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नागार्जुन की कविताएँ : Nagarjun Ki Kavita (Hindi)

परिचय

नागार्जुन (1911–1998) हिंदी और मैथिली के प्रसिद्ध कवि, उपन्यासकार एवं पत्रकार थे। उनका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र था और वे प्रगतिशील तथा जनपक्षधर साहित्य के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते हैं।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘अकाल और उसके बाद’, ‘बलचनमा’, ‘रतिनाथ की चाची’ और ‘युगधारा’ शामिल हैं। उनकी कविता की विशेषता आम जनता के जीवन, सामाजिक विषमता, राजनीतिक विडंबनाओं और लोकभाषा की सहज अभिव्यक्ति है।
उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969) और मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार सहित कई सम्मान प्राप्त हुए। वे अपनी निर्भीक, व्यंग्यात्मक और जनसरोकारों से जुड़ी रचनाशीलता के कारण ‘जनकवि’ के रूप में प्रसिद्ध हैं।


बादल को घिरते देखा

नागार्जुन

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिषतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बग़ल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा-काल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
दुर्गम बर्फ़ानी घाटी में
शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल—
के पीछे धावित हो-होकर
तरल-तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
कहाँ गए धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत किंतु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो, वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल
मुखरित देवदारु-कानन में,
शोणित धवल भोज पत्रों से
छाई हुई कुटी के भीतर
रंग-बिरंगे और सुगंधित
फूलों से कुंतल को साजे,
इंद्रनील की माला डाले
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
शतदल लाल कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि-खचित कलामय
पान पात्र द्राक्षासव पूरित
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चंदन की त्रिपटी पर,
नरम निदाग बाल-कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आँखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

अकाल और उसके बाद

नागार्जुन

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद

कालिदास

नागार्जुन

कालिदास, सच-सच बतलाना!
इंदुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोए थे?
कालिदास, सच-सच बतलाना!
शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोए थे?
कालिदास, सच-सच बतलाना!
रति रोई या तुम रोए थे?
वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास, सच-सच बतलाना!
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थक कर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवलगिरि के शिखरों पर
प्रियवर, तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोए थे!
कालिदास, सच-सच बतलाना!

गुलाबी चूड़ियाँ

नागार्जुन

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से ऊपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक़
हिलती रहती हैं...
झूककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला ׃ हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ, नहीं मानती है मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस जुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-सादे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा—
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
बर्ना ये किसको नहीं भाएँगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

सिंदूर तिलकित भाल

नागार्जुन

घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल!
याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल!
कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिए न समाज?
कौन है वह एक जिसको नहीं पड़ता दूसरे से काज?
चाहिए किसको नहीं सहयोग?
चाहिए किसको नहीं सहवास?
कौन चाहेगा कि उसका शून्य में टकराए यह उच्छ्वास?
हो गया हूँ मैं नहीं पाषाण
जिसको डाल दे कोई कहीं भी
करेगा वह कभी कुछ न विरोध
करेगा वह कुछ नहीं अनुरोध
वेदना ही नहीं उसके पास
उठेगा फिर कहाँ से निःश्वास
मैं न साधारण, सचेतन जंतु
यहाँ हाँ-ना किंतु और परंतु
यहाँ हर्ष-विषाद-चिंता-क्रोध
यहाँ है सुख-दुख का अवबोध
यहाँ है प्रत्यक्ष औ’ अनुमान
यहाँ स्मृति-विस्मृति सभी के स्थान
तभी तो तुम याद आतीं प्राण,
हो गया हूँ मैं नहीं पाषाण!
याद आते स्वजन
जिनकी स्नेह से भींगी अमृतमय आँख
स्मृति-विहंगम को कभी थकने न देंगी पाँख
याद आता मुझे अपना वह ‘तरउनी’ ग्राम
याद आतीं लीचियाँ, वे आम
याद आते मुझे मिथिला के रुचिर भू-भाग
याद आते धान
याद आते कमल, कुमुदिनि और तालमखान
याद आते शस्य-श्यामल जनपदों के
रूप-गुण-अनुसार ही रखे गए वे नाम
याद आते वेणुवन के नीलिमा के निलय अति अभिराम
धन्य वे जिनके मृदुलतम अंक
हुए थे मेरे लिए पर्यंक
धन्य वे जिनकी उपज के भाग
अन्न-पानी और भाजी-साग
फूल-फल औ’ कंद-मूल अनेक विध मधु-मांस
विपुल उनका ऋण, सधा सकता न मैं दशमांश
ओह, यद्यपि पड़ गया हूँ दूर उनसे आज
हृदय से पर आ रही आवाज़
धन्य वे जन, वही धन्य समाज
यहाँ भी तो हूँ न मैं असहाय
यहाँ भी हैं व्यक्ति औ’ समुदाय
किंतु जीवन भर रहूँ फिर भी प्रवासी ही कहेंगे हाय!
मरूँगा तो चिता पर दो फूल देंगे डाल
समय चलता जाएगा निर्बाध अपनी चाल
सुनोगी तुम तो उठेगी हूक
मैं रहूँगा सामने (तस्वीर में) पर मूक
सांध्य नभ में पश्चिमांत-समान
लालिमा का जब करुण आख्यान
सुना करता हूँ, सुमुखि, उस काल
याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल।

