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मंज़िलों के निशाँ नहीं मिलते / 'क़मर' मुरादाबादी

मंज़िलों के निशाँ नहीं मिलते
तुम अगर नागहाँ नहीं मिलते

आशियाने का रंज कौन करे
चार तिनके कहाँ नहीं मिलते

दास्तानें हज़ार मिलती हैं
साहिब-ए-दास्ताँ नहीं मिलते

यूँ न मिलने के सौ बहाने हैं
मिलने वाले कहाँ नहीं मिलते

इंकिलाब-ए-जहाँ अरे तौबा
हम जहाँ थे वहाँ नहीं मिलते

दोस्तों की कमी नहीं हम-दम
ऐसे दुश्मन कहाँ नहीं मिलते

जिन को मंजिल सलाम करती थी
आज वो कारवाँ नहीं मिलते

शाख-ए-गुल पर जो झूमते थे ‘कमर’
आज वो आशियाँ नहीं मिलते

श्रेणी: ग़ज़ल

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