कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

निदा फ़ाज़ली की नज़्में : Nida Fazli Nazm Hindi

वालिद की वफ़ात पर : निदा फ़ाज़ली

तुम्हारी क़ब्र पर
मैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आया
मुझे मालूम था
तुम मर नहीं सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिस ने उड़ाई थी
वो झूटा था
वो तुम कब थे
कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से मिल के टूटा था
मिरी आँखें
तुम्हारे मंज़रों में क़ैद हैं अब तक
मैं जो भी देखता हूँ
सोचता हूँ
वो वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी
कहीं कुछ भी नहीं बदला
तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैं
मैं लिखने के लिए
जब भी क़लम काग़ज़ उठाता हूँ
तुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हूँ
बदन में मेरे जितना भी लहू है
वो तुम्हारी
लग़्ज़िशों नाकामियों के साथ बहता है
मिरी आवाज़ में छुप कर
तुम्हारा ज़ेहन रहता है
मिरी बीमारियों में तुम
मिरी लाचारियों में तुम
तुम्हारी क़ब्र पर जिस ने तुम्हारा नाम लिखा है
वो झूटा है
तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूँ
तुम मुझ में ज़िंदा हो
कभी फ़ुर्सत मिले तो फ़ातिहा पढ़ने चले आना

दीवानगी रहे बाक़ी : निदा फ़ाज़ली

तू इस तरह से मिरी ज़िंदगी में शामिल है
जहाँ भी जाऊँ ये लगता है तेरी महफ़िल है
हर एक रंग तिरे रूप की झलक ले ले
कोई हँसी कोई लहजा कोई महक ले ले
ये आसमान ये तारे ये रास्ते ये हवा
हर एक चीज़ है अपनी जगह ठिकाने से
कई दिनों से शिकायत नहीं ज़माने से
मिरी तलाश तिरी दिलकशी रहे बाक़ी
ख़ुदा करे कि ये दीवानगी रहे बाक़ी

वक़्त से पहले : निदा फ़ाज़ली

यूँ तो हर रिश्ते का अंजाम यही होता है
फूल खिलता है
महकता है
बिखर जाता है
तुम से वैसे तो नहीं कोई शिकायत
लेकिन
शाख़ हो सब्ज़
तो हस्सास फ़ज़ा होती है
हर कली ज़ख़्म की सूरत ही जुदा होती है
तुम ने
बे-कार ही मौसम को सताया वर्ना
फूल जब खिल के महक जाता है
ख़ुद-ब-ख़ुद
शाख़ से गिर जाता है

आदमी की तलाश : निदा फ़ाज़ली

अभी मरा नहीं ज़िंदा है आदमी शायद
यहीं कहीं उसे ढूँडो यहीं कहीं होगा
बदन की अंधी गुफा में छुपा हुआ होगा
बढ़ा के हाथ
हर इक रौशनी को गुल कर दो
हवाएँ तेज़ हैं झँडे लपेट कर रख दो
जो हो सके तो उन आँखों पे पट्टियाँ कस दो
न कोई पाँव की आहट
न साँसों की आवाज़
डरा हुआ है वो
कुछ और भी न डर जाए
बदन की अंधी गुफा से न कूच कर जाए
यहीं कहीं उसे ढूँडो
वो आज सदियों बाद
उदास उदास है
ख़ामोश है
अकेला है
न जाने कब कोई पसली फड़क उठे उस की
यहीं कहीं उसे ढूँडो यहीं कहीं होगा
बरहना हो तो उसे फिर लिबास पहना दो
अँधेरी आँखों में सूरज की आग दहका दो
बहुत बड़ी है ये बस्ती कहीं भी दफ़ना दो
अभी मरा नहीं
ज़िंदा है आदमी शायद

इत्तिफ़ाक़ : निदा फ़ाज़ली

हम सब
एक इत्तिफ़ाक़ के
मुख़्तलिफ़ नाम हैं
मज़हब
मुल्क
ज़बान
इसी इत्तिफ़ाक़ की अन-गिनत कड़ियाँ हैं
अगर पैदाइश से पहले
इन्तिख़ाब की इजाज़त होती
तो कोई लड़का
अपने बाप के घर में पैदा होना पसंद नहीं करता

इंतिज़ार : निदा फ़ाज़ली

मुद्दतें बीत गईं
तुम नहीं आईं अब तक
रोज़ सूरज के बयाबाँ में
भटकती है हयात
चाँद के ग़ार में
थक-हार के सो जाती है रात
फूल कुछ देर महकता है
बिखर जाता है
हर नशा
लहर बनाने में उतर जाता है
वक़्त!
बे-चेहरा हवाओं सा गुज़र जाता है
किसी आवाज़ के सब्ज़े में लहक जैसी तुम
किसी ख़ामोश तबस्सुम में चमक जैसी तुम
किसी चेहरे में महकती हुई आँखों जैसी
कहीं अबरू कहीं गेसू कहीं बाँहों जैसी
चाँद से
फूल तलक
यूँ तो तुम्हीं तुम हो मगर
तुम कोई चेहरा कोई जिस्म कोई नाम नहीं
तुम जहाँ भी हो
अधूरी हो हक़ीक़त की तरह
तुम कोई ख़्वाब नहीं हो
जो मुकम्मल होगी

वो लड़की : निदा फ़ाज़ली

वो लड़की याद आती है
जो होंटों से नहीं पूरे बदन से बात करती थी
सिमटते वक़्त भी चारों दिशाओं में बिखरती थी
वो लड़की याद आती है
वो लड़की अब न जाने किस के बिस्तर की किरन होगी
अभी तक फूल की मानिंद होगी या चमन होगी
सजीली रात
अब भी
जब कभी घूँघट उठाती है
लचकती कहकशाँ जब बनते बनते टूट जाती है
कोई अलबेली ख़ुशबू बाल खोले मुस्कुराती है
वो लड़की याद आती है

मोहब्बत : निदा फ़ाज़ली

पहले वो रंग थी
फिर रूप बनी
रूप से जिस्म में तब्दील हुई
और फिर जिस्म से बिस्तर बन कर
घर के कोने में लगी रहती है
जिस को
कमरे में घटा सन्नाटा
वक़्त-बे-वक़्त उठा लेता है
खोल लेता है बिछा, लेता है

सुना है मैं ने : निदा फ़ाज़ली

सुना है मैं ने!
कई दिन से तुम परेशाँ हो
किसी ख़याल में
हर वक़्त खोई रहती हो
गली में जाती हो
जाते ही लौट आती हो
कहीं की चीज़
कहीं रख के भूल जाती हो
किचन में!
रोज़ कोई प्याली तोड़ देती हो
मसाला पीस कर
सिल यूँही छोड़ देती हो
नसीहतों से ख़फ़ा
मश्वरों से उलझन सी
कमर में दर्द की लहरें
रगों में एैंठन सी
यक़ीन जानो!
बहुत दूर भी नहीं वो घड़ी
हर इक फ़साने का उनवाँ बदल चुका होगा
मिरे पलंग की चौड़ाई
घट चुकी होगी
तुम्हारे जिस्म का सूरज पिघल चुका होगा

सोने से पहले : निदा फ़ाज़ली

हर लड़की के
तकिए के नीचे
तेज़ ब्लेड
गोंद की शीशी
और कुछ तस्वीरें होती हैं
सोने से पहले
वो कई तस्वीरों की तराश-ख़राश से
एक तस्वीर बनाती है
किसी की आँखें किसी के चेहरे पर लगाती है
किसी के जिस्म पर किसी का चेहरा सजाती है
और जब इस खेल से ऊब जाती है
तो किसी भी गोश्त-पोस्त के आदमी के साथ
लिपट कर सो जाती है

लफ़्ज़ों का पुल : निदा फ़ाज़ली

मस्जिद का गुम्बद सूना है
मंदिर की घंटी ख़ामोश
जुज़दानों में लिपटे आदर्शों को
दीमक कब की चाट चुकी है
रंग
गुलाबी
नीले
पीले
कहीं नहीं हैं
तुम उस जानिब
मैं इस जानिब
बीच में मीलों गहरा ग़ार
लफ़्ज़ों का पुल टूट चुका है
तुम भी तन्हा
मैं भी तन्हा

फ़ासला : निदा फ़ाज़ली

ये फ़ासला
जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ है
हर इक ज़माने की दास्ताँ है
न इब्तिदा है
न इंतिहा है
मसाफ़तों का अज़ाब साँसों का दाएरा है
न तुम कहीं हो
न मैं कहीं हूँ
तलाश रंगीन वाहिमा है
सफ़र में लम्हों का कारवाँ है
ये फ़ासला!
जो तुम्हारे और मेरे दरमियाँ है
यही तलब है यही जज़ा है
यही ख़ुदा है

सच्चाई : निदा फ़ाज़ली

वो किसी एक मर्द के साथ
ज़ियादा दिन नहीं रह सकती
ये उस की कमज़ोरी नहीं
सच्चाई है
लेकिन जितने दिन वो जिस के साथ रहती है
उस के साथ बेवफ़ाई नहीं करती
उसे लोग भले ही कुछ कहें
मगर
किसी एक घर में
ज़िंदगी भर झूट बोलने से
अलग अलग मकानों में सच्चाइयाँ बिखेरना
ज़ियादा बेहतर है

बस यूँही जीते रहो : निदा फ़ाज़ली

बस यूँही जीते रहो
कुछ न कहो
सुब्ह जब सो के उठो
घर के अफ़राद की गिनती कर लो
टाँग पर टाँग रखे रोज़ का अख़बार पढ़ो
उस जगह क़हत गिरा
जंग वहाँ पर बरसी
कितने महफ़ूज़ हो तुम शुक्र करो
रेडियो खोल के फिल्मों के नए गीत सुनो
घर से जब निकलो तो
शाम तक के लिए होंटों में तबस्सुम सी लो
दोनों हाथों में मुसाफ़े भर लो
मुँह में कुछ खोखले बे-मअ'नी से जुमले रख लो
मुख़्तलिफ़ हाथों में सिक्कों की तरह घिसते रहो
कुछ न कहो
उजली पोशाक
समाजी इज़्ज़त
और क्या चाहिए जीने के लिए
रोज़ मिल जाती है पीने के लिए
बस यूँही जीते रहो
कुछ न कहो

नज़्म बहुत आसान थी पहले : निदा फ़ाज़ली

नज़्म बहुत आसान थी पहले
घर के आगे
पीपल की शाख़ों से उछल के
आते जाते
बच्चों के बस्तों से निकल के
रंग-ब-रंगी
चिड़ियों की चहकार में ढल के
नज़्म मिरे घर जब आती थी
मेरे क़लम से, जल्दी जल्दी
ख़ुद को पूरा लिख जाती है
अब सब मंज़र
बदल चुके हैं
छोटे छोटे चौराहों से
चौड़े रस्ते निकल चुके हैं
नए नए बाज़ार
पुराने गली मोहल्ले निगल चुके हैं
नज़्म से मुझ तक
अब कोसों लम्बी दूरी है
इन कोसों लम्बी दूरी में
कहीं अचानक
बम फटते हैं
कोख में माओं के
सोते बच्चे कटते हैं
मज़हब और सियासत
दोनों
नए नए नारे रटते हैं
बहुत से शहरों
बहुत से मुल्कों से
अब चल कर
नज़्म मिरे घर जब आती है
इतनी ज़ियादा थक जाती है
मेरे लिखने की टेबल पर
ख़ाली काग़ज़ को
ख़ाली ही छोड़ के रुख़्सत हो जाती है
और किसी फ़ुट-पाथ पे जा कर
शहर के सब से बूढ़े शहरी की
पलकों पर!
आँसू बन कर सो जाती है

नींद पूरे बिस्तर में नहीं होती : निदा फ़ाज़ली

नींद पूरे बिस्तर में नहीं होती
वो पलंग के एक कोने में
दाएँ
या बाएँ
कसी मख़्सूस तकिए की
तोड़-मोड़ में छुपी होती है
जब तकिए और गर्दन में
समझौता हो जाता है
तो आदमी चैन से
सो जाता है

क़ौमी यक-जेहती : निदा फ़ाज़ली

वो तवाइफ़
कई मर्दों को पहचानती है
शायद इसी लिए
दुनिया को ज़ियादा जानती है
उस के कमरे में
हर मज़हब के भगवान की एक एक तस्वीर लटकी है
ये तस्वीरें
लीडरों की तक़रीरों की तरह नुमाइशी नहीं
उस का दरवाज़ा
रात गए तक
हिन्दू
मुस्लिम
सिख
ईसाई
हर मज़हब के आदमी के लिए खुला रहता है
ख़ुदा जाने
उस के कमरे की सी कुशादगी
मस्जिद और मंदिर के आँगनों में कब पैदा होगी

एक कहानी : निदा फ़ाज़ली

तुम ने
शायद किसी रिसाले में
कोई अफ़्साना पढ़ लिया होगा
खो गई होगी रूप की रानी
इश्क़ ने ज़हर खा लिया होगा
तुम अकेली खड़ी हुई होगी
सर से आँचल ढलक रहा होगा
या पड़ोसन के फूल से रुख़ पर
कोई धब्बा चमक रहा होगा
काम में होंगे सारे घर वाले
रेडियो गुनगुना रहा होगा
तुम पे नश्शा सा छा गया होगा
मुझ को विश्वाश है कि अब तुम भी
शाम को खिड़की खोल देने पर
अपनी लड़की को टोकती होगी
गीत गाने से रोकती होगी

ख़ुदा ख़ामोश है : निदा फ़ाज़ली

बहुत से काम हैं
लिपटी हुई धरती को फैला दें
दरख़्तों को उगाएँ
डालियों पे फूल महका दें
पहाड़ों को क़रीने से लगाएँ
चाँद लटकाएँ
ख़लाओं के सरों पे नील-गूँ आकाश
फैलाएँ
सितारों को करें रौशन
हवाओं को गती दे दें
फुदकते पत्थरों को पँख दे कर नग़्मगी दे दें
लबों को मुस्कुराहट
अँखड़ियों को रौशनी दे दें
सड़क पर डोलती परछाइयों को
ज़िंदगी दे दें
ख़ुदा ख़ामोश है!
तुम आओ तो तख़्लीक़ हो दुनिया
मैं इतने सारे कामों को अकेला कर नहीं सकता

खेलता बच्चा : निदा फ़ाज़ली

घास पर खेलता है इक बच्चा
पास माँ बैठी मुस्कुराती है
मुझ को हैरत है जाने क्यूँ दुनिया
काबा ओ सोमनात जाती है

ख़ुदा का घर नहीं कोई : निदा फ़ाज़ली

ख़ुदा का घर नहीं कोई
बहुत पहले हमारे गाँव के अक्सर बुज़ुर्गों ने
उसे देखा था
पूजा था
यहीं था वो
यहीं बच्चों की आँखों में
लहकते सब्ज़ पेड़ों में
वो रहता था
हवाओं में महकता था
नदी के साथ बहता था
हमारे पास वो आँखें कहाँ हैं
जो पहाड़ी पर
चमकती
बोलती
आवाज़ को देखें
हमारे कान बहरे हैं
हमारी रूह अंधी है
हमारे वास्ते
अब फूल खिलते हैं
न कोंपल गुनगुनाती है
न ख़ामोशी अकेले में सुनहरे गीत गाती है
हमारा अहद!
माँ के पेट से अंधा है बहरा है
हमारे आगे पीछे
मौत का तारीक पहरा है

फ़क़त चंद लम्हे : निदा फ़ाज़ली

बहुत देर है
बस के आने में
आओ
कहीं पास की लॉन पर बैठ जाएँ
चटख़्ता है मेरी भी रग रग में सूरज
बहुत देर से तुम भी चुप चुप खड़ी हो
न मैं तुम से वाक़िफ़
न तुम मुझ से वाक़िफ़
नई सारी बातें नए सारे क़िस्से
चमकते हुए लफ़्ज़ चमकते लहजे
फ़क़त चंद घड़ियाँ
फ़क़त चंद लम्हे
न मैं अपने दुख-दर्द की बात छेड़ूँ
न तुम अपने घर की कहानी सुनाओ
मैं मौसम बनूँ
तुम फ़ज़ाएँ जगाओ

बूढ़ा : निदा फ़ाज़ली

हर माँ अपनी कोख से
अपना शौहर ही पैदा करती है
मैं भी जब
अपने कंधों पर
बूढ़े मलबे को ढो ढो कर
थक जाऊँगा
अपनी महबूबा के
कँवारे गर्भ में
छुप कर सो जाऊँगा
हर माँ अपनी कोख से
अपना शौहर ही पैदा करती है

फ़ातिहा : निदा फ़ाज़ली

अगर क़ब्रिस्तान में
अलग अलग कत्बे न हों
तो हर क़ब्र में
एक ही ग़म सोया हुआ रहता है
किसी माँ का बेटा
किसी भाई की बहन
किसी आशिक़ की महबूबा
तुम!
किसी क़ब्र पर भी फ़ातिहा पढ़ के चले जाओ

सलीक़ा : निदा फ़ाज़ली

देवता है कोई हम में
न फ़रिश्ता कोई
छू के मत देखना
हर रंग उतर जाता है
मिलने-जुलने का सलीक़ा है ज़रूरी वर्ना
आदमी चंद मुलाक़ातों में मर जाता है

छोटी सी हँसी : निदा फ़ाज़ली

सूनी सूनी थी फ़ज़ा
मैं ने यूँही
उस के बालों में गुँधी ख़ामोशियों को छू लिया
वो मुड़ी
थोड़ा हँसी
मैं भी हँसा
फिर हमारे साथ
नदियाँ वादियाँ
कोहसार बादल
फूल कोंपल
शहर जंगल
सब के सब हँसने लगे
इक मोहल्ले में
किसी घर के
किसी कोने की
छोटी सी हँसी ने
दूर तक फैली हुई दुनिया को
रौशन कर दिया है
ज़िंदगी में
ज़िंदगी का रंग फिर से भर दिया है

एक तस्वीर : निदा फ़ाज़ली

सुब्ह की धूप
धुली शाम का रूप
फ़ाख़्ताओं की तरह सोच में डूबे तालाब
अजनबी शहर के आकाश
अँधेरों की किताब
पाठशाला में चहकते हुए मासूम गुलाब
घर के आँगन की महक
बहते पानी की खनक
सात रंगों की धनक
तुम को देखा तो नहीं है
लेकिन
मेरी तंहाई में
ये रंग-बिरंगे मंज़र
जो भी तस्वीर बनाते हैं
वो!
तुम जैसी है

छोटी सी शॉपिंग : निदा फ़ाज़ली

गोटे वाली
लाल ओढ़नी
उस पर
चोली-घागरा
उसी से मैचिंग करने वाला
छोटा सा इक नागरा
छोटी सी!
ये शॉपिंग थी
या!
कोई जादू-टोना
लम्बा चौड़ा शहर अचानक
बन कर
एक खिलौना
इतिहासों का जाल तोड़ के
दाढ़ी
पगड़ी
ऊँट छोड़ के
''अलिफ़'' से
अम्माँ
''बे'' से
बाबा
बैठा बाज रहा था
पाँच साल की बच्ची
बन कर जयपुर
नाच रहा था

कल रात : निदा फ़ाज़ली

कल रात
वो थका हुआ
चुप चुप
उदास उदास
सुनता रहा सड़क से गुज़रती बसों का शोर
पीपल का पत्ता टूट के दीवार ढा गया
आंतों का दर्द नींद की परियों को खा गया
झुँझला के उस ने चाँदी का दीपक बुझा दिया
आकाश को समेट के नीचे गिरा दिया
फैली हुई ज़मीं को धुएँ सा उड़ा दिया
फिर कुछ नहीं
न खेत, न मैदाँ, न रास्ते
बस इक निगाह
खिड़की की रंग-जालियाँ
(बस तीन चार आने की दो चार गोलियां)

नया दिन : निदा फ़ाज़ली

सूरज!
इक नट-खट बालक-सा
दिन भर शोर मचाए
इधर उधर चिड़ियों को बिखेरे
किरनों को छितराए
क़लम दरांती ब्रश हथौड़ा
जगह जगह फैलाए
शाम! थकी हारी माँ जैसी
इक दिया मलकाए
धीमे धीमे
सारी बिखरी चीज़ें चुनती जाए

रुख़्सत होते वक़्त : निदा फ़ाज़ली

रुख़्सत होते वक़्त
उस ने कुछ नहीं कहा
लेकिन एयरपोर्ट पर अटैची खोलते हुए
मैं ने देखा
मेरे कपड़े के नीचे
उस ने
अपने दोनों बच्चों की तस्वीर छुपा दी है
तअज्जुब है
छोटी बहन हो कर भी
उस ने मुझे माँ की तरह दुआ दी है

पैदाइश : निदा फ़ाज़ली

बंद कमरा
छटपटाता सा अंधेरा
और
दीवारों से टकराता हुआ
मैं!!
मुंतज़िर हूँ मुद्दतों से अपनी पैदाइश के दिन का
अपनी माँ के पेट से
निकला हूँ जब से
मैं!!
ख़ुद अपने पेट के अंदर पड़ा हूँ

एक चिड़िया : निदा फ़ाज़ली

जामुन की इक शाख़ पे बैठी इक चिड़िया
हरे हरे पत्तों में छप कर गाती है
नन्हे नन्हे तीर चलाए जाती है
और फिर अपने आप ही कुछ उकताई सी
चूँ चूँ करती पर तोले उड़ जाती है
धुँदला धुँदला दाग़ सा बनती जाती है
मैं अपने आँगन में खोया खोया सा
आहिस्ता आहिस्ता घुलता जाता हूँ
किसी परिंदे के पर सा लहराता हूँ
दूर गगन की उजयाली पेशानी पर
धुँदला धुँदला दाग़ सा बनता जाता हूँ

इतनी पी जाओ : निदा फ़ाज़ली

इतनी पी जाओ
कि कमरे की सियह ख़ामोशी
इस से पहले कि कोई बात करे
तेज़ नोकीले सवालात करे
इतनी पी जाओ कि दीवारों के बे-रंग निशान
इस से पहले कि
कोई रूप भरें
माँ बहन भाई को तस्वीर करें
मुल्क तक़्सीम करें
इस से पहले कि उठें दीवारें
ख़ून से माँग भरें तलवारें
यूँ गिरो टूट के बिस्तर पे अँधेरा हो जाए
जब खुले आँख सवेरा हो जाए
इतनी पी जाओ!

बे-ख़्वाब नींद : निदा फ़ाज़ली

न जाने कौन वो बहरूपिया है
जो हर शब
मिरी थकी हुई पलकों की सब्ज़ छाँव में
तरह तरह के करिश्मे दिखाया करता है
लपकती सुर्ख़ लपट
झूमती हुई डाली
चमकते ताल के पानी में डूबता पत्थर
उभरते फैलते घेरों में तैरते ख़ंजर
उछलती गेंद रबड़ की सधे हुए दो हाथ
सुलगते खेत की मिट्टी पे टूटती बरसात
अजीब ख़्वाब हैं ये
बिना वज़ू किए सोई नहीं कभी मैं तो
मैं सोचती हूँ
किसी रोज़ अपनी भाबी के
चमकते पाँव की पाज़ेब तोड़ कर रख दूँ
बड़ी शरीर है हर वक़्त शोर करती हैं
किसी तरह सही बे-ख़्वाब नींद तो आए
घड़ी घड़ी की मुसीबत से जान छुट जाए

हिजरत : निदा फ़ाज़ली

ज़रूरी काग़ज़ों की फ़ाइलों से
बे-ज़रूरी
काग़ज़ों को
छाँटा जाता है
कभी कुछ फेंका जाता है
कभी कुछ बाँटा जाता है
कई बरसों के रिश्तों को
पलों में
काटा जाता है
वो शीशा हो
कि पत्थर हो
बिना दुम का वो बंदर हो
निशानों से भरा
या कोई बोसीदा कैलेंडर हो
पुराने घर के ताक़ों में
मचानों में
वो सब!!
छोटा हुआ अपना
कभी बन कर कोई आँसू
कभी बन कर कोई सपना
अचानक
जगमगाता है
वो सब खोया हुआ
अपने न होने से सताता है
मकानों के बदलने से
नए ख़ानों में ढलने से
बहुत कुछ टूट जाता है
बहुत कुछ छूट जाता है

खेल : निदा फ़ाज़ली

आओ
कहीं से थोड़ी सी मिट्टी भर लाएँ
मिट्टी को बादल में गूँधें
नए नए आकार बनाएँ
किसी के सर पे चुटिया रख दें
माथे ऊपर तिलक सजाएँ
किसी के छोटे से चेहरे पर
मोटी सी दाढ़ी फैलाएँ
कुछ दिन इन से जी बहलाएँ
और ये जब मैले हो जाएँ
दाढ़ी चोटी तिलक सभी को
तोड़-फोड़ के गड-मड कर दें
मिली-जुली ये मिट्टी फिर से
अलग अलग साँचों में भर दें
नए नए आकार बनाएँ
दाढ़ी में चोटी लहराए
चोटी में दाढ़ी छुप जाए
किस में कितना कौन छपा है
कौन बताए

मोर नाच : निदा फ़ाज़ली

देखते देखते
उस के चारों तरफ़
सात रंगों का रेशम बिखरने लगा
धीमे धीमे कई खिड़कियाँ सी खुलीं
फड़फड़ाती हुई फ़ाख़ताएँ उड़ीं
बदलियाँ छा गईं
बिजलियों की लकीरें चमकने लगीं
सारी बंजर ज़मीनें हरी हो गईं
नाचते नाचते
मोर की आँख से
पहला आँसू गिरा
ख़ूबसूरत सजीले परों की धनक
टूट कर टुकड़ा टुकड़ा बिखरने लगी
फिर फ़ज़ाओं से जंगल बरसने लगा
देखते देखते....

नक़ाबें : निदा फ़ाज़ली

नीली पीली हरी गुलाबी
मैं ने सब रंगीन नक़ाबें
अपनी जेबों में भर ली हैं
अब मेरा चेहरा नंगा है
बिल्कुल नंगा
अब!
मेरे साथी ही मुझ पर
पग पग
पत्थर फेंक रहे हैं
शायद वो
मेरे चेहरे में अपना चेहरा देख रहे हैं

कच्ची दीवारें : निदा फ़ाज़ली

मेरी माँ हर दिन अपने बूढे हाथों से
इधर उधर से मिट्टी ला कर
घर की कच्ची दीवारों के ज़ख़्मों को
भरती रहती है
तेज़ हवाओं के झोंकों से
बेचारी कितना डरती है
मेरी माँ कितनी भोली है
बरसों की सीली दीवारें
छोटे-मोटे पैवंदों से
आख़िर कब तक रुक पाएँगी
जब कोई बादल गरजेगा
हर हर करती ढह जाएँगी

नया सफ़र : निदा फ़ाज़ली

आसमाँ लोहा दिशाएँ पत्थर
सर-निगूँ सारे खुजूरों के दरख़्त
कोई हरकत न सदा
बुझ गई बूढ़ी पहाड़ी पे चमकती हुई आग!
थम गए पाक सितारों से बरसते हुए राग
फिर से काँधों पे जमालो सर को
फिर से जिस्मों में लगा लो टाँगें
ढूँड लो खोई हुई आँखों को
अब किसी पर नहीं उतरेगा सहीफ़ा कोई

सरहद-पार का एक ख़त पढ़ कर : निदा फ़ाज़ली

दवा की शीशी में
सूरज
उदास कमरे में चाँद
उखड़ती साँसों में रह रह के
एक नाम की गूँज....!
तुम्हारे ख़त को कई बार पढ़ चुका हूँ मैं
कोई फ़क़ीर खड़ा गिड़गिड़ा रहा था अभी
बिना उठे उसे धुत्कार कर भगा भी चुका
गली में खेल रहा था पड़ोस का बच्चा
बुला कर पास उसे मार कर रुला भी चुका
बस एक आख़िरी सिगरेट बचा था पैकेट में
उसे भी फूँक चुका
घिस चुका
बुझा भी चुका
न जाने वक़्त है क्या दूर तक है सन्नाटा
फ़क़त मुंडेर के पिंजरे में ऊँघता पंछी
कभी कभी यूँही पंजे चिल्लाने लगता है
फिर अपने-आप ही
दाने उठाने लगता है
तुम्हारे ख़त को.....

चौथा आदमी : निदा फ़ाज़ली

बैठे बैठे यूँही क़लम ले कर
मैं ने काग़ज़ के एक कोने पर
अपनी माँ
अपने बाप के दो नाम
एक घेरा बना के काट दिए
और
इस गोल दाएरे के क़रीब
अपना छोटा सा नाम टाँक दिया
मेरे उठते ही, मेरे बच्चे ने
पूरे काग़ज़ को ले कर फाड़ दिया!

मशीन : निदा फ़ाज़ली

मशीन चल रही हैं
नीले पीले लाल लोहे की मशीनों में
हज़ारों आहनी पुर्ज़े
मुक़र्रर हरकतों के दाएरों में
चलते फिरते हैं
सहर से शाम तक पुर-शोर आवाज़ें उगलते हैं
बड़ा छोटा हर इक पुर्ज़ा
कसा है कील-पंचों से
हज़ारों घूमते पुर्ज़ों को अपने पेट में डाले
मशीनें सोचती हैं
चीख़ती हैं
जंग करती हैं
मशीनें चल रही हैं

पिघलता धुआँ : निदा फ़ाज़ली

दूर शादाब पहाड़ी पे बना इक बंगला
लाल खपरैलों पे फैली हुई अँगूर की बेल
सेहन में बिखरे हुए मिट्टी के राजा-रानी
मुँह चिढ़ाती हुई बच्चों को कोई दीवानी
सेब के उजले दरख़्तों की घनी छाँव में
पाँव डाले हुए तालाब में कोई लड़की
गोरे हाथों में सँभाले हुए तकिए का ग़िलाफ़
अन-कही बातों को धागों में सिए जाती है
दिल के जज़्बात का इज़हार किए जाती है
गर्म चूल्हे के क़रीं बैठी हुई इक औरत
एक पैवंद लगी साड़ी से तन को ढाँपे
धुँदली आँखों से मिरी सम्त तके जाती है
मुझ को आवाज़ पे आवाज़ दिए जाती है
इक सुलगती हुई सिगरेट का बल खाता धुआँ
फैलता जाता है हर सम्त मिरे कमरे में

सितंबर1965 : निदा फ़ाज़ली

किसी क़साई ने
इक हड्डी छील कर फेंकी
गली के मोड़ से
दो कुत्ते भौंकते उठ्ठे
किसी ने पाँव उठाए
किसी ने दुम पटकी
बहुत से कुत्ते खड़े हो कर शोर करने लगे
न जाने क्यूँ मिरा जी चाहा
अपने सब कपड़े
उतार कर किसी चौराहे पर खड़ा हो जाऊँ
हर एक चीज़ पे झपटूँ
घड़ी घड़ी चिल्लाऊँ
निढाल हो के जहाँ चाहूँ
जिस्म फैला दूँ
हज़ारों साल की सच्चाइयों को
झुटला दूँ

जेब कटने के ब'अद : निदा फ़ाज़ली

मिरे कुर्ते की बूढ़ी जेब से कल
तुम्हारी याद!!
चुपके से निकल कर
सड़क के शोर-ओ-गुल में खो गई है
बड़ी बस्ती है
किस को फ़िक्र इतनी!
कि किस खोली में कब से तीरगी है
यहाँ
हर एक को अपनी पड़ी है

बुझ गए नील-गगन : निदा फ़ाज़ली

अब कहीं कोई नहीं
जल गए सारे फ़रिश्तों के बदन
बुझ गए नील-गगन
टूटता चाँद बिखरता सूरज
कोई नेकी न बदी
अब कहीं कोई नहीं
आग के शोले बढ़े
आसमानों का ख़ुदा
डर के ज़मीं पर उतरा
चार छे गाम चला टूट गया
आदमी अपनी ही दीवारों से पत्थर ले कर
फिर गुफाओं की तरफ़ लौट गया
अब कहीं कोई नहीं

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