कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

रोऊँ मैं सागर के किनारे / Roon Main Sagar Ke Kinare

 रोऊँ मैं सागर के किनारे, सागर हँसी उड़ाए

क्या जानें ये चंचल लहरें, मैं हूँ आग छुपाए


मैं भी इतना डूब चुका हूँ, क्या तेरी गहराई

काहे होड़ लगाए मो से, काहे होड़ लगाए

रोऊँ मैं सागर के किनारे


तुझ में डूबे चाँद मगर इक चाँद ने मुझे डुबाया

मेरा सब कुछ लूट के ले गई, चाँदनी रात की माया

अर्मानों की चितह सजाकर मैंने आग लगाई

अब क्या आग बुझाए मेरी, अब क्या आग बुझाए

रोऊँ मैं सागर के किनारे...

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Popular Posts

Categories

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *