आचार्य भिक्षु परिचय
जन्म–निधन
1726 – 1803
जन्म स्थान
मारवाड़, राजस्थान
प्रमुख पहचान
तेरापंथ धर्मसंघ के संस्थापक
प्रमुख रचनाएँ
भिक्षु के पद एवं धार्मिक साहित्य
रचनाएँ
द्रोपदी रो बखांण आचार्य भिक्षु
दूहा
हाहाकार हुवो घणो, अमरकंका नगरी मांय।
राजधानी पड़ी भागी बिखरी, देखी नें डरप्यो राय॥
हिवे पदमनाभ राजा मन चिंतवे, हूं जीवां बचूं किण ठाम।
जो शरणे जावूं द्रोपदी तणे, तो कृष्ण न ले म्हारो नाम॥
इम विचारने नीकल्यो, ओर न कोई साथ।
शरणे आयो द्रोपदी तणे, ओ बोल्यो जोड़ी हाथ॥
तुझ शरणे हूं आवियो, इम बोल्यो राजान।
जब द्रोपदी राजा नें कहे, ते सुणो सुरत दे कान॥
चौपाई
हिवे द्रोपदी कहे सुण राय, आय वणी ताहरे जी।
थे मोटो करे अन्याय, शरणे आया मांहरे जी॥
कृष्णजी तीन खंड रा नाथ, त्याने तें खिजाविया जी।
थारी अकाले करवा घात, सताब सूं आविया जी॥
ओ तो शूर वीर बलवंत, प्राक्रम त्यारों अति घणो जी।
त्यां कीधो वेर्या नो अंत, साहमा मंड्या तिण तणो जी॥
त्यानें पाछा भागण रो नेम, विरुद लियां वहे जी।
जो उवे आधो काढे एम, तो मरजाद में कुण रहे जी॥
जो तूं जीवणो वांछे राजान, केई दिन ताहरो जी।
तो तूं छोड़ दे निज अभिमान, कह्यो कर माहरो जी॥
तो तूं अस्त्री वेश बणाय, पहर नारी वेस नें जी।
वले दाढी मूंछ मुंडाय, दूरा कर केश ने जी॥
स्नान करे सुध न्हाय, दूरा मेल टाल टाल ने जी।
वले पहरण भीनी साड़ी ल्याय, नीचा छेहड़ा राळ नें जी॥
काजळ घाल आंख्यां मांय, टीकी दे निलाड़ नें जी।
वले नाक में नथ लटकाय, गळे पहर हार ने जी॥
दोनूं बांहां में चुड़लो घाल, कचु पहर ने आण ने जी।
वले अस्त्री नी पर चाल, घूंघट नीचो ताण ने जी॥
भेंटणो वहु मोळो वखाण, तिणसू भर थाळ ने जी।
वले मोनें ले आगेवाण, गर्व थारो गाळ नें जी॥
वले घणा अतेवर मांहि, परवार सूं जाय नें जी।
इम वादे कृष्णजी रा पाय, अपराध खमाय नें जी॥
वले कहिजे तूं जोड़ी हाथ, भूंडो काम म्हे कियो जी।
हिवे जीवां वचूं किरपानाथ, शरणो तुझ में लियो जी॥
जो इसड़ी कहे करे नरमाय, तो जीवा वचे सही जी।
ते पिण अस्त्री वेस वणाय, तो कृष्ण मारे नहीं जी॥
त्रिय वेस वड़ा टबा मांहि, प्रतख ही पेखियो जी।
तेहनें अनुसारे ताहि, वर्णन त्रिया नों कियो जी॥
दूहा
ए वचन सुणे द्रोपदी तणो, पदमनाभ राजान।
पछे द्रोपदी कह्यो तिमहिज कर्यो, मेले निज अभिमान॥
अस्त्री रूप वणाय ने, अतेवर ले साथ।
शरणे आयो श्रीकृष्ण रे, बोलियो जोड़ी हाथ॥
हूं बल प्राक्रम देख तुम तणो, रिधि देख पाम्यो अगाध।
हिवे वारूंवार खमजो तुमे, म्हारो कियो अपराध॥
पगां लागो श्रीकृष्ण रे, सूंपी द्रोपदी ने आण।
जब कृष्णजी पदमोत्तर भणी, करड़ी बोल्या वाण॥
रे अपत्थ पत्थिया पापीया, आ द्रोपदी मांहरी वेन।
इणने थें आणी जाण नें, तो किण विध पामसी चेन॥
हिवे जीवतो जा तूं इहां थकी, भय मत पाम लिगार।
इम कही पदमोत्तर भणी, सीख दीधी तिणवार॥
चौपाई
हिवे पाछा वल्या श्रीकृष्णजी रे, द्रोपदी ने लेई साथ।
पांचूं पांडवा ने आणी द्रोपदी रे, सूंपी हाथो हाथ॥
पांडवां देखी द्रोपदी भणी जी, मन माहे हर्ष अपार।
हिवे पांच पांडव छठा कृष्णजी रे, वेठा रथ मंझार॥
जंबू द्वीप रा भरत ने जी, नीकल्या जीते राड़।
लवण समुद्र विचे थई जी, चाल्या कृष्ण मुरार॥
तिण काले ने तिण समे जी, घातकी खंड द्वीप रे माहि।
पूर्व अर्द्ध भरत मंझे जी, चंपा नगरी ताहि॥
पूर्णभद्र नामे वाग थो जी, छहुं रितु में सुखदाय।
तिहा तीन खंड केरो अधिपति जी, राय लखण गुण तिण मांय॥
तिण काले नें तिण समें जी, मुनि सुव्रत अरिहंत।
ते तीर्थंकर बावीसमां जी, तिहां आया विहार करत॥
चंपानगरी रा वाग में जी, समोसर्या भगवान।
धर्म कथा तिहां सांभळे जी, तीन खंड रो राजान॥
धर्म कथा सुणतां थकां जी, संख शब्द सुणियो ताम।
जाणे दूजो वासुदेव ऊपनी जी, भय पाम्यो तिण ठाम॥
जब मुनि सुव्रत स्वामी कहे जी, सुण कपिल वासुदेव राय।
थें जाण्यो इहां कोई ऊपनों जी, दूजो वासुदेव आय॥
तीर्थंकर चक्रवर्ती मोटका जी, वासुदेव बलदेव जाण।
एक खेतर में एक एक ऊपजे जी, दोय दोय न उपजे आण॥
जंबू द्वीप रा भरत में जी, हथणापुर नगर मंझार।
तिहा पांच पांडव नी भारज्या जी, द्रोपदी नामे नार॥
अमरकंका नगरी तणो जी, पदमोत्तर नामें राय।
तिण द्रोपदी ने आणी इहाजी, मंत्री देव बोलाय॥
तिणसूं पांच पांडव ने कृष्णजी रे, आया तिणरी वाहार।
संग्राम कियो तिण अवसरे जी, संख पूर्यो तिणवार॥
मुनिसुव्रत स्वामी ने वादने जी, प्रश्न पूछे तिणवार।
तो हूं जाय मिलूं हिवे तेहसूं जी, निजरां देखूं कृष्ण मुरार॥
तीर्थंकर तीर्थंकर मिले नहीं जी, चक्रवर्ती सूं चक्रवर्ती नाहिं।
वासुदेव न मिले वासुदेव सूं जी, नहीं मिले बलदेव माहोमांहि॥
धवळी पीळी ध्वजा रथ तेहनीजी, मांहे बेठा कृष्ण मुरार।
ते ध्वजा देखसी उण रथ तणी, लवण समुद्र मंझार॥
दूहा
वंदना कर हस्ती चढ़्यो, सुण अरिहंत री वाण।
लवण समुद्र नी वेल छे, तिहां ऊभो सताव सूं आण॥
कृष्ण वासुदेव तेहनीं, ध्वजा रथ री देख।
लवण समुद्र मांहे जावतां, तिणसूं हरखित हुवो वशेख॥
ए उत्तम पुरुष मो सरिखो, कृष्ण वासुदेव राय।
लवण समुद्र मांहे थई, जबूं द्वीपे उतावळो जाय॥
जब संख पचायण पूरियो, ते सांभळयो कृष्ण महाराय।
त्यां पिण पाछो संख पुरियो, कीधो घणी नरराय॥
सखे संख मिलिया तिहां, दोनूं वासुदेव राय।