उनको प्रणाम!

नागार्जुन

जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम।
कुछ कुंठित औ’ कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए!
—उनको प्रणाम!
जो छोटी-सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि-पार;
मन की मन में ही रही, स्वयं
हो गए उसी में निराकार!
—उनको प्रणाम!
जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह-रह नव-नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे!
—उनको प्रणाम!
एकाकी और अकिंचन हो
जो भू-परिक्रमा को निकले;
हो गए पंगु, प्रति-पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले!
—उनको प्रणाम!
कृत-कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल!
—उनको प्रणाम!
थी उग्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दुःखांत हुआ;
था जन्म-काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहांत हुआ!
—उनको प्रणाम!
दृढ़ व्रत औ’ दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति-मंत;
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत!
—उनको प्रणाम!
जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर!
—उनको प्रणाम!

आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी

नागार्जुन

आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
आओ शाही बैंड बजाएँ,
आओ बंदनवार सजाएँ,
ख़ुशियों में डूबे उतराएँ,
आओ तुमको सैर कराएँ—
उटकमंड की, शिमला-नैनीताल की
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
तुम मुस्कान लुटाती आओ,
तुम वरदान लुटाती जाओ,
आओ जी चाँदी के पथ पर,
आओ जी कंचन के रथ पर,
नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की
छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
सैनिक तुम्हें सलामी देंगे
लोग-बाग बलि-बलि जाएँगे
दॄग-दॄग में ख़ुशियाँ छ्लकेंगी
ओसों में दूबें झलकेंगी
प्रणति मिलेगी नए राष्ट्र के भाल की
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
बेबस-बेसुध, सूखे-रुखडे़,
हम ठहरे तिनकों के टुकडे़,
टहनी हो तुम भारी भरकम डाल की
खोज ख़बर तो लो अपने भक्तों के ख़ास महाल की!
लो कपूर की लपट
आरती लो सोने के थाल की
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेंट के लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो
पार्लमेंट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो
मिनिस्टरों से शेकहैंड लो, जनता से जयकार लो
दाएँ-बाएँ खडे हज़ारी ऑफ़िसरों से प्यार लो
धनकुबेर उत्सुक दीखेंगे उनके ज़रा दुलार लो
होंठों को कंपित कर लो, रह-रह के कनखी मार लो
बिजली की यह दीपमालिका फिर-फिर इसे निहार लो
यह तो नई-नई दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोड़ी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की!
यही हुई है राय जवाहरलाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!

