परिचय
धनी धरम दास (15वीं–16वीं शताब्दी) मध्यकालीन संत परंपरा के प्रमुख संत-कवि और कबीर के शिष्य माने जाते हैं। वे निर्गुण भक्ति परंपरा से जुड़े थे और उनकी वाणी में गुरु-भक्ति, आत्मज्ञान तथा बाहरी आडंबरों के विरोध की भावना प्रमुख है।
उनकी रचनाओं की विशेषता सहज लोकभाषा में आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति है। ‘धर्मदास की वाणी’ को उनकी प्रमुख काव्य-परंपरा से जोड़ा जाता है और कबीरपंथी साहित्य में उनका विशेष स्थान है।
धनुष बान लिये डाढ़
धनी धरमदास
धनुष बान लिये डाढ़, जोगिनि एक माया हो।छिहिं में करत बिगार, तनिक नहिं दाया हो॥
झिर झिर बहै बयार, प्रेम रस डोलै हो।
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो॥
पिया पिया करत पुकार, पिया नहिं आया हो।
पिया बिनु सून मँदिलवा, बोलन लागे कागा हो॥
कागा हो तुम कारे, कियो बटवारा हो।
पिया मिलने की आस, बहुरि ना छूठहि हो॥
कहैं कबीर धर्मदास, गुरू संग चेला हो।
हिल मिलि करो सतसंग, उतरि चलो पारा हो॥
साहब मेटो चूक हमारी
धनी धरमदास
साहब मेटो चूक हमारी॥टेक॥बार-बार मोहिं डंड भयो है, चूक भई अति भारी॥
अब हम आये निकट तुम्हारे, अब मो तनहिं निहारो।
करुनामय तुम नाम धराये, तुम समरथ अब मेरो॥
ऐसी बिपति भई मोहिं ऊपर, कोइ न हीत हमारो।
तरसत जीव रहै निस बासर, जानि जनहिं तुम दौ रौ॥
अब की चूक छिमा कर साहेब, अब सनमुख ह्वै हेरो।
तुम सतगुरु सकल सुख दाता, सबद पान तै तारौ॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, करौं बंदगी तेरो।
मोरा पिया बसै कौन देस हो
धनी धरमदास
मोरा पिया बसै कौन देस हो।अपने पिया को ढूँढ़न हम निकसीं, कोइ न कहत सनेस हो॥
पिया कारन हम भई हैं बावरी, धरो जोगिनिया के भेस हो।
ब्रह्मा बिस्नु महेस न जानै, का जानै सारद सेस हो॥
धनि जो अगम अगोचर पइलन, हम सब सहत कलेस हो।
उहाँ के हाल कबीर गुरु जानें, आवत जात हमेस हो॥
जग ये दोऊ खेलत होरी
धनी धरमदास
जग ये दोऊ खेलत होरी।माया ब्रह्मबिलास करत हैं, एक से एक बरजोरी॥
सचिदानन्द सरूप अखंडित, व्यापक है बस ठौरी।
हिये नैन से परख परो जेहि, जोति समाय रहो री॥
जोबन जोर नैन सर मारते, ठहर सकै को कोरी।
मदत प्रचंड उठै चमकारी, कामा करी चित चोरी॥
निरगुन रूप अमान अखंडित, जा में गुन बिसरो री।
माया मुत्त अनंद कियो है, सबहि में अमर भरोरी॥
कारन सूछम स्थूल देंह धरि, भक्ति हेत तृन तोरी।
धर्मनि बिना दरस गुरु मूरत, कस भव पार भयोरी॥
साहेब सतगुरु घर आया हो
धनी धरमदास
साहेब सतगुरु घर आया हो।अँगना मोर जगमग भया, सुर संपति लाया हो॥
आधि गई मेरी हे सखी, आज सज्जन पाया हो।
धन विधाता लेख लिखा, निज भाग जगाया हो॥
कोमल बचन अंग दया घनेरी, कल्प वृच्छ की छाया हो।