हेत जुगत मनवारां करी, ते संख शब्द रे मांय॥
चौपाई
हिवे कपिल वासुदेव राजान, कृष्णजी ने देई सनमान।
अमरकंका राजधानी जठे, सबळो साथ ले आयो तठे॥
अमरकंका विखरी तिणवार, भागा तोरण पोल ले किंवाड़।
राजधानी विदरूप वशेख, गढ़ कोट किल्ला घर पड़िया देख॥
कपिल वासुदेव पूछे एम, आ राजधानी विखरी कहो केम।
भागा तोरण पोल किंवाड़, गढ़ कोट किल्ला रे पडिया वघार॥
जब पदमनाभ राय बोल्यो आम, सांभळो तीन खंड केरा स्वाम।
जंबू भरत रो कृष्ण वासुदेव, ते जुद्ध करण आयो स्वयंमेव॥
उण थांरी काण न राखी कांय, तिणरे राज लेवण री थी मन मांय।
म्हे जुद्ध करने दियो भगाय, ताप पड़ि तिणसूं पाछा जाय॥
म्हें तिणसूं जुद्ध कियो तिण काल, आमां साहमां वूहा गोळा नाळ।
गढ कोट किल्ला पड़िया तिणवार, भागा तोरण पोल किवाड़॥
इम झूठ बोल्यो पदमोत्तर राय, ते कपिल वासुदेव सुणियो ताय।
तिण ऊपर कोप चढ्या तिणवार, करड़ा वचन कह्या निराधार॥
रे अपत्थ पत्थिया मूढ़ गिंवार, अकाले मरण रा वाछणहार।
मुझ सारिखा पुरुष कृष्ण राजान, त्यांसूं जुद्ध कियो धरमान॥
त्यां तोने दियो तुरत हठाय, तूं भाग ने आयो नगरी मांय।
थारी ध्वजा पताका लीधी लूट, तूं मो आगे काय बोले झूठ॥
घणो निभ्रंछी पाड़ी माम, वले देसोटो दियो तिण ठाम।
जिहां जिहां वरते म्हारी आण, त्यां तूं कठेई म रहिजे जाण॥
हिवे पदमनाभ रो पुत्र बोलाय, तिणने राज वेसाण्यो ताय।
ते कपिल वासुदेव स्वयंमेव आप, अमरकंका रो राजा थाप॥
तिहांथी चाल आया निज ठाम, सुखे राज करे अभिराम।
हिवे जादवराय श्री कृष्ण मुरार, ए पिण समुद्र उतरिया पार॥
दूहा
हिवे पांचूंई पांडवा भणी, कहे कृष्ण आम।
थें जावो गंगा नदी ऊतरो, सुखे करो विश्राम॥
हूं लवण सुठिया देवता कन्हे, सीख मांगे ने तिण पास।
बात करनें आऊं वेगसूं, थे मत होवजो उदास॥
पांडव तिहांथी नीकल्या, आया गंगा नदी रे मंझार।
एक नावा मिली तिणमें वेसने, पांडव उतरिया पार॥
गंगा नदी उतर पांडवां, तिहां विचार कियो मन मान।
नावा मत मेलो श्रीकृष्ण नें, ए किसड़ाएक बलवान॥
गंगा नदी भुजा करे ऊतरे, एहवा बलवंत छे के नाहिं।
आ पारखा करण श्रीकृष्ण री, एहवी धार बेठा मन माहिं॥
चौपाई
देवता सूं हो मिलने श्री कृष्ण महाराज, सीख मांगेनें तिहाथी चालियाजी।
गंगा नदी हो वहे घणी ओगाज, तिणरा कांठा ताई आया रथ चालियाजी॥
नदी माहे हो नहीं कोई रथ रो काम, जब नावां नें जोवण लागा जादवपतिजी।
चिहूं दिशि जोया हो नावां नहीं दीठी ताम, वले नावां न देखी नदी मांहे आवतिजी॥
जब जादवपति हो रथ नें घोड़ा सारथी सहीत, एक भुजा सूं त्यांने झालियाजी।
एक भुजा सूं हो तिरीया जाए डर भय रहीत, गंगा नदी मांहे आघा चालियाजी॥
