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Aziz Azad Ghazals / अज़ीज़ आज़ाद ग़ज़ल

 चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए / अज़ीज़ आज़ाद  चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए मगर उनकी तो ये ज़िद है हमें तो अब ख़ुदा कहिए सलीकेमन्द लोगों पे यूँ ओछे वार करना भी सरासर बदतमीज़ी है इसे मत हौसला कहिए तुम्हारे दम पै जीते हम तो यारों कब के मर जाते अगर ज़िंदा हैं क़िस्मत से बुजुर्गों की दुआ कहिए हमारा नाम शामिल है वतन के जाँनिसारों<ref>जान छिड़कने वाले</ref> में मगर यूँ तंगनज़री<ref>संकीर्ण-दृष्टि</ref> से हमें मत बेवफ़ा कहिए तुम्हीं पे नाज था हमको वतन के मो’तबर<ref>प्रतिष्ठित</ref> लोगों चमन वीरान-सा क्यूँ है गुलों को क्या हुआ कहिए किसी की जान ले लेना तो इनका शौक है ‘आज़ाद’ जिसे तुम क़त्ल कहते हो उसे इनकी अदा कहिए चार दिनों की उम्र मिली है और फ़ासले जन्मों के / अज़ीज़ आज़ाद चार दिनों की उम्र मिली है और फ़ासले जन्मों के इतने कच्चे रिश्ते क्यूँ हैं इस दुनिया में अपनो के सिर्फ़ मुहब्बत की दुनिया में सारी ज़बानें अपनी हैं बाकी बोली अपनी-अपनी खेल तमाशे लफ़्ज़ों के आँखों ने आँखों को पल में जाने क्या-क्या कह डाला ख़ामोशी ने खोल दिये ...

निदा फाज़ली ग़ज़ल / Nida Fazli Ghazals

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निदा फ़ाज़ली निदा फ़ाज़ली (चंडीगढ़, 28-Jan-2014) जन्म मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली 12 अक्टूबर 1938 दिल्ली, ब्रिटिश भारत मृत्यु 8 फ़रवरी 2016 (उम्र 77 वर्ष) मुम्बई भाषा हिंदी, उर्दू राष्ट्रीयता भारतीय नागरिकता भारतीय दिल्ली में पिता मुर्तुज़ा हसन और माँ जमील फ़ातिमा के घर माँ की इच्छा के विपरीत तीसरी संतान नें जन्म लिया जिसका नाम बड़े भाई के नाम के क़ाफ़िये से मिला कर मुक़्तदा हसन रखा गया। दिल्ली कॉर्पोरेशन के रिकॉर्ड में इनके जन्म की तारीख १२ अक्टूबर १९३८ (12 Oct 1938) लिखवा दी गई। पिता स्वयं भी शायर थे। इन्होने अपना बाल्यकाल ग्वालियर में गुजारा जहाँ पर उनकी शिक्षा हुई। उन्होंने १९५८ में ग्वालियर कॉलेज (विक्टोरिया कॉलेज या लक्ष्मीबाई कॉलेज) से स्नातकोत्तर पढ़ाई पूरी करी। वो छोटी उम्र से ही लिखने लगे थे। निदा फ़ाज़ली इनका लेखन का नाम है। निदा का अर्थ है स्वर/ आवाज़/ Voice। फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है जहाँ से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ा। अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए / निदा फाज़ली ग़ज़ल nida fazli ghazal / gha...

बशीर बद्र ग़ज़ल शायरी / Bashir Badra Ghazal

वो ग़ज़ल वालों का असलूब समझते होंगे / बशीर बद्र वो ग़ज़ल वालो का असलूब[1] समझते होंगे चाँद कहते है किसे ख़ूब समझते होंगे इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझको मेरा महबूब समझते होंगे मैं समझता था मुहब्बत की ज़बाँ ख़ुश्बू है फूल से लोग उसे ख़ूब समझते होंगे देख कर फूल के औराक़ [2] पे शबनम कुछ लोग तेरा अश्कों भरा मकतूब[3] समझते होंगे भूल कर अपना ज़माना ये ज़माने वाले आज के प्यार को मायूब[4] समझते होंगे शब्दार्थ 1 शैली 2 पन्ने 3 ख़त 4बुरा ,ऐबदार हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए / बशीर बद्र हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए मैं ख़ुद भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ कोई मासूम क्यों मेरे लिए बदनाम हो जाए अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए मुसाफ़िर के र...

