ख़्वाब नहीं देखा है : वसीम बरेलवी
मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा हैरात खिलने का गुलाबों से महक आने का
ओस की बूंदों में सूरज के समा जाने का
चाँद सी मिट्टी के ज़र्रों से सदा आने का
शहर से दूर किसी गाँव में रह जाने का
खेत खलियानों में बाग़ों में कहीं गाने का
सुबह घर छोड़ने का देर से घर आने का
बहते झरनों की खनकती हुई आवाज़ों का
चहचहाती हुई चिड़ियों से लदी शाख़ों का
नर्गिसी आँखों में हँसती हुई नादानी का
मुस्कुराते हुए चेहरे की ग़ज़ल ख़्वानी का
तेरा हो जाने तिरे प्यार में खो जाने का
तेरा कहलाने का तेरा ही नज़र आने का
मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है
हाथ रख दे मिरी आँखों पे कि नींद आ जाए
दीवाने की जन्नत : वसीम बरेलवी
मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई होअपने साए से झिझकती हुई घबराती हुई
अपने एहसास की तहरीक पे शरमाती हुई
अपने क़दमों की भी आवाज़ से कतराती हुई
अपनी साँसों के महकते हुए अंदाज़ लिए
अपनी ख़ामोशी में गहनाए हुए राज़ लिए
अपने होंटों पे इक अंजाम का आग़ाज़ लिए
दिल की धड़कन को बहुत रोकती समझाती हुई
अपनी पायल की ग़ज़ल-ख़्वानी पे झल्लाती हुई
नर्म शानों पे जवानी का नया बार लिए
शोख़ आँखों में हिजाबात से इंकार लिए
तेज़ नब्ज़ों में मुलाक़ात के आसार लिए
काले बालों से बिखरती हुई चम्पा की महक
सुर्ख़ आरिज़ पे दमकते हुए शालों की चमक
नीची नज़रों में समाई हुई ख़ुद्दार झिजक
नुक़रई जिस्म पे वो चाँद की किरनों की फुवार
चाँदनी रात में बुझता हुआ पलकों का सितार
फ़र्त-ए-जज़्बात से महकी हुई साँसों की क़तार
दूर माज़ी की बद-अंजाम रिवायात लिए
नीची नज़रें वही एहसास-ए-मुलाक़ात लिए
वही माहौल वही तारों भरी रात लिए
आज तुम आई हो दोहराती हुई माज़ी को
मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई हो
काश इक ख़्वाब रहे तल्ख़ हक़ीक़त न बने
ये मुलाक़ात भी दीवाने की जन्नत न बने
तेरी याद : वसीम बरेलवी
मैं तिरी याद को सीने से लगाए गुज़राअजनबी शहर की मशग़ूल गुज़र गाहों से
बेवफ़ाई की तरह फैली हुई राहों से
नई तहज़ीब के आबाद बयाबानों से
दस्त-ए-मज़दूर पे हँसते हुए ऐवानों से
मैं तिरी याद को सीने से लगाए गुज़रा
गाँव की दो-पहरी धूप के सन्नाटों से
ख़ुश्क नहरों के किनारों पे थकी छाँव से
अपने दिल की तरह रोई हुई पग-डंडी से
मैं तिरी याद को सीने से लगाए पहुँचा
बस्तियाँ छोड़ के तरसे हुए वीरानों में
तलख़ी-ए-दहर समेटे हुए मय-ख़ानों में
ख़ून-ए-इंसान पे पलते हुए इंसानों में
जाने पहचाने हुए लोगों में अन-जानों में
मैं तिरी याद को सीने से लगाए पहूँचा
अपने अहबाब तिरे ग़म के परस्तारों में
अपनी रूठी हुई तक़दीर के ग़म-ख़्वारों में
अपने हम-मंज़िल-ओ-हम-रास्ता फ़नकारों में
और फ़नकार की साँसों के ख़रीदारों में
मैं तिरी याद को सीने से लगाए पहुँचा
ये समझ कर कि कोई आँख इधर उट्ठेगी
मेरी मग़्मूम निगाही को मुझे समझेगी
लेकिन ए दोस्त ये दुनिया है यहाँ तेरा ग़म
एक इंसान को तस्कीन भी दे सकता है
एक इंसान का आराम भी ले सकता है
ख़ूँ में डूबी हुई तहरीर भी बन सकता है
एक फ़नकार की तक़दीर भी बन सकता है
सारी दुनिया के मगर काम नहीं आ सकता
सब के होंटों पे तिरा नाम नहीं आ सकता
एक नज़्म : वसीम बरेलवी
दीवाली की रात आई है तुम दीप जलाए बैठी होमासूम उमंगों को अपने सीने से लगाए बैठी हो
तस्वीर को मेरी फूलों की ख़ुशबू में बसाए बैठी हो
आँखों के नशीले डोरों पर काजल को बिठाए बैठी हो
मैं दूर कहीं तुम से बैठा इक दीप की जानिब तकता हूँ
इक बज़्म सजाए रक्खी है इक दर्द जगाए रखता हूँ
ख़ामोशी मेरी साथी है और देखने वाला कोई नहीं
ऐ काश कहीं से आ जाते जीने का बहाना कोई नहीं
खिलौना : वसीम बरेलवी
देर से एक ना-समझ बच्चाइक खिलौने के टूट जाने पर
इस तरह से उदास बैठा है
जैसे मय्यत क़रीब रक्खी हो
और मरने के बा'द हर हर बात
मरने वाले की याद आती हो
जाने क्या क्या ज़रा तवक़्क़ुफ़ से
सोच लेता है और रोता है
लेकिन इतनी ख़बर कहाँ उस को
ज़िंदगी के अजीब हाथों में
ये भी मिट्टी का इक खिलौना है
अदना सा बासी : वसीम बरेलवी
कल भी मेरी प्यास पे दरिया हँसते थेआज भी मेरे दर्द का दरमाँ कोई नहीं
मैं इस धरती का अदना सा बासी हूँ
सच पूछो तो मुझ सा परेशाँ कोई नहीं
कैसे कैसे ख़्वाब बुने थे आँखों ने
आज भी उन ख़्वाबों सा अर्ज़ां कोई नहीं
कल भी मेरे ज़ख़्म भुनाए जाते थे
आज भी मेरे हाथ में दामाँ कोई नहीं
कल मेरा नीलाम किया था ग़ैरों ने
आज तो मेरे अपने बेचे देते हैं
सच पूछो तो मेरी ख़ता बस इतनी है
मैं इस धरती का अदना सा बासी हूँ
वह जानते ही नहीं : वसीम बरेलवी
मैं तुम से छूट रहा हूँ मिरे प्यारोमगर मिरा रिश्ता पुख़्ता हो रहा है इस ज़मीं से
जिस की गोद में समाने के लिए
मैं ने पूरी ज़िंदगी रीहरसल की है
कभी कुछ खो कर कभी कुछ पा कर
कभी हँस कर कभी रो कर
पहले दिन से मुझे अपनी मंज़िल का पता था
इसी लिए मैं कभी ज़ोर से नहीं चला
और जिन्हें ज़ोर से चलते देखा
तरस खाया उन की हालत पर
इस लिए कि वो जानते ही न थे
कि वो क्या कर रहे हैं
बेबसी : वसीम बरेलवी
वक़्त के तेज़ गाम दरिया मेंतू किसी मौज की तरह उभरी
आँखों आँखों में हो गई ओझल
और मैं एक बुलबुले की तरह
इसी दरिया के इक किनारे पर
नरकुलों के मुहीब झावे में
ऐसा उलझा कि ये भी भूल गया
बुलबुले की बिसात ही क्या थी
शहर मेरा : वसीम बरेलवी
शहर मेरा उदास गंगा साकोई भी आए और अपने पाप
खो के जाता है धोके जाता है
आग का खेल खेलने वाले
ये नहीं जानते कि पानी का
आग से बैर है हमेशा का
आग कितनी ही ख़ौफ़नाक सही
उस की लपटों की उम्र थोड़ी है
और गंगा के साफ़ पानी को
आज बहना है कल भी बहना है
जाने किस किस का दर्द सहना है
शहर मेरा उदास गंगा सा
अमानत : वसीम बरेलवी
ये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैये इक नादान बच्चे की तरह तन्हाई को
इशारा करता है ठोड़ी पकड़ कर और कहता है
वो देखो गाँव के सीने पे सर रक्खे हुए सरसों
तुम्हारी कम-सिनी खेली है जिस की गोद में बरसों
नुक़ूश-ए-पा से अब तक हर गली की माँग रौशन है
अभी तक गोद फैलाए हुए डेरे का आँगन है
रसीली जामुनों के पेड़ की कमज़ोर शाख़ों ने
तुम्हारी उँगलियों का हर निशाँ महफ़ूज़ रक्खा है
लबों पर झील की गहराइयों के है बस इक शिकवा
कि जब से तुम गए हो कोई भी हम तक नहीं पहुँचा
किनारे झील के वो पेड़ अब तक मुंतज़िर सा है
कब आओगे यहाँ कपड़े उतरोगे नहाओगे
ये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता है
ये इक नादान बच्चे की तरह तन्हाई को
इशारा करता है ठोड़ी पकड़ कर और कहता है
वो देखो गाँव के खलियानों में सोया हुआ जादू
नशीली रात की रानी वो लौ देती हुई ख़ुश्बू
दियों का धीमी धीमी रौशनी देना धुआँ देना
शिकस्ता झोंपड़ों का ज़िंदगी को लोरियाँ देना
खनकती हैं रसोई घर में अल्हड़ चूड़ियाँ अब तक
भरा की पोलियाँ लाती हैं सर पर बूढ़ियाँ अब तक
तलैया के किनारे कच्ची ईंटों से बना मंदिर
सुलगते कंडों से उठती धुएँ की मल्गजी चादर
हरे खेतों की मेंडों पर सुलगते जिस्म के साए
लरज़ते होंठ घबराई हुई साँसों के अफ़्साने
लचकती आम की शाख़ों पे बल खाए हुए झूले
किसी का भागना ये कह के कोई है हमें छू ले
ये देखो ज़िंदगी कितनी हसीं है कितनी भोली है
उसी आग़ोश में आ जाओ जिस में आँख खोली है
ये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता है
ये कहता है कि मैं गुज़री हुई बातों में खो जाऊँ
तुम्हारी ज़ुल्फ़ से महकी हुई रातों में खो जाऊँ
इसे मैं कैसे समझाऊँ कि अब ये साँस का डोरा
इक ऐसी धार की तलवार है जिस पर गुज़रना है
मुझे और ज़िंदगी के ज़ख़्म को टाँके लगाना हैं
इसे मैं कैसे समझाऊँ कि ये माज़ी की तस्वीरें
अब इक ऐसी अमानत हैं जिसे मैं रख नहीं सकता
अगर रक्खूँ तो नाकारा निकम्मा कह के ये दुनिया
मुझे ठोकर लगा दे और ख़ुद आगे को बढ़ जाए
मिरी पस-मांदगी पर हर नज़र उट्ठे तरस खाए
मुझे मुर्दा अजाइब-घर की ऐसी मूर्ती समझे
जो सब को इस लिए प्यारी है कि काफ़ी पुरानी है
ये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता है
इसे मैं कैसे समझाऊँ कि ये माज़ी की तस्वीरें
अब इक ऐसी अमानत हैं जिसे मैं रख नहीं सकता
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