मरो वै जोगी मरौ
गोरखनाथ
मरो वै जोगी मरौ, मरण है मीठा।मरणी मरौ जिस मरणी, गोरख मरि दीठा॥
अवधू मन चंगा तो कठौती गंगा
गोरखनाथ
अवधू मन चंगा तो कठौती गंगा, बांध्या मेल्हा तौ जगत चेला।बदंत गोरख सत सरूप, तत विचारै तै रेख न रूप॥
हिंदू ध्यावै देहुरा
गोरखनाथ
हिंदू ध्यावै देहुरा मुसलमान मसीत।जोगी ध्यावै परम पद देहुरा न समीत॥
हिंदू आखैं राम कौं, मुसलमान आखैं खुदाई।
जोगी आखैं अलख कौं, तहं राम अछै न खुदाई॥
हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान
गोरखनाथ
हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान, अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियान।हंसै खेलै न करै मन भंग, ते निहचल सदा नाथ के संग॥
काजी मुलां कुरांण लगाया
गोरखनाथ
काजी मुलां कुरांण लगाया, ब्रह्म लगाया वेद।कापड़ी संन्यासी तीरथ भरमाया, न पाया निरबांण का भेवं॥
लाल बोलंती अम्हे पारि उतरिया, मूढ रहै उर वारं।
स्थिति बिहूणां झूठा जोगी ना तस वार न पारं॥
थोड़ा बोलै थोड़ा खाई
गोरखनाथ
थोड़ा बोलै थोड़ा खाई, तिस घटि पवनां रह समाई।गगन मंडल में अनहद बाजै, प्यंड पड़ै तो सतगुरु लाजै॥
कहणि सुहेली रहणि दुहेली
गोरखनाथ
कहणि सुहेली रहणि दुहेली बिन खायां गुड़ मीठा।खाई हींग कपूर बखाणौं, गोरख कहै सब झूठा॥
बसती न सुन्यं, सुन्यं न बसती
गोरखनाथ
बसती न सुन्यं, सुन्यं न बसती, अगम अगोचर ऐसा।गगन सिखर महि बालक बोलै, ताका नाम धरहुगे कैसा॥
कोई न्यंदै कोई ब्यंदै
गोरखनाथ
कोई न्यंदै कोई ब्यंदै कोई करै हमारी आसा ।गोरख कहै सुनौ रे अवधू यहू पंथ खरा उदासा ॥
अभरा था ते सूभर भरिया
गोरखनाथ
अभरा था ते सूभर भरिया, नीझर झरता रहिया।खाँडे थैं खुरसाण दुहेला, यूँ सतगुर मारग कहिया॥
निरति न सुरति जोग न भोगं
गोरखनाथ
निरति न सुरति जोग न भोगं,जरा मरण नहीं तहां रोगं।
गोरख बोलै एकंकार,
नहिं तहँ बाचा ओं अंकारं॥
देख पंडिता रहि देखि सारं
गोरखनाथ
पढि देख पंडिता रहि देखि सारं, अपणी करणी उतरिबा पारं।बदंत गोरखनाथ कहि धूं साखी, घटि घटि दीपक पसु न आँखी॥
पढि देखि पंडित ब्रह्म ज्ञानं
गोरखनाथ
पढि देखि पंडित ब्रह्म ज्ञानं, मूवां मुकति बैकुंठा थानं।गाड्या जार्या चौरासी मैं जाई, सति सति भाखंत गोरख राई॥
ग्यांन सरीखा गुरु
गोरखनाथ
ग्यांन सरीखा गुरु न मिलिया चित्त सरीखा चेला।मन सरीखा मेल न मिलिया ताथैं गोरख फिरै अकेला॥
थंभ बिहूँणी गगन रचीलै
गोरखनाथ
थंभ बिहूँणी गगन रचीलै, तेल बिहूँणी बाती।गुरु गोरख बचने, पतिआया, तब द्योस नहीं तहां राती॥
गगन मंडल मैं ऊँधा कूवा
