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जावेद अख्तर की नज्में : Javed Akhtar Nazm in Hindi


ये खेल क्या है : जावेद अख़्तर

मिरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है
और अब
मेरी चाल के इंतिज़ार में है
मगर मैं कब से
सफ़ेद-ख़ानों
सियाह-ख़ानों में रक्खे
काले सफ़ेद मोहरों को देखता हूँ
मैं सोचता हूँ
ये मोहरे क्या हैं
अगर मैं समझूँ
के ये जो मोहरे हैं
सिर्फ़ लकड़ी के हैं खिलौने
तो जीतना क्या है हारना क्या
न ये ज़रूरी
न वो अहम है
अगर ख़ुशी है न जीतने की
न हारने का ही कोई ग़म है
तो खेल क्या है
मैं सोचता हूँ
जो खेलना है
तो अपने दिल में यक़ीन कर लूँ
ये मोहरे सच-मुच के बादशाह ओ वज़ीर
सच-मुच के हैं प्यादे
और इन के आगे है
दुश्मनों की वो फ़ौज
रखती है जो कि मुझ को तबाह करने के
सारे मंसूबे
सब इरादे
मगर ऐसा जो मान भी लूँ
तो सोचता हूँ
ये खेल कब है
ये जंग है जिस को जीतना है
ये जंग है जिस में सब है जाएज़
कोई ये कहता है जैसे मुझ से
ये जंग भी है
ये खेल भी है
ये जंग है पर खिलाड़ियों की
ये खेल है जंग की तरह का
मैं सोचता हूँ
जो खेल है
इस में इस तरह का उसूल क्यूँ है
कि कोई मोहरा रहे कि जाए
मगर जो है बादशाह
उस पर कभी कोई आँच भी न आए
वज़ीर ही को है बस इजाज़त
कि जिस तरफ़ भी वो चाहे जाए
मैं सोचता हूँ
जो खेल है
इस में इस तरह उसूल क्यूँ है
पियादा जो अपने घर से निकले
पलट के वापस न जाने पाए
मैं सोचता हूँ
अगर यही है उसूल
तो फिर उसूल क्या है
अगर यही है ये खेल
तो फिर ये खेल क्या है
मैं इन सवालों से जाने कब से उलझ रहा हूँ
मिरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है
और अब मेरी चाल के इंतिज़ार में है

वक़्त : जावेद अख़्तर

ये वक़्त क्या है
ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है
ये जब न गुज़रा था
तब कहाँ था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है
तो अब कहाँ है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है
ये वक़्त क्या है
ये वाक़िए
हादसे
तसादुम
हर एक ग़म
और हर इक मसर्रत
हर इक अज़िय्यत
हर एक लज़्ज़त
हर इक तबस्सुम
हर एक आँसू
हर एक नग़्मा
हर एक ख़ुशबू
वो ज़ख़्म का दर्द हो
कि वो लम्स का हो जादू
ख़ुद अपनी आवाज़ हो कि माहौल की सदाएँ
ये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँ
वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल
तमाम एहसास
सारे जज़्बे
ये जैसे पत्ते हैं
बहते पानी की सतह पर
जैसे तैरते हैं
अभी यहाँ हैं
अभी वहाँ हैं
और अब हैं ओझल
दिखाई देता नहीं है लेकिन
ये कुछ तो है
जो कि बह रहा है
ये कैसा दरिया है
किन पहाड़ों से आ रहा है
ये किस समुंदर को जा रहा है
ये वक़्त क्या है
कभी कभी मैं ये सोचता हूँ
कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो
तो ऐसा लगता है
दूसरी सम्त जा रहे हैं
मगर हक़ीक़त में
पेड़ अपनी जगह खड़े हैं
तो क्या ये मुमकिन है
सारी सदियाँ
क़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी हों
ये वक़्त साकित हो
और हम ही गुज़र रहे हों
इस एक लम्हे में
सारे लम्हे
तमाम सदियाँ छुपी हुई हों
न कोई आइंदा
न गुज़िश्ता
जो हो चुका है
जो हो रहा है
जो होने वाला है
हो रहा है
मैं सोचता हूँ
कि क्या ये मुमकिन है
सच ये हो
कि सफ़र में हम हैं
गुज़रते हम हैं
जिसे समझते हैं हम
गुज़रता है
वो थमा है
गुज़रता है या थमा हुआ है
इकाई है या बटा हुआ है
है मुंजमिद
या पिघल रहा है
किसे ख़बर है
किसे पता है
ये वक़्त क्या है
ये काएनात-ए-अज़ीम
लगता है
अपनी अज़्मत से
आज भी मुतइन नहीं है
कि लम्हा लम्हा
वसीअ-तर और वसीअ-तर होती जा रही है
ये अपनी बाँहें पसारती है
ये कहकशाओं की उँगलियों से
नए ख़लाओं को छू रही है
अगर ये सच है
तो हर तसव्वुर की हद से बाहर
मगर कहीं पर
यक़ीनन ऐसा कोई ख़ला है
कि जिस को
इन कहकशाओं की उँगलियों ने
अब तक छुआ नहीं है
ख़ला
जहाँ कुछ हुआ नहीं है
ख़ला
कि जिस ने किसी से भी ''कुन'' सुना नहीं है
जहाँ अभी तक ख़ुदा नहीं है
वहाँ
कोई वक़्त भी न होगा
ये काएनात-ए-अज़ीम
इक दिन
छुएगी
इस अन-छुए ख़ला को
और अपने सारे वजूद से
जब पुकारेगी
''कुन''
तो वक़्त को भी जनम मिलेगा
अगर जनम है तो मौत भी है
मैं सोचता हूँ
ये सच नहीं है
कि वक़्त की कोई इब्तिदा है न इंतिहा है
ये डोर लम्बी बहुत है
लेकिन
कहीं तो इस डोर का सिरा है
अभी ये इंसाँ उलझ रहा है
कि वक़्त के इस क़फ़स में
पैदा हुआ
यहीं वो पला-बढ़ा है
मगर उसे इल्म हो गया है
कि वक़्त के इस क़फ़स से बाहर भी इक फ़ज़ा है
तो सोचता है
वो पूछता है
ये वक़्त क्या है

