एनसीईआरटी पाठ्यक्रम की लोककथाएँ | NCERT ki Lokkathaen Hindi
फिर? फुर्र!
प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दूसरी के पाठ्यक्रम में शामिल है।
कहानी सुनाने वाला कहानियाँ सुना-सुनाकर थक गया, पर सुनने वाले नहीं थके। उसे घेरकर बैठे बच्चों और बूढ़ों ने उससे और कहानी सुनाने का आग्रह किया।
सो उसने कहना शुरू किया कि एक पेड़ पर बहुत-सी चिड़ियाँ रहती थीं। इतना कहकर वह रुक गया। आदतन लोगों ने पूछा, “फिर?”
कहानी सुनाने वाले ने कहा, “एक चिड़िया पेड़ से उड़ी-फुर्र!”
“फिर?”
“फिर एक चिड़िया पेड़ से उड़ी-फुर्र!”
“फिर?”
“फिर एक चिड़िया उड़ी-फुर्र!”
“फिर?”
“फुर्र!”
देर तक यही चलता रहा। “फिर?” “फुर्र!” “फिर?” “फुर्र!” से लोग ऊब गए। आख़िर एक जने ने पूछा, “यह कब तक चलेगा?”
कहानी सुनाने वाले ने कहा, “जब तक कि सारी चिड़ियाँ उड़ नहीं जातीं!”
स्रोत :
- पुस्तक : भारत की लोक कथाएँ (पृष्ठ 354)
- संपादक : ए. के. रामानुजन
- प्रकाशन : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत
- संस्करण : 2001
गारो
प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा सातवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।
मेघालय राज्य की एक प्रमुख जनजाति है गारो। गारो लोग स्वभाव से ही शांतिप्रिय, परिश्रमी और प्रकृति को प्यार करने वाले होते हैं। इसी गारो समाज के दो महापुरुषों के नाम हैं—जा पा जलिन पा और सुक पा बुगि पा। गारो समाज इन दो महापुरुषों को बड़ी श्रद्धा से याद करता है।
गारो लोग ‘मेघालय’ में कैसे बस गए, इसके बारे में एक कहानी प्रचलित है। कहा जाता है कि हज़ारों साल पहले गारो लोगों के पूर्वज चीन और तिब्बत की ओर सुदूर घाटियों में इधर-उधर भटकते रहते थे। जहाँ खाने-पीने का साधन मिल जाता, वहाँ रुक जाते। जब भोजन की कठिनाई होती तो नए स्थानों की खोज में निकल पड़ते। यह ख़ानाबदोश जीवन कब तक चलता रहा होगा, कुछ सही-सही नहीं कहा जा सकता।
भोजन की तलाश में भटकने के अतिरिक्त गारो लोगों को विषम मौसम और जंगली जानवरों का भी सामना करना पड़ता था। इस कारण गारो लोग बहुत परेशान होते थे।
उन्हीं दिनों गारो समाज में जा पा जलिन पा और सुक पा बुंगि पा का जन्म हुआ था। इन दो महापुरुषों ने अपने लोगों की परेशानियों को देखा और समझा। दोनों ने गारो लोगों को उस विषम परिस्थिति से निकालकर कहीं अच्छे स्थान पर ले जाने का फ़ैसला किया। दोनों महापुरुषों ने गारो लोगों को एकत्रित किया। उन्होंने बताया कि वे उन्हें एक सुंदर स्थान पर ले जाएँगे। गारो लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। सभी लोगों ने उनकी बात मान ली। कहा जाता है कि जलिन पा और बुंगि पा इतने निडर और प्रभावशाली व्यक्ति थे कि जंगलों के ख़ूँख़ार जानवर भी उनकी आहट या आवाज़ सुनकर भागने लगते थे। वे भयंकर तूफ़ानों में भी सही मार्ग और दिशा का पता लगा लेते थे। रात में भी उन्हें अपने साथियों का मार्गदर्शन करने में कभी परेशानी नहीं होती थी। अपने सहज बोध और विवेक द्वारा वे आने वाले संकट का पूर्वानुमान कर लेते और अपने साथियों को मुसीबतों से बचा लेते।
इस तरह सारे गारो एक साथ हिमालय की तराई को पार करते हुए ब्रह्मपुत्र नदी-घाटी की ओर बढ़े। वे अपनी संपत्ति-घोड़े, जानवर आदि अपने साथ लेकर चल रहे थे। कभी-कभी महीनों तक चलते रहते और कहीं-कहीं वर्षों ठहर जाते वर्षों तक इस प्रकार यात्रा होती रही। वे हिमालय की घाटियों के बीच रास्ता नापते रहे। जलिन पा और बुंगि पा ने अपने साथियों को सदैव आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
कई वर्षों की कठिन यात्रा के बाद गारो लोग असम के मैदानी जंगलों में आ पहुँचे। कहा जाता है कि उनका पहला पड़ाव कुचविहार के वनों में हुआ। कुचविहार पर उन दिनों असम के राजा का अधिकार था। उसने गारो लोगों को आगे बढ़ने से रोक दिया। गारो लोग प्रारंभ से ही शांतिप्रिय रहे हैं। उन्होंने लड़ाई का रास्ता नहीं अपनाया। जलिन पा और बुंगि पा ने असम के राजा से बातचीत करके उन्हें समझाया। असम का राजा उन्हें मार्ग देने के लिए सहमत हो गया। उसका विवाह एक गारो सुंदरी से करा दिया गया। इस तरह वातावरण मित्रतापूर्ण हो गया।
कुछ विद्वानों का अनुमान है कि यह घटना लगभग प्रथम सदी ईसा पूर्व की है। आज कुचविहार इलाक़ा पश्चिम बंगाल राज्य में पड़ता है। कहा जाता है कि गारो समाज के कुछ लोग कुचविहार क्षेत्र में बस गए थे। आज भी कुचविहार क्षेत्र में तथा आसपास के कई स्थानों में गारो समाज के लोग रहते हैं।
अब जलिन पा और बुंगि पा ने अपने लोगों को गारो पहाड़ी की घाटियों की ओर चलने की सलाह दी। यह घाटी बहुत ही सुंदर थी। यहाँ पहाड़ी झरने, जंगली फूल, फल, जड़ी-बूटियाँ और पशु-पक्षी वातावरण को और अधिक आकर्षक बना रहे थे। ज़मीन भी बहुत उपजाऊ थी। इस कारण उन्होंने वहीं बसने का फ़ैसला किया।
आज यह क्षेत्र गारो समाज का मूल निवास स्थान बन गया है। गारो लोग इस क्षेत्र को अपनी पवित्र भूमि मानते हैं।
गारो लोग प्रारंभ से ही प्रकृति के विभिन्न प्रकार के संसाधनों की तलाश करना ही अपना मनोरंजन मानते हैं। जंगलों में घूमना, फल-फूलों, अन्न, कंद-मूल आदि की खोज करना, खेती के लिए उपजाऊ भूमि की पहचान करना आदि उनको शुरू से ही पसंद रहे हैं। आज भी गारो लोगों ने अपने पारंपरिक हुनर को क़ायम रखा हुआ है।
गारो समाज और गारो संस्कृति भारत का गौरव है। गारो समाज आज भी जलिन पा और बुंगि पा को बड़ी श्रद्धा और आदर से याद करते हैं।
स्रोत :
- पुस्तक : दूर्वा (भाग-2) (पृष्ठ 29)
- प्रकाशन : एनसीईआरटी
- संस्करण : 2022
Muft Hi Muft | मुफ्त ही मुफ्त (गुजराती लोककथा) | Class 4 Hindi Chapter 14 | Ncert |
प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा चौथी के पाठ्यक्रम में शामिल है।
एक दिन भीखूभाई का मन नारियल खाने का हुआ। ताज़ा-मुलायम, कसा हुआ, शक्कर के साथ। म्म्म्म! उसके बारे में सोचते ही भीखूभाई ने अपने होंठों को चटकारा, “वाह क्या मीठा-मीठा सा स्वाद होगा!”
लेकिन एक छोटी-सी समस्या थी। घर में तो एक भी नारियल नहीं था।
“ओहो! अब मुझे बाज़ार जाना पड़ेगा,” उन्होंने अपनी पत्नी लाभुबेन से कहा।
लाभुबेन अपने कंधे उचक उचकाकर बोलीं, “खाना है तो जाना है।”
एक समस्या और थी।
भीखूभाई ने कहा, “पैसे ख़र्च करने पड़ेंगे,”
लाभुबेन बोली, “हाँ। पैसे तो ख़र्च करने पड़ेंगे।”
अब तक तो तुम्हें पता लग गया होगा कि भीखूभाई ज़रा कंजूस थे। वे सीधे खेत में बूढ़े बरगद के नीचे जाकर बैठ गए और सोचने लगे, “क्या करूँ? मैं क्या करूँ?”
मगर नारियल खाने के लिए जी ऐसा ललचाया कि वे जल्दी घर वापस लौटकर लाभुबेन से बोले, “अच्छा, मैं बाज़ार तक हो आता हूँ। पता तो चले कि नारियल आजकल कितने में बिक रहे हैं।”
जूते पहनकर, छड़ी उठाकर, भीखूभाई निकल पड़े।
बाज़ार में लोग अपने-अपने कामों में लगे थे। भीखूभाई ने इधर कुछ देखा, उधर कुछ उठाया और दाम पूछा। देखते-पूछते, वे नारियलवाले के पास पहुँच गए।
“ऐ नारियलवाले, नारियल कितने में दोगे?” भीखूभाई ने पूछा।
नारियलवाले ने कहा, “बस, दो रुपए में काका,” “बस, दो रुपए! “भीखूभाई ने आँखें फैलाकर कहा, “बहुत ज़्यादा है। “एक रुपए में दे दो।”
नारियलवाले ने कहा, “ना जी ना। दो रुपए, सही दाम। ले लो या छोड़ दो,” “ठीक है! ठीक है!” भीखूभाई बड़बड़ाए।
अच्छा तो बताओ, एक रुपए में कहाँ मिलेगा?”
नारियलवाले ने कहा, “यहाँ से थोड़ी दूर जो मंडी है, वहाँ शायद मिल जाए।”
सो भीखूभाई उसी तरफ़ चल पड़े। “चलो देख लेते हैं,” वे अपने आप से बोले, “टहलने का मौक़ा है और रुपए भर बचत भी हो जाएगी।” ख़ुशी से घुरघुराते भीखूभाई ने छड़ी को ज़मीन पर थपथपाया।
मंडी में कोलाहल फैला हुआ था। व्यापारियों की ऊँची-ऊँची आवाज़े गूँज रही थीं।
“बटाटा-आलू, बटाटा-आलू! काँदा-प्याज़ काँदा-प्याज़! गाजर गाजर गाजर! कोबी-बंदगोभी कोबी-बंदगोभी!”
माथे का पसीना पोंछकर भीखूभाई ने इधर-उधर ताका। नारियलवाले को देखकर पूछा, “अरे भाई, एक नारियल कितने में दोगे?”
“सिर्फ़ एक रुपया, काका,” नारियलवाले ने जवाब दिया, “जो चाहो ले जाओ। जल्दी।”
“शू छे भाई?” भीखूभाई ने कहा, “यह क्या? मैं इतनी दूर से आया हूँ और तुम पूरा एक रुपया माँग रहे हो। पचास पैसे काफ़ी हैं। मैं इस नारियल को लेता हूँ और तुम, यह लो, पकड़ो, पचास पैसे।”
नारियलवाले ने झट भीखूभाई के हाथ से नारियल को छीन लिया और बोला, “माफ़ करो, काका। एक रुपया या फिर कुछ नहीं।” लेकिन भीखूभाई का निराश चेहरा देखकर बोला, “बंदरगाह पर चले जाओ, हो सकता है वहाँ तुम्हें पचास पैसे में मिल जाए।”
भीखूभाई अपनी छड़ी से टेक लगाकर सोचने लगे, “आख़िर पचास पैसे तो पूरे पचास पैसे हैं। वैसे भी मेरी टाँगों में अभी भी दम है।”
पैरों को घसीटते हुए, भीखूभाई चलने लगे। हर दो क़दम पर रुककर, जेब में से बड़ा सफ़ेद रुमाल निकालकर, वे अपना पसीना पोंछते।
सागर के किनारे एक नाववाला बैठा था। उसके सामने दो-चार नारियल पड़े थे। “अरे भाई, एक नारियल कितने में दोगे?” भीखूभाई ने पूछा और कहा, “ये तो काफ़ी अच्छे दिखते हैं।”
“काका, यह कोई पूछने वाली बात है? केवल पचास पैसे” नाववाले ने कहा।
“पचास पैसे!” भीखूभाई मानो हैरानी से हक्के-बक्के हो गए। “इतनी दूर से पैदल आया हूँ। इतना थक गया हूँ और तुम कहते हो पचास पैसे? मेरी मेहनत बेकार हो गई। ना भाई ना! पचास पैसे बहुत ज़्यादा है। मैं तुम्हें पच्चीस पैसे दूँगा। यह लो, रख लो।” ऐसा कहते हुए, भीखूभाई झुककर नारियल उठाने ही वाले थे...