हरिजन-गाथा

नागार्जुन

 एक

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था!
महसूस करने लगीं वे
एक अनोखी बेचैनी
एक अपूर्व आकुलता
उनकी गर्भकुक्षियों के अंदर
बार-बार उठने लगी टीसें
लगाने लगे दौड़ उनके भ्रूण
अंदर ही अंदर
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
हरिजन-माताएँ अपने भ्रूणों के जनकों को
खो चुकी हों एक पैशाचिक दुष्कांड में
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था...

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं—
तेरह के तेरह अभागे—
अकिंचन मनुपुत्र
ज़िंदा झोंक दिए गए हों
प्रचंड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन संपन्न ऊँची जातियों वाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा!
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था...

ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि
महज़ दस मील दूर पड़ता हो थाना
और दरोग़ा जी तक बार-बार
ख़बरें पहुँचा दी गई हों संभावित दुर्घटनाओं की

और, निरंतर कई दिनों तक
चलती रही हों तैयारियाँ सरेआम
(किरासिन के कनस्तर, मोटे-मोटे लक्क्ड़,
उपलों के ढेर, सूखी घास-फूस के पूले
जुटाए गए हों उल्लासपूर्वक)
और एक विराट चिताकुंड के लिए
खोदा गया हो गड्ढा हँस-हँसकर
और ऊँची जातियों वाली वो समूची आबादी
आ गई हो होली वाले 'सुपर मौज़' के मूड में
और, इस तरह ज़िंदा झोंक दिए गए हों
तेरह के तेरह अभागे मनुपुत्र
सौ-सौ भाग्यवान मनुपुत्रों द्वारा
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था...
ऐसा तो कभी नहीं हुआ था...

दो

चकित हुए दोनों वयस्क बुजुर्ग
ऐसा नवजातक
न तो देखा था, न सुना ही था आज तक!
पैदा हुआ है दस रोज़ पहले अपनी बिरादरी में
क्या करेगा भला आगे चलकर?
रामजी के आसरे जी गया अगर
कौन-सी माटी गोड़ेगा?
कौन-सा ढेला फोड़ेगा?
मग्गह का यह बदनाम इलाक़ा
जाने कैसा सलूक करेगा इस बालक से
पैदा हुआ है बेचारा—
भूमिहीन बँधुआ मज़दूरों के घर में
जीवन गुज़ारेगा हैवान की तरह
भटकेगा जहाँ-तहाँ बनमानुस जैसा
अधपेटा रहेगा अधनंगा डोलेगा
तोतला होगा कि साफ़-साफ़ बोलेगा
जाने क्या करेगा
बहादुर होगा कि बेमौत मरेगा...
फ़िक्र की तलैया में खाने लगे गोते
वयस्क बुजुर्ग दोनों, एक ही बिरादरी के हरिजन
सोचने लगे बार-बार...
कैसे तो अनोखे हैं अभागे के हाथ-पैर
राम जी ही करेंगे इसकी ख़ैर
हम कैसे जानेंगे, हम ठहरे हैवान
देखो तो कैसा मुलुर-मुलुर देख रहा शैतान!
सोचते रहे दोनों बार-बार...

हाल ही में घटित हुआ था वो विराट दुष्कांड...
झोंक दिए गए थे तेरह निरपराध हरिजन
सुसज्जित चिता में...

यह पैशाचिक नरमेध
पैदा कर गया है दहशत जन-जन के मन में
इन बूढ़ों की तो नींद ही उड़ गई है तब से!
बाक़ी नहीं बचे हैं पलकों के निशान
दिखते हैं दृगों के कोर ही कोर
देती है जब-तब पहरा पपोटों पर
सील-मुहर सूखी कीचड़ की

उनमें से एक बोला दूसरे से
बच्चे की हथेलियों के निशान
दिखलाएँगे गुरु जी से
वो ज़रूर कुछ न कु़छ बतलाएँगे
इसकी क़िस्मत के बारे में

देखो तो ससुरे के कान हैं कैसे लंबे
आँखें हैं छोटी पर कितनी तेज़ हैं
कैसी तेज़ रोशनी फूट रही है इनसे!
सिर हिलाकर और स्वर खींचकर,
बुद्धू ने कहा— 
हाँ जी खदेरन, गुरु जी ही देखेंगे इसको
बताएँगे वही इस कलुए की क़िस्मत के बारे में
चलो, चलें, बुला लावें गुरु महाराज को...

पास खड़ी थी दस साला छोकरी
दद्दू के हाथों से ले लिया शिशु को
सँभलकर चली गई झोंपड़ी के अंदर

अगले नहीं, उससे अगले रोज़
पधारे गुरु महाराज
रैदासी कुटिया के अधेड़ संत ग़रीबदास
बकरी वाली गंगा-जमनी दाढ़ी थी
लटक रहा था गले से
अँगूठानुमा ज़रा-सा टुकड़ा तुलसी काठ का
कद था नाटा, सूरत थी साँवली
कपार पर, बाईं तरफ घोड़े के खुर का
निशान था
चेहरा था गोल-मटोल, आँखें थीं घुच्ची
बदन कठमस्त था...
ऐसे आप अधेड़ संत ग़रीबदास पधारे
चमर टोली में...

'अरे भगाओ इस बालक को
होगा यह भारी उत्पाती
जुलुम मिटाएँगे धरती से
इसके साथी और संघाती 

'यह उन सबका लीडर होगा
नाम छ्पेगा अख़बारों में
बड़े-बड़े मिलने आएँगे
लद-लदकर मोटर-कारों में

'खान खोदने वाले सौ-सौ
मज़दूरों के बीच पलेगा
युग की आँचों में फ़ौलादी
साँचे-सा यह वहीं ढलेगा

'इसे भेज दो झरिया-फरिया
माँ भी शिशु के साथ रहेगी
बतला देना, अपना असली
नाम-पता कुछ नहीं कहेगी

'आज भगाओ, अभी भगाओ
तुम लोगों को मोह न घेरे
होशियार, इस शिशु के पीछे
लगा रहे हैं गीदड़ फेरे

'बड़े-बड़े इन भूमिधरों को
यदि इसका कुछ पता चल गया
दीन-हीन छोटे लोगों को
समझो फिर दुर्भाग्य छ्ल गया

'जनबल-धनबल सभी जुटेगा
हथियारों की कमी न होगी
लेकिन अपने लेखे इसको
हर्ष न होगा, गमी न होगी

'सबके दुख में दुखी रहेगा
सबके सुख में सुख मानेगा
समझ-बूझकर ही समता का 
असली मुद्दा पहचानेगा

'अरे देखना इसके डर से
थर-थर काँपेंगे हत्यारे
चोर-उचक्के-गुंडे-डाकू
सभी फिरेंगे मारे-मारे

'इसकी अपनी पार्टी होगी
इसका अपना ही दल होगा
अजी देखना, इसके लेखे
जंगल में ही मंगल होगा

'श्याम सलोना यह अछूत शिशु
हम सबका उद्धार करेगा
आज यही संपूर्ण क्रांति का
बेड़ा सचमुच पार करेगा

'हिंसा और अहिंसा दोनों
बहनें इसको प्यार करेंगी
इसके आगे आपस में वे
कभी नहीं तक़रार करेंगी...'

इतना कहकर उस बाबा ने
दस-दस के छह नोट निकाले
बस, फिर उसके होंठों पर थे
अपनी उँगलियों के ताले

फिर तो उस बाबा की आँखें
बार-बार गीली हो आईं
साफ़ सिलेटी हृदय-गगन में
जाने कैसी सुधियाँ छाईं

नव शिशु का सिर सूँघ रहा था
विह्वल होकर बार-बार वो
साँस खींचता था रह-रहकर 
गुमसुम-सा था लगातार वो

पाँच महीने होने आए
हत्याकांड मचा था कैसा!
प्रबल वर्ग ने निम्न वर्ग पर
पहले नहीं किया था ऐसा!

देख रहा था नवजातक के
दाएँ कर की नरम हथेली
सोच रहा था—इस ग़रