मुजरिम : शकेब जलाली
यही रस्ता मिरी मंज़िल की तरफ़ जाता हैजिस के फ़ुट-पाथ फ़क़ीरों से अटे रहते हैं
ख़स्ता कपड़ों में ये लिपटे हुए मरियल ढाँचे
ये भिकारी कि जिन्हें देख के घिन आती है
हड्डियाँ जिस्म की निकली हुई पिचके हुए गाल
मैले सर में जुएँ, आज़ा से टपकता हुआ कोढ़
रूह बीमार, बदन सुस्त, निगाहें पामाल
हाथ फैलाए पड़े रहते हैं रोगी इंसान
चंद बेवाओं के मदक़ूक़ से पीले चेहरे
कुछ हवस-कार निगाहों में उतर जाते हैं
जिन के अफ़्लास-ज़दा जिस्म, ढलकते सीने
चंद सिक्कों के एवज़ शब को बिका करते हैं
शिद्दत-ए-फ़ाक़ा से रोते हुए नन्हे बच्चे
एक रोटी के निवाले से बहल जाते हैं
या सर-ए-शाम ही सो जाते हैं भूके प्यासे
माँ की सूखी हुई छाती को दबा कर मुँह में
चंद बद-ज़ेब से शोहरत-ज़दा इंसाँ अक्सर
अपनी दौलत ओ सख़ावत की नुमाइश के लिए
या कभी रहम के जज़्बे से हरारत पा कर
चार छे पैसे उन्हें बख़्श दिया करते हैं
क्या फ़क़त रहम की हक़दार हैं नंगी रूहें?
क्यूँ ये इंसानों पे इंसान तरस खाते हैं?
क्यूँ इन्हें देख के एहसास-ए-तही-दस्ती है
अक्सर औक़ात मैं कतरा के निकल जाता हूँ?
यही रस्ता मिरी मंज़िल की तरफ़ जाता है
जश्न-ए-'ईद : शकेब जलाली
सभी ने 'ईद मनाई मिरे गुलिस्ताँ मेंकिसी ने फूल पिरोए किसी ने ख़ार चुने
ब-नाम-ए-इज़्न-ए-तकल्लुम ब-नाम-ए-जब्र-ए-सुकूत
किसी ने होंट चबाए किसी ने गीत बुने
बड़े ग़ज़ब का गुलिस्ताँ में जश्न-ए-'ईद हुआ
कहीं तो बिजलियाँ कौदीं कहीं चिनार जले
कहीं कहीं कोई फ़ानूस भी नज़र आया
ब-तौर-ए-ख़ास मगर क़ल्ब-ए-दाग़-दार जले
'अजब थी 'ईद-ए-ख़ुमिस्ताँ 'अजब था रंग-ए-नशात
किसी ने बादा-ओ-साग़र किसी ने अश्क पिए
किसी ने अतलस-ओ-कमख़्वाब की क़बा पहनी
किसी ने चाक-ए-गरेबाँ किसी ने ज़ख़्म सिए
हमारे ज़ौक़-ए-नज़ारा को 'ईद के दिन भी
कहीं पे साया-ए-ज़ुल्मत कहीं पे नूर मिला
किसी ने दीदा-ओ-दिल के कँवल खिले पाए
किसी को साग़र-ए-एहसास चकना-चूर मिला
ब-फ़ैज़-ए-'ईद भी पैदा हुई न यक-रंगी
कोई मलूल कोई ग़म से बे-नियाज़ रहा
बड़ा ग़ज़ब है ख़ुदावंद-ए-कौसर-ओ-तसनीम
कि रोज़-ए-'ईद भी तबक़ों का इम्तियाज़ रहा
साथी : शकेब जलाली
मैं उस को पाना भी चाहूँतो ये मेरे लिए ना-मुम्किन है
वो आगे आगे तेज़-ख़िराम
मैं उस के पीछे पीछे
उफ़्तां ख़ेज़ाँ
आवाज़ें देता
शोर मचाता
कब से रवाँ हूँ
बर्ग-ए-ख़िज़ाँ हूँ
जब मैं उकता कर रुक जाऊँगा
वो भी पल भर को ठहर कर
मुझ से आँखें चार करेगा
फिर अपनी चाहत का इक़रार करेगा
फिर मैं
मुँह तोड़ के
तेज़ी से घर की जानिब लौटूँगा
अपने नक़्श-ए-क़दम रौंदूँगा
अब वो दिल थाम के
मेरे पीछे लपकता आएगा
नद्दी नाले
पत्थर पर्बत फाँद आ जाएगा
मैं आगे आगे
वो पीछे पीछे
दोनों की रफ़्तार है इक जैसी
फिर ये कैसे हो सकता है
वो मुझ को या मैं उस को पा लूँ
इन्फ़िरादियत परस्त : शकेब जलाली
एक इंसाँ की हक़ीक़त क्या हैज़िंदगी से उसे निस्बत क्या है
आँधी उट्ठे तो उड़ा ले जाए
मौज बिफरे तो बहा ले जाए
एक इंसाँ की हक़ीक़त क्या है
डगमगाए तो सहारा न मिले
सामने हो प किनारा न मिले
एक इंसाँ की हक़ीक़त क्या है
कुंद तलवार क़लम कर डाले
सर्द-शो'ला ही भसम कर डाले
ज़िंदगी से उसे निस्बत क्या है
एक इंसाँ की हक़ीक़त क्या है
याद : शकेब जलाली
रात इक लड़खड़ाते झोंके सेना-गहाँ संग-ए-सुर्ख़ की सिल पर
आइना गिर के पाश पाश हुआ
और नन्ही नुकीली किरचों की
एक बोछाड़ दिल को चीर गई
दावत-ए-फिक्र : शकेब जलाली
किस तरह रेत के समुंदर मेंकश्ती-ए-ज़ीस्त है रवाँ सोचो
सुन के बाद-ए-सबा की सरगोशी
क्यूँ लरज़ती हैं पत्तियाँ सोचो
पत्थरों की पनाह में क्यूँ है
आइना-साज़ की दुकाँ सोचो
अस्ल सरचश्मा-ए-वफ़ा क्या है
वज्ह-ए-बे-मेहरी-ए-बुताँ सोचो
ज़ौक़-ए-ता'मीर क्यूँ नहीं मिटता
क्यूँ उजड़ती हैं बस्तियाँ सोचो
फ़िक्र-ए-सुक़रात है कि ज़हर का घूँट
बाइ'स-ए-उम्र-ए-जावेदाँ सोचो
लोग मा'नी तराश ही लेंगे
कोई बे-रब्त दास्ताँ सोचो
मुबारक वो साअत : शकेब जलाली
मैं भटका हुआ इक मुसाफ़िररह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल से ना-आश्नाई पे नाज़ाँ
तआक़ुब में अपनी ही परछाइयों के रवाँ था
मेरे जिस्म का बोझ धरती सँभाले हुए थी
मगर उस की रानाइयों से मुझे कोई दिल-बस्तगी ही नहीं थी
कभी राह चलते हुए ख़ाक की रूह-परवर कशिश
मैं ने महसूस की ही नहीं थी
मैं आँखों से बीना था लेकिन
मेरे चार-सू चादरें आइनों की तरह थीं
कि जिन के लिए मेरा परतव ही था इक ज़िंदा हक़ीक़त
किसी दूसरे को गवारा न थी इस में शिरकत
मैं कानों से बहरा नहीं था
मगर जिस तरह कोहना गुम्बद में चमगादड़ों के भटकने की आवाज़ गूँजती नहीं है
खुले आसमाँ के परिंदों की चहकार अंदर पहुंचती नहीं है
इसी तरह मेरा भी ज़ौक़-ए-समाअत रसा था फ़क़त अपनी ही धड़कनों तक
बस अपने लहू की सुबुक आहटों तक
मैं भटका हुआ इक मुसाफ़िर
मेरी राह पर मिट चुके थे सफ़र के इशारात सारे
फ़रामोशियों की घनी धुँद में खो चुके थे जिहत के निशानात सारे
रह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल से मैं आश्ना ही नहीं था
मगर मैं अकेला