बंजारा : जावेद अख़्तर

मैं बंजारा
वक़्त के कितने शहरों से गुज़रा हूँ
लेकिन
वक़्त के इस इक शहर से जाते जाते मुड़ के देख रहा हूँ
सोच रहा हूँ
तुम से मेरा ये नाता भी टूट रहा है
तुम ने मुझ को छोड़ा था जिस शहर में आ कर
वक़्त का अब वो शहर भी मुझ से छूट रहा है
मुझ को विदाअ करने आए हैं
इस नगरी के सारे बासी
वो सारे दिन
जिन के कंधे पर सोती है
अब भी तुम्हारी ज़ुल्फ़ की ख़ुशबू
सारे लम्हे
जिन के माथे पर रौशन
अब भी तुम्हारे लम्स का टीका
नम आँखों से
गुम-सुम मुझ को देख रहे हैं
मुझ को इन के दुख का पता है
इन को मेरे ग़म की ख़बर है
लेकिन मुझ को हुक्म-ए-सफ़र है
जाना होगा
वक़्त के अगले शहर मुझे अब जाना होगा
वक़्त के अगले शहर के सारे बाशिंदे
सब दिन सब रातें
जो तुम से ना-वाक़िफ़ होंगे
वो कब मेरी बात सुनेंगे
मुझ से कहेंगे
जाओ अपनी राह लो राही
हम को कितने काम पड़े हैं
जो बीती सो बीत गई
अब वो बातें क्यूँ दोहराते हो
कंधे पर ये झोली रक्खे
क्यूँ फिरते हो क्या पाते हो
मैं बे-चारा
इक बंजारा
आवारा फिरते फिरते जब थक जाऊँगा
तन्हाई के टीले पर जा कर बैठूँगा
फिर जैसे पहचान के मुझ को
इक बंजारा जान के मुझ को
वक़्त के अगले शहर के सारे नन्हे-मुन्ने भोले लम्हे
नंगे पाँव
दौड़े दौड़े भागे भागे आ जाएँगे
मुझ को घेर के बैठेंगे
और मुझ से कहेंगे
क्यूँ बंजारे
तुम तो वक़्त के कितने शहरों से गुज़रे हो
उन शहरों की कोई कहानी हमें सुनाओ
उन से कहूँगा
नन्हे लम्हो!
एक थी रानी
सुन के कहानी
सारे नन्हे लम्हे
ग़मगीं हो कर मुझ से ये पूछेंगे
तुम क्यूँ इन के शहर न आईं
लेकिन उन को बहला लूँगा
उन से कहूँगा
ये मत पूछो
आँखें मूँदो
और ये सोचो
तुम होतीं तो कैसा होता
तुम ये कहतीं
तुम वो कहतीं
तुम इस बात पे हैराँ होतीं
तुम उस बात पे कितनी हँसतीं
तुम होतीं तो ऐसा होता
तुम होतीं तो वैसा होता
धीरे धीरे
मेरे सारे नन्हे लम्हे
सो जाएँगे
और मैं
फिर हौले से उठ कर
अपनी यादों की झोली कंधे पर रख कर
फिर चल दूँगा
वक़्त के अगले शहर की जानिब
नन्हे लम्हों को समझाने
भूले लम्हों को बहलाने
यही कहानी फिर दोहराने
तुम होतीं तो ऐसा होता
तुम होतीं तो वैसा होता

दुश्वारी : जावेद अख़्तर

मैं भूल जाऊँ तुम्हें
अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो
कोई ख़्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कम-बख़्त
भुला न पाया वो सिलसिला
जो था ही नहीं
वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त
जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं

आँसू : जावेद अख़्तर

किसी का ग़म सुन के
मेरी पलकों पे
एक आँसू जो आ गया है
ये आँसू क्या है
ये आँसू क्या इक गवाह है
मेरी दर्द-मंदी का मेरी इंसान-दोस्ती का
ये आँसू क्या इक सुबूत है
मेरी ज़िंदगी में ख़ुलूस की एक रौशनी का
ये आँसू क्या ये बता रहा है
कि मेरे सीने में एक हस्सास दिल है
जिस ने किसी की दिल-दोज़ दास्ताँ जो सुनी
तो सुन के तड़प उठा है
पराए शो'लों में जल रहा है
पिघल रहा है
मगर में फिर ख़ुद से पूछता हूँ
ये दास्ताँ तो अभी सुनी है
ये आँसू भी क्या अभी ढला है
ये आँसू
क्या मैं ये समझूँ
पहले कहीं नहीं था
मुझे तो शक है कि ये कहीं था
ये मेरे दिल और मेरी पलकों के दरमियाँ
इक जो फ़ासला है
जहाँ ख़यालों के शहर ज़िंदा हैं
और ख़्वाबों की तुर्बतें हैं
जहाँ मोहब्बत के उजड़े बाग़ों में
तल्ख़ियों के बबूल हैं
और कुछ नहीं है
जहाँ से आगे हैं
उलझनों के घनेरे जंगल
ये आँसू
शायद बहुत दिनों से
वहीं छुपा था
जिन्हों ने इस को जनम दिया था
वो रंज तो मस्लहत के हाथों
न जाने कब क़त्ल हो गए थे
तो करता फिर किस पे नाज़ आँसू
कि हो गया बे-जवाज़ आँसू
यतीम आँसू यसीर आँसू
न मो'तबर था
न रास्तों से ही बा-ख़बर था
तो चलते चलते
वो थम गया था
ठिठक गया था
झिझक गया था
इधर से आज इक किसी के ग़म की
कहानी का कारवाँ जो गुज़रा
यतीम आँसू ने जैसे जाना
कि इस कहानी की सरपरस्ती मिले
तो मुमकिन है
राह पाना
तो इक कहानी की उँगली थामे
उसी के ग़म को रूमाल करता
इसी के बारे में
झूटे सच्चे सवाल करता
ये मेरी पलकों तक आ गया है

अजीब आदमी था वो : जावेद अख़्तर

अजीब आदमी था वो
मोहब्बतों का गीत था
बग़ावतों का राग था
कभी वो सिर्फ़ फूल था
कभी वो सिर्फ़ आग था
अजीब आदमी था वो
वो मुफ़लिसों से कहता था
कि दिन बदल भी सकते हैं
वो जाबिरों से कहता था
तुम्हारे सर पे सोने के जो ताज हैं
कभी पिघल भी सकते हैं
वो बंदिशों से कहता था
मैं तुम को तोड़ सकता हूँ
सहूलतों से कहता था
मैं तुम को छोड़ सकता हूँ
हवाओं से वो कहता था
मैं तुम को मोड़ सकता हूँ
वो ख़्वाब से ये कहता था
कि तुझ को सच करूँगा मैं
वो आरज़ूओं से कहता था
मैं तेरा हम-सफ़र हूँ
तेरे साथ ही चलूँगा मैं
तू चाहे जितनी दूर भी बना ले अपनी मंज़िलें
कभी नहीं थकूँगा मैं
वो ज़िंदगी से कहता था
कि तुझ को मैं सजाऊँगा
तू मुझ से चाँद माँग ले
मैं चाँद ले के आऊँगा
वो आदमी से कहता था
कि आदमी से प्यार कर
उजड़ रही है ये ज़मीं
कुछ इस का अब सिंघार कर
अजीब आदमी था वो
वो ज़िंदगी के सारे ग़म
तमाम दुख
हर इक सितम से कहता था
मैं तुम से जीत जाऊँगा
कि तुम को तो मिटा ही देगा
एक रोज़ आदमी
भुला ही देगा ये जहाँ
मिरी अलग है दास्ताँ
वो आँखें जिन में ख़्वाब हैं
वो दिल है जिन में आरज़ू
वो बाज़ू जिन में है सकत
वो होंट जिन पे लफ़्ज़ हैं
रहूँगा उन के दरमियाँ
कि जब मैं बीत जाऊँगा
अजीब आदमी था वो

वो कमरा याद आता है : जावेद अख़्तर

मैं जब भी
ज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप कर
मैं जब भी
दूसरों के और अपने झूट से थक कर
मैं सब से लड़ के ख़ुद से हार के
जब भी उस एक कमरे में जाता था
वो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरा
वो बेहद मेहरबाँ कमरा
जो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता था
जैसे कोई माँ
बच्चे को आँचल में छुपा ले
प्यार से डाँटे
ये क्या आदत है
जलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुम
वो कमरा याद आता है
दबीज़ और ख़ासा भारी
कुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ा
कि जैसे कोई अक्खड़ बाप
अपने खुरदुरे सीने में
शफ़क़त के समुंदर को छुपाए हो
वो कुर्सी
और उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस की
वो दोनों
दोस्त थीं मेरी
वो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईना
जो दिल का अच्छा था
वो बे-हँगम सी अलमारी
जो कोने में खड़ी
इक बूढ़ी अन्ना की तरह
आईने को तंबीह करती थी
वो इक गुल-दान
नन्हा सा
बहुत शैतान
उन दिनों पे हँसता था
दरीचा
या ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहट
और दरीचे पर झुकी वो बेल
कोई सब्ज़ सरगोशी
किताबें
ताक़ में और शेल्फ़ पर
संजीदा उस्तानी बनी बैठीं
मगर सब मुंतज़िर इस बात की
मैं उन से कुछ पूछूँ
सिरहाने
नींद का साथी
थकन का चारा-गर
वो नर्म-दिल तकिया
मैं जिस की गोद में सर रख के
छत को देखता था
छत की कड़ियों में
न जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थीं
वो छोटी मेज़ पर
और सामने दीवार पर
आवेज़ां तस्वीरें
मुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थीं
मुस्कुराती थीं
उन्हें शक भी नहीं था
एक दिन
मैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगा
मैं इक दिन यूँ भी जाऊँगा
कि फिर वापस न आऊँगा
मैं अब जिस घर में रहता हूँ
बहुत ही ख़ूबसूरत है
मगर अक्सर यहाँ ख़ामोश बैठा याद करता हूँ
वो कमरा बात करता था

नया हुक्म-नामा : जावेद अख़्तर

किसी का हुक्म है सारी हवाएँ
हमेशा चलने से पहले बताएँ
कि उन की सम्त क्या है
किधर जा रही हैं
हवाओं को बताना ये भी होगा
चलेंगी अब तो क्या रफ़्तार होगी
हवाओं को ये इजाज़त नहीं है
कि आँधी की इजाज़त अब नहीं है
हमारी रेत की सब ये फ़सीलें
ये काग़ज़ के महल जो बन रहे हैं
हिफ़ाज़त उन की करना है ज़रूरी
और आँधी है पुरानी इन की दुश्मन
ये सभी जनते हैं
किसी का हुक्म है दरिया की लहरें
ज़रा ये सर-कशी कम कर लें अपनी हद में ठहरें
उभरना फिर बिखरना और बिखर कर फिर उभरना
ग़लत है ये उन का हंगामा करना
ये सब है सिर्फ़ वहशत की अलामत
बग़ावत की अलामत
बग़ावत तो नहीं बर्दाश्त होगी
ये वहशत तो नहीं बर्दाश्त होगी
अगर लहरों को है दरिया में रहना
तो उन को होगा अब चुप-चाप बहना
किसी का हुक्म है
इस गुलिस्ताँ में बस इक रंग के ही फूल होंगे
कुछ अफ़सर होंगे जो ये तय करेंगे
गुलिस्ताँ किस तरह बनना है कल का
यक़ीनन फूल तो यक-रंगीं होंगे
मगर ये रंग होगा कितना गहरा कितना हल्का
ये अफ़सर तय करेंगे
किसी को ये कोई कैसे बताए
गुलिस्ताँ में कहीं भी फूल यक-रंगीं नहीं होते
कभी हो ही नहीं सकते
कि हर इक रंग में छुप कर बहुत से रंग रहते हैं
जिन्होंने बाग़-ए-यक-रंगीं बनाना चाहे थे
उन को ज़रा देखो
कि जब इक रंग में सौ रंग ज़ाहिर हो गए हैं तो
कितने परेशाँ हैं कितने तंग रहते हैं
किसी को ये कोई कैसे बताए
हवाएँ और लहरें कब किसी का हुक्म सुनती हैं
हवाएँ हाकिमों की मुट्ठियों में हथकड़ी में
क़ैद-ख़ानों में नहीं रुकतीं
ये लहरें रोकी जाती हैं
तो दरिया कितना भी हो पुर-सुकूँ बेताब होता है
और इस बेताबी का अगला क़दम सैलाब होता है

दोराहा : जावेद अख़्तर

ये जीवन इक राह नहीं
इक दोराहा है
पहला रस्ता
बहुत सहल है
इस में कोई मोड़ नहीं है
ये रस्ता
इस दुनिया से बेजोड़ नहीं है
इस रस्ते पर मिलते हैं
रेतों के आँगन
इस रस्ते पर मिलते हैं
रिश्तों के बंधन
इस रस्ते पर चलने वाले
कहने को सब सुख पाते हैं
लेकिन
टुकड़े टुकड़े हो कर
सब रिश्तों में बट जाते हैं
अपने पल्ले कुछ नहीं बचता
बचती है
बे-नाम सी उलझन
बचता है
साँसों का ईंधन
जिस में उन की अपनी हर पहचान
और उन के सारे सपने
जल बुझते हैं
इस रस्ते पर चलने वाले
ख़ुद को खो कर जग पाते हैं
ऊपर ऊपर तो जीते हैं
अंदर अंदर मर जाते हैं
दूसरा रस्ता
बहुत कठिन है
इस रस्ते में
कोई किसी के साथ नहीं है
कोई सहारा देने वाला नहीं है
इस रस्ते में
धूप है
कोई छाँव नहीं है
जहाँ तसल्ली भीक में दे दे कोई किसी को
इस रस्ते में
ऐसा कोई गाँव नहीं है
ये उन लोगों का रस्ता है
जो ख़ुद अपने तक जाते हैं
अपने आप को जो पाते हैं
तुम इस रस्ते पर ही चलना
मुझे पता है
ये रस्ता आसान नहीं है
लेकिन मुझ को ये ग़म भी है
तुम को अब तक
क्यूँ अपनी पहचान नहीं है