मध्य भागे हो आया गंगा नदी रे मांय, तिहां थाका अंतत परसेवे भीना घणाजी।
जब चिंतवे हो मन में श्रीकृष्ण महाराय, ए अति बलवंता पांडव पांचूं जणाजी॥
ते भुजा कर हो उतरिया गंगा नदी रे पूर, हूं थाको पाणी में बळ चाले नहीं जी।
इम चितवंतां हो गंगा देवी आई हजूर, तिण पाणी रो थाग देवी सहीजी॥
तिहां मुहुर्त मात्र हो जदुपति ले विश्राम, पछे गंगा उतर कुसले खेमे आवियाजी।
पांच पांडव हो सुखे बेठा छे तिण ठाम, तिहां कृष्णजी आय तिणनें सरावियाजी॥
श्रीपति बोल्या हो पांडवा थें तो अति बलवान, थें भुजा करे नदी उतर ने आवियाजी।
भगाया हा थांने तिहां पदमनाभ राजान, जब तो थें वचन मांहें छळावियाजी॥
जब पांडव हो कहे सांभळ कृष्ण महाराय, म्हे नावां सूं नदी उतर आया इहांजी।
ते नावां नें हो साहमी नहीं मेली ताय, म्हे पांचूई मिलनें विचार कियो तिहांजी॥
गंदा नदी हो साढा बासठ जोजन मांहि, आ चोड़ी ओगाज करती वहे सहीजी।
ते कृष्णजी हो भुजा कर उतरे के नांहि, एहवो वल प्राक्रम छे के यांमे नहीं जी॥
ए वचन सुणनें हो तीन लीटी चाढ़ी निलाड़, कृष्णजी कोप चढ़े रोस आणियोजी।
थे पांचूंई पांडव पूरा मूढ़ गिंवार, अजेस म्हारो बळ प्राक्रम न जाणियोजी॥
लवण समुद्र हो उतावळ सूं वेग उलांग, पदमोत्तर नें हठाय मान भंग करीजी।
अमरकंका हो म्हे तो मार विखेरी भांग, म्हे द्रोपदी आणनें थां आगळ धरीजी॥
थे तो भागा हो छोडेआया द्रोपदी री आस, जब विलखो वेदळ मुख जाण्यों म्है थाहरो जी।
ते म्हे आणी हो सूंपी द्रोपदी तुम पास, जब थें न जाण्यों बळ प्राक्रम माहरोजी॥
दूहा
वले करड़ा वचन कहे कृष्णजी, कोप चढ्या अति पूर।
लोह डंडा लेई हाथ में, पांचूं रथ किया चकचूर॥
वले देसोटो दियो कृष्णजी, पांचूं पांडवा नें ताम।
जिहां आण वरते छे मांहरी, थें मत रहिज्यो तिण ठाम॥
पांचूं रथ भांग्या पांडवां तणा, नगर वसायो तिण ठाम।
तिहां लोकां जावाने थापियो, भागीरथ तीरथ नाम॥
हिवे तिहांथी निकल श्रीकृष्णजी, आया कटक उतरियो तिण ठाम।
पछे सेना सहित परवर् या थका, आया द्वारिका नगरी ताम॥
पांडव हथणापुर आविया, ले पोता रो साथ।
पडू राजा कन्हे आयनें, ए बोल्या जोड़ी हाथ॥
म्हानें देसोटो दियो कृष्णजी, वले कीधा आग्या वार।
म्हांसूं करड़ी कीधी कृष्णजी, देसोटो दे इणवार॥
चौपाई
हिवे पूछे पंडूराय, देसोटो थाने क्यूं दियो जी।
इसड़ो कवण अन्याय, मोटो खून थें कियो जी॥
जब पांडव बोल्या तिणवार, म्हे द्रोपदी ल्याविया जी।
समुद्र उतरिया पार, कुसळे खेमे आविया जी॥
जब कह्यो कृष्णजी मांय, गंगा उतरो तिहां जी।
थें चालो आण हुलास, हूंतो रहिसूं इहां जी॥