करोड़ों की इस भीड़ में भी उदास और अकेला
तआक़ुब में अपनी ही परछाइयों के रवाँ था
मैं शायद हमेशा यूँही अपनी परछाइयों के तआक़ुब में हैरान फिरता
अगर रौशनी मुझ पे चमकी न होती
मुबारक वो साअत कि जब मौत और तीरगी के घने साएबाँ के तले
रौशनी मुझ पे चमकी
मेरे दिल पे धरती ने और उस के अरफ़ा मज़ाहिर ने अपनी मोहब्बत रक़म की
मुबारक वो साअत कि जब बर्क़ के कोड़े लहराती
लोहे की चीलों से और
आतिशीं तीर बरसाते फ़ौलाद के पर दरिंदों से मुढभेड़ में
मैं ने देखे
मेरे साथियों के जिगर में तराज़ू हैं जो तीर
हुआ हूँ मैं ख़ुद उन का नख़चीर
जो क़तरा लहू का गिरा उन के तन से
बहा है वो मेरे बदन से
मुबारक वो साअत कि जब मैं ने जाना
मिरी धड़कनों में करोड़ों दिलों की सदा है
मेरी रूह में मुश्तरक ''गरचे क़ालिब जुदा है''
काला पत्थर : शकेब जलाली
मेरा चेहरा आईना हैआईने पर दाग़ जो होते
लहू की बरखा से मैं धोता
अपने अंदर झाँक के देखो
दिल के पत्थर में कालक की कितनी परतें जमी हुई हैं
जिन से हर निथरा-सुथरा मंज़र कजला सा गया
दरिया सूख गए हैं शर्म के मारे
कोएले पर से कालक कौन उतारे!!
पादाश : शकेब जलाली
कभी इस सुबुक-रौ नदी के किनारे गए ही नहीं होतुम्हें क्या ख़बर है
वहाँ अन-गिनत खुरदुरे पत्थरों को
सजल पानियों ने
मुलाएम रसीले, मधुर गीत गा कर
अमिट चिकनी गोलाइयों को अदा सौंप दी है
वो पत्थर नहीं था
जिसे तुम ने बे-डोल, अन-घड़ समझ कर
पुरानी चटानों से टकरा के तोड़ा
अब उस के सुलगते तराशे
अगर पाँव में चुभ गए हैं तो क्यूँ चीख़ते हो?
रात के पिछले पहर : शकेब जलाली
शाम ही से थी फ़ज़ा में किसी जलते हुए कपड़े की बिसांदऔर हवा चलती थी जैसे
उस के ज़ख़्मी हों क़दम
दीदा-ए-महर ने अनजाने ख़तर से मुड़ कर
जाते जाते बड़ी हसरत से कई बार ज़मीं को देखा
लेकिन इस सब्ज़ लकीर
इस दरख़्तों की हरी बाड़ के पार
कुछ न पाया कोई शोला न शरार
और फिर रात के तन्नूर से उबला पानी
तीरगिय्यों का सियह फ़व्वारा
देखते देखते तस्वीर हर एक चीज़ की धुँदलाने लगी
दूर तक काले समुंदर की हुमकती लहरें
हाँपते सीनों की मानिंद कराँ-ता-कराँ फैल गईं
और जब रात पड़ी
सिसकियाँ बन गईं झोंकों की सदा
दम-ब-ख़ुद हो गए उस वक़्त दर-ओ-बाम
जैसे आहट किसी तूफ़ाँ की सुना चाहते हों
आँखें मल मल के चराग़ों की लवों ने देखा
लेकिन इस सब्ज़ लकीर
इस दरख़्तों की हरी बाड़ के पार
कुछ न पाया कोई शोला न शरार
रात के पिछले पहर
ना-गहाँ नींद से चौंकी जो ज़मीन
इस के होंटों पे थी ग़मनाक कराह
कर्ब-अंगेज़ कराह