पंद्रह अगस्त : जावेद अख़्तर

यही जगह थी यही दिन था और यही लम्हात
सरों पे छाई थी सदियों से इक जो काली रात
इसी जगह इसी दिन तो मिली थी उस को मात
इसी जगह इसी दिन तो हुआ था ये एलान
अँधेरे हार गए ज़िंदाबाद हिन्दोस्तान
यहीं तो हम ने कहा था ये कर दिखाना है
जो ज़ख़्म तन पे है भारत के उस को भरना है
जो दाग़ माथे पे भारत के है मिटाना है
यहीं तो खाई थी हम सब ने ये क़सम उस दिन
यहीं से निकले थे अपने सफ़र पे हम उस दिन
यहीं था गूँज उठा वन्दे-मातरम उस दिन
है जुरअतों का सफ़र वक़्त की है राहगुज़र
नज़र के सामने है साठ मील का पत्थर
कोई जो पूछे किया क्या है कुछ किया है अगर
तो उस से कह दो कि वो आए देख ले आ कर
लगाया हम ने था जम्हूरियत का जो पौधा
वो आज एक घनेरा सा ऊँचा बरगद है
और उस के साए में क्या बदला कितना बदला है
कब इंतिहा है कोई इस की कब कोई हद है
चमक दिखाते हैं ज़र्रे अब आसमानों को
ज़बान मिल गई है सारे बे-ज़बानों को
जो ज़ुल्म सहते थे वो अब हिसाब माँगते हैं
सवाल करते हैं और फिर जवाब माँगते हैं
ये कल की बात है सदियों पुरानी बात नहीं
कि कल तलक था यहाँ कुछ भी अपने हाथ नहीं
विदेशी राज ने सब कुछ निचोड़ डाला था
हमारे देश का हर कर्धा तोड़ डाला था
जो मुल्क सूई की ख़ातिर था औरों का मुहताज
हज़ारों चीज़ें वो दुनिया को दे रहा है आज
नया ज़माना लिए इक उमंग आया है
करोड़ों लोगों के चेहरे पे रंग आया है
ये सब किसी के करम से न है इनायत से
यहाँ तक आया है भारत ख़ुद अपनी मेहनत से
जो कामयाबी है उस की ख़ुशी तो पूरी है
मगर ये याद भी रखना बहुत ज़रूरी है
कि दास्तान हमारी अभी अधूरी है
बहुत हुआ है मगर फिर भी ये कमी तो है
बहुत से होंठों पे मुस्कान आ गई लेकिन
बहुत सी आँखें है जिन में अभी नमी तो है
यही जगह थी यही दिन था और यही लम्हात
यहीं तो देखा था इक ख़्वाब सोची थी इक बात
मुसाफ़िरों के दिलों में ख़याल आता है
हर इक ज़मीर के आगे सवाल आता है
वो बात याद है अब तक हमें कि भूल गए
वो ख़्वाब अब भी सलामत है या फ़ुज़ूल गए
चले थे दिल में लिए जो इरादे पूरे हुए
ये कौन है कि जो यादों में चरख़ा कातता है
ये कौन है जो हमें आज भी बताता है
है वादा ख़ुद से निभाना हमें अगर अपना
तो कारवाँ नहीं रुक पाए भूल कर अपना
है थोड़ी दूर अभी सपनों का नगर अपना
मुसाफ़िरो अभी बाक़ी है कुछ सफ़र अपना

भूक : जावेद अख़्तर

आँख खुल गई मेरी
हो गया मैं फिर ज़िंदा
पेट के अंधेरों से
ज़ेहन के धुँदलकों तक
एक साँप के जैसा
रेंगता ख़याल आया
आज तीसरा दिन है...... आज तीसरा दिन है
इक अजीब ख़ामोशी
मुंजमिद है कमरे में
एक फ़र्श और इक छत
और चार दीवारें
मुझ से बे-तअल्लुक़ सब
सब मिरे तमाशाई
सामने की खिड़की से
तेज़ धूप की किरनें
आ रही हैं बिस्तर पर
चुभ रही हैं चेहरे में
इस क़दर नुकीली हैं
जैसे रिश्ते-दारों के
तंज़ मेरी ग़ुर्बत पर
आँख खुल गई मेरी
आज खोखला हूँ मैं
सिर्फ़ ख़ोल बाक़ी है
आज मेरे बिस्तर में
लेटा है मिरा ढाँचा
अपनी मुर्दा आँखों से
देखता है कमरे को
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है
दोपहर की गर्मी में
बे-इरादा क़दमों से
इक सड़क पे चलता हूँ
तंग सी सड़क पर हैं
दोनों सम्त दूकानें
ख़ाली ख़ाली आँखों से
हर दुकान का तख़्ता
सिर्फ़ देख सकता हूँ
अब पढ़ा नहीं जाता
लोग आते जाते हैं
पास से गुज़रते हैं
फिर भी कितने धुँदले हैं
सब हैं जैसे बे-चेहरा
शोर इन दुकानों का
राह चलती इक गाली
रेडियो की आवाज़ें
दूर की सदाएँ हैं
आ रही मीलों से
जो भी सुन रहा हूँ मैं
जो भी देखता हूँ मैं
ख़्वाब जैसा लगता है
है भी और नहीं भी है
दोपहर की गर्मी में
बे-इरादा क़दमों से
इक सड़क पे चलता हूँ
सामने के नुक्कड़ पर
नल दिखाई देता है
सख़्त क्यूँ है ये पानी
क्यूँ गले में फँसता है
मेरे पेट में जैसे
घूँसा एक लगता है
आ रहा है चक्कर सा
जिस्म पर पसीना है
अब सकत नहीं बाक़ी
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है
हर तरफ़ अंधेरा है
घाट पर अकेला हूँ
सीढ़ियाँ हैं पत्थर की
सीढ़ियों पे लेटा हूँ
अब मैं उठ नहीं सकता
आसमाँ को तकता हूँ
आसमाँ को थाली में
चाँद एक रोटी है
झुक रही हैं अब पलकें
डूबता है ये मंज़र
है ज़मीन गर्दिश में
मेरे घर में चूल्हा था
रोज़ खाना पकता था
रोटियाँ सुनहरी हैं
गर्म गर्म ये खाना
खुल नहीं रही आँखें
क्या मैं मरने वाला हूँ
माँ अजीब थी मेरी
रोज़ अपने हाथों से
मुझ को वो खिलाती थी
कौन सर्द हाथों से
छू रहा है चेहरे को
इक निवाला हाथी का
इक निवाला घोड़े का
इक निवाला भालू का
मौत है कि बे-होशी
जो भी ग़नीमत है
मौत है कि बे-होशी
जो भी है ग़नीमत है
आज तीसरा दिन था........ आज तीसरा दिन था

शबाना : जावेद अख़्तर

ये आए दिन के हंगामे
ये जब देखो सफ़र करना
यहाँ जाना वहाँ जाना
इसे मिलना उसे मिलना
हमारे सारे लम्हे
ऐसे लगते हैं
कि जैसे ट्रेन के चलने से पहले
रेलवे-स्टेशन पर
जल्दी जल्दी अपने डब्बे ढूँडते
कोई मुसाफ़िर हों
जिन्हें कब साँस भी लेने की मोहलत है
कभी लगता है
तुम को मुझ से मुझ को तुम से मिलने का
ख़याल आए
कहाँ इतनी भी फ़ुर्सत है
मगर जब संग-दिल दुनिया मेरा दिल तोड़ती है तो
कोई उम्मीद चलते चलते
जब मुँह मोड़ती है तो
कभी कोई ख़ुशी का फूल
जब इस दिल में खिलता है
कभी जब मुझ को अपने ज़ेहन से
कोई ख़याल इनआम मिलता है
कभी जब इक तमन्ना पूरी होने से
ये दिल ख़ाली सा होता है
कभी जब दर्द आ के पलकों पे मोती पिरोता है
तो ये एहसास होता है
ख़ुशी हो ग़म हो हैरत हो
कोई जज़्बा हो
इस में जब कहीं इक मोड़ आए तो
वहाँ पल भर को
सारी दुनिया पीछे छूट जाती है
वहाँ पल भर को
इस कठ-पुतली जैसी ज़िंदगी की
डोरी टूट जाती है
मुझे उस मोड़ पर
बस इक तुम्हारी ही ज़रूरत है
मगर ये ज़िंदगी की ख़ूबसूरत इक हक़ीक़त है
कि मेरी राह में जब ऐसा कोई मोड़ आया है
तो हर उस मोड़ पर मैं ने
तुम्हें हम-राह पाया है