हूं सीख ले देवता पास, वेगो आऊं तिहां जी।
थें चालो आण हुलास, हूं रहिसूं इहां जी॥
जब म्हे आया गंगा समभाव, नावां सूं उतर जिहां जी।
म्हें साहमी न मेली नाव, विचार कियो तिहां जी॥
कृष्ण बलवंत छे के नांहिं, नावां बिन ऊतरे जी।
इण गंगा नदी रे मांहि, भुजा करनें तिरे जी॥
पछे कृष्ण भुजा रे जोर, गंगा तिर आविया जी।
म्हे बेठा छा तिण ठोड़, म्हांनें त्यां सराविया जी॥
म्हांनें कृष्णजी कह्यो आय, बलवंत पांचूं जणा जी।
भुजा सूं नदी तिर बेठा आय, म्हे तो थाका घणा जी॥
जब म्हे कह्यो नावा सूं ताम, तिरनें इहां आविया जी।
थारो वळ जोवा रे काम, नावां नहीं ल्याविया जी॥
जब कोप्या कृष्ण मुरार, निलाड़ सळ चाढ़ने जी।
वळे म्हांने दीधी धिक्कार, करड़ा वयण काढनें जी॥
पूर्व बीती बात साख्यात, मांडे तात ने कही जी।
जाव देसोटा लग बात, सुणाय दीधी सहीजी॥
जब पंडू राजा कहे आम, अकारज थे कियो जी।
अविनो करे तिण ठाम, देसोटो थें लियो जी॥
थांसूं किया गुण अनेक, भाई हित जाणनें जी।
त्यांरो करे हासो ठेक, त्यांसूं तोड़ी ताणनें जी॥
ओलंभा दिया पडूराय, पांचूं पांडवां भणीजी।
हिवे रहो किसी ठोड़ जाय, कृष्ण तीन खंड घणी जी॥
जब बोल्या पांडव पांचूं माय, होणहार टळे नहीं जी।
हिवे करवो कवण उपाय, विचार करो सही जी॥
वैराग री ढाळां आचार्य भिक्षु
दूहा
केइ बालपणे समज्या नहीं, वले जोबन दीधो खोय।
पछें बुढापो आयां थकां, कुण कुण अवस्था होय॥
शक्ति घटी देही तणी, वले वली लीलरी आय।
तिणसूं कमायो पिण जावे नहीं, जब बेठो रह घर मांय॥
जब गमतो न लागें केहनें, वले दीठांई न सुहाय।
पुण्य संचो पूरो हुवो, हिवें दुख मांहें दिन जाय॥
खाट पड्यो खूं खूं करे, हुइ सूगली देह।
हाल हुकम चाले नहीं, परिजन फिर दीधो छेह॥
भूख तृषा पीड्यो थको, पामें दुख अतंत।
जरा आइ जोबन गयो, जब कुण-कुण हुवे वृतंत॥
चौपाई
बूढो डिगतो डिगतो चाले, आंख नाक झरे सिर हाले।
कांख वाय ज्यूं मस्तक घूणे, जब जाय बेठो घर खूणें॥
बूढो खूं खूं करतो थूके, घर रा तिण ऊपर कूकें।
नींठ नीठ दड लीप सुधार्यो, थें तो सगळो आंगण विगाड़्यो॥
बूढे हाठ हवेली कराया, तठे वेसण न दे जाया।
नोहरे जाय बेसाण्यो एकंत, सार संभार को न करत॥
सुसरे करे घणी नरमाइ, पुत्र नी बहु नें बतळाइ।
है तूं बडा साजन की जाइ, मोनें ठंडो सो पांणी पाइ॥
हूंतो होवुं छूं कातण सूं खोटी, हूं तो किम भर ल्यावुं लोटी।
इम सुण हुवो बूढो उदास, न्हांखे हिया मांसूं निसास॥
बूढा सूं बेठो रहणी नावें, वले बेटा री बहु नें बोलावे।
कहे मोसूं बेठो रह्यो न जाय, खाट गूदड़ी दे तूं बिछाय॥
म्हारा बालक बालकी रोवें, ते तों पालणियां में न सोवें।
यांने छोडपरी किम जाऊं, खाट गूदड़ी केम बिछावूं॥
सुसरा मोनें क्यांनें संतावो, थारां बेटां नें कांम भोळावो।
बेटा नें बोलायां मूंन साझे, कने ऊभो रह्यो पिण लाजे॥
बूढळा रा पुन्य परवार्या, तिणसूं वचन जाए मार्या।
जब बूढळो मन में खीजे, बेटा बहु मूल न भीजे॥
बूढा रे बाळपणा रा हेवा, जाणे खावूं मिष्ठान नें मेवा।
मन गमता भोजन खावूं, लाडू पेड़ा जलेबी मगावूं॥
उन्हों सीरो मगद वले खाजा, एहवा भोजन ताजा।
जाणे नरमसी खीचड़ी खावू, दही दूध ने बूरो मंगावूं॥
बूढा नें आछा भोजन भावे, पुन्य बिनां कहो कुण खवावे।
ओ तो स्वारथ किणरे न आवे, तिण सूं घर रां ने मूळ न सुहावे॥
घर सूं सूखी लूखी रोटी आवे, ते तो दांता सूं खाइ न जावे।
जब बूढो हुवो दिलगीर, काढें आख्यां मां सूं नीर॥
जां की बोली पिण न सुहावे, मीठा भोजन कुण खवावे।
बूढे हाथां सूं द्रव्य कमाया, बेटा दाब रह्या धन माया॥
जब ओ कर कर लोकां ने भेळा, करे बेटा बहुं नीं हेला।
म्हारां कह्या में को नहीं चाले, पूरो धान खावानें न घाले॥
जब लोक हसें पीटें ताल्यां, बोले बेटा बहु नें गाल्यां।
कहे बेटा बहु ने एम, डोकरा नें दुख दो केम॥
केइ केहवा लागा आम, थें तो मत हुवो लूण हराम।
जब बेटा बहु इम बोले, डोकरा रा परदा खोले॥
ओ तो लोका सूं एकठ मांडे, म्हाने यूं ही अनाखी भाडें।
म्हे तो आछा भोजन नित घालां, इणरे केडें सगळा चालां॥
इणरे पीत मुरीद न कांई, ओ तो यूं ही करे विकळाई।
इणरी गइ अकल विग्यांनो, इणरी बात कोइ मत मांनो॥
बूढा रो कुण ऊठे बेली, उणरी बात गइ सर्व ठेली।
बूढा रा पुन्य पड़ गया पूरा, तिण सूं सेंण सगा हुवा दूरा॥
निज नारी री आहिज रीत, बूढा सूं न धरे प्रीत।
वले ओर सगा सेंण सारा, बूढा सूं होय जाय न्यारा॥
कदे घी गुळ सूंधा होय जात, जब वांछे बूढा री घात।
घर रां तो मांड्यो अति आंचो, ओ तों मरे न छोडे माचो॥
बाल जवान तो मर जावे, इण बूढा नें मरण न आवे।
ओ तों नित नवों होय रह्यो सेंठो, म्हारें वारणे रिणाइ ज्यूं बेठो॥
म्हे तो सगळा हुवां छां काया, इण डोकरे वोहत सताया।
इणरी दांई ना पर गया विरखो, ओ तो अजे न मुंवो जरखो॥
म्हांरे उघड़ी पाप री खांनो, इण बूढा सूं पड़ियो पानो।
एहुवा वचन बूढा नें सुणावे, जब बूढो अतंत दु:ख पावे॥
बूढे कर्म कीया था जाडा, ते तों आया कुबेळां में आडा।
ते भोगवतां दुख पावे, सुमता विण पड़ियो सीदावे॥
बूढा री विपत अनेक, पूरी कहणी नावें वशेख।
थोड़ीसी कही बांनगी मात, देखो अरुबरू साख्यात॥
इणरी सुणज्यो लोक लुगाइ, एहवी विपत बुढापे आई।
जो ऊ पेंहली धर्म करतो, एहवी विपत में क्यांनें पड़तो॥