Azhar Inayati Ghazal / अज़हर इनायती की ग़ज़लें

 ग़ज़लें अज़हर इनायती की  हम ने जो क़सीदों को अज़हर इनायती ग़ज़ल हम ने जो क़सीदों को मुनासिब नहीं समझा शह ने भी हमें अपना मुसाहिब नहीं समझा. काँटे भी कुछ इस रुत में तरह-दार नहीं थे कुछ हम ने उलझना भी मुनासिब नहीं समझा. ख़ुद क़ातिल-ए-अक़दार-ए-शराफ़त है ज़माना इल्ज़ाम है मैं हिफ़्ज़-ए-मरातिब नहीं समझा. हम-असरों में ये छेड़ चली आई है 'अज़हर' याँ 'ज़ौक़' ने ग़ालिब' को भी ग़ालिब नहीं समझा. हर एक रात को महताब अज़हर इनायती ग़ज़ल हर एक रात को महताब देखने के लिए मैं जागता हूँ तेरा ख़्वाब देखने के लिए. न जाने शहर में किस किस से झूट बोलूँगा मैं घर के फूलों को शादाब देखने के लिए. इसी लिए मैं किसी और का न हो जाऊँ मुझे वो दे गया इक ख़्वाब देखने के लिए. किसी नज़र में तो रह जाए आख़िरी मंज़र कोई तो हो मुझे ग़र्क़ाब देखने के लिए. अजीब सा है बहाना मगर तुम आ जाना हमारे गाँव का सैलाब देखने के लिए. पड़ोसियों ने ग़लत रंग दे दिया 'अज़हर' वो छत पे आया था महताब देखने के लिए. इस बार उन से मिल के अज़हर इनायती ग़ज़ल इस बार उन से मिल के जुदा हम जो हो गए उन की सहेलियों के भी आँचल भिगो गए. चौराहों...

Akbar Hyderabadi Ghazal / अकबर हैदराबादी की ग़ज़लें

ग़ज़लें अकबर हैदराबादी की  आँख में आँसू का अकबर हैदराबादी ग़ज़ल आँख में आँसू का और दिल में लहू का काल है है तमन्ना का वही जो ज़िंदगी का हाल है यूँ धुआँ देने लगा है जिस्म ओ जाँ का अलाओ जैसे रग रग में रवाँ इक आतिश-ए-सय्याल है फैलते जाते हैं दाम-ए-नारसी के दाएरे तेरे मेरे दरमियाँ किन हादसों का जाल है घिर गई है दो ज़मानों की कशाकश में हयात इक तरफ ज़ंजीर-ए-माज़ी एक जानिब हाल है हिज्र की राहों से 'अकबर' मंज़िल-ए-दीदार तक यूँ है जैसे दरमियाँ इक रौशनी का साल है. बदन से रिश्ता-ए-जाँ अकबर हैदराबादी ग़ज़ल बदन से रिश्ता-ए-जाँ मोतबर न था मेरा मैं जिस में रहता था शायद वो घर न था मेरा क़रीब ही से वो गुज़रा मगर ख़बर न हुई दिल इस तरह तो कभी बे-ख़बर न था मेरा मैं मिस्ल-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना जिस चमन में रहा वहाँ के गुल न थे मेरे समर न था मेरा न रौशनी न हरारत ही दे सका मुझ को पराई आग में कोई शरर न था मेरा ज़मीन को रू-कश-ए-अफ़लाक कर दिया जिस ने हुनर था किस का अगर वो हुनर न था मेरा कुछ और था मेरी तश्कील ओ इर्तिक़ा का सबब मदार सिर्फ़ हवाओं पे गर न था मेरा जो धूप दे गया मुझ को वो मेरा सूरज था जो छाँव दे न सका व...

Shakeel Azmi Ghazal / शकील आज़मी की ग़ज़लें

शकील आज़मी की ग़ज़लें  बात से बात की गहराई चली जाती है / शकील आज़मी ग़ज़ल बात से बात की गहराई चली जाती है झूठ आ जाए तो सच्चाई चली जाती है रात भर जागते रहने का अमल ठीक नहीं चाँद के इश्क़ में बीनाई चली जाती है मैं ने इस शहर को देखा भी नहीं जी भर के और तबीअत है कि घबराई चली जाती है कुछ दिनों के लिए मंज़र से अगर हट जाओ ज़िंदगी भर की शनासाई चली जाती है प्यार के गीत हवाओं में सुने जाते हैं दफ़ बजाती हुई रूस्वाई चली जाती है छप से गिरती है कोई चीज़ रूके पानी में दूर तक फटती हुई काई चली जाती है मस्त करती है मुझे अपने लहू की ख़ुशबू ज़ख़्म सब खोल के पुरवाई चली जाती है दर ओ दीवार पे चेहरे से उभर आते हैं जिस्म बनती हुई तन्हाई चली जाती है चाँद में ढलने सितारों में निकलने के लिए / शकील आज़मी ग़ज़ल चाँद में ढलने सितारों में निकलने के लिए मैं तो सूरज हूँ बुझूँगा भी तो जलने के लिए मंज़िलों तुम ही कुछ आगे की तरफ़ बढ़ जाओ रास्ता कम है मिरे पाँव को चलने के लिए ज़िंदगी अपने सवारों को गिराती जब है एक मौक़ा भी नहीं देती सँभलने के लिए मैं वो मौसम जो अभी ठीक से छाया भी नहीं साज़िशें होने लगीं मुझ को बदल...