नाववाले ने कहा, “नीचे रख दो। मेरे साथ कोई सौदा-वौदा नहीं चलेगा।”
थोड़ी देर बाद उसने भीखूभाई की ओर ध्यान से देखा और ज़रा ठंडे दिमाग़ से बोला, “सस्ते में चाहिए? नारियल के बग़ीचे में चले जाओ। वहाँ ढेर सारे मिल जाएँगे, मनपसंद दाम में।”
भीखूभाई ने फिर अपने आप को समझाया, “इतनी दूर आया हूँ। अब बग़ीचे तक जाने में हर्ज़ ही क्या है?” सच बात तो यह थी कि वे काफ़ी थक चुके थे। मगर पच्चीस पैसे बचाने के ख़्याल से ही उनमें फुर्ती आ गई।
भीखूभाई ने सोचा, “दोगुना ज़्यादा चलना पड़ेगा, पर चार आने बच भी तो जाएँगे और फिर, कोई भी चीज़ मुफ़्त में कहाँ मिलती है?”
भीखूभाई नारियल के बग़ीचे में पहुँच गए। वहाँ के माली को देखकर उससे पूछा, “यह नारियल कितने में बेचोगे?”
माली ने जवाब दिया, “जो पसंद आए ले जाओ, काका, बस, पच्चीस पैसे का एक। देखो, कितने बड़े-बड़े हैं!”
“हे भगवान! पच्चीस पैसे! पूरा रास्ता पैदल आने के बाद भी! जूते घिस गए, पैर थक गए और अब पैसे भी देने पड़ेंगे? मेरी बात मानो, एक नारियल मुफ़्त में ही दे दो, हाँ। देखो, मैं कितना थक गया हूँ!”
भीखूभाई की बात सुनकर माली ने कहा, “अरे, काका। मुफ़्त में चाहिए! न? यह रहा पेड़ और वह रहा नारियल। पेड़ पर चढ़ जाओ और जितने चाहो तोड़ लो। वहाँ नारियल की कोई कमी नहीं है। पैसे तो मेरी मेहनत के हैं।”
“सच? जितना चाहूँ ले लूँ?” भीखूभाई तो ख़ुशी से फूले न समाए। “मेरा यहाँ तक आना बेकार नहीं गया!”
उन्होंने जल्दी-जल्दी पेड़ पर चढ़ना शुरू कर दिया। पेड़ पर चढ़ते-चढ़ते भीखूभाई ने सोचा “बहुत अच्छे! मेरी तो क़िस्मत खुल गई। जितने नारियल चाहे तोड़ लूँ और पैसे भी न दूँ। क्या बात है!”
भीखूभाई ऊपर पहुँच गए। फिर वे टहनी और तने के बीच आराम से बैठ गए और दोनों हाथों को आगे बढ़ाने लगे सबसे बड़े नारियल को तोड़ने के लिए। ज़्ज़्ज़्क! पैर फिसल गए। भीखूभाई ने एकदम से नारियल को पकड़ लिया। उनके दोनों पैर हवा में झूलते रह गए।
“ओ माँ! अब मैं क्या करूँ?”
