दुरसा आढ़ा (1535–1655) राजस्थान के प्रसिद्ध चारण कवि और वीर रस के कवि थे। वे मेवाड़ और राजपूत वीरता की प्रशंसा करने वाले कवियों में प्रमुख माने जाते हैं। उनकी कविताओं में वीरता, स्वाभिमान, देशप्रेम और युद्ध-भावना का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। दुरसा आढ़ा ने अपने काव्य के माध्यम से तत्कालीन राजपूत शासकों और योद्धाओं के शौर्य का वर्णन किया। उनकी रचनाएँ डिंगल काव्य परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती हैं और राजस्थान के वीर काव्य में उनका विशेष स्थान है।
अकबर समद अथाह
दुरसा आढ़ा
अकबर समद अथाह, तिंह डूबा हींदू तुरक।मेवाड़ो निण माह, पोयण फूल प्रतापसी॥
भागै सागै भाम
दुरसा आढ़ा
भागै सागै भाम, अम्रत लागै ऊमस।अकबर तळ आराम, पटकै जहर प्रतासी॥
अकबर जासी आप
दुरसा आढ़ा
अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दूसरा।पुनरासी परताप, सुजस न जासी सूरमा॥
अजरामर धन एह
दुरसा आढ़ा
अजरामर धन एह, जस रह जावे जगत में।दुख सुख दोनू देह, सुपन समान प्रतापसी॥
जिण रो जस जग माहि
दुरसा आढ़ा
जिण रो जस जग माहि, जिणरो जग धिन जीवणो।नेड़ो अपजस नाँहि, पणधर धिनो प्रतापसी॥
चीत मरण रण चाय
दुरसा आढ़ा
चीत मरण रण चाय, अकबर आधीनी बिना।पराधीन दुख पाय, पुनि जीवै न प्रतापसी॥
सेला अणी सनान
दुरसा आढ़ा
सेला अणी सनान, धारा तीरथ में धसे।देण धरम रणदान, पुरट सरीर प्रतापसी॥
सांगो धरम सहाय
दुरसा आढ़ा
सांगो धरम सहाय, बाबर सु भिड़ियो बिहस।अकबर कदमा आय, पड़े न राण प्रतापसी॥
मन री मन रै माहि
दुरसा आढ़ा
मन री मन रै मांहि, अकबर रै रहगी इकस।नरवर, करिये नाहि, पूरी राण प्रतापसी॥
अकबर कीना याद
दुरसा आढ़ा
अकबर कीना याद, हींदू नृप हाजर हुवा।गेदपाट मरजाद पग लागो न प्रतापसी॥
घट सूं ओघट घाट
दुरसा आढ़ा
घट सूं ओघट घाट, घसियो अकबरिये घणो।इळ चनण उप्रवाट, परमळ उठी प्रतापसी॥
सुष हित, स्याळ समाज
दुरसा आढ़ा
सुष हित स्याळ समाज, हींदू अकबर बस हुवा।रोसीलो मृगराज, पजै न राण प्रतापसी॥
अकबर गरब न आँण
दुरसा आढ़ा
अकबर गरब न आँण, हींदू सह चाकर हुवा।दीठो कोई दीवाण, करतो लटका कटहड़ै॥
महि दाधण मेवाड
दुरसा आढ़ा
महि दाधण मेवाड, राड़ धाड अकबर रचै।विषै विषायत बाड, प्रथुळ पहाड प्रतापसी॥
कदै न नामै कंध
दुरसा आढ़ा
कदै न नामै कंध, अकबर ढिग आवै न ओ।सूरज बण संबंध, पाळे राण प्रतापसी॥
ढिग अकबर दळ ढाण
दुरसा आढ़ा
ढिग अकबर दळ ढाण, अग अग झगड़े आथड़े।मग मग पाड़ै माण, पग पग राण प्रतापसी॥
बधियो अकबर वैर
दुरसा आढ़ा
बधियो अकबर वैर, रसत गैर रोकी रिपू।कंद मूळ फळ कैर, पावै राण प्रतापसी॥
अकबर हिये उचाट
दुरसा आढ़ा
अकबर हिये उचाट, रात दिवस लागी रहै।रजवट बट समराट, पाटप राण प्रतापसी॥
अकबर जतन अपार
दुरसा आढ़ा
अकबर जतन अपार,रात दिवस रोकण करै।पूगी समदा पार, पगी राण प्रतापसी॥
अकबर पथर अनेक
दुरसा आढ़ा
अकबर पथर अनेक, कै भूपत भेळा किया।हाथ न लागो हेक, पारस राण प्रतापसी॥
थिर नृप हिन्दुसथान
दुरसा आढ़ा
थिर नृप हिन्दुसथान, लातरगा मग लोभ लग।माता भूमी मान, पूजै राण प्रतापसी॥
कळपे अकबर काय
दुरसा आढ़ा
कळपे अकबर काय; गुण पूगीधर गोड़िया।मिणधर छाबड माय, पडै न राण प्रतापसी॥
है अकबर घर हाण
दुरसा आढ़ा
है अकबर घर हाण, डाण ग्रहे नीची दिसट।तजै न ऊची ताण, पोरस राण प्रतापसी॥
जाणै अकबर जोर
दुरसा आढ़ा
जाणै अकबर जोर, तो पिण, ताणै तोर तिड़।आ बलाय है और, पिसणा पोर प्रतापसी॥
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