सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

श्री गजानन बावन्नी / Shri Gajanan Bavanni

 जय जय सदगुरू गजानना | रक्षक तूची भक्तजना ||१||

निर्गुण तू परमात्मा तू | सगुण रुपात गजानन तू ||२||

सदेह तू, परी विदेह तू | देह असून देहातीत तू ||३||

माघ वद्य सप्तमी दिनी | शेगावात प्रगटोनी ||४||

उष्ट्या पत्रावळीनिमित्त | विदेह्त्व तव हो प्रगट ||५||

बंकट लालावरी तुझी | कृपा जाहली ती साची ||६||

गोसाव्याच्या नवसासाठी | गांजा घेसी लावून ओठी ||७||

तव पद तीर्थे वाचविला | जानराव तो भक्त भला ||८||

जानाकीरामा चिंचवणे | नासवोनी स्वरूपी आणणे ||९||

मुकीन चंदूचे कानवले | खाउन कृतार्थ त्या केले ||१०||

विहिरी माजी जलविहीना | केले देवा जल भरणा ||११||

मध माश्यांचे डंख तुवा | सहन सुखे केले देवा ||१२||

त्यांचे काटे योगबले | काढुनी सहजी दाखविले ||१३||

कुस्ती हरीशी खेळोनि | शक्ती दर्शन घडवोनी ||१४||

वेद म्हणुनी दाखविला | चकित द्रविड ब्राह्मण झाला ||१५||

जळत्या पर्यकावरती | ब्रह्म्हगीरीला ये प्रचीती ||१६||

टाकळीकर हरिदासाचा | अश्व शांत केला साचा ||१७||

बाळकृष्ण बाळापुराचा | समर्थ भक्तची जो होता ||१८||

रामदास रूपे त्याला | दर्शन देवोनी तोषविला ||१९||

सुकलालाची गोमाता | द्वाड बहुत होती ताता ||२०||

कृपा तुझी होताच क्षणी | शांत जाहली ती जननी ||२१||

घुडे लक्ष्मण शेगावी | येता व्याधी तू निरवी ||२२||

दांभिकता परी ती त्याची | तू न चालवोनी घे साची ||२३||

भास्कर पाटील तव भक्त | उद्धरलासी तू त्वरित ||२४||

आज्ञा तव शिरसावंद्य | काकही मानती तुज वंद्य ||२५||

विहिरीमाजी रक्षियला | देवा तू गणू जवऱ्याला ||२६||

पिताम्बराकरवी लीला | वठला आंबा पल्लवीला ||२७||

सुबुद्धी देशी जोश्याला | माफ करी तो दंडाला ||२८||

सवडद येथील गंगाभारती | थुंकूनी वारिली रक्तपिती ||२९||

पुंडलिकाचे गंडांतर | निष्ठा जाणून केले दूर ||३०||

ओंकारेश्वरी फुटली नौका | तारी नर्मदा क्षणात एका ||३१||

माधवनाथा समवेत | केले भोजन अदृष्ट ||३२||

लोकमान्य त्या टिळकांना | प्रसाद तूची पाठविला ||३३||

कवर सुताची कांदा भाकर | भक्शिलीस तू प्रेमाखातर ||३४||

नग्न बैसोनी गाडीत | लीला दाविली विपरीत ||३५||

बायजे चित्ती तव भक्ती | पुंडलीकावरी विरक्त प्रीती ||३६||

बापुना मनी विठ्ठल भक्ती | स्वयं होशी तू विठ्ठल मूर्ती ||३७||

कवठ्याच्या त्या वारकऱ्याला | मरीपासुनी वाचविला ||३८||

वासुदेव यती तुज भेटे | प्रेमाची ती खुण पटे ||३९||

उद्धट झाला हवालदार | भस्मीभूत झाले घरदार ||४०||

देहान्ताच्या नंतरही | कितीजणा अनुभव येई ||४१||

पडत्या मजूरा झेलीयेले | बघती जन आश्चर्य भले ||४२||

अंगावरती खांब पडे | स्त्री वांचे आश्चर्य घडे ||४३||

गजाननाच्या अद्भुत लीला | अनुभव येती आज मितीला ||४४||

शरण जाऊनी गजानना | दुःख तयाते करी कथना ||४५||

कृपा करी तो भक्तांसी | धावून येतो वेगेसी ||४६||

गजाननाची बावन्नी | नित्य असावी ध्यानी मनी ||४७||

बावन्न गुरुवारी नेमे | करा पाठ बहु भक्तीने ||४८||

विघ्ने सारी पळती दूर | सर्व सुखांचा येई पूर ||४९||

चिंता साऱ्या दूर करी | संकटातूनी पार करी ||५०||

सदाचार रत सद्भक्ता | फळ लाभे बघता बघता ||५१||

भक्त बोले जय बोला | गजाननाची जय बोला ||

जय बोला हो जय बोला | गजाननाची जय बोला ||५२||


|| अनंत कोटी ब्रम्हांड नायक, महाराजाधिराज योगिराज परब्रम्ह सच्चिदानंद भक्तप्रतीपालक शेगाव निवासी समर्थ सद्गुरू श्री गजानन महाराज की जय ||


टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...