और मेरा शहर-ए-मोहब्बत
तारीकी की चादर ओढ़े
रौशनी की आहट पर कान लगाए कब से बैठे हैं
घोड़ों की टापों को सुनते रहते हैं
हद-ए-समाअत से आगे जाने वाली आवाज़ों के रेशम से
अपनी रू-ए-सियाह पे तारे काढ़ते रहते हैं
अँगुश्ता ने इक इक कर के छलनी होने को आए
अब बारी अंगुश्त-ए-शहादत की आने वाली है
सुब्ह से पहले वो कटने से बच जाए तो!

हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है : परवीन शाकिर

मुझे मालूम था
ये दिन भी दुख की कोख से फूटा है
मेरी मातमी चादर
नहीं तब्दील होगी आज के दिन भी
जो राख उड़ती थी ख़्वाबों की बदन में
यूँही आशुफ़्ता रहेगी
और उदासी की यही सूरत रहेगी
मैं अपने सोग में मातम-कुनाँ
यूँ सर-ब-ज़ानू रात तक बैठी रहूँगी
और मिरे ख़्वाबों का पुर्सा आज भी कोई नहीं देगा
मगर ये कौन है
जो यूँ मुझे बाहर बुलाता है
बड़ी नर्मी से कहता है
कि अपने हुजरा-ए-ग़म से निकल कर बाग़ में आओ
ज़रा बाहर तो देखो
दूर तक सब्ज़ा बिछा है
और हरी शाख़ों पे नारंजी शगूफ़े मुस्कुराते हैं
मुलाएम सब्ज़ पत्तों पर पड़ी शबनम
सुनहरी धूप में हीरे की सूरत जगमगाती है
दरख़्तों में छुपी नद्दी
बहुत धीमे सुरों में गुनगुनाती है
चमकते ज़र्द फूलों से लदी नन्ही पहाड़ी के अक़ब में
नुक़रई चश्मा ख़ुशी से खिलखिलाता है
परिंद-ए-ख़ुश-गुलू
शाख़-ए-शगुफ़्ता पर चहकता है
घने जंगल में बारिश का ग़ुबार-ए-सब्ज़
सत्ह-ए-शीशा-ए-दिल पर
मुलाएम उँगलियों से मर्हबा के लफ़्ज़ लिखता है
कोई आता है
आ कर चादर-ए-ग़म को बड़ी आहिस्तगी से
मेरे शानों से हटा कर
सात रंगों का दुपट्टा खोल कर मुझ को उड़ाता है
मैं खुल कर साँस लेती हूँ
मिरे अंदर
कोई पैरों में घुंघरू बाँधता है
रक़्स का आग़ाज़ करता है
मिरे कानों के आवेज़ों को ये किस ने छुआ
जिस से लवें फिर से गुलाबी हो गई हैं
कोई सरगोशियों में फिर से मेरा नाम लेता है
फ़ज़ा की नग़्मगी आवाज़ देती है
हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है

ज़ूद-पशीमान : परवीन शाकिर

गहरी भूरी आँखों वाला इक शहज़ादा
दूर देस से
चमकीले मुश्की घोड़े पर हवा से बातें करता
जिगर जिगर करती तलवार से जंगल काटता आया
दरवाज़ों से लिपटी बेलें परे हटाता
जंगल की बाँहों में जकड़े महल के हाथ छुड़ाता
जब अंदर आया तो देखा
शहज़ादी के जिस्म की सारी सूइयाँ ज़ंग-आलूदा थीं
रस्ता देखने वाली आँखें
सारे शिकवे भुला चुकी थीं!

जिज़्या : परवीन शाकिर

गुड़िया सी ये लड़की
जिस की उजली हँसी से
मेरा आँगन दमक रहा है
कल जब सात समुंदर पार चली जाएगी
और साहिली शहर के सुर्ख़ छतों वाले घर के अंदर
पूरे चाँद की रौशनी बन कर बिखरेगी
हम सब उस को याद करेंगे
और अपने अश्कों के सच्चे मोतियों से
सारी उम्र
इक ऐसा सूद उतारते जाएँगे
जिस का अस्ल भी हम पर क़र्ज़ नहीं था!

