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जौन एलिया की नज़्में : Jaun Elia Ki Nazm Hindi

रम्ज़ : जौन एलिया

तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे
मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं
मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें
मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं
इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर
इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन
मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता
ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

सज़ा : जौन एलिया

हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं
तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम
मैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं
तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में
और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं
पस सर-ब-सर अज़िय्यत ओ आज़ार ही रहो
बेज़ार हो गई हो बहुत ज़िंदगी से तुम
जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो
तुम को यहाँ के साया ओ परतव से क्या ग़रज़
तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो
मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बे-मेहर ही रहा
तुम इंतिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो
तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई
इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो
मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात
मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो
अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मिरे लिए
बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो
जब मैं तुम्हें नशात-ए-मोहब्बत न दे सका
ग़म में कभी सुकून-ए-रिफ़ाक़त न दे सका
जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं
जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बेवफ़ा के हैं
फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

शायद : जौन एलिया

मैं शायद तुम को यकसर भूलने वाला हूँ
शायद जान-ए-जाँ शायद
कि अब तुम मुझ को पहले से ज़ियादा याद आती हो
है दिल ग़मगीं बहुत ग़मगीं
कि अब तुम याद दिलदाराना आती हो
शमीम-ए-दूर-माँदा हो
बहुत रंजीदा हो मुझ से
मगर फिर भी
मशाम-ए-जाँ में मेरे आश्ती-मंदाना आती हो
जुदाई में बला का इल्तिफ़ात-ए-मेहरमाना है
क़यामत की ख़बर-गीरी है
बेहद नाज़-बरदारी का आलम है
तुम्हारे रंग मुझ में और गहरे होते जाते हैं
मैं डरता हूँ
मिरे एहसास के इस ख़्वाब का अंजाम क्या होगा
ये मेरे अंदरून-ए-ज़ात के ताराज-गर
जज़्बों के बैरी वक़्त की साज़िश न हो कोई
तुम्हारे इस तरह हर लम्हा याद आने से
दिल सहमा हुआ सा है
तो फिर तुम कम ही याद आओ
मता-ए-दिल मता-ए-जाँ तो फिर तुम कम ही याद आओ
बहुत कुछ बह गया है सैल-ए-माह-ओ-साल में अब तक
सभी कुछ तो न बह जाए
कि मेरे पास रह भी क्या गया है
कुछ तो रह जाए

