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जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई / 'असअद' भोपाली

जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई
उन की निगाह और भी मासूम हो गई

हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे
अब ज़िंदगी से ज़िंदगी महरूम हो गई

क़ल्ब ओ ज़मीर बे-हिस ओ बे-जान हो गए
दुनिया ख़ुलूस ओ दर्द से महरूम हो गई

उन की नज़र के कोई इशारे न पा सका
मेरे जुनूँ की चारों तरफ़ धूम हो गई

कुछ इस तरह से वक़्त ने लीं करवटें 'असद'
हँसती हुई निगाह भी मग़मूम हो गई

श्रेणी: ग़ज़ल

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