सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

शकेब जलाली की नज़्में : Shakeb Jalali Nazm Hindi

मुजरिम : शकेब जलाली

यही रस्ता मिरी मंज़िल की तरफ़ जाता है
जिस के फ़ुट-पाथ फ़क़ीरों से अटे रहते हैं
ख़स्ता कपड़ों में ये लिपटे हुए मरियल ढाँचे
ये भिकारी कि जिन्हें देख के घिन आती है
हड्डियाँ जिस्म की निकली हुई पिचके हुए गाल
मैले सर में जुएँ, आज़ा से टपकता हुआ कोढ़
रूह बीमार, बदन सुस्त, निगाहें पामाल
हाथ फैलाए पड़े रहते हैं रोगी इंसान
चंद बेवाओं के मदक़ूक़ से पीले चेहरे
कुछ हवस-कार निगाहों में उतर जाते हैं
जिन के अफ़्लास-ज़दा जिस्म, ढलकते सीने
चंद सिक्कों के एवज़ शब को बिका करते हैं
शिद्दत-ए-फ़ाक़ा से रोते हुए नन्हे बच्चे
एक रोटी के निवाले से बहल जाते हैं
या सर-ए-शाम ही सो जाते हैं भूके प्यासे
माँ की सूखी हुई छाती को दबा कर मुँह में
चंद बद-ज़ेब से शोहरत-ज़दा इंसाँ अक्सर
अपनी दौलत ओ सख़ावत की नुमाइश के लिए
या कभी रहम के जज़्बे से हरारत पा कर
चार छे पैसे उन्हें बख़्श दिया करते हैं
क्या फ़क़त रहम की हक़दार हैं नंगी रूहें?
क्यूँ ये इंसानों पे इंसान तरस खाते हैं?
क्यूँ इन्हें देख के एहसास-ए-तही-दस्ती है
अक्सर औक़ात मैं कतरा के निकल जाता हूँ?
यही रस्ता मिरी मंज़िल की तरफ़ जाता है

जश्न-ए-'ईद : शकेब जलाली

सभी ने 'ईद मनाई मिरे गुलिस्ताँ में
किसी ने फूल पिरोए किसी ने ख़ार चुने
ब-नाम-ए-इज़्न-ए-तकल्लुम ब-नाम-ए-जब्र-ए-सुकूत
किसी ने होंट चबाए किसी ने गीत बुने
बड़े ग़ज़ब का गुलिस्ताँ में जश्न-ए-'ईद हुआ
कहीं तो बिजलियाँ कौदीं कहीं चिनार जले
कहीं कहीं कोई फ़ानूस भी नज़र आया
ब-तौर-ए-ख़ास मगर क़ल्ब-ए-दाग़-दार जले
'अजब थी 'ईद-ए-ख़ुमिस्ताँ 'अजब था रंग-ए-नशात
किसी ने बादा-ओ-साग़र किसी ने अश्क पिए
किसी ने अतलस-ओ-कमख़्वाब की क़बा पहनी
किसी ने चाक-ए-गरेबाँ किसी ने ज़ख़्म सिए
हमारे ज़ौक़-ए-नज़ारा को 'ईद के दिन भी
कहीं पे साया-ए-ज़ुल्मत कहीं पे नूर मिला
किसी ने दीदा-ओ-दिल के कँवल खिले पाए
किसी को साग़र-ए-एहसास चकना-चूर मिला
ब-फ़ैज़-ए-'ईद भी पैदा हुई न यक-रंगी
कोई मलूल कोई ग़म से बे-नियाज़ रहा
बड़ा ग़ज़ब है ख़ुदावंद-ए-कौसर-ओ-तसनीम
कि रोज़-ए-'ईद भी तबक़ों का इम्तियाज़ रहा