मेले : जावेद अख़्तर

बाप की उँगली थामे
इक नन्हा सा बच्चा
पहले-पहल मेले में गया तो
अपनी भोली-भाली
कंचों जैसी आँखों से
इक दुनिया देखी
ये क्या है और वो क्या है
सब उस ने पूछा
बाप ने झुक कर
कितनी सारी चीज़ों और खेलों का
उस को नाम बताया
नट का
बाज़ीगर का
जादूगर का
उस को काम बताया
फिर वो घर की जानिब लौटे
गोद के झूले में
बच्चे ने बाप के कंधे पर सर रक्खा
बाप ने पूछा
नींद आती है
वक़्त भी एक परिंदा है
उड़ता रहता है
गाँव में फिर इक मेला आया
बूढ़े बाप ने काँपते हाथों से
बेटे की बाँह को थामा
और बेटे ने
ये क्या है और वो क्या है
जितना भी बन पाया
समझाया
बाप ने बेटे के कंधे पर सर रक्खा
बेटे ने पूछा
नींद आती है
बाप ने मुड़ के
याद की पगडंडी पर चलते
बीते हुए
सब अच्छे बुरे
और कड़वे मीठे
लम्हों के पैरों से उड़ती
धूल को देखा
फिर
अपने बेटे को देखा
होंटों पर
इक हल्की सी मुस्कान आई
हौले से बोला
हाँ!
मुझ को अब नींद आती है

आरज़ू के मुसाफ़िर : जावेद अख़्तर

जाने किस की तलाश उन की आँखों में थी
आरज़ू के मुसाफ़िर
भटकते रहे
जितना भी वो चले
इतने ही बिछ गए
राह में फ़ासले
ख़्वाब मंज़िल थे
और मंज़िलें ख़्वाब थीं
रास्तों से निकलते रहे रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
जिन पे सब चलते हैं
ऐसे सब रास्ते छोड़ के
एक अंजान पगडंडी की उँगली थामे हुए
इक सितारे से
उम्मीद बाँधे हुए सम्त की
हर गुमाँ को यक़ीं मान के
अपने दिल से
कोई धोका खाते हुए जान के
सहरा सहरा
समुंदर को वो ढूँडते
कुछ सराबों की जानिब
रहे गामज़न
यूँ नहीं था
कि उन को ख़बर ही न थी
ये समुंदर नहीं
लेकिन उन को कहीं
शायद एहसास था
ये फ़रेब
उन को महव-ए-सफ़र रक्खेगा
ये सबब था
कि था और कोई सबब
जो लिए उन को फिरता रहा
मंज़िलों मंज़िलों
रास्ते रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
अक्सर ऐसा हुआ
शहर-दर-शहर
और बस्ती बस्ती
किसी भी दरीचे में
कोई चराग़-ए-मोहब्बत न था
बे-रुख़ी से भरी
सारी गलियों में
सारे मकानों के
दरवाज़े यूँ बंद थे
जैसे इक सर्द
ख़ामोश लहजे में
वो कह रहे हों
मुरव्वत का और मेहरबानी का मस्कन
कहीं और होगा
यहाँ तो नहीं है
यही एक मंज़र समेटे थे
शहरों के पथरीले सब रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
और कभी यूँ हुआ
आरज़ू के मुसाफ़िर थे
जलती सुलगती हुई धूप में
कुछ दरख़्तों ने साए बिछाए मगर
उन को ऐसा लगा
साए में जो सुकून
और आराम है
मंज़िलों तक पहुँचने न देगा उन्हें
और यूँ भी हुआ
महकी कलियों ने ख़ुशबू के पैग़ाम भेजे उन्हें
उन को ऐसा लगा
चंद कलियों पे कैसे क़नाअत करें
उन को तो ढूँढना है
वो गुलशन कि जिस को
किसी ने अभी तक है देखा नहीं
जाने क्यूँ था उन्हें इस का पूरा यक़ीं
देर हो या सवेर उन को लेकिन कहीं
ऐसे गुलशन के मिल जाएँगे रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
धूप ढलने लगी
बस ज़रा देर में रात हो जाएगी
आरज़ू के मुसाफ़िर जो हैं
उन के क़दमों तले
जो भी इक राह है
वो भी शायद अँधेरे में खो जाएगी
आरज़ू के मुसाफ़िर भी
अपने थके-हारे बे-जान पैरों पे
कुछ देर तक लड़खड़ाएँगे
और गिर के सो जाएँगे
सिर्फ़ सन्नाटा सोचेगा ये रात भर
मंज़िलें तो उन्हें जाने कितनी मिलीं
ये मगर
मंज़िलों को समझते रहे जाने क्यूँ रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
और फिर इक सवेरे की उजली किरन
तीरगी चीर के
जगमगा देगी
जब अन-गिनत रहगुज़ारों पे बिखरे हुए
उन के नक़्श-ए-क़दम
आफ़ियत-गाहों में रहने वाले
ये हैरत से मजबूर हो के कहेंगे
ये नक़्श-ए-क़दम सिर्फ़ नक़्श-ए-क़दम ही नहीं
ये तो दरयाफ़्त हैं
ये तो ईजाद हैं
ये तो अफ़्कार हैं
ये तो अशआर हैं
ये कोई रक़्स हैं
ये कोई राग हैं
इन से ही तो हैं आरास्ता
सारी तहज़ीब ओ तारीख़ के
वक़्त के
ज़िंदगी के सभी रास्ते
वो मुसाफ़िर मगर
जानते-बूझते भी रहे बे-ख़बर
जिस को छू लें क़दम
वो तो बस राह थी
उन की मंज़िल दिगर थी
अलग चाह थी
जो नहीं मिल सके उस की थी आरज़ू
जो नहीं है कहीं उस की थी जुस्तुजू
शायद इस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे

ए'तिराफ़ : जावेद अख़्तर

सच तो ये है क़ुसूर अपना है
चाँद को छूने की तमन्ना की
आसमाँ को ज़मीन पर माँगा
फूल चाहा कि पत्थरों पे खिले
काँटों में की तलाश ख़ुश्बू की
आग से माँगते रहे ठंडक
ख़्वाब जो देखा
चाहा सच हो जाए
इस की हम को सज़ा तो मिलनी थी