बूढो पेंहलां बूहो मद छकियो, जिण धर्म ओळख नहीं सकियो।
हिवे रह्यो आरत ध्यांन ध्याय, तिण सूं धर्म कीयो किम जाय॥
बूढे पेंहलां कीधी कूड़ी सेखी, रह्यो धर्म तणो नित धेखी।
करतो साधु श्रावकां री हेला, हिवे आय पड़ी छे बेलां॥
पेंहलां कीधी न्यातीलां ठेलो, जिण धर्म नें जांणियो सेलो।
हिवें न्यातीला आडा न आवे, जब आप पड़्यो पिछतावे॥
मोह माया में रह्यो कळियो, दुरगति नों टांको झलियो।
जोबन हुंतो ते दीधो गमाय, हिवे कारी न लागे काय॥
पछें मरनें माठी गति जावे, चिहुंगति में गोता खावे।
पाप आगे न चाले जोरो, पाछो नर भव पावणो दोरो॥
केइ बूढा घर रां नें डरावे, लड़ झगड़ नें आछो खावे।
वले कर कर लोकां नें साखी, बेटा बहु ने भांडे अन्हांखी॥
वले करे खीटोर खोराई, घर रां नें घणो दुखदाइ।
केइ बूढा छे एहवा पापी, रह्या घर रां नें नित संतापी॥
केइ बूढा सूधा हुवे जोग, बेटा बहु मिलिया अजोग।
कदा आछी वस्तु बूढो खावे, तो उवे खूणे घाली घुरकावे॥
कहे तूं तो हुवो गटकायो, म्हांरे धन नहीं घर मांयो।
सूधो बेठो रोटी क्यूं न खावे, म्हाने कांय अन्हाखी सतावे॥
जब बूढो संके लाजां मरतो, बारे वचन न काढे डरतो।
बूढ़े कीयो विचारज ऊंडो, रखे दीसूं लोका में भूंडो॥
एतो कर रह्या फेन फितूरो, म्हांरे धोळां में घालें धूरो।
यांनें छेड़वियां नहीं बाकी, रखे जावे बूढापे नाकी॥
म्हांरो कांण कुख थो भारी, रखे लोकिक बिगड़े म्हारी।
इम जांणी बूढ़े मूंन साझी, जांण्यो राखूं बूढापे बाजी॥
जो न हुवे दोयां मांहे लजिया, तिणरा घर मांसू न मिटे कजिया।
कुड कुड काढे राता डोळा, नीकळे नित सांग बनोळा॥
बात करता माथे सळ चाढे, नितका दुख में दिन काढे।
देखो नीठ मानव भव पायो, राग धेख में यूही गमायो॥
संसार ना सगा सर्व काचा, त्यांने जाण रह्या मूढ साचा।
तिण री बुधवंत करज्यो पिछाणो, याने जाणज्यो बैरी समाणो॥
केइ बूढा रे पुन्य रहे बाकी, घर रा कार न लोपे जाकी।
जिण रे पूर्व पुन्य छे भारी, तिणरी मरजादा राखे नारी॥
जिण पूर्व पुन्य उपाया, त्यारे हाथ जोड़ रे जाया।
जो ऊ थोड़ीसी वस्तु मंगावे, तो उवे थाळ भरी बेगा ल्यावे॥
सर्व जी जी कारे बतळावे, वले बूढा को हुकम चलावे।
मन गमता भोजन खवावे, सारा पेहली बूढा ने जीमावे॥
जिण पूरी कीधी पुन्याई, बेटा बहु मिल्या सुखदाई।
रूड़ा रूड़ा वस्त्र पहरावे, सुख सेज्या माहे पोढावे॥
वले काण कुख राखे भारी, सगळा रहे आगन्या कारी।
देव परमेश्वर ज्यूं पूजे, करड़ी नजर कीया सर्व धूजे॥
एहवा सुख में बूढो रति पामे, वले रही लोकिक लोका मे।
बूढो एहवी साता सुख पाय, घणो मगन हुवो मन मांय॥
एतो सारा मिल्या सुखदाय, पिण त्रांण शरण नहीं थाय।
