दौर आया है शादमानी का / 'महशर' इनायती

दौर आया है शादमानी का
आओ मातम करें जवानी का

दर्स-ए-इबरत नहीं है ऐ दुनिया
ज़िक्र है उन की मेहर-बानी का

अब वो चुप हैं तो हो गया शायद
उन को एहसास बे-ज़बानी का

कल जो आँधी के साथ बादल छाए
मुझ को ध्यान आ गया जवानी का

उन से उन की हक़ीक़त ऐ ‘महशर’
दौर कब है ये हक़-बयानी का

श्रेणी: ग़ज़ल

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