दरख़्त-ए-ज़र्द : जौन एलिया

नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
वो किन ख़्वाबों से जाने आश्ना ना-आश्ना होगी
तुम्हारे दिल के इस दुनिया से कैसे सिलसिले होंगे
तुम्हें कैसे गुमाँ होंगे तुम्हें कैसे गिले होंगे
तुम्हारी सुब्ह जाने किन ख़यालों से नहाती हो
तुम्हारी शाम जाने किन मलालों से निभाती हो
न जाने कौन दोशीज़ा तुम्हारी ज़िंदगी होगी
न जाने उस की क्या बायसतगी शाइस्तगी होगी
उसे तुम फ़ोन करते और ख़त लिखते रहे होगे
न जाने तुम ने कितनी कम ग़लत उर्दू लिखी होगी
ये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा है
ये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा है
वो हँसती हो तो शायद तुम न रह पाते हो हालों में
गढ़ा नन्हा सा पड़ जाता हो शायद उस के गालों में
गुमाँ ये है तुम्हारी भी रसाई ना-रसाई हो
वो आई हो तुम्हारे पास लेकिन आ न पाई हो
वो शायद माइदे की गंद बिरयानी न खाती हो
वो नान-ए-बे-ख़मीर-ए-मैदा कम-तर ही चबाती हो
वो दोशीज़ा भी शायद दास्तानों की हो दिल-दादा
उसे मालूम होगा 'ज़ाल' था 'सोहराब' का दादा
तहमतन यानी 'रुस्तम' था गिरामी 'साम' का वारिस
गिरामी 'साम' था सुल्ब-ए-नर-ए-'मानी' का ख़ुश-ज़ादा
(ये मेरी एक ख़्वाहिश है जो मुश्किल है)
वो 'नज्म'-आफ़ंदि-ए-मरहूम को तो जानती होगी
वो नौहों के अदब का तर्ज़ तो पहचानती होगी
उसे कद होगी शायद उन सभी से जो लपाड़ी हों
न होंगे ख़्वाब उस का जो गवय्ये और खिलाड़ी हों
हदफ़ होंगे तुम्हारा कौन तुम किस के हदफ़ होगे
न जाने वक़्त की पैकार में तुम किस तरफ़ होगे
है रन ये ज़िंदगी इक रन जो बरपा लम्हा लम्हा है
हमें इस रन में कुछ भी हो किसी जानिब तो होना है
सो हम भी इस नफ़स तक हैं सिपाही एक लश्कर के
हज़ारों साल से जीते चले आए हैं मर मर के
शुहूद इक फ़न है और मेरी अदावत बे-फ़नों से है
मिरी पैकार अज़ल से
ये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या है
हमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' का
सो रिज़्क़-ए-फ़ख़्र अब हम खा रहे हैं 'मीर'-ए-बिस्मिल का
सिधारत भी था शर्मिंदा कि दो-आबे का बासी था
तुम्हें मालूम है उर्दू जो है पाली से निकली है
वो गोया उस की ही इक पुर-नुमू डाली से निकली है
ये कड़वाहट की बातें हैं मिठास इन की न पूछो तुम
नम-ए-लब को तरसती हैं सो प्यास इन की न पूछो तुम
ये इक दो जुरओं की इक चुह्ल है और चुह्ल में क्या है
अवामुन्नास से पूछो भला अल-कुह्ल में क्या है
ये तअन-ओ-तंज़ की हर्ज़ा-सराई हो नहीं सकती
कि मेरी जान मेरे दिल से रिश्ता खो नहीं सकती
नशा चढ़ने लगा है और चढ़ना चाहिए भी था
अबस का निर्ख़ तो इस वक़्त बढ़ना चाहिए भी था
अजब बे-माजरा बे-तौर बेज़ाराना हालत है
वजूद इक वहम है और वहम ही शायद हक़ीक़त है
ग़रज़ जो हाल था वो नफ़्स के बाज़ार ही का था
है ''ज़'' बाज़ार में तो दरमियाँ 'ज़रयून' में अव्वल
तो ये इब्राफ़नीक़ी खेलते हर्फ़ों से थे हर पल
तो ये 'ज़रयून' जो है क्या ये अफ़लातून है कोई
अमाँ 'ज़रयून' है 'ज़रयून' वो माजून क्यूँ होता
हैं माजूनें मुफ़ीद ''अर्वाह'' को माजून यूँ होता
सुनो तफ़रीक़ कैसे हो भला अश्ख़ास ओ अश्या में
बहुत जंजाल हैं पर हो यहाँ तो ''या'' में और ''या'' में
तुम्हारी जो हमासा है भला उस का तो क्या कहना
है शायद मुझ को सारी उम्र उस के सेहर में रहना
मगर मेरे ग़रीब अज्दाद ने भी कुछ किया होगा
बहुत टुच्चा सही उन का भी कोई माजरा होगा
ये हम जो हैं हमारी भी तो होगी कोई नौटंकी
हमारा ख़ून भी सच-मुच का सेहने पर बहा होगा
है आख़िर ज़िंदगी ख़ून अज़-बुन-ए-नाख़ुन बर-आवर-तर
क़यामत सानेहा मतलब क़यामत फ़ाजिआ परवर
नहीं हो तुम मिरे और मेरा फ़र्दा भी नहीं मेरा
सो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरा
मिरे दीरोज़ में ज़हर-ए-हलाहल तेग़-ए-क़ातिल है
मिरे घर का वही सरनाम-तर है जो भी बिस्मिल है
गुज़श्त-ए-वक़्त से पैमान है अपना अजब सा कुछ
सो इक मामूल है इमरान के घर का अजब सा कुछ
'हसन' नामी हमारे घर में इक 'सुक़रात' गुज़रा है
वो अपनी नफ़्इ से इसबात तक माशर के पहुँचा है
कि ख़ून-ए-रायगाँ के अम्र में पड़ना नहीं हम को
वो सूद-ए-हाल से यकसर ज़ियाँ-काराना गुज़रा है
तलब थी ख़ून की क़य की उसे और बे-निहायत थी
सो फ़ौरन बिन्त-ए-अशअश का पिलाया पी गया होगा
वो इक लम्हे के अंदर सरमदिय्यत जी गया होगा
तुम्हारी अर्जुमंद अम्मी को मैं भूला बहुत दिन में
मैं उन की रंग की तस्कीन से निमटा बहुत दिन में
वही तो हैं जिन्हों ने मुझ को पैहम रंग थुकवाया
वो किस रग का लहू है जो मियाँ मैं ने नहीं थूका
लहू और थूकना उस का है कारोबार भी मेरा
यही है साख भी मेरी यही मेआर भी मेरा
मैं वो हूँ जिस ने अपने ख़ून से मौसम खिलाए हैं
न-जाने वक़्त के कितने ही आलम आज़माए हैं
मैं इक तारीख़ हूँ और मेरी जाने कितनी फ़सलें हैं
मिरी कितनी ही फ़रएँ हैं मिरी कितनी ही असलें हैं
हवादिस माजरा ही हम रहे हैं इक ज़माने से
शदायद सानेहा ही हम रहे हैं इक ज़माने से
हमेशा से बपा इक जंग है हम उस में क़ाएम हैं
हमारी जंग ख़ैर ओ शर के बिस्तर की है ज़ाईदा
ये चर्ख़-ए-जब्र के दव्वार-ए-मुमकिन की है गिरवीदा
लड़ाई के लिए मैदान और लश्कर नहीं लाज़िम
सिनान ओ गुर्ज़ ओ शमशीर ओ तबर ख़ंजर नहीं लाज़िम
बस इक एहसास लाज़िम है कि हम बुअदैन हैं दोनों
कि नफ़्इ-ए-ऐन-ए-ऐन ओ सर-ब-सर ज़िद्दीन हैं दोनों