एतो इण भव केड़े चाले, परभव जाता साथे न हाले॥
साथ आवे पुन्य ने पाप, सुख दुख भोगवे आपोआप।
इम सांभळ नें नर नारी, करज्यो मन माहिं विचारी॥
एहवा सुख तो सगळाइ फीका, त्यानें कदे म जाणो नीका।
ते तो थोड़ा माहे विललावे, सुपना जिम आल माल होय जावे॥
त्यांमें कदे म जांणज्यो सार, ते तो मिलिया अनती बार।
एहवा सुख ऊपर निजर न दीजें, करणी कर लाहो लीजें॥
तात्विक ढाळ आचार्य भिक्षु
दूहा
एक आंधो नें एक पांगळो, दोनूं पड़िया अटवी मांय।
इणरे आंख नहीं उणरे पग नहीं, त्यां सूं नगर गयो नहीं जाय॥
आंधो डूंडाटी मारतो थको, आमों साहमों भमलेटा खात।
पांगळो पड़ियो तिहां आवियो, दोनूं करे मांहोमांहि बात॥
पांगळो कहे हूं दुखियो घणो, हूं पड़ियो छूं अटवी मांय।
दोनूं पग नहीं भाई मांहरे, मोसूं नगर गयो नहीं जाय॥
जब आंधो कहे हूं पिण दुखियो घणो, हूं पिण मारूं अटवी में डूंडाट।
आंख्या विण नगर पोहचूं नहीं, नोनें कुण बतावे बाट॥
जो तं खांधे वेसे मांहरे, तूं मोनें मारग चलाय।
तो आपां दोनं जणा, नगरी पहुंचा जाय॥
ढाळ
पांगळो सुण हरख्यो ताहि, मिसलत कीधी मांहोमांहि।
पांगळा नें उठायो आंधे, बेसाण्यो पोतारा खांधे॥
पांगळो ते आंधा नें चलावे, सांनीकर मारग बतावे।
इण विध अटवी लांघी ताहि, दोनूं आया छें नगरी मांहि॥
नगरी आया तो सुखिया हुआ, अन्न पांणी बिनां नहीं मुवा।
ए दिष्टांत रूड़ी रीत जांणों, संसार ने मुगत पिछाणों॥
मोटी अटवी जिम संसार, तिण में दुखिया जीव अपार।
नगर जिम मुगति नं जांणो, तिण नें रूडी रीत पिछांणो॥
आंधा ज्यूं जीव ग्यांन रहित, अग्यांनी मिथ्यात सहित।
तिण रे क्रिया रूप नहीं पाय, ते मुगत नगर किम जाय॥
ते जीव क्रिया करवा लागो, पिण नहीं जांणे मुगत रो मागो।
जिण आगम नों जांण नांहीं, जीवादिक न जांणे काई॥
ते मुगत नगर किम जावें, संसार में झोला खावें।
ते तों आंधा जेम अळूझें, ग्यांन बिनां संवळो न सूझें॥
कदा जीवादिक नो हुवो जांण, मोख मारग लियो पिछांण।
पिण क्रिया करणी नहीं आवे, तो पिण मुगत नहीं जावे॥
मिळिया आंधो ने पांगळो दोय, सुखे नगर पोहता सोय।
ज्यूं ग्यांन क्रिया नों संयोग थाय, तो जीव मुगत माहे जाय॥
क्रिया तो ग्यान छे नाहीं, क्रिया तो जांणे देखे नहीं कांइ।
क्रिया तो सुमता रस भाव, कर्म रोकण तोड़ण रो सभाव॥
ग्यांन दरसण छें उपयोग, ते जांणे देखे लोक अलोक।
कोइ क्रिया नें कहे उपयोग, तिण ते मोटो मिथ्यात रो रोग॥
ग्यान क्रिया छे दोय, त्या नें एक म जांणो कोय।
त्यांरो सभाव जूवो जूवो जांणो, त्यांने रूड़ी रीत पिछांणो॥

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