उस के सीने पे रवाँ
बूट लोहे के गुमकते हुए बूट
जिस तरह काँच की चादर पे लुढ़कती हुई पत्थर की सिलें
हर क़दम एक नई चीख़ जनम लेती थी
ख़ाक से दाद-ए-सितम लेती थी
जिहत की तलाश : शकेब जलाली
यहाँ दरख़्त के ऊपर उगा हुआ है दरख़्तज़मीन तंग है (जैसे कभी फ़राख़ न थी)
हवा का काल पड़ा है, नमी भी आम नहीं
समुंदरों को बिलो कर फ़ज़ाओं को मथ कर
जनम दिए हैं अगर चंद अब्र के टुकड़े
झपट लिया है उन्हें यूँ दराज़ शाख़ों ने
कि नीम-जाँ तने को ज़रा ख़बर न हुई
जड़ें भी ख़ाक तले एक ही लगन में रवाँ
न तीरगी से मफ़र है, न रौशनी का सवाल
ज़मीं में पाँव धँसे हैं फ़ज़ा में हात बुलंद
नई जिहत का लगे अब दरख़्त में पैवंद
लरज़ता दीप : शकेब जलाली
दूर शब का सर्द हातआसमाँ के ख़ेमा-ए-ज़ंगार की
आख़िरी क़िंदील गुल करने बढ़ा
और कोमल चाँदनी
एक दर-बस्ता घरौंदे से परे
मुज़्महिल पेड़ों पे गिर कर बुझ गई
बे-निशाँ साए की धीमी चाप पर
ओंगते रस्ते के हर ज़र्रे ने पल भर के लिए
अपनी पलकों की बुझी दर्ज़ों से झाँका
और आँखें मूँद लें
उस समय ताक़-ए-शिकस्ता पर लरज़ते दीप से
मैं ने पूछा
हम-नफ़स
अब तिरे बुझने में कितनी देर है?
इंदिमाल : शकेब जलाली
शाम की सीढ़ियाँ कितनी किरनों का मक़्तल बनींबाद-ए-मस्मूम ने तोड़ कर कितने पत्ते सुपुर्द-ए-ख़िज़ाँ कर दिए
बह के मशकीज़ा-ए-अब्र से कितनी बूँदें ज़मीं की ग़िज़ा बन गईं
ग़ैर-मुमकिन था उन का शुमार
थक गईं गिनने वाले हर इक हाथ की उँगलियाँ
अन-गिनत कह के आगे बढ़ा वक़्त का कारवाँ
अन-गिनत थे मिरे ज़ख़्म-ए-दिल
टूटी किरनों, बिखरते हुए ज़र्द पत्तों, बरसती हुई बूंदियों की तरह
और मरहम भी नापैद था
लेकिन उस रोज़ देखा जो इक तिफ़्ल-ए-नौ-ज़ाईदा का ख़ंदा-ए-ज़ेर-ए-लब
ज़ख़्म-ए-दिल मुंदमिल हो गए सब के सब!
गुरेज़-पा : शकेब जलाली
धीरे धीरे गिर रही थीं नख़्ल-ए-शब से चाँदनी की पत्तियाँबहते बहते अब्र का टुकड़ा कहीं से आ गया था दरमियाँ
मिलते मिलते रह गई थीं मख़मलीं सब्ज़े पे दो परछाइयाँ
जिस तरह सपने के झूले से कोई अंधे कुएँ में जा गिरे
ना-गहाँ कजला गए थे शर्मगीं आँखों के नूरानी दिए
जिस तरह शोर-ए-जरस से कोई वामाँदा मुसाफ़िर चौंक उठे
यक-ब-यक घबरा के वो निकली थी मेरे बाज़ुओं की क़ैद से
अब सुलगते रह गए थे, छिन गया था जाम भी
और मेरी बेबसी पर हँस पड़ी थी चाँदनी
आज तक एहसास की चिलमन से उलझा है ये मुबहम सा सवाल
उस ने आख़िर क्यूँ बुना था बहकी नज़रों से हसीं चाहत का जाल
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