भीखूभाई चिल्लाने लगे, “अरे भाई! मदद करो!” उन्होंने नीचे खड़े माली से विनती की।
माली ने कहा, “वो मेरा काम नहीं, काका, मैंने सिर्फ़ नारियल लेने की बात की थी। बाक़ी सब तुम्हारे और तुम्हारे नारियल के बीच का मामला है। पैसे नहीं, ख़रीदना नहीं, बेचना नहीं, और मदद नहीं। सब कुछ मुफ़्त।” तभी ऊँट पर सवार एक आदमी वहाँ से गुज़रा।
“अरे ओ!” भीखूभाई ज़ोर-ज़ोर से बुलाने लगे, “ओ ऊँटवाले! मेरे पैर वापस पेड़ पर टिका दो न! बड़ी मेहरबानी होगी।”
ऊँटवाले ने सोचा, “चलो, मदद कर देता हूँ। मेरा क्या जाता है।”
ऊँट की पीठ पर खड़े होकर उसने भीखूभाई के पैरों को पकड़ लिया। ठीक उसी समय ऊँट को हरे-हरे पत्ते नज़र आए। पत्ते खाने के लालच में ऊँट ने गर्दन झुकाई और अपनी जगह से हट गया।
बस, वह आदमी ऊँट की पीठ से फिसल गया! अपनी जान बचाने के लिए उसने भीखूभाई के पैरों को कसकर पकड़ लिया। अब दोनों क्या करते? इतने में एक घुड़सवार आया।
“अरे, सांभ्लो छो!” पेड़ से लटके दोनों पुकारने लगे। “सुनो भाई, कोई बचाओ! बचाओ! घुड़सवार को देखकर भीखूभाई ने दुहाई दी, “ओ मेरे भाई, मुझे पेड़ पर वापस पहुँचा दो।”
“हम्म्म। एक मिनट भी नहीं लगेगा। मैं घोड़े की पीठ पर चढ़कर इनकी मदद कर देता हूँ” यह सोचकर घुड़सवार घोड़े पर उठ खड़ा हुआ।
लेकिन कौन कहता है कि घोड़ा ऊँट से बेहतर है? हरी-हरी घास दिखाई देने पर तो दोनों एक जैसे ही हैं। घास के चक्कर में घोड़ा ज़रा आगे बढ़ा और छोड़ चला अपने मालिक को ऊँटवाले के पैरों से लटकते हुए।
एक, दो और अब तीनों के तीनों-झूलते रहे नारियल के पेड़ से।
“काका! काका! कसके पकड़े रहना, हाँ”, घुड़सवार ने पसीना-पसीना होते हुए कहा, “जब तक कोई बचाने वाला न आए, कहीं छोड़ न देना। मैं आपको सौ रुपए दूँगा।”
“काका! काका!” अब ऊँटवाले की बारी थी। “मैं आपको दो सौ रुपए दूँगा, लेकिन नारियल को छोड़ना नहीं।”
“सौ और दो सौ! बाप रे बाप, तीन सौ रुपए!” भीखूभाई का सिर चकरा गया। “इतना! इतना सारा पैसा!” ख़ुशी से उन्होंने अपनी दोनों बाहों को फैलाया... और नारियल गया हाथ से छूट।
धड़ाम से तीनों ज़मीन पर गिरे घुड़सवार, ऊँटवाला और भीखूभाई। भीखूभाई अपने आप को सँभाल ही रहे थे कि एक बहुत बड़ा नारियल उनके सिर पर आ फूटा।
बिल्कुल मुफ़्त।
राख की रस्सी
प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा पाँचवी के पाठ्यक्रम में शामिल है।
लोनपो गार तिब्बत के बत्तीसवें राजा सौनगवसैन गांपो के मंत्री थे। वे अपनी चालाकी और हाज़िरजवाबी के लिए दूर-दूर तक मशहूर थे। कोई उनके सामने टिकता न था। चैन से ज़िंदगी चल रही थी। मगर जब से उनका बेटा बड़ा हुआ था उनके लिए चिंता का विषय बना हुआ था। कारण यह था कि वह बहुत भोला था। होशियारी उसे छूकर भी नहीं गई थी। लोनपो गार ने सोचा, “मेरा बेटा बहुत सीधा-सादा है। मेरे बाद इसका काम कैसे चलेगा!”