Akhilesh Tiwari Ghazal / अखिलेश तिवारी की ग़ज़लें

अखिलेश तिवारी की ग़ज़लें कहाँ तलक यूँ तमन्ना को दर-ब-दर देखूँ अखिलेश तिवारी ग़ज़ल  कहाँ तलक यूँ तमन्ना को दर-ब-दर देखूँ सफ़र तमाम करूँ मैं भी अपना घर देखूँ सुना है मीर से दुनिया है आइनाख़ाना तो क्यों न फिर इस दुनिया को बन-सँवर देखूँ छिड़ी है जंग मुझे ले के ख़ुद मेरे भीतर फलक की बात रखूँ या शकिस्ताँ पर देखूँ हरेक शय है नज़र में अभी बहुत धुँधली पहाड़ियों से ज़मीं पर ज़रा उतर देखूँ तलाश में है उसी दिन से मंज़िल मेरी मैं ख़ुद में ठहरा हुआ जबसे इक सफ़र देखूँ मेरे सुकून का कब पास अक्ल ने रक्खा सहर के साथ ही मैं तपती दोपहर देखूँ ग़मों के नूर में लफ़्जों को ढालने निकले अखिलेश तिवारी ग़ज़ल  ग़मों के नूर में लफ़्जों को ढालने निकले गुहरशनास समंदर खंगालने निकले खुली फ़िज़ाओं के आदी हैं ख़्वाब के पंछी इन्हें क़फ़स में कहाँ आप पालने निकले सफ़र है दूर का और बेचराग़ दीवाने तेरे ही ज़िक्र से रातें उजालने निकले शराबखानो कभी महफ़िलों की जानिब हम ख़ुद अपने आप से टकराव टालने निकले सियाह शब ने नई साज़िशें रची शायद हवा के हाथ कहाँ ख़ाक डालने निकले मुलाहिज़ा हो मेरी भी उड़ान, पिंजरे में अखिलेश तिवारी ग़ज़ल...

Wali Dakhni Ghazal Shayari / वली दक्कनी की ग़ज़ल शायरी

वली दक्कनी की ग़ज़ल /शायरी याद करना हर घडी़ उस यार का वली दक्कनी ग़ज़ल शायरी याद करना हर घड़ी उस यार का है वज़ीफ़ा मुझ दिल-ए-बीमार का आरज़ू-ए-चश्मा-ए-कौसर नहीं तिश्नालब हूँ शर्बत-ए-दीदार का आकबत क्या होवेगा मालूम नहीं दिल हुआ है मुब्तिला दिलदार का क्या कहे तारीफ़ दिल है बेनज़ीर हर्फ़ हर्फ़ उस मख़्ज़न-ए-इसरार का गर हुआ है तालिब-ए-आज़ादगी बन्द मत हो सुब्बा-ओ-ज़ुन्नार का मस्नद-ए-गुल मन्ज़िल-ए-शबनम हुई देख रुत्बा दीदा-ए-बेदार का ऐ "वली" हो ना स्रिजन पर निसार मुद्द'आ है चश्म-ए-गौहर बार का दिल को लगती है वली दक्कनी ग़ज़ल शायरी दिल को लगती है दिलरुबा की अदा जी में बसती है खुश-अदा की अदा गर्चे सब ख़ूबरू हैं ख़ूब वले क़त्ल करती है मीरज़ा की अदा हर्फ़-ए-बेजा बजा है गर बोलूँ दुश्मन-ए-होश है पिया की अदा नक़्श-ए-दीवार क्यूँ न हो आशिक़ हैरत-अफ़ज़ा है बेवफ़ा की अदा गुल हुये ग़र्क आब-ए-शबनम में देख उस साहिब-ए-हया की अदा ऐ "वली" दर्द-ए-सर की दारू है मुझको उस संदली क़बा की अदा फ़िराके-गुजरात वली दक्कनी ग़ज़ल शायरी गुजरात के फिराके सों है खा़र-खा़र दिल। बेताब है सूनेमन आतिलबहार दिल।। मरहम...