साथी : शकेब जलाली

मैं उस को पाना भी चाहूँ
तो ये मेरे लिए ना-मुम्किन है
वो आगे आगे तेज़-ख़िराम
मैं उस के पीछे पीछे
उफ़्तां ख़ेज़ाँ
आवाज़ें देता
शोर मचाता
कब से रवाँ हूँ
बर्ग-ए-ख़िज़ाँ हूँ
जब मैं उकता कर रुक जाऊँगा
वो भी पल भर को ठहर कर
मुझ से आँखें चार करेगा
फिर अपनी चाहत का इक़रार करेगा
फिर मैं
मुँह तोड़ के
तेज़ी से घर की जानिब लौटूँगा
अपने नक़्श-ए-क़दम रौंदूँगा
अब वो दिल थाम के
मेरे पीछे लपकता आएगा
नद्दी नाले
पत्थर पर्बत फाँद आ जाएगा
मैं आगे आगे
वो पीछे पीछे
दोनों की रफ़्तार है इक जैसी
फिर ये कैसे हो सकता है
वो मुझ को या मैं उस को पा लूँ

इन्फ़िरादियत परस्त : शकेब जलाली

एक इंसाँ की हक़ीक़त क्या है
ज़िंदगी से उसे निस्बत क्या है
आँधी उट्ठे तो उड़ा ले जाए
मौज बिफरे तो बहा ले जाए
एक इंसाँ की हक़ीक़त क्या है
डगमगाए तो सहारा न मिले
सामने हो प किनारा न मिले
एक इंसाँ की हक़ीक़त क्या है
कुंद तलवार क़लम कर डाले
सर्द-शो'ला ही भसम कर डाले
ज़िंदगी से उसे निस्बत क्या है
एक इंसाँ की हक़ीक़त क्या है

याद : शकेब जलाली

रात इक लड़खड़ाते झोंके से
ना-गहाँ संग-ए-सुर्ख़ की सिल पर
आइना गिर के पाश पाश हुआ
और नन्ही नुकीली किरचों की
एक बोछाड़ दिल को चीर गई

दावत-ए-फिक्र : शकेब जलाली

किस तरह रेत के समुंदर में
कश्ती-ए-ज़ीस्त है रवाँ सोचो
सुन के बाद-ए-सबा की सरगोशी
क्यूँ लरज़ती हैं पत्तियाँ सोचो
पत्थरों की पनाह में क्यूँ है
आइना-साज़ की दुकाँ सोचो
अस्ल सरचश्मा-ए-वफ़ा क्या है
वज्ह-ए-बे-मेहरी-ए-बुताँ सोचो
ज़ौक़-ए-ता'मीर क्यूँ नहीं मिटता
क्यूँ उजड़ती हैं बस्तियाँ सोचो
फ़िक्र-ए-सुक़रात है कि ज़हर का घूँट
बाइ'स-ए-उम्र-ए-जावेदाँ सोचो
लोग मा'नी तराश ही लेंगे
कोई बे-रब्त दास्ताँ सोचो