उलझन : जावेद अख़्तर

करोड़ों चेहरे
और उन के पीछे
करोड़ों चेहरे
ये रास्ते हैं कि भिड़ के छत्ते
ज़मीन जिस्मों से ढक गई है
क़दम तो क्या तिल भी धरने की अब जगह नहीं है
ये देखता हूँ तो सोचता हूँ
कि अब जहाँ हूँ
वहीं सिमट के खड़ा रहूँ मैं
मगर करूँ क्या
कि जानता हूँ
कि रुक गया तो
जो भीड़ पीछे से आ रही है
वो मुझ को पैरों तले कुचल देगी पीस देगी
तो अब जो चलता हूँ मैं
तो ख़ुद मेरे अपने पैरों में आ रहा है
किसी का सीना
किसी का बाज़ू
किसी का चेहरा
चलूँ
तो औरों पे ज़ुल्म ढाऊँ
रुकूँ
तो औरों के ज़ुल्म झेलूँ
ज़मीर
तुझ को तो नाज़ है अपनी मुंसिफ़ी पर
ज़रा सुनूँ तो
कि आज क्या तेरा फ़ैसला है

अजीब क़िस्सा है : जावेद अख़्तर

अजीब क़िस्सा है
जब ये दुनिया समझ रही थी
तुम अपनी दुनिया में जी रही हो
मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ
तो हम ने सारी निगाहों से दूर
एक दुनिया बसाई थी
जो कि मेरी भी थी
तुम्हारी भी थी
जहाँ फ़ज़ाओं में
दोनों के ख़्वाब जागते थे
जहाँ हवाओं में
दोनों की सरगोशियाँ घुली थीं
जहाँ के फूलों में
दोनों की आरज़ू के सब रंग
खिल रहे थे
जहाँ पे दोनों की जुरअतों के
हज़ार चश्मे उबल रहे थे
न वसवसे थे न रंज-ओ-ग़म थे
सुकून का गहरा इक समुंदर था
और हम थे
अजीब क़िस्सा है
सारी दुनिया ने
जब ये जाना
कि हम ने सारी निगाहों से दूर
एक दुनिया बसाई है तो
हर एक अबरू ने जैसे हम पर कमान तानी
तमाम पेशानियों पे उभरीं
ग़म और ग़ुस्से की गहरी शिकनें
किसी के लहजे से तल्ख़ी छलकी
किसी की बातों में तुरशी आई
किसी ने चाहा
कि कोई दीवार ही उठा दे
किसी ने चाहा
हमारी दुनिया ही वो मिटा दे
मगर ज़माने को हारना था
ज़माना हारा
ये सारी दुनिया को मानना ही पड़ा
हमारे ख़याल की एक सी ज़मीं है
हमारे ख़्वाबों का एक जैसा ही आसमाँ है
मगर पुरानी ये दास्ताँ है
कि हम पे दुनिया
अब एक अर्से से मेहरबाँ है
अजीब क़िस्सा है
जब कि दुनिया ने
कब का तस्लीम कर लिया है
हम एक दुनिया के रहने वाले हैं
सच तो ये है
तुम अपनी दुनिया में जी रही हो
मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ!

एक मोहरे का सफ़र : जावेद अख़्तर

जब वो कम-उम्र ही था
उस ने ये जान लिया था कि अगर जीना है
बड़ी चालाकी से जीना होगा
आँख की आख़िरी हद तक है बिसात-ए-हस्ती
और वो मामूली सा इक मोहरा है
एक इक ख़ाना बहुत सोच के चलना होगा
बाज़ी आसान नहीं थी उस की
दूर तक चारों तरफ़ फैले थे
मोहरे
जल्लाद
निहायत ही सफ़्फ़ाक
सख़्त बे-रहम
बहुत ही चालाक
अपने क़ब्ज़े में लिए
पूरी बिसात
उस के हिस्से में फ़क़त मात लिए
वो जिधर जाता
उसे मिलता था
हर नया ख़ाना नई घात लिए
वो मगर बचता रहा
चलता रहा
एक घर
दूसरा घर
तीसरा घर
पास आया कभी औरों के
कभी दूर हुआ
वो मगर बचता रहा
चलता रहा
गो कि मामूली सा मुहरा था मगर जीत गया
यूँ वो इक रोज़ बड़ा मुहरा बना
अब वो महफ़ूज़ है इक ख़ाने में
इतना महफ़ूज़ है इक ख़ाने में
इतना महफ़ूज़ कि दुश्मन तो अलग
दोस्त भी पास नहीं आ सकते
उस के इक हाथ में है जीत उस की
दूसरे हाथ में तन्हाई है

बे-घर : जावेद अख़्तर

शाम होने को है
लाल सूरज समुंदर में खोने को है
और उस के परे
कुछ परिंदे
क़तारें बनाए
उन्हीं जंगलों को चले
जिन के पेड़ों की शाख़ों पे हैं घोंसले
ये परिंदे
वहीं लौट कर जाएँगे
और सो जाएँगे
हम ही हैरान हैं
इस मकानों के जंगल में
अपना कहीं भी ठिकाना नहीं
शाम होने को है
हम कहाँ जाएँगे

बरगद : जावेद अख़्तर

मेरे रस्ते में इक मोड़ था
और उस मोड़ पर
पेड़ था एक बरगद का
ऊँचा
घना
जिस के साए में मेरा बहुत वक़्त बीता है
लेकिन हमेशा यही मैं ने सोचा
कि रस्ते में ये मोड़ ही इस लिए है
कि ये पेड़ है
उम्र की आँधियों में
वो पेड़ एक दिन गिर गया है
मोड़ लेकिन है अब तक वहीं का वहीं
देखता हूँ तो
आगे भी रस्ते में
बस मोड़ ही मोड़ हैं
पेड़ कोई नहीं
रास्तों में मुझे यूँ तो मिल जाते हैं मेहरबाँ
फिर भी हर मोड़ पर
पूछता है ये दिल
वो जो इक छाँव थी
खो गई है कहाँ

जहन्नमी : जावेद अख़्तर

मैं अक्सर सोचता हूँ
ज़ेहन की तारीक गलियों में
दहकता और पिघलता
धीरे धीरे आगे बढ़ता
ग़म का ये लावा
अगर चाहूँ
तो रुक सकता है
मेरे दिल की कच्ची खाल पर रक्खा ये अँगारा
अगर चाहूँ
तो बुझ सकता है
लेकिन
फिर ख़याल आता है
मेरे सारे रिश्तों में
पड़ी सारी दराड़ों से
गुज़र के आने वाली बर्फ़ से ठंडी हवा
और मेरी हर पहचान पर सर्दी का ये मौसम
कहीं ऐसा न हो
इस जिस्म को इस रूह को ही मुंजमिद कर दे
मैं अक्सर सोचता हूँ
ज़ेहन की तारीक गलियों में
दहकता और पिघलता
धीरे धीरे आगे बढ़ता
ग़म का ये लावा
अज़िय्यत है
मगर फिर भी ग़नीमत है
इसी से रूह में गर्मी
बदन में ये हरारत है
ये ग़म मेरी ज़रूरत है
मैं अपने ग़म से ज़िंदा हूँ