तक़य्या : परवीन शाकिर

सो अब ये शर्त-ए-हयात ठहरी
कि शहर के सब नजीब अफ़राद
अपने अपने लहू की हुरमत से मुन्हरिफ़ हो के जीना सीखें
वो सब अक़ीदे कि इन घरानों में
उन की आँखों के रंगतों की तरह तसलसुल से चल रहे थे
सुना है बातिल क़रार पाए
वो सब वफ़ादारियाँ कि जिन पर लहू के वा'दे हलफ़ हुए थे
वो आज से मस्लहत की घड़ियाँ शुमार होंगी
बदन की वाबस्तगी का क्या ज़िक्र
रूह के अहद-नामे तक फ़स्ख़ माने जाएँ
ख़मोशी-ओ-मस्लहत-पसंदी में ख़ैरियत है
मगर मिरे शहर-ए-मुन्हरिफ़ में
अभी कुछ ऐसे ग़य्यूर-ओ-सादिक़ ब-क़ैद-ए-जाँ हैं
कि हर्फ़-ए-इंकार जिन की क़िस्मत नहीं बना है
सो हाकिम-ए-शहर जब भी अपने ग़ुलाम-ज़ादे
उन्हें गिरफ़्तार करने भेजे
तो साथ में एक एक का शजरा-ए-नस्ब भी रवाना करना
और उन के हमराह सर्द पत्थर में चुनने देना
कि आज से जब
हज़ार-हा साल बा'द हम भी
किसी ज़माने के टेक्सलाया हड़प्पा बन कर तलाशे जाएँ
तो उस ज़माने के लोग
हम को
कहीं बहुत कम-नसब न जानें

शुगून : परवीन शाकिर

सात सुहागनें और मेरी पेशानी!
संदल की तहरीर
भला पत्थर के लिखे को क्या धोएगी
बस इतना है
जज़्बे की पूरी नेकी से
सब ने अपने अपने ख़ुदा का इस्म मुझे दे डाला है
और ये सुनने में आया है
शाम ढले जंगल के सफ़र में
इस्म बहुत काम आते हैं!

फ़रोग़ फ़रख़-ज़ाद के लिए एक नज़्म : परवीन शाकिर

मुसाहिब-ए-शाह से कहो कि
फ़क़ीह-ए-आज़म भी आज तस्दीक़ कर गए हैं
कि फ़स्ल फिर से गुनाहगारों की पक गई है
हुज़ूर की जुम्बिश-ए-नज़र के
तमाम जल्लाद मुंतज़िर हैं
कि कौन सी हद जनाब जारी करें
तो तामील-ए-बंदगी हो
कहाँ पे सर और कहाँ पे दस्तार उतारना अहसन-उल-अमल है
कहाँ पे हाथों कहाँ ज़बानों को क़त्अ कीजिए
कहाँ पे दरवाज़ा रिज़्क़ का बंद करना होगा
कहाँ पे आसाइशों की भूखों को मार दीजे
कहाँ बटेगी लुआन की छूट
और कहाँ पर
रज्म के अहकाम जारी होंगे
कहाँ पे नौ साला बच्चियां चहल साला मर्दों के साथ
संगीन में पिरोने का हुक्म होगा
कहाँ पे इक़बाली मुलज़िमों को
किसी तरह शक का फ़ाएदा हो
कहाँ पे मासूम दार पर खींचना पड़ेगा
हुज़ूर अहकाम जो भी जारी करेंगे
फ़क़त इल्तिजा ये होगी
कि अपने इरशाद-ए-आलिया को
ज़बानी रखें
वगरना
कानूनी उलझनें हैं!

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