मुबारक वो साअत : शकेब जलाली

मैं भटका हुआ इक मुसाफ़िर
रह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल से ना-आश्नाई पे नाज़ाँ
तआक़ुब में अपनी ही परछाइयों के रवाँ था
मेरे जिस्म का बोझ धरती सँभाले हुए थी
मगर उस की रानाइयों से मुझे कोई दिल-बस्तगी ही नहीं थी
कभी राह चलते हुए ख़ाक की रूह-परवर कशिश
मैं ने महसूस की ही नहीं थी
मैं आँखों से बीना था लेकिन
मेरे चार-सू चादरें आइनों की तरह थीं
कि जिन के लिए मेरा परतव ही था इक ज़िंदा हक़ीक़त
किसी दूसरे को गवारा न थी इस में शिरकत
मैं कानों से बहरा नहीं था
मगर जिस तरह कोहना गुम्बद में चमगादड़ों के भटकने की आवाज़ गूँजती नहीं है
खुले आसमाँ के परिंदों की चहकार अंदर पहुंचती नहीं है
इसी तरह मेरा भी ज़ौक़-ए-समाअत रसा था फ़क़त अपनी ही धड़कनों तक
बस अपने लहू की सुबुक आहटों तक
मैं भटका हुआ इक मुसाफ़िर
मेरी राह पर मिट चुके थे सफ़र के इशारात सारे
फ़रामोशियों की घनी धुँद में खो चुके थे जिहत के निशानात सारे
रह-ओ-रस्म-ए-मंज़िल से मैं आश्ना ही नहीं था
मगर मैं अकेला
करोड़ों की इस भीड़ में भी उदास और अकेला
तआक़ुब में अपनी ही परछाइयों के रवाँ था
मैं शायद हमेशा यूँही अपनी परछाइयों के तआक़ुब में हैरान फिरता
अगर रौशनी मुझ पे चमकी न होती
मुबारक वो साअत कि जब मौत और तीरगी के घने साएबाँ के तले
रौशनी मुझ पे चमकी
मेरे दिल पे धरती ने और उस के अरफ़ा मज़ाहिर ने अपनी मोहब्बत रक़म की
मुबारक वो साअत कि जब बर्क़ के कोड़े लहराती
लोहे की चीलों से और
आतिशीं तीर बरसाते फ़ौलाद के पर दरिंदों से मुढभेड़ में
मैं ने देखे
मेरे साथियों के जिगर में तराज़ू हैं जो तीर
हुआ हूँ मैं ख़ुद उन का नख़चीर
जो क़तरा लहू का गिरा उन के तन से
बहा है वो मेरे बदन से
मुबारक वो साअत कि जब मैं ने जाना
मिरी धड़कनों में करोड़ों दिलों की सदा है
मेरी रूह में मुश्तरक ''गरचे क़ालिब जुदा है''

काला पत्थर : शकेब जलाली

मेरा चेहरा आईना है
आईने पर दाग़ जो होते
लहू की बरखा से मैं धोता
अपने अंदर झाँक के देखो
दिल के पत्थर में कालक की कितनी परतें जमी हुई हैं
जिन से हर निथरा-सुथरा मंज़र कजला सा गया
दरिया सूख गए हैं शर्म के मारे
कोएले पर से कालक कौन उतारे!!

पादाश : शकेब जलाली

कभी इस सुबुक-रौ नदी के किनारे गए ही नहीं हो
तुम्हें क्या ख़बर है
वहाँ अन-गिनत खुरदुरे पत्थरों को
सजल पानियों ने
मुलाएम रसीले, मधुर गीत गा कर
अमिट चिकनी गोलाइयों को अदा सौंप दी है
वो पत्थर नहीं था
जिसे तुम ने बे-डोल, अन-घड़ समझ कर
पुरानी चटानों से टकरा के तोड़ा
अब उस के सुलगते तराशे
अगर पाँव में चुभ गए हैं तो क्यूँ चीख़ते हो?

रात के पिछले पहर : शकेब जलाली

शाम ही से थी फ़ज़ा में किसी जलते हुए कपड़े की बिसांद
और हवा चलती थी जैसे
उस के ज़ख़्मी हों क़दम
दीदा-ए-महर ने अनजाने ख़तर से मुड़ कर
जाते जाते बड़ी हसरत से कई बार ज़मीं को देखा
लेकिन इस सब्ज़ लकीर
इस दरख़्तों की हरी बाड़ के पार
कुछ न पाया कोई शोला न शरार
और फिर रात के तन्नूर से उबला पानी
तीरगिय्यों का सियह फ़व्वारा
देखते देखते तस्वीर हर एक चीज़ की धुँदलाने लगी
दूर तक काले समुंदर की हुमकती लहरें
हाँपते सीनों की मानिंद कराँ-ता-कराँ फैल गईं
और जब रात पड़ी
सिसकियाँ बन गईं झोंकों की सदा
दम-ब-ख़ुद हो गए उस वक़्त दर-ओ-बाम
जैसे आहट किसी तूफ़ाँ की सुना चाहते हों
आँखें मल मल के चराग़ों की लवों ने देखा
लेकिन इस सब्ज़ लकीर
इस दरख़्तों की हरी बाड़ के पार
कुछ न पाया कोई शोला न शरार
रात के पिछले पहर
ना-गहाँ नींद से चौंकी जो ज़मीन
इस के होंटों पे थी ग़मनाक कराह
कर्ब-अंगेज़ कराह
उस के सीने पे रवाँ
बूट लोहे के गुमकते हुए बूट
जिस तरह काँच की चादर पे लुढ़कती हुई पत्थर की सिलें
हर क़दम एक नई चीख़ जनम लेती थी
ख़ाक से दाद-ए-सितम लेती थी

जिहत की तलाश : शकेब जलाली

यहाँ दरख़्त के ऊपर उगा हुआ है दरख़्त
ज़मीन तंग है (जैसे कभी फ़राख़ न थी)
हवा का काल पड़ा है, नमी भी आम नहीं
समुंदरों को बिलो कर फ़ज़ाओं को मथ कर
जनम दिए हैं अगर चंद अब्र के टुकड़े
झपट लिया है उन्हें यूँ दराज़ शाख़ों ने
कि नीम-जाँ तने को ज़रा ख़बर न हुई
जड़ें भी ख़ाक तले एक ही लगन में रवाँ
न तीरगी से मफ़र है, न रौशनी का सवाल
ज़मीं में पाँव धँसे हैं फ़ज़ा में हात बुलंद
नई जिहत का लगे अब दरख़्त में पैवंद

लरज़ता दीप : शकेब जलाली

दूर शब का सर्द हात
आसमाँ के ख़ेमा-ए-ज़ंगार की
आख़िरी क़िंदील गुल करने बढ़ा
और कोमल चाँदनी
एक दर-बस्ता घरौंदे से परे
मुज़्महिल पेड़ों पे गिर कर बुझ गई
बे-निशाँ साए की धीमी चाप पर
ओंगते रस्ते के हर ज़र्रे ने पल भर के लिए
अपनी पलकों की बुझी दर्ज़ों से झाँका
और आँखें मूँद लें
उस समय ताक़-ए-शिकस्ता पर लरज़ते दीप से
मैं ने पूछा
हम-नफ़स
अब तिरे बुझने में कितनी देर है?

इंदिमाल : शकेब जलाली

शाम की सीढ़ियाँ कितनी किरनों का मक़्तल बनीं
बाद-ए-मस्मूम ने तोड़ कर कितने पत्ते सुपुर्द-ए-ख़िज़ाँ कर दिए
बह के मशकीज़ा-ए-अब्र से कितनी बूँदें ज़मीं की ग़िज़ा बन गईं
ग़ैर-मुमकिन था उन का शुमार
थक गईं गिनने वाले हर इक हाथ की उँगलियाँ
अन-गिनत कह के आगे बढ़ा वक़्त का कारवाँ
अन-गिनत थे मिरे ज़ख़्म-ए-दिल
टूटी किरनों, बिखरते हुए ज़र्द पत्तों, बरसती हुई बूंदियों की तरह
और मरहम भी नापैद था
लेकिन उस रोज़ देखा जो इक तिफ़्ल-ए-नौ-ज़ाईदा का ख़ंदा-ए-ज़ेर-ए-लब
ज़ख़्म-ए-दिल मुंदमिल हो गए सब के सब!

गुरेज़-पा : शकेब जलाली

धीरे धीरे गिर रही थीं नख़्ल-ए-शब से चाँदनी की पत्तियाँ
बहते बहते अब्र का टुकड़ा कहीं से आ गया था दरमियाँ
मिलते मिलते रह गई थीं मख़मलीं सब्ज़े पे दो परछाइयाँ
जिस तरह सपने के झूले से कोई अंधे कुएँ में जा गिरे
ना-गहाँ कजला गए थे शर्मगीं आँखों के नूरानी दिए
जिस तरह शोर-ए-जरस से कोई वामाँदा मुसाफ़िर चौंक उठे
यक-ब-यक घबरा के वो निकली थी मेरे बाज़ुओं की क़ैद से
अब सुलगते रह गए थे, छिन गया था जाम भी
और मेरी बेबसी पर हँस पड़ी थी चाँदनी
आज तक एहसास की चिलमन से उलझा है ये मुबहम सा सवाल
उस ने आख़िर क्यूँ बुना था बहकी नज़रों से हसीं चाहत का जाल

टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...