Aziz Azad Ghazals / अज़ीज़ आज़ाद ग़ज़ल
चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए / अज़ीज़ आज़ाद चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए मगर उनकी तो ये ज़िद है हमें तो अब ख़ुदा कहिए सलीकेमन्द लोगों पे यूँ ओछे वार करना भी सरासर बदतमीज़ी है इसे मत हौसला कहिए तुम्हारे दम पै जीते हम तो यारों कब के मर जाते अगर ज़िंदा हैं क़िस्मत से बुजुर्गों की दुआ कहिए हमारा नाम शामिल है वतन के जाँनिसारों<ref>जान छिड़कने वाले</ref> में मगर यूँ तंगनज़री<ref>संकीर्ण-दृष्टि</ref> से हमें मत बेवफ़ा कहिए तुम्हीं पे नाज था हमको वतन के मो’तबर<ref>प्रतिष्ठित</ref> लोगों चमन वीरान-सा क्यूँ है गुलों को क्या हुआ कहिए किसी की जान ले लेना तो इनका शौक है ‘आज़ाद’ जिसे तुम क़त्ल कहते हो उसे इनकी अदा कहिए चार दिनों की उम्र मिली है और फ़ासले जन्मों के / अज़ीज़ आज़ाद चार दिनों की उम्र मिली है और फ़ासले जन्मों के इतने कच्चे रिश्ते क्यूँ हैं इस दुनिया में अपनो के सिर्फ़ मुहब्बत की दुनिया में सारी ज़बानें अपनी हैं बाकी बोली अपनी-अपनी खेल तमाशे लफ़्ज़ों के आँखों ने आँखों को पल में जाने क्या-क्या कह डाला ख़ामोशी ने खोल दिये ...