एक दिन लोनपो गार ने अपने बेटे को सौ भेड़ें देते हुए कहा, “तुम इन्हें लेकर शहर जाओ। मगर इन्हें मारना या बेचना नहीं। इन्हें वापस लाना सौ जौ के बोरों के साथ। वरना मैं तुम्हें घर में नहीं घुसने दूँगा।” इसके बाद उन्होंने बेटे को शहर की तरफ़ रवाना किया।
लोनपो गार का बेटा शहर पहुँच गया। मगर इतने बोरे जौ ख़रीदने के लिए उसके पास रुपए ही कहाँ थे? वह इस समस्या पर सोचने-विचारने के लिए सड़क किनारे बैठ गया। मगर कोई हल उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था। वह बहुत दुखी था। तभी एक लड़की उसके सामने आ खड़ी हुई। “क्या बात है तुम इतने दुखी क्यों हो?” लोनपो गार के बेटे ने अपना हाल कह सुनाया। “इसमें इतना दुखी होने की कोई बात नहीं। मैं इसका हल निकाल देती हूँ।” इतना कहकर लड़की ने भेड़ों के बाल उतारे और उन्हें बाज़ार में बेच दिया। जो रुपए मिले उनसे जौ के सौ बोरे ख़रीद कर उसे घर वापस भेज दिया।
लोनपो गार के बेटे को लगा कि उसके पिता बहुत ख़ुश होंगे। मगर उसकी आपबीती पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वे उठकर कमरे से बाहर चले गए। दूसरे दिन उन्होंने अपने बेटे को बुलाकर कहा, “पिछली बार भेड़ों के बाल उतारकर बेचना मुझे ज़रा भी पसंद नहीं आया। अब तुम दुबारा उन्हीं भेड़ों को लेकर जाओ। उनके साथ जौ के सौ बोरे लेकर ही लौटना।”
एक बार फिर निराश लोनपो गार का बेटा शहर में उसी जगह जा बैठा। न जाने क्यों उसे यक़ीन था कि वह लड़की उसकी मदद के लिए ज़रूर आएगी। और हुआ भी कुछ ऐसा ही, वह लड़की आई। उससे उसने अपनी मुश्किल कह सुनाई, “अब तो बिना जौ के सौ बोरों के मेरे पिता मुझे घर में नहीं घुसने देंगे।” लड़की सोचकर बोली, “एक तरीक़ा है।” उसने भेड़ों के सींग काट लिए। उन्हें बेचकर जो रुपए मिले उनसे सौ बोरे जौ ख़रीदे। बोरे लोनपो गार के बेटे को सौंपकर लड़की ने उसे घर भेज दिया।
भेड़ें और जौ के बोरे पिता के हवाले करते हुए लोनपो गार का बेटा ख़ुश था। उसने विजयी भाव से सारी कहानी कह सुनाई। सुनकर लोनपो गार बोले,” उस लड़की से कहो कि हमें नौ हाथ लंबी राख़ की रस्सी बनाकर दे।” उनके बेटे ने लड़की के पास जाकर पिता का संदेश दोहरा दिया। लड़की ने एक शर्त रखी, “मैं रस्सी बना तो दूँगी। मगर तुम्हारे पिता को वह गले में पहननी होगी।” लोनपो गार ने सोचा ऐसी रस्सी बनाना ही असंभव है। इसलिए लड़की की शर्त मंज़ूर कर ली।
अगले दिन लड़की ने नौ हाथ लंबी रस्सी ली। उसे पत्थर के सिल पर रखा और जला दिया। रस्सी जल गई, मगर रस्सी के आकार की राख बच गई। इसे वह सिल समेत लोनपो गार के पास ले गई और उसे पहनने के लिए कहा। लोनपो गार रस्सी देखकर चकित रह गए। वे जानते थे कि राख की रस्सी को गले में पहनना तो दूर, उठाना भी मुश्किल है। हाथ लगाते ही वह टूट जाएगी। लड़की की समझदारी के सामने उनकी अपनी चालाकी धरी रह गई। बिना वक़्त गँवाए लोनपो गार ने अपने बेटे की शादी का प्रस्ताव लड़की के सामने रख दिया। धूमधाम से उन दोनों की शादी हो गई।
स्रोत :
- पुस्तक : रिमझिम (पृष्ठ 5)
- प्रकाशन : एनसीईआरटी
- संस्करण : 2022
बूढ़ी अम्मा की बात
प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।
एक था किसान। गोमा मोरी नाम था उसका। गुज़र-बसर लायक़ खेती थी। एक गाय, एक जोड़ी बैल, बीस बकरियाँ थीं। छोटा-सा घर। घर के सामने पशु बाँधने का बाड़ा। तीन साल से वर्षा बहुत कम हुई थी। न फ़सलें हुईं थीं न चारा। इस वर्ष भी आषाढ़ सूखा ही रह गया। वर्षा की कोई आशा नही बँधी थी। खेत जोतकर क्या करूँगा? गोमा ने एक लंबी साँस छोड़ी और मन-ही-मन सोचा। वह बैलों को हाँकते हुए वापिस घर की ओर चल पड़ा।
अगले दिन गोमा बड़े सवेरे सोकर उठा। गाय, बैल व बकरियों को बाड़े से निकाला। उसकी पत्नी बकरियों को घेरकर उन्हें चराने चली गई। उसने फिर हिम्मत बटोरी और हल को बैलों के कँधे पर रखकर चल पड़ा खेतों की ओर। रास्ते में उसे कई किसानों ने टोककर कहा कि गोमा! खेत जोतने से क्या होगा? वर्षा के तो कुछ भी आसार नहीं दिख रहे। गोमा ने सब की बात सुनी। कई बार उसका मन डाँवाडोल भी हुआ फिर भी उसने हिम्मत रखी और कुछ सोचकर खेत पर पहुँच गया।
उसने आकाश की ओर देखा। सूरज आग के गोले की तरह जल रहा था। उसने धरती को भी निहारा। खेतों में गहरी और चौड़ी दरारें पड़ गई थीं। वह बैलों को देखकर उनकी दशा से भी चिंतित था। भूख-प्यास सहन करते-करते वे बहुत दुबले हो गए थे। वह थोड़ा निराश भी हुआ। उसे बैलों की दशा पर दया हो आई। उसने फिर एक लबी साँस छोड़ी और खेत की मेंड़ पर एक वृक्ष के नीचे बैठकर सोचने लगा। क्या करे वह? खेत जोते या उसे यों ही पड़ा रहने दे। वह सोचता रहा। थोड़ी देर बाद वह उठा और दुखी मन से बैलों को हाँककर घर की राह पकड़ ली। उसने निर्णय कर लिया कि वह तब तक खेत नहीं जोतेगा जब तक कि वर्षा नहीं हो जाती।
धूप काफ़ी तेज़ थी। दूसरे दिन वह और भी निराश हो गया। उसके पैर न आगे बढ़ते थे और न पीछे जाने की उनमें हिम्मत ही थी। रास्ते में एक पेड़ के नीचे उसने बैलों को रोका और वहीं नीचे ज़मीन पर बैठ गया।
तभी वहाँ पर एक बूढ़ी अम्मा आ गई। वह भी उसी पेड़ के नीचे बैठ गई। गोमा ने पूछा, “अरी ओ बूढ़ी अम्मा! कहाँ से आ रही हो इतनी तेज़ धूप में? तुम्हें किधर जाना है?” बूढ़ी अम्मा ने कहा, “मैं तो अपनी नातिन से मिलने पास के गाँव जा रही हूँ। लेकिन तुम इस समय यहाँ क्या कर रहे हो? यह समय तो खेत में हल जोतने का है। लेकिन तुम यहाँ आराम कर रहे हो। क्या तुम बीमार हो या तुम्हारे बैल बीमार हैं। कहीं तुम्हारा हल टूट तो नहीं गया है?”
गोमा बोला—“नहीं अम्मा! न तो मैं बीमार हूँ और न ही मेरे बैल बीमार हैं? मेरा हल भी नहीं टूटा है। टूटी है तो मेरी हिम्मत। अम्मा तुम तो जानती हो तीन साल से वर्षा ठीक से नहीं हुई है। इस वर्ष भी यही हाल है। खेत जोतकर क्या करूँ?”