गोरखनाथ
गगन मंडल मैं ऊँधा कूवा, वहाँ अमृत का बासा।सगुरा होई सु भरि भरि पीवै, निगुरा जाई पियासा॥
अभरा था ते सूभर भरिया
गोरखनाथ
अभरा था ते सूभर भरिया, नीझर झरता रहिया।खाँडे थैं खुरसाण दुहेला, यूँ सतगुर मारग कहिया॥
यहु मन सकती यहु मन सीव
गोरखनाथ
यहु मन सकती यहु मन सीव, यहु मन पाँच तत्त का जीव।यहु मन जे उनमन रहै। तौ तीन लोक की बात कहै॥
सबदहिं ताला सबदहिं कूँची
गोरखनाथ
सबदहिं ताला सबदहिं कूँची, सबदहिं सबद जगाया।सबदहिं सबद सूँ परचा हुआ, सबदहिं सबद समाया॥
बाहरि न भीतरि नेड़ा न दूर
गोरखनाथ
बाहरि न भीतरि नेड़ा न दूर, खोजत रहै ब्रह्म अरु सूर।सेत फटक मनि हरि बींधा, इहि परमारथ गोरख सीधा॥
गुरु की बाचा खोजै नाहीं
गोरखनाथ
गुरु की बाचा खोजै नाहीं, अहंकारी अहंकार करै।खोजी जीवै खोजि गुरु कौं अहंकारी का प्यंड परै॥
दरवेस सोइ जो दर की जाणैं
गोरखनाथ
दरवेस सोइ जो दर की जाणैं,पंचे पवन अपूठा आणैं।
सदा सुचेत रहै दिन−राति,
सो दरवेस अलह की जाति॥
पढि पढि पढि केता मूवा
गोरखनाथ
पढि पढि पढि केता मूवा, कथि कथि कथि कहा कीन्हा।बढि बढि बहु घटि गया, पारब्रह्म नहीं चीन्हा॥
तूंबी मैं तिरलोक समाया
गोरखनाथ
तूंबी मैं तिरलोक समाया त्रिवेणी रवि चंदा।बूझो रे ब्रह्म गियानी अनहद नाद अभंगा॥
पंथ बिन चलिबा अगनि बिन जलिबा
गोरखनाथ
पंथ बिन चलिबा अगनि बिन जलिबा, अनिला तृषा जहटिया।ससंवेद श्री गोरख कथिया, बूझि ल्यो पंडित पढिया॥
अधिक तत्त तै गुरु बोलिये
गोरखनाथ
अधिक तत्त तै गुरु बोलिये हीण तत्त तै चेला।मन मांनै तौ संगि रमौ नहीं तौ रमौ अकेला॥
गगनि मंडल में गाय बियाई
गोरखनाथ
गगनि मंडल में गाय बियाई, कागद दही जमाया।छांछि छांणि पिंडता पीवी, सिधां माखण खाया॥
सांग का पूरा ग्यांन का ऊरा
गोरखनाथ
सांग का पूरा ग्यांन का ऊरा, पेट का तूटा डिंभ का सूरा।बदंत गोरख न पाया जोग, करि पाखंड रिझाया लोग॥
वेदे न सास्त्रे कतेबे न कुरांणे
गोरखनाथ
वेदे न सास्त्रे कतेबे न कुरांणे पुस्तके न बंच्या जाई।ते पद जानां बिरला जोगी और दुनी सब धंधै लाई॥
पंथि चले चलि पवनां
गोरखनाथ
पंथि चले चलि पवनां तूटै नाद बिंद अरु बाई।घटि ही भीतरि अठसठि तीरथ कहाँ भ्रमै रे भाई॥
बेद कतेब न खांणीं बांणीं
गोरखनाथ
बेद कतेब न खांणीं बांणीं, सब ढंकी तलि आंणीं।गगन सिखर महिं सबद प्रकास्या, तहं बूझै अलख बिनाणीं॥
गोरख कहै सुणहु रे अवधू
गोरखनाथ
गोरख कहै सुणहु रे अवधू, जग में ऐसे रहणां।आँखें देखिबा कानैं सुणिबा, मुखि तैं कछु न कहणां॥
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