Luis-Urbina ने मेरी अजब कुछ ग़म-गुसारी की
ब-सद दिल दानिशी गुज़रान अपनी मुझ पे तारी की
बहुत उस ने पिलाई और पीने ही न दी मुझ को
पलक तक उस ने मरने के लिए जीने न दी मुझ को
''मैं तेरे इश्क़ में रंजीदा हूँ हाँ अब भी कुछ कुछ हूँ
मुझे तेरी ख़यानत ने ग़ज़ब मजरूह कर डाला
मगर तैश-ए-शदीदाना के ब'अद आख़िर ज़माने में
रज़ा की जाविदाना जब्र की नौबत भी आ पहुँची''
मोहब्बत एक पसपाई है पुर-अहवाल हालत की
मोहब्बत अपनी यक-तौरी में दुश्मन है मोहब्बत की
सुख़न माल-ए-मोहब्बत की दुकान-आराई करता है
सुख़न सौ तरह से इक रम्ज़ की रुस्वाई करता है
सुख़न बकवास है बकवास जो ठहरा है फ़न मेरा
वो है ताबीर का अफ़्लास जो ठहरा है फ़न मेरा
सुख़न यानी लबों का फ़न सुख़न-वर यानी इक पुर-फ़न
सुख़न-वर ईज़द अच्छा था कि आदम या फिर अहरीमन
मज़ीद आंकि सुख़न में वक़्त है वक़्त अब से अब यानी
कुछ ऐसा है ये मैं जो हूँ ये मैं अपने सिवा हूँ ''मैं''
सो अपने आप में शायद नहीं वाक़े हुआ हूँ मैं
जो होने में हो वो हर लम्हा अपना ग़ैर होता है
कि होने को तो होने से अजब कुछ बैर होता है
यूँही बस यूँही 'ज़ेनू' ने यकायक ख़ुद-कुशी कर ली
अजब हिस्स-ए-ज़राफ़त के थे मालिक ये रवाक़ी भी
बिदह यारा अज़ाँ बादा कि दहक़ाँ पर्वर्द आँ-रा
ब सोज़द हर मता-ए-इनतिमाए दूदमानां रा
ब-सोज़द ईं ज़मीन-ए-ए'तिबार-ओ-आस्मानां रा
ब-सोज़द जान ओ दिल राहम बयासायद दिल ओ जाँ रा
दिल ओ जाँ और आसाइश ये इक कौनी तमस्ख़ुर है
हुमुक़ की अबक़रिय्यत है सफ़ाहत का तफ़क्कुर है
हुमुक़ की अबक़रिय्यत और सफ़ाहत के तफ़क्कुर ने
हमें तज़ई-ए-मोहलत के लिए अकवान बख़्शे हैं
और अफ़लातून-ए-अक़्दस ने हमें अ'यान बख़्शे हैं
सुनो 'ज़रयून' तुम तो ऐन-ए-अ'यान-ए-हक़ीक़त हो
नज़र से दूर मंज़र का सर-ओ-सामान-ए-सर्वत हो
हमारी उम्र का क़िस्सा हिसाब अंदोज़-ए-आनी है
ज़मानी ज़द में ज़न की इक गुमान-ए-लाज़िमानी है
गुमाँ ये है कि बाक़ी है बक़ा हर आन फ़ानी है
कहानी सुनने वाले जो भी हैं वो ख़ुद कहानी हैं
कहानी कहने वाला इक कहानी की कहानी है
पिया पे ये गदाज़िश ये गुमाँ और ये गिले कैसे
सिला-सोज़ी तो मेरा फ़न है फिर इस के सिले कैसे
तो मैं क्या कह रहा था यानी क्या कुछ सह रहा था मैं
अमाँ हाँ मेज़ पर या मेज़ पर से बह रहा था मैं
रुको मैं बे-सर-ओ-पा अपने सर से भाग निकला हूँ
इला या अय्युहल-अबजद ज़रा यानी ज़रा ठहरो
There is an absurd I इन absurdity शायद
कहीं अपने सिवा यानी कहीं अपने सिवा ठहरो
तुम इस absurdity में इक रदीफ़ इक क़ाफ़िया ठहरो
रदीफ़ ओ क़ाफ़िया क्या हैं शिकस्त-ए-ना-रवा क्या है
शिकस्त-ए-नारवा ने मुझ को पारा पारा कर डाला
अना को मेरी बे-अंदाज़ा-तर बे-चारा कर डाला
मैं अपने आप में हारा हूँ और ख़्वाराना हारा हूँ
जिगर-चाकाना हारा हूँ दिल-अफ़गाराना हारा हूँ
जिसे फ़न कहते आए हैं वो है ख़ून-ए-जिगर अपना
मगर ख़ून-ए-जिगर क्या है वो है क़त्ताल-तर अपना
कोई ख़ून-ए-जिगर का फ़न ज़रा ताबीर में लाए
मगर मैं तो कहूँ वो पहले मेरे सामने आए
वजूद ओ शेर ये दोनों define हो नहीं सकते
कभी मफ़्हूम में हरगिज़ ये काइन हो नहीं सकते
हिसाब-ए-हर्फ़ में आता रहा है बस हसब उन का
नहीं मालूम ईज़द ईज़दाँ को भी नसब उन का
है ईज़द ईज़दाँ इक रम्ज़ जो बे-रम्ज़ निस्बत है
मियाँ इक हाल है इक हाल जो बे-हाल-ए-हालत है
न जाने जब्र है हालत कि हालत जब्र है यानी
किसी भी बात के मअनी जो हैं उन के हैं क्या मअनी
वजूद इक जब्र है मेरा अदम औक़ात है मेरी
जो मेरी ज़ात हरगिज़ भी नहीं वो ज़ात है मेरी
मैं रोज़-ओ-शब निगारिश-कोश ख़ुद अपने अदम का हूँ
मैं अपना आदमी हरगिज़ नहीं लौह-ओ-क़लम का हूँ
हैं कड़वाहट में ये भीगे हुए लम्हे अजब से कुछ
सरासर बे-हिसाबाना सरासर बे-सबब से कुछ
सराबों ने सराबों पर बहुत बादल हैं बरसाए
शराबों ने मआबद के तमूज़ ओ बअल नहलाए
(यक़ीनन क़ाफ़िया है यावा-फ़रमाई का सर-चश्मा
''हैं नहलाए'' ''हैं बरसाए'')
न जाने आरिबा क्यूँ आए क्यूँ मुस्तारबा आए
मुज़िर के लोग तो छाने ही वाले थे सो वो छाए
मिरे जद हाशिम-ए-आली गए ग़़ज़्ज़ा में दफ़नाए
मैं नाक़े को पिलाऊँगा मुझे वाँ तक वो ले जाए
लिदू लिलमौती वबनू लिलहिज़ाबी सन ख़राबाती
वो मर्द-ए-ऊस कहता है हक़ीक़त है ख़ुराफ़ाती
ये ज़ालिम तीसरा पैग इक अक़ानीमी बिदायत है
उलूही हर्ज़ा-फ़रमाई का सिर्र-ए-तूर-ए-लुक्नत है
भला हूरब की झाड़ी का वो रम्ज़-ए-आतिशीं क्या था
मगर हूरब की झाड़ी क्या ये किस से किस की निस्बत है
ये निस्बत के बहुत से क़ाफ़िए हैं है गिला इस का
मगर तुझ को तो यारा! क़ाफ़ियों की बे-तरह लत है
गुमाँ ये है कि शायद बहर से ख़ारिज नहीं हूँ मैं
ज़रा भी हाल के आहंग में हारिज नहीं हूँ
तना-तन तन तना-तन तन तना-तन तन तना-तन तन
तना-तन तन नहीं मेहनत-कशों का तन न पैराहन
न पैराहन न पूरी आधी रोटी अब रहा सालन
ये साले कुछ भी खाने को न पाएँ गालियाँ खाएँ
है इन की बे-हिसी में तो मुक़द्दस-तर हरामी-पन
मगर आहंग मेरा खो गया शायद कहाँ जाने
कोई मौज-ए-... कोई मौज-ए-शुमाल-ए-जावेदाँ जाने
शुमाल-ए-जावेदाँ के अपने ही क़िस्से थे जो गुज़रे
वो हो गुज़रे तो फिर ख़ुद मैं ने भी जाना वो हो गुज़रे
शुमाल-ए-जावेदाँ अपना शुमाल-ए-जावेदान-ए-जाँ
है अब भी अपनी पूँजी इक मलाल-ए-जावेदान-ए-जाँ
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
यही है दिल का मज़मून अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
हमारे दरमियाँ अब एक बेजा-तर ज़माना है
लब-ए-तिश्ना पे इक ज़हर-ए-हक़ीक़त का फ़साना है
अजब फ़ुर्सत मयस्सर आई है ''दिल जान रिश्ते'' को
न दिल को आज़माना है न जाँ को आज़माना है
कलीद-ए-किश्त-ज़ार-ए-ख़्वाब भी गुम हो गई आख़िर
कहाँ अब जादा-ए-ख़ुर्रम में सर-सब्ज़ाना जाना है
कहूँ तो क्या कहूँ मेरा ये ज़ख़्म-ए-जावेदाना है
वही दिल की हक़ीक़त जो कभी जाँ थी वो अब आख़िर
फ़साना दर फ़साना दर फ़साना दर फ़साना है
हमारा बाहमी रिश्ता जो हासिल-तर था रिश्तों का
हमारा तौर-ए-बे-ज़ारी भी कितना वालिहाना है
किसी का नाम लिक्खा है मिरी सारी बयाज़ों पर
मैं हिम्मत कर रहा हूँ यानी अब उस को मिटाना है
ये इक शाम-ए-अज़ाब-ए-बे-सरोकाराना हालत है
हुए जाने की हालत में हूँ बस फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है
नहीं मालूम तुम इस वक़्त किस मालूम में होगे
न जाने कौन से मअनी में किस मफ़्हूम में होगे
मैं था मफ़्हूम ना-मफ़्हूम में गुम हो चुका हूँ मैं
मैं था मालूम ना-मालूम में गुम हो चुका हूँ मैं
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगी
मिरे ख़ुद से गुज़रने के ज़माने से सिवा होगी
मिरे क़ामत से अब क़ामत तुम्हारा कुछ फ़ुज़ूँ होगा
मिरा फ़र्दा मिरे दीरोज़ से भी ख़ुश नुमूं होगा
हिसाब-ए-माह-ओ-साल अब तक कभी रक्खा नहीं मैं ने
किसी भी फ़स्ल का अब तक मज़ा चक्खा नहीं मैं ने
मैं अपने आप में कब रह सका कब रह सका आख़िर
कभी इक पल को भी अपने लिए सोचा नहीं मैं ने
हिसाब-ए-माह-ओ-साल ओ रोज़-ओ-शब वो सोख़्ता-बूदश
मुसलसल जाँ-कनी के हाल में रखता भी तो कैसे
जिसे ये भी न हो मालूम वो है भी तो क्यूँ-कर है
कोई हालत दिल-ए-पामाल में रखता भी तो कैसे
कोई निस्बत भी अब तो ज़ात से बाहर नहीं मेरी
कोई बिस्तर नहीं मेरा कोई चादर नहीं मेरी
ब-हाल-ए-ना-शिता सद-ज़ख़्म-हा ओ ख़ून-हा ख़ूर्दम
ब-हर-दम शूकराँ आमेख़्ता माजून-हा ख़ूर्दम
तुम्हें इस बात से मतलब ही क्या और आख़िरश क्यूँ हो
किसी से भी नहीं मुझ को गिला और आख़िरश क्यूँ हो
जो है इक नंग-ए-हस्ती उस को तुम क्या जान भी लोगे
अगर तुम देख लो मुझ को तो क्या पहचान भी लोगे
तुम्हें मुझ से जो नफ़रत है वही तो मेरी राहत है
मिरी जो भी अज़िय्यत है वही तो मेरी लज़्ज़त है
कि आख़िर इस जहाँ का एक निज़ाम-ए-कार है आख़िर
जज़ा का और सज़ा का कोई तो हंजार है आख़िर
मैं ख़ुद में झेंकता हूँ और सीने में भड़कता हूँ
मिरे अंदर जो है इक शख़्स मैं उस में फड़कता हूँ
है मेरी ज़िंदगी अब रोज़-ओ-शब यक-मज्लिस-ए-ग़म-हा
अज़ा-हा मर्सिया-हा गिर्या-हा आशोब-ए-मातम-हा
तुम्हारी तर्बियत में मेरा हिस्सा कम रहा कम-तर
ज़बाँ मेरी तुम्हारे वास्ते शायद कि मुश्किल हो
ज़बाँ अपनी ज़बाँ मैं तुम को आख़िर कब सिखा पाया
अज़ाब-ए-सद-शमातत आख़िरश मुझ पर ही नाज़िल हो
ज़बाँ का काम यूँ भी बात समझाना नहीं होता
समझ में कोई भी मतलब कभी आना नहीं होता
कभी ख़ुद तक भी मतलब कोई पहुंचाना नहीं होता
गुमानों के गुमाँ की दम-ब-दम आशोब-कारी है
भला क्या ए'तिबारी और क्या ना-ए'तिबारी है
गुमाँ ये है भला में जुज़ गुमाँ क्या था गुमानों में
सुख़न ही क्या फ़सानों का धरा क्या है फ़सानों में
मिरा क्या तज़्किरा और वाक़ई क्या तज़्किरा मेरा
मैं इक अफ़्सोस था अफ़्सोस हूँ गुज़रे ज़मानों में
है शायद दिल मिरा बे-ज़ख़्म और लब पर नहीं छाले
मिरे सीने में कब सोज़िंदा-तर दाग़ों के हैं थाले
मगर दोज़ख़ पिघल जाए जो मेरे साँस अपना ले
तुम अपनी माम के बेहद मुरादी मिन्नतों वाले
मिरे कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं कुछ भी नहीं बाले
मगर पहले कभी तुम से मिरा कुछ सिलसिला तो था
गुमाँ में मेरे शायद इक कोई ग़ुंचा खिला तो था
वो मेरी जावेदाना बे-दुई का इक सिला तो था
सो उस को एक अब्बू नाम का घोड़ा मिला तो था
साया-ए-दामान-ए-रहमत चाहिए थोड़ा मुझे
मैं न छोड़ूँ या नबी तुम ने अगर छोड़ा मुझे
ईद के दिन मुस्तफ़ा से यूँ लगे कहने 'हुसैन'
सब्ज़ जोड़ा दो 'हसन' को सुर्ख़ दो जोड़ा मुझे
''अदब अदब कुत्ते तिरे कान काटूँ
'ज़रयून' के ब्याह के नान बाटूँ''
तारों भरे जगर जगर ख़्वान बाटूँ
''आ जा री निन्दिया तू आ क्यूँ न जा
'ज़रयून' को आ के सुला क्यूँ न जा''
तुम्हारे ब्याह में शजरा पढ़ा जाना था नौशा वास्ती दूल्हा
''चौकी आँगन में बिछी वास्ती दूल्हा के लिए''
मक्के मदीने के पाक मुसल्ले पयम्बर घर नवासे
शाह-ए-मर्दां अमीर-ऊल-मोमिनीन हज़रत-'अली' के पोते
हज़रत इमाम-'हसन' हज़रत इमाम-'हुसैन' के पोते
हज़रत इमाम-अली-'नक़ी' के पोते
सय्यद-'जाफ़र' सानी के पोते
सय्यद अबुल-फ़रह सैदवाइल-वास्ती के पोते
मीराँ सय्यद-'अली'-बुज़ुर्ग के पोते
सय्यद-'हुसैन'-शरफ़ुद्दीन शाह-विलायत के पोते
क़ाज़ी सय्यद-'अमीर'-अली के पोते
दीवान सय्यद-'हामिद' के पोते
अल्लामा सय्यद-'शफ़ीक़'-हसन-एलिया के पोते
सय्यद-'जौन'-एलिया हसनी-उल-हुसैनी सपूत-जाह''
मगर नाज़िर हमारा सोख़्ता-सुल्ब आख़िरी नस्साब अब मरने ही वाला है
बस इक पल हफ़ सदी का फ़ैसला करने ही वाला है
सुनो 'ज़रयून' बस तुम ही सुनो यानी फ़क़त तुम ही
वही राहत में है जो आम से होने को अपना ले
कभी कोई भी पर हो कोई 'बहमन' यार या 'ज़ेनू'
तुम्हें बहका न पाए और बैरूनी न कर डाले
मैं सारी ज़िंदगी के दुख भुगत कर तुम से कहता हूँ
बहुत दुख देगी तुम में फ़िक्र और फ़न की नुमू मुझ को
तुम्हारे वास्ते बेहद सहूलत चाहता हूँ मैं
दवाम-ए-जहल ओ हाल-ए-इस्तिराहत चाहता हूँ मैं
न देखो काश तुम वो ख़्वाब जो देखा किया हूँ मैं
वो सारे ख़्वाब थे क़स्साब जो देखा किया हूँ मैं
ख़राश-ए-दिल से तुम बे-रिश्ता बे-मक़्दूर ही ठहरो
मिरे जहमीम-ए-ज़ात-ए-ज़ात से तुम दूर ही ठहरो
कोई 'ज़रयून' कोई भी क्लर्क और कोई कारिंदा
कोई भी बैंक का अफ़सर सेनेटर कोई पावंदा
हर इक हैवान-ए-सरकारी को टट्टू जानता हूँ मैं
सो ज़ाहिर है इसे शय से ज़ियादा मानता हूँ मैं
तुम्हें हो सुब्ह-दम तौफ़ीक़ बस अख़बार पढ़ने की
तुम्हें ऐ काश बीमारी न हो दीवार पढ़ने की
अजब है 'सार्त्र' और 'रसेल' भी अख़बार पढ़ते थे
वो मालूमात के मैदान के शौक़ीन बूढ़े थे
नहीं मालूम मुझ को आम शहरी कैसे होते हैं
वो कैसे अपना बंजर नाम बंजर-पन में बोते हैं
मैं ''उर्र'' से आज तक इक आम शहरी हो नहीं पाया
इसी बाइस मैं हूँ अम्बोह की लज़्ज़त से बे-माया
मगर तुम इक दो-पाया रास्त क़ामत हो के दिखलाना
सुनो राय-दहिंदा बिन हुए तुम बाज़ मत आना
फ़क़त 'ज़रयून' हो तुम यानी अपना साबिक़ा छोड़ो
फ़क़त 'ज़रयून' हो तुम यानी अपना लाहिक़ा छोड़ो
मगर मैं कौन जो चाहूँ तुम्हारे बाब में कुछ भी
भला क्यूँ हो मिरे एहसास के अस्बाब में कुछ भी
तुम्हारा बाप यानी मैं अबस मैं इक अबस-तर मैं
मगर मैं यानी जाने कौन अच्छा मैं सरासर मैं
मैं कासा-बाज़ ओ कीना-साज़ ओ कासा-तन हूँ कुत्ता हूँ
मैं इक नंगीन-ए-बूदश हूँ प तुम तो सिर्र-ए-मुनअम हो
तुम्हारा बाप रूहुल-क़ुद्स था तुम इब्न-ए-मरयम हो
ये क़ुलक़ुल तीसरा पैग अब तो चौथा हो गुमाँ ये है
गुमाँ का मुझ से कोई ख़ास रिश्ता हो गुमाँ ये है
गुमाँ ये है कि मैं जो जा रहा था आ रहा हूँ मैं
मगर मैं आ रहा कब हूँ पियापे जा रहा हूँ मैं
ये चौथा पैग है ऊँ-हूँ ज़लालत की गई मुझ से
ज़लालत की गई मुझ से ख़यानत की गई मुझ से
जोज़ामी हो गई 'वज़्ज़ाह' की महबूब वावैला
मगर इस का गिला क्या जब नहीं आया कोई एेला
सुनो मेरी कहानी पर मियाँ मेरी कहानी क्या
मैं यकसर राइगानी हूँ हिसाब-ए-राइगानी क्या
बहुत कुछ था कभी शायद पर अब कुछ भी नहीं हूँ मैं
न अपना हम-नफ़स हूँ मैं न अपना हम-नशीं हूँ मैं
कभी की बात है फ़रियाद मेरा वो कभी यानी
नहीं इस का कोई मतलब नहीं इस के कोई मअनी
मैं अपने शहर का सब से गिरामी नाम लड़का था
मैं बे-हंगाम लड़का था मैं सद-हंगाम लड़का था
मिरे दम से ग़ज़ब हंगामा रहता था मोहल्लों में
मैं हश्र-आग़ाज़ लड़का था मैं हश्र-अंजाम लड़का था
मिरे हिन्दू मुसलमाँ सब मुझे सर पर बिठाते थे
उन्ही के फ़ैज़ से मअनी मुझे मअनी सिखाते थे
सुख़न बहता चला आता है बे-बाइस के होंटों से
वो कुछ कहता चला आता है बे-बाइस के होंटों से
मैं अशराफ़-ए-कमीना-कार को ठोकर पे रखता था
सो मैं मेहनत-कशों की जूतियाँ मिम्बर पे रखता था
मैं शायद अब नहीं हूँ वो मगर अब भी वही हूँ मैं
ग़ज़ब हंगामा-परवर ख़ीरा-सरा अब भी वही हूँ मैं
मगर मेरा था इक तौर और भी जो और ही कुछ था
मगर मेरा था इक दौर और भी जो और ही कुछ था
मैं अपने शहर-ए-इल्म-ओ-फ़न का था इक नौजवाँ काहिन
मिरे तिल्मीज़-ए-इल्म-ओ-फ़न मिरे बाबा के थे हम-सिन
मिरा बाबा मुझे ख़ामोश आवाज़ें सुनाता था
वो अपने-आप में गुम मुझ को पुर-हाली सिखाता था
वो हैअत-दाँ वो आलिम नाफ़-ए-शब में छत पे जाता था
रसद का रिश्ता सय्यारों से रखता था निभाता था
उसे ख़्वाहिश थी शोहरत की न कोई हिर्स-ए-दौलत थी
बड़े से क़ुत्र की इक दूरबीन उस की ज़रूरत थी
मिरी माँ की तमन्नाओं का क़ातिल था वो क़ल्लामा
मिरी माँ मेरी महबूबा क़यामत की हसीना थी
सितम ये है ये कहने से झिजकता था वो फ़ह्हामा
था बेहद इश्तिआल-अंगेज़ बद-क़िस्मत ओ अल्लामा
ख़लफ़ उस के ख़ज़फ़ और बे-निहायत ना-ख़लफ़ निकले
हम उस के सारे बेटे इंतिहाई बे-शरफ़ निकले
मैं उस आलिम-तरीन-ए-दहर की फ़िक्रत का मुनकिर था
मैं फ़सताई था जाहिल था और मंतिक़ का माहिर था
पर अब मेरी ये शोहरत है कि मैं बस इक शराबी हूँ
मैं अपने दूदमान-ए-इल्म की ख़ाना-ख़राबी हूँ
सगान-ए-ख़ूक ज़ाद-ए-बर्ज़न ओ बाज़ार-ए-बे-मग़्ज़ी
मिरी जानिब अब अपने थोबड़े शाहाना करते हैं
ज़िना-ज़ादे मिरी इज़्ज़त भी गुस्ताख़ाना करते हैं
कमीने शर्म भी अब मुझ से बे-शर्माना करते थे
मुझे इस शाम है अपने लबों पर इक सुख़न लाना
'अली' दरवेश था तुम उस को अपना जद्द न बतलाना
वो सिब्तैन-ए-मोहम्मद, जिन को जाने क्यूँ बहुत अरफ़ा
तुम उन की दूर की निस्बत से भी यकसर मुकर जाना
कि इस निस्बत से ज़हर ओ ज़ख़्म को सहना ज़रूरी है
अजब ग़ैरत से ग़ल्तीदा-ब-ख़ूँ रहना ज़रूरी है
वो शजरा जो कनाना फहर ग़ालिब कअब मर्रा से
क़ुसइ ओ हाशिम ओ शेबा अबू-तालिब तक आता था
वो इक अंदोह था तारीख़ का अंदोह-ए-सोज़िंदा
वो नामों का दरख़्त-ए-ज़र्द था और उस की शाख़ों को
किसी तन्नूर के हैज़म की ख़ाकिस्तर ही बनना था
उसे शोला-ज़दा बूदश का इक बिस्तर ही बनना था
हमारा फ़ख़्र था फ़क़्र और दानिश अपनी पूँजी थी
नसब-नामों के हम ने कितने ही परचम लपेटे हैं
मिरे हम-शहर 'ज़रयून' इक फ़ुसूँ है नस्ल, हम दोनों
फ़क़त आदम के बेटे हैं फ़क़त आदम के बेटे हैं
मैं जब औसान अपने खोने लगता हूँ तो हँसता हूँ
मैं तुम को याद कर के रोने लगता हूँ तो हँसता हूँ
हमेशा मैं ख़ुदा हाफ़िज़ हमेशा मैं ख़ुदा हाफ़िज़
ख़ुदा हाफ़िज़
ख़ुदा हाफ़िज़

दरीचा-हा-ए-ख़याल : जौन एलिया

चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें
और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल
जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं
बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ
याद की इक किरन भी आ न सके
चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें
और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें
जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं
जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

अजनबी शाम : जौन एलिया

धुँद छाई हुई है झीलों पर
उड़ रहे हैं परिंद टीलों पर
सब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़
बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़
अपने गल्लों को ले के चरवाहे
सरहदी बस्तियों में जा पहुँचे
दिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँ
अजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँ

नाकारा : जौन एलिया

कौन आया है
कोई नहीं आया है पागल
तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है
अच्छा यूँ है
बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने
तेज़-रवी की राहगुज़र से
मेहनत-कोश और काम के दिन की
धूल आई है धूप आई है
जाने ये किस ध्यान में था मैं
आता तो अच्छा कौन आता
किस को आना था कौन आता

वो : जौन एलिया

वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा
वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा
किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार
किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार
गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए
और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए
रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं
कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं
वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी
जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी
मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं
ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं
दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं
वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं

क़ातिल : जौन एलिया

सुना है तुम ने अपने आख़िरी लम्हों में समझा था
कि तुम मेरी हिफ़ाज़त में हो मेरे बाज़ुओं में हो
सुना है बुझते बुझते भी तुम्हारे सर्द ओ मुर्दा लब से
एक शो'ला शोला-ए-याक़ूत-फ़ाम ओ रंग ओ उम्मीद-ए-फ़रोग़-ए-ज़िंदगी-आहंग लपका था
हमें ख़ुद में छुपा लीजे
ये मेरा वो अज़ाब-ए-जाँ है जो मुझ को
मिरे अपने ख़ुद अपने ही जहन्नम में जलाता है
तुम्हारा सीना-ए-सीमीं
तुम्हारे बाज़ूवान-ए-मर-मरीं
मेरे लिए
मुझ इक हवसनाक-ए-फ़रोमाया की ख़ातिर
साज़ ओ सामान-ए-नशात ओ नश्शा-ए-इशरत-फ़ुज़ूनी थे
मिरे अय्याश लम्हों की फ़ुसूँ-गर पुर-जुनूनी के लिए
सद-लज़्ज़त आगीं सद-करिश्मा पुर-ज़बानी थे
तुम्हें मेरी हवस-पेशा
मिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बेवफ़ाई का गुमाँ तक
इस गुमाँ का एक वहम-ए-ख़ुद गुरेज़ाँ तक नहीं था
क्यूँ नहीं था क्यूँ नहीं था क्यूँ
कोई होता कोई तो होता
जो मुझ से मिरी सफ़्फ़ाक क़ातिल बेवफ़ाई की सज़ा में
ख़ून थुकवाता
मुझे हर लम्हे की सूली पे लटकाता
मगर फ़रियाद कोई भी नहीं कोई
दरेग़ उफ़्ताद कोई भी
मुझे मफ़रूर होना चाहिए था
और मैं सफ़्फ़ाक-क़ातिल बेवफ़ा ख़ूँ-रेज़-तर मैं
शहर में ख़ुद-वारदाती
शहर में ख़ुद-मस्त आज़ादाना फिरता हूँ
निगार-ए-ख़ाक-आसूदा
बहार-ए-ख़ाक-आसूदा

सफ़र के वक़्त : जौन एलिया

तुम्हारी याद मिरे दिल का दाग़ है लेकिन
सफ़र के वक़्त तो बे-तरह याद आती हो
बरस बरस की हो आदत का जब हिसाब तो फिर
बहुत सताती हो जानम बहुत सताती हो
मैं भूल जाऊँ मगर कैसे भूल जाऊँ भला
अज़ाब-ए-जाँ की हक़ीक़त का अपनी अफ़्साना
मिरे सफ़र के वो लम्हे तुम्हारी पुर-हाली
वो बात बात मुझे बार बार समझाना
ये पाँच कुर्ते हैं देखो ये पाँच पाजामे
डले हुए हैं क़मर-बंद इन में और देखो
ये शेव-बॉक्स है और ये है ओलड असपाइस
नहीं हुज़ूर की झोंजल का अब कोई बाइ'स
ये डाइरी है और इस में पते हैं और नंबर
इसे ख़याल से बक्से की जेब में रखना
है अर्ज़ ''हज़रत-ए-ग़ाएब-दिमाग़'' बंदी की
कि अपने ऐब की हालत को ग़ैब में रखना
ये तीन कोट हैं पतलून हैं ये टाइयाँ हैं
बंधी हुई हैं ये सब तुम को कुछ नहीं करना
ये 'वेलियम' है 'ओनटल' है और 'टरपटी-नाल'
तुम इन के साथ मिरी जाँ ड्रिंक से डरना
बहुत ज़ियादा न पीना कि कुछ न याद आए
जो लखनऊ में हुआ था वो अब दोबारा न हो
हो तुम सुख़न की अना और तमकनत जानम
मज़ाक़ का किसी 'इंशा' को तुम से यारा न हो
वो 'जौन' जो नज़र आता है उस का ज़िक्र नहीं
तुम अपने 'जौन' का जो तुम में है भरम रखना
अजीब बात है जो तुम से कह रही हूँ मैं
ख़याल मेरा ज़ियादा और अपना कम रखना
हो तुम बला के बग़ावत-पसंद तल्ख़-कलाम
ख़ुद अपने हक़ में इक आज़ार हो गए हो तुम
तुम्हारे सारे सहाबा ने तुम को छोड़ दिया
मुझे क़लक़ है कि बे-यार हो गए हो तुम
ये बैंक-कार मैनेजर ये अपने टेक्नोक्रेट
कोई भी शुबह नहीं हैं ये एक अबस का ढिढोल
मैं ख़ुद भी इन को क्रो-मैग्नन समझती हूँ
ये शानदार जनावर हैं दफ़्तरों का मख़ौल
मैं जानती हूँ कि तुम सुन नहीं रहे मिरी बात
समाज झूट सही फिर भी उस का पास करो
है तुम को तैश है बालिशतियों की ये दुनिया
तो फिर क़रीने से तुम उन को बे-लिबास करो
तुम एक सादा ओ बरजस्ता आदमी ठहरे
मिज़ाज-ए-वक़्त को तुम आज तक नहीं समझे
जो चीज़ सब से ज़रूरी है वो मैं भूल गई
ये पासपोर्ट है इस को सँभाल के रखना
जो ये न हो तो ख़ुदा भी बशर तक आ न सके
सो तुम शुऊ'र का अपने कमाल कर रखना
मिरी शिकस्त के ज़ख़्मों की सोज़िश-ए-जावेद
नहीं रहा मिरे ज़ख़्मों का अब हिसाब कोई
है अब जो हाल मिरा वो अजब तमाशा है
मिरा अज़ाब नहीं अब मिरा अज़ाब कोई
नहीं कोई मिरी मंज़िल पे है सफ़र दरपेश
है गर्द गर्द अबस मुझ को दर-ब-दर पेश

तआ'क़ुब : जौन एलिया

मुझ से पहले के दिन
अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हें
ख़्वाब-ओ-ता'बीर के गुम-शुदा सिलसिले
बार बार अब सताने लगे हैं तुम्हें
दुख जो पहुँचे थे तुम से किसी को कभी
देर तक अब जगाने लगे हैं तुम्हें
अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हें
अपने वो अहद-ओ-पैमाँ जो मुझ से न थे
क्या तुम्हें मुझ से अब कुछ भी कहना नहीं

बस एक अंदाज़ा : जौन एलिया

बरस गुज़रे तुम्हें सोए हुए
उठ जाओ सुनती हो अब उठ जाओ
मैं आया हूँ
मैं अंदाज़े से समझा हूँ
यहाँ सोई हुई हो तुम
यहाँ रू-ए-ज़मीं के इस मक़ाम-ए-आसमानी-तर की हद में
बाद-हा-ए-तुंद ने
मेरे लिए बस एक अंदाज़ा ही छोड़ा है!

मगर ये ज़ख़्म ये मरहम : जौन एलिया

तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से बे-सरोकार
तुम्हारी याद के मौसम गुज़रते जाते हैं
बस एक मन्ज़र-ए-बे-हिज्र-ओ-विसाल है जिस में
हम अपने आप ही कुछ रंग भरते जाते हैं
न वो नशात-ए-तसव्वुर कि लो तुम आ ही गए
न ज़ख़्म-ए-दिल की है सोज़िश कोई जो सहनी हो
न कोई वा'दा-ओ-पैमाँ की शाम है न सहर
न शौक़ की है कोई दास्ताँ जो कहनी हो
नहीं जो महमिल-ए-लैला-ए-आरज़ू सर-ए-राह
तो अब फ़ज़ा में फ़ज़ा के सिवा कुछ और नहीं
नहीं जो मौज-ए-सबा में कोई शमीम-ए-पयाम
तो अब सबा में सबा के सिवा कुछ और नहीं
उतार दे जो किनारे पे हम को कश्ती-ए-वहम
तो गिर्द-ओ-पेश को गिर्दाब ही समझते हैं
तुम्हारे रंग महकते हैं ख़्वाब में जब भी
तो ख़्वाब में भी उन्हें ख़्वाब ही समझते हैं
न कोई ज़ख़्म न मरहम कि ज़िंदगी अपनी
गुज़र रही है हर एहसास को गँवाने में
मगर ये ज़ख़्म ये मरहम भी कम नहीं शायद
कि हम हैं एक ज़मीं पर और इक ज़माने में

हमेशा क़त्ल हो जाता हूँ मैं : जौन एलिया

बिसात-ए-ज़िंदगी तो हर घड़ी बिछती है उठती है
यहाँ पर जितने ख़ाने जितने घर हैं
सारे
ख़ुशियाँ और ग़म इनआ'म करते हैं
यहाँ पर सारे मोहरे
अपनी अपनी चाल चलते हैं
कभी महसूर होते हैं कभी आगे निकलते हैं
यहाँ पर शह भी पड़ती है
यहाँ पर मात होती है
कभी इक चाल टलती है
कभी बाज़ी पलटती है
यहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैं
मगर मैं वो पियादा हूँ
जो हर घर में
कभी इस शह से पहले और कभी उस मात से पहले
कभी इक बुर्द से पहले कभी आफ़ात से पहले
हमेशा क़त्ल हो जाता है

रातें सच्ची हैं दिन झूटे हैं : जौन एलिया

चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा
उन की लज़्ज़त और अज़िय्यत से मैं अपना कोई अहद नहीं तोडूँगा
तेज़ नज़र ना-बीनाओं की आबादी में
क्या मैं अपने ध्यान की ये पूँजी भी गिनवा दूँ
हाँ मेरे ख़्वाबों को तुम्हारी सुब्हों की सर्द और साया-गूँ ताबीरों से नफ़रत है
इन सुब्हों ने शाम के हाथों अब तक जितने सूरज बेचे
वो सब इक बर्फ़ानी भाप की चमकीली और चक्कर खाती गोलाई थे
सो मेरे ख़्वाबों की रातें जलती और दहकती रातें
ऐसी यख़-बस्ता ताबीरों के हर दिन से अच्छी हैं और सच्ची भी हैं
जिस में धुँदला चक्कर खाता चमकीला-पन छे अतराफ़ का रोग बना है
मेरे अंधेरे भी सच्चे हैं
और तुम्हारे ''रोग उजाले'' भी झूटे हैं
रातें सच्ची हैं दिन झूटे
जब तक दिन झूटे हैं जब तक
रातें सहना और अपने ख़्वाबों में रहना
ख़्वाबों को बहकाने वाले दिन के उजालों से अच्छा है
हाँ मैं बहकावों की धुँद नहीं ओढूँगा
चाहे तुम मेरी बीनाई खुरच डालो मैं फिर भी अपने ख़्वाब नहीं छोड़ूँगा
अपना अहद नहीं तोडूँगा
यही तो बस मेरा सब कुछ है
माह ओ साल के ग़ारत-गर से मेरी ठनी है
मेरी जान पर आन बनी है
चाहे कुछ हो मेरे आख़िरी साँस तलक अब चाहे कुछ हो

ख़ल्वत : जौन एलिया

मुझे तुम अपनी बाँहों में जकड़ लो और मैं तुम को
किसी भी दिल-कुशा जज़्बे से यकसर ना-शनासाना
नशात-ए-रंग की सरशारी-ए-हालत से बेगाना
मुझे तुम अपनी बाँहों में जकड़ लो और मैं तुम को
फ़ुसूँ-कारा निगारा नौ-बहारा आरज़ू-आरा
भला लम्हों का मेरी और तुम्हारी ख़्वाब-परवर
आरज़ू-मंदी की सरशारी से क्या रिश्ता
हमारी बाहमी यादों की दिलदारी से क्या रिश्ता
मुझे तुम अपनी बाँहों में जकड़ लो और मैं तुम को
यहाँ अब तीसरा कोई नहीं या'नी मोहब्बत भी

फ़न पारा : जौन एलिया

ये किताबों की सफ़-ब-सफ़ जिल्दें
काग़ज़ों का फ़ुज़ूल इस्ती'माल
रौशनाई का शानदार इसराफ़
सीधे सीधे से कुछ सियह धब्बे
जिन की तौजीह आज तक न हुई
चंद ख़ुश-ज़ौक़ कम-नसीबों ने
बसर औक़ात के लिए शायद
ये लकीरें बिखेर डाली हैं
कितनी ही बे-क़ुसूर नस्लों ने
इन को पढ़ने के जुर्म में ता-उम्र
ले के कश्कूल-ए-इल्म-ओ-हिक्मत-ओ-फ़न
कू-ब-कू जाँ की भीक माँगी है
आह ये वक़्त का अज़ाब-ए-अलीम
वक़्त ख़ल्लाक़ बे-शुऊर क़दीम
सारी तारीफ़ें उन अँधेरों की
जिन में परतव न कोई परछाईं
आह ये ज़िंदगी की तन्हाई
सोचना और सोचते रहना
चंद मासूम पागलों की सज़ा
आज मैं ने भी सोच रक्खा है
वक़्त से इंतिक़ाम लेने को
यूँही ता-शाम सादे काग़ज़ पर
टेढ़े टेढ़े ख़ुतूत खींचे जाएँ

लौह-ए-दाइरा : जौन एलिया

मैं दाएरे पर पड़ा हुआ अपने ख़ूँ के धब्बों को चाटता हूँ
कि मेरे होने का सारा इल्ज़ाम मेरे सर है
लबों की दहलीज़ पर मिरी रूह कब से फ़रियाद कर रही है
मैं अपने सीने में जल रहा हूँ मैं अपनी आँखों में बुझ रहा हूँ
ये शाह-राहों का हादसा है मगर किसी को ख़बर नहीं है
मुझे बचा लो मुझे बचा लो
हुजूम-ए-आदम जवाब दे क्या ये कोई सहरा है शहर की रहगुज़र नहीं है
मैं फिर न आऊँगा मेरी आवाज़ फिर न आएगी
मेरा इसबात फिर न टकराएगा तुम्हारी बतालतों से
मगर मिरा बाल बाल मक़रूज़ है मिरे जब्र-ए-आगही का
मैं अपनी आवाज़ का बदन हूँ
जो चुप है उस की ज़बान उस के दहन में सड़ जाएगी
मैं बोलूँगा और मिरा बोलना ही मेरा ज़ियाँ भी ठहरेगा
मेरे सीने में जो ख़राशें सुलग रही हैं
वो आख़िर-ए-कार मेरी लौह-ए-मज़ार का हाशिया बनेंगी
जवाब की बस्तियों के दरवाज़े बंद हैं और मिरा गला ख़ुश्क हो चुका है
तमाम इंसान अपनी परछाइयों को ओढ़े हुए हैं और शाम बह रही है
धुँद ने चौक के बड़े बुर्ज का मुसल्लस निगल लिया है
सुकूत का ज़महरीर सम्तों में घुल चुका है
मैं एक संगीन मुजस्समा हूँ जिसे बना कर जिसे ख़याबाँ में नस्ब कर के
मुजस्समा-साज़ और मे'मार अपना रोज़ीना पा चुके हैं
मैं एक संगीं मुजस्समा हूँ
जो धुँद की तैलिसान ओढ़े हुए हयूलों को तक रहा है
मगर समा'अत का जाल अब जल्द बुन लिया जाए
सुन लिया जाए
मेरे अतराफ़ एक तूफ़ान उठने वाला है
जो ज़मीनों को यूँ निगल लेगा जैसे ये लोग अपने लोगों का ख़ून-ए-बस्ता निगल रहे हैं
मैं अपने सीने में जल रहा हूँ अपनी आँखों में बुझ रहा हूँ

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