बूढ़ी अम्मा बोली—“देखो बेटा! वर्षा तुम्हारे हाथ में नहीं है। यह तो प्रकृति पर निर्भर है। जब बादल बनेंगे तो वर्षा अवश्य होगी। तुम्हारा काम है खेत जोत जोतकर तैयार करना। तुम अपना काम समय पर करो। प्रकृति अपना काम अवश्य समय पर करेगी। वर्षा अवश्य होगी।”
गोमा पुनः बूढ़ी अम्मा से बोला—“अम्मा खेत बहुत कठोर हो गए हैं। मेरे बैल दुबले हैं, इन्हें पेटभर चारा तक नहीं मिल रहा है। पीने के लिए पानी तक की दिक़्क़त है। चारा-पानी ही क्या यहाँ तो पेड़ों की पत्तियाँ तक ख़त्म हो गई हैं। बेचारे बैल कैसे हल खींचे? वर्षा की आस हो तो हिम्मत भी बँधे।” गोमा ने निराश मन से अपनी बात कही।
बूढ़ी अम्मा बोली—“बेटा! तुम निराशा की बात मत करो। पेड़ों की बात भी तुमने ख़ूब कही। पेड़ तो यहाँ सब लोग काट रहे हैं। देखो अब पेड़ भी कहाँ बचे हैं? जब पेड़ ही नहीं होंगे तो पत्तियाँ कहाँ से आएँगी? अगर पेड़ अधिक होते तो वर्षा भी अवश्य हो जाती। सारे जंगल से पेड़ों की कटाई जारी है। पेड़ नहीं होंगे तो हरियाली कहाँ से होगी? हरियाली नहीं तो वर्षा भी नहीं। लेकिन जो हुआ सो हुआ। अब तो तुम लोग पेड़ों पर ध्यान दो। तुम निराश मत होओ। खेतों में हल चलाओ। उन्हें हाँक-जोत कर बोने के लिए तैयार करो। इस मौसम में कभी-न-कभी तो वर्षा अवश्य होगी। बूढ़ी अम्मा ने मुस्कुराकर गोमा की हिम्मत बढ़ाई। वह उठी और लकड़ी टेकती हुई अपनी राह चल दी।
वैसे तो गोमा मन से निराश था मगर बूढ़ी अम्मा की बातों से उसको थोड़ी आशा बढ़ी। अगले दिन उसने पूरे उत्साह से अपना खेत जोतना शुरू कर दिया। उसने लगातार चार दिन तक हल चलाया। खेत ख़ूब अच्छी तरह तैयार हो गए। गोमा अपना काम पूरा करके बहुत प्रसन्न था। अब वह बैलों को हाँकते हुए घर की ओर चल पड़ा। पूरी राह वह गुनगुनाता रहा। उस रात उसे नींद भी अच्छी तरह आई। चार दिन की कड़ी मेहनत के कारण वह निढाल होकर सोया।
सवेरे जब वह सोकर उठा तो गाय रंभा रही थी। बकरियाँ मिमिया रही थीं। सवेरे-सवेरे अपने पशुओं की ये आवाज़ें सुनने के लिए उसके कान तरस गए थे। वह पुलककर उठा। उसकी पत्नी ने आँगन से आवाज़ लगाई। अजी सुनते हो! बाहर तो आओ। वर्षा होने वाली है। गोमा झटपट बाहर आया। उसने देखा मौसम बहुत सुहाना हो गया है। आसमान में बादल घुमड़ आए थे। उसने बादलों को जी भरकर निहारा। उसे लगा मानो बादलों से बूढ़ी अम्मा की मुस्कुराती हुई आकृति उभर आई हो। उसे बूढ़ी अम्मा की बात रह-रहकर याद आ रही थी। उसने मन-ही-मन बूढ़ी अम्मा को प्रणाम किया और सोचा कि वह ठीक ही कह रही थी कि तुम अपना काम समय पर करो। बादल बरसने लगे। आँगन तर-बतर हो गया। गोमा को लगा मानो बूढ़ी अम्मा उससे कुछ कह रही हों। वह बूढ़ी अम्मा से कुछ कहना चाहता था। तभी बारिश और तेज़ हो गई।
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