दिल : जावेद अख़्तर

दिल वो सहरा था
कि जिस सहरा में
हसरतें
रेत के टीलों की तरह रहती थीं
जब हवादिस की हवा
उन को मिटाने के लिए
चलती थी
यहाँ मिटती थीं
कहीं और उभर आती थीं
शक्ल खोते ही
नई शक्ल में ढल जाती थीं
दिल के सहरा पे मगर अब की बार
सानेहा गुज़रा कुछ ऐसा
कि सुनाए न बने
आँधी वो आई कि सारे टीले
ऐसे बिखरे
कि कहीं और उभर ही न सके
यूँ मिटे हैं
कि कहीं और बनाए न बने
अब कहीं
टीले नहीं
रेत नहीं
रेत का ज़र्रा नहीं
दिल में अब कुछ नहीं
दिल को सहरा भी अगर कहिए
तो कैसे कहिए

मुअम्मा : जावेद अख़्तर

हम दोनों जो हर्फ़ थे
हम इक रोज़ मिले
इक लफ़्ज़ बना
और हम ने इक मअ'नी पाए
फिर जाने क्या हम पर गुज़री
और अब यूँ है
तुम अब हर्फ़ हो
इक ख़ाने में
में इक हर्फ़ हूँ
इक ख़ाने में
बीच में
कितने लम्हों के ख़ाने ख़ाली हैं
फिर से कोई लफ़्ज़ बने
और हम दोनों इक मअ'नी पाएँ
ऐसा हो सकता है
लेकिन सोचना होगा
इन ख़ाली ख़ानों में हम को भरना क्या है

एक शाएर दोस्त से : जावेद अख़्तर

घर में बैठे हुए क्या लिखते हो
बाहर निकलो
देखो क्या हाल है दुनिया का
ये क्या आलम है
सूनी आँखें हैं
सभी ख़ुशियों से ख़ाली जैसे
आओ इन आँखों में ख़ुशियों की चमक हम लिख दें
ये जो माथे हैं
उदासी की लकीरों के तले
आओ इन माथों पे क़िस्मत की दमक हम लिख दें
चेहरों से गहरी ये मायूसी मिटा के
आओ
इन पे उम्मीद की इक उजली किरन हम लिख दें
दूर तक जो हमें वीराने नज़र आते हैं
आओ वीरानों पर अब एक चमन हम लिख दें
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ समुंदर सा बहे
मौज-ब-मौज
बहर-ए-नग़्मात में
हर कोह-ए-सितम हल हो जाए
दुनिया दुनिया न रहे एक ग़ज़ल हो जाए

हम-साए के नाम : जावेद अख़्तर

कुछ तुम ने कहा
कुछ मैं ने कहा
और बढ़ते बढ़ते बात बढ़ी
दिल ऊब गया
दिल डूब गया
और गहरी काली रात बढ़ी
तुम अपने घर
मैं अपने घर
सारे दरवाज़े बंद किए
बैठे हैं कड़वे घूँट पिए
ओढ़े हैं ग़ुस्से की चादर
कुछ तुम सोचो
कुछ मैं सोचूँ
क्यूँ ऊँची हैं ये दीवारें
कब तक हम इन पर सर मारें
कब तक ये अँधेरे रहने हैं
कीना के ये घेरे रहने हैं
चलो अपने दरवाज़े खोलें
और घर के बाहर आएँ हम
दिल ठहरे जहाँ हैं बरसों से
वो इक नुक्कड़ है नफ़रत का
कब तक इस नुक्कड़ पर ठहरें
अब इस के आगे जाएँ हम
बस थोड़ी दूर इक दरिया है
जहाँ एक उजाला बहता है
वाँ लहरों लहरों हैं किरनें
और किरनों किरनों हैं लहरें
इन किरनों में
इन लहरों में
हम दिल को ख़ूब नहाने दें
सीनों में जो इक पत्थर है
उस पत्थर को घुल जाने दें
दिल के इक कोने में भी छुपी
गर थोड़ी सी भी नफ़रत है
इस नफ़रत को धुल जाने दें
दोनों की तरफ़ से जिस दिन भी
इज़हार नदामत का होगा
तब जश्न मोहब्बत का होगा

काएनात : जावेद अख़्तर

मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ
ये काएनात और इस की वुसअत
तमाम हैरत तमाम हैरत
ये क्या तमाशा ये क्या समाँ है
ये क्या अयाँ है ये क्या निहाँ है
अथाह साग़र है इक ख़ला का
न जाने कब से न जाने कब तक
कहाँ तलक है
हमारी नज़रों की इंतिहा है
जिसे समझते हैं हम फ़लक है
ये रात का छलनी छलनी सा काला आसमाँ है
कि जिस में जुगनू की शक्ल में
बे-शुमार सूरज पिघल रहे हैं
शहाब-ए-साक़िब है
या हमेशा की ठंडी काली फ़ज़ाओं में
जैसे आग के तीर चल रहे हैं
करोड़-हा नूरी बरसों के फ़ासलों में फैली
ये कहकशाएँ
ख़ला घेरे हैं
या ख़लाओं की क़ैद में है
ये कौन किस को लिए चला है
हर एक लम्हा
करोड़ों मीलों की जो मसाफ़त है
इन को आख़िर कहाँ है जाना
अगर है इन का कहीं कोई आख़िरी ठिकाना
तो वो कहाँ है
जहाँ कहीं है
सवाल ये है
वहाँ से आगे कोई ज़मीं है
कोई फ़लक है
अगर नहीं है
तो ये नहीं कितनी दूर तक है
मैं कितनी सदियों से तक रहा हूँ
ये काएनात और इस की वुसअत
तमाम हैरत तमाम हैरत
सितारे जिन की सफ़ीर किरनें
करोड़ों बरसों से राह में है
ज़मीं से मिलने की चाह में है
कभी तो आ के करेंगी ये मेरी आँखें रौशन
कभी तो आएगी मेरे हाथों में रौशनी का एक ऐसा दामन
कि जिस को थामे मैं जा के देखूँगा इन ख़लाओं के
फैले आँगन
कभी तो मुझ को ये काएनात अपने राज़ खुल के
सुना ही देगी
ये अपना आग़ाज़ अपना अंजाम
मुझ को इक दिन बता ही देगी
अगर कोई वाइज़ अपने मिम्बर से
नख़वत-आमेज़ लहज़े में ये कहे
कि तुम तो कभी समझ ही नहीं सकोगे
कि इस क़दर है ये बात गहरी
तो कोई पूछे
जो मैं न समझा
तो कौन समझाएगा
और जिस को कभी न कोई समझ सके
ऐसी बात तो फिर फ़ुज़ूल ठहरी

कच्ची बस्ती : जावेद अख़्तर

गलियाँ
और गलियों में गलियाँ
छोटे घर
नीचे दरवाज़े
टाट के पर्दे
मैली बद-रंगी दीवारें
दीवारों से सर टकराती
कोई गाली
गलियों के सीने पर बहती
गंदी नाली
गलियों के माथे पर बहता
आवाज़ों का गंदा नाला
आवाज़ों की भीड़ बहुत है
इंसानों की भीड़ बहुत है
कड़वे और कसीले चेहरे
बद-हाली के ज़हर से हैं ज़हरीले चेहरे
बीमारी से पीले चेहरे
मरते चेहरे
हारे चेहरे
बे-बस और बेचारे चेहरे
सारे चेहरे
एक पहाड़ी कचरे की
और उस पर फिरते
आवारा कुत्तों से बच्चे
अपना बचपन ढूँड रहे हैं
दिन ढलता है
इस बस्ती में रहने वाले
औरों की जन्नत को अपनी मेहनत दे कर
अपने जहन्नम की जानिब
अब थके हुए
झुँझलाए हुए से
लौट रहे हैं
एक गली में
ज़ंग लगे पीपे रक्खे हैं
कच्ची दारू महक रही है
आज सवेरे से
बस्ती में
क़त्ल-ओ-ख़ूँ का
चाक़ू-ज़नी का
कोई क़िस्सा नहीं हुआ है
ख़ैर
अभी तो शाम है
पूरी रात पड़ी है
यूँ लगता है
सारी बस्ती
जैसे इक दुखता फोड़ा है
यूँ लगता है
सारी बस्ती
जैसे है इक जलता कढ़ाव
यूँ लगता है
जैसे ख़ुदा नुक्कड़ पर बैठा
टूटे-फूटे इंसाँ
औने-पौने दामों
बेच रहा है!

''मेरा आँगन मेरा पेड़'' : जावेद अख़्तर

मेरा आँगन
कितना कुशादा कितना बड़ा था
जिस में
मेरे सारे खेल
समा जाते थे
और आँगन के आगे था वो पेड़ कि जो मुझ से काफ़ी ऊँचा था
लेकिन
मुझ को इस का यक़ीं था
जब मैं बड़ा हो जाऊँगा
इस पेड़ की फुंगी भी छू लूँगा
बरसों ब'अद
मैं घर लौटा हूँ
देख रहा हूँ
ये आँगन
कितना छोटा है
पेड़ मगर पहले से भी थोड़ा ऊँचा है

मिरी दुआ है : जावेद अख़्तर

ख़ला के गहरे समुंदरों में
अगर कहीं कोई है जज़ीरा
जहाँ कोई साँस ले रहा है
जहाँ कोई दिल धड़क रहा है
जहाँ ज़ेहानत ने इल्म का जाम पी लिया है
जहाँ के बासी
ख़ला के गहरे समुंदरों में
उतारने को हैं अपने बेड़े
तलाश करने कोई जज़ीरा
जहाँ कोई साँस ले रहा है
जहाँ कोई दिल धड़क रहा है
मिरी दुआ है
कि उस जज़ीरे में रहने वालों के जिस्म का रंग
इस जज़ीरे के रहने वालों के जिस्म के जितने रंग हैं
इन से मुख़्तलिफ़ हो
बदन की हैअत भी मुख़्तलिफ़
और शक्ल-ओ-सूरत भी मुख़्तलिफ़ हो
मिरी दुआ है
अगर है उन का भी कोई मज़हब
तो इस जज़ीरे के मज़हबों से वो मुख़्तलिफ़ हो
मिरी दुआ है
कि इस जज़ीरे की सब ज़बानों से मुख़्तलिफ़ हो ज़बान उन की
मिरी दुआ है
ख़ला के गहरे समुंदरों से गुज़र के
इक दिन
इस अजनबी नस्ल के जहाज़ी
ख़लाई बेड़े में
इस जज़ीरे तक आएँ
हम उन के मेज़बाँ हों
हम उन को हैरत से देखते हों
वो पास आ कर
हमें इशारों से ये बताएँ
कि उन से हम इतने मुख़्तलिफ़ हैं
कि उन को लगता है
इस जज़ीरे के रहने वाले
सब एक से हैं
मिरी दुआ है
कि इस जज़ीरे के रहने वाले
उस अजनबी नस्ल के कहे का यक़ीन कर लें

बीमार की रात : जावेद अख़्तर

दर्द बे-रहम है
जल्लाद है दर्द
दर्द कुछ कहता नहीं
सुनता नहीं
दर्द बस होता है
दर्द का मारा हुआ
रौंदा हुआ
जिस्म तो अब हार गया
रूह ज़िद्दी है
लड़े जाती है
हाँफती
काँपती
घबराई हुई
दर्द के ज़ोर से
थर्राई हुई
जिस्म से लिपटी है
कहती है
नहीं छोड़ूँगी
मौत
चौखट पे खड़ी है कब से
सब्र से देख रही है उस को
आज की रात
न जाने क्या हो

आसार-ए-क़दीमा : जावेद अख़्तर

एक पत्थर की अधूरी मूरत
चंद ताँबे के पुराने सिक्के
काली चाँदी के अजब से ज़ेवर
और कई कांसे के टूटे बर्तन
एक सहरा मिले
ज़ेर-ए-ज़मीं
लोग कहते हैं कि सदियों पहले
आज सहरा है जहाँ
वहीं इक शहर हुआ करता था
और मुझ को ये ख़याल आता है
किसी तक़रीब
किसी महफ़िल में
सामना तुझ से मिरा आज भी हो जाता है
एक लम्हे को
बस इक पल के लिए
जिस्म की आँच
उचटती सी नज़र
सुर्ख़ बिंदिया की दमक
सरसराहट तिरी मल्बूस की
बालों की महक
बे-ख़याली में कभी
लम्स का नन्हा सा फूल
और फिर दूर तक वही सहरा
वही सहरा कि जहाँ
कभी इक शहर हुआ करता था

परस्तार : जावेद अख़्तर

वो जो कहलाता था दीवाना तिरा
वो जिसे हिफ़्ज़ था अफ़्साना तिरा
जिस की दीवारों पे आवेज़ां थीं
तस्वीरें तिरी
वो जो दोहराता था
तक़रीरें तिरी
वो जो ख़ुश था तिरी ख़ुशियों से
तिरे ग़म से उदास
दूर रह के जो समझता था
वो है तेरे पास
वो जिसे सज्दा तुझे करने से
इंकार न था
उस को दर-अस्ल कभी तुझ से
कोई प्यार न था
उस की मुश्किल थी
कि दुश्वार थे उस के रस्ते
जिन पे बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर
घूमते रहज़न थे
सदा उस की अना के दर पे
उस ने घबरा के
सब अपनी अना की दौलत
तेरी तहवील में रखवा दी थी
अपनी ज़िल्लत को वो दुनिया की नज़र
और अपनी भी निगाहों से छुपाने के लिए
कामयाबी को तिरी
तिरी फ़ुतूहात
तिरी इज़्ज़त को
वो तिरे नाम तिरी शोहरत को
अपने होने का सबब जानता था
है वजूद उस का जुदा तुझ से
ये कब मानता था
वो मगर
पुर-ख़तर रास्तों से आज निकल आया है
वक़्त ने तेरे बराबर न सही
कुछ न कुछ अपना करम उस पे भी फ़रमाया है
अब उसे तेरी ज़रूरत ही नहीं
जिस का दावा था कभी
अब वो अक़ीदत ही नहीं
तेरी तहवील में जो रक्खी थी कल
उस ने अना
आज वो माँग रहा है वापस
बात इतनी सी है
ऐ साहिब-ए-नाम-ओ-शोहरत
जिस को कल
तेरे ख़ुदा होने से इंकार न था
वो कभी तेरा परस्तार न था

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Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...