धन जननी अस संत जिन जाया, अनंद बधाया हो॥
जप तप नेम धर्म बहु कीन्हा, रसना नामहिं गाया हो।
धरमदास सतगुर सतसंग से, छिन में पर यह पाया हो॥
साहेब कौन कमी घर तेरा
धनी धरमदास
साहेब कौन कमी घर तेरा।भूखे अन्न पियासे पानी, कपड़ा से तन घेरो।
जो कुछ न्यामत सवै महल में, लरच खजाना ढेरो॥
ख़ाक से पाक कियो पल माहीं, है समरथ तेरो।
भव से काढ़ि कियो तरनी पर, खेइ लगावो सबेरो॥
रहै न घाम छाँह दुनिया में, रहे न जम की चेरो।
राव रंक रंक से राजा, छिन में बाजत तूरो॥
मानो सत्त झूठ जनि जानो, सत्त बचन है पूरो।
धरमदास चरनन पर बिनवै, तुम गति सब भरे पूरो॥
साहेब दीनबंधु हितकारी
धनी धरमदास
साहेब दीनबंधु हितकारी।कोटिन ऐगुन बालक करई, माता-पिता चित एक न धारी॥
तुम गुरु माता-पिता जीवन कै, मैं अति दीन दुखारी।
प्रनतपाल करुना निधान प्रभु, हमरी और निहारी॥
जुगन-जुगन से तुम चलि आये, जीवन के हितकारी।
सदा भरोसे रहूँ तुम्हारे, तुम प्रतिपाल हमारी॥
मोरे तुमहीं सत सुकृति ही, अंतर और न धारो।
जानत ही जन के तन की, अब कस मोहिं बिसारी॥
को कहि सकै तुम्हारी महिमा, कोहि न दिह्यो पद भारी।
धरमदास पर दाया कीन्ही, सेवक अहौं तुम्हारी॥
साहेब बूड़त नाव अब मोरी
धनी धरमदास
साहेब बूड़त नाव अब मोरी।काम क्रोध की लहर उठतु है, मोह पवन झकझोरी॥
लोभ मोरे हिरदे घुमरतु है, सागर वार न पारी।
कपट की भंवर परतु है बहुतै, वा में बेडा अटको॥
काल फाँस लियो है दूबारे, आया सरन तुम्हारी।
धरमदास पर दाया कीन्हीं, काठि फंद जिव तारी।
कहै कबीर सुनो हो धर्मन, सतगुरु सरवन उबारी॥
साहेब मोरी ओर निहारो
धनी धरमदास
साहेब मोरी ओर निहारो।परजा पुत्र अहौं मैं साहेब, बहुत बात मैं टारी॥
हौं मैं कोटि जनम को पापी, मन बच करम असारो।
एकौ कर्म छुटे ना कबहूँ, बहु विधि बात बिगारो॥
हौं अपराधी बहुत जुगन को, नइया मोर उबारो।
बदी छोर सकल सुखदाता, करुनामय करत पुकारो॥
सीस चढ़ाइ पाप की मोटरी, आयो तुम्हारे दुवारो।
को अस हमरे भार उतारे, तुमहीं हेतु हमारो॥
धरमदास यह बिनती बिनवै, सतगुरु मोको तारो।
साहेब कबीर हंस के राजा, अमर लोक पहुँचावो॥
बधावा संत खजाऊ हो
धनी धरमदास
बधावा संत खजाऊ हो।जा बिधि सतगुरु मेहक करैं, सोई विधि बतलाऊँ हो॥
रतन पटोरा डारि पाँवड़े, सन्मुख जाऊँ हो।
सब सखियाँ मिलि बाँटत बधाई, मंगल गाऊँ हो॥
घसि घसि चंदन अंगना लिपाऊँ, चौक पुराऊँ हो।
मेवा नरियर पान मिठाई, संजम सबै मंगाऊँ हो॥
खौर आम घृत अमृत भोजन, संत जिमाउल हो।
चरन घोइ चरनामृत लेऊँ, सीस नवाऊँ हो॥
जब मोरे साहेब तखत बिराजैं, आरत लाऊँ हो।
पान पर्वत दया से पाऊँ, सब मिलि गाऊँ हो॥
जब मोरे सतगुरु पलंग पधारें, चरन दबाऊँ हो।
धरमदास याही विधि करि, सतलोक सिधाऊँ हो॥
पिया बिन मोहिं नींद न आवे
धनी धरमदास
पिया बिन मोहिं नींद न आवे।खन गरजै खन बिजुली चमकै, ऊपर से मोहिं झाँकि दिखावै।
सासु ननद घर दारुनि आहैं, नित मोहिं बिरह सतावै।
जोगि ह्वै कै मैं बन-बन ढूँढूँ, कोऊ न सुधि बतलावै।
धरमदास बिनवै कर जोरी, कोइ नेरे कोइ दूर बतावै॥
पिया बिन मोहि नीक न लागै गाँव
धनी धरमदास
पिया बिन मोहि नीक न लागै गाँव॥टेक॥चलत चलत मोरे चरन दुखित भे आँखिन परिगै धूर॥
आगे चलूँ पंथ नहिं सूझै पाछे परै न पाँव।
सासुरे जाउँ पिया नहिं चीन्हें नैहर जात लजाउँ॥
इहाँ मोर गाँव उहाँ मोर पाही बीचे अमरपुर धाम।
धरमदास बिनवै कर जोरी तहाँ गाँव न ठाँव॥
चलो सखि देखन चलिये
धनी धरमदास
चलो सखि देखन चलिये, दुलह कबीर हैं।उन सों जुरल सनेह, जठर सों राखि हैं॥
पांच तत्त को आसा, त्यागो बेगि कै।
छांडो झिलि मिलि तेह, पुरुष गम राखि कै॥
लाँघो औघट घाट, पंथ निजि ताकि कै।
गहो सुकृति जिन डोर, अगम गम राखि के॥
चार कोस आकास, तहाँ चढ़ि देखिये।
आगे मारग झीनि, तो सूरत विबेकिये॥
मुकुट एक अनूप, छत्र सिर साजि है।
ढुरत अग को चौर, सब्द धुनि गाजि है॥
सेत धुजा फहराय, भँवर तहँ गुंजहीं।
नितहिं उठै झनकार, गगन घनघोरहीं॥
कहैं कबीर धर्मदास सों, मूल उचारिये।
आगम गम्म बताइ कै, हंस उबारिये॥
हमारी उमरिया होली खेलन की
धनी धरमदास
हमारी उमरिया होली खेलन की।पिय मोसों मिल के बिछुर गया हो॥
पिय हमरे हम पिय की पयारी।
पिय बिच अंतर परि गयो हो॥
पिया मिलैं तब जियों मोरी सजनी।
पिया बिना जियरा निकल गयो हो॥
इत गोकुल उत मथुरा नगरी।
बीच सगर पिय मिलि गयो हो॥
धरमदास बिरहिनि पिय पावै।
चरन कंबल चित गहिं रहो हो॥
गुरु बिन कौन हरै मोरी पीरा
धनी धरमदास
गुरु बिन कौन हरै मोरी पीरा॥रहत अली मलीन जुग, राई, बिनत पाए एक हीरा।
पाये हीरा रहे नहिं धीरा, लैइ के चले वोहि पारख तीरा॥
सो हीरा साधू सब परखे, तब से भयो मन धीरा।
धरमदास विनबै कर जोरी, अजर अमर गुरु पाये कबीरा॥
मैं हेरि रहूँ नैना सो नेह लगाई
धनी धरमदास
मैं हेरि रहूँ नैना सो नेह लगाई॥राह चलत मोहिं मिलि गये सतगुरु, सो सुख बरनि न जाई॥
देह के दरस मोहिं बौराये, लै गये चित्त चुराई॥
छवि सत दरस कहाँ लगि बरनी, चाँद सुरज छिपी तब जाई॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, पुनि पुनि दरस दिखाई॥
सजन से प्रीति मोहिं लागी
धनी धरमदास
सजन से प्रीति मोहिं लागी, दरस को भयो अनुरागी।नहीं वैराग मोहिं आवै, साहेब के गुन नितै गावै।
अभरन भूषन तनै साजूँ, पिया को देखि हैंस हुलसूं॥
भया है गैब का डंका, चलो जहँ देस है बंका।
बिना ऋतु फूल एक फूला, भँवर रंग देखि के भूला॥
तकत छवि टरै ना टारी, होय तिस बरन बलिहारी।
कहै धरमदास कर जोरी, साहेब से अरज है मोरी॥
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