दिल गया दिल का निशाँ बाक़ी रहा / 'ज़हीर' देहलवी

दिल गया दिल का निशाँ बाक़ी रहा
दिल की जा दर्द-ए-निहाँ बाक़ी रहा

कौन ज़ेरे-ए-आसमाँ बाक़ी रहा
नेक-नामों का निशाँ बाक़ी रहा

हो लिए दुनिया के पूरे कारोबार
और इक ख़्वाब-ए-गिराँ बाक़ी रहा

रफ़्ता रफ़्ता चल बसे दिल के मकीं
अब फ़क़त ख़ाली मकाँ बाक़ी रहा

चल दिए सब छोड़ कर अहल-ए-जहाँ
और रहने को जहाँ बाक़ी रहा

कारवाँ मंज़िल पे पहुँचा उम्र का
अब ग़ुबार-ए-कारवाँ बाक़ी रहा

मिल गए मिट्टी में क्या क्या मह-जबीं
सब को खा कर आसमाँ बाक़ी रहा

मिट गए बन बन के क्या क़स्र ओ महल
नाम को इक ला-मकाँ बाक़ी रहा

आरज़ू ही आरज़ू में मिट गए
और शौक़-ए-आस्ताँ बाक़ी रहा

ऐश ओ इशरत चल बसे दिल से 'ज़हीर'
दर्द ओ ग़म बहर-ए-निशाँ बाक़ी रहा

श्रेणी: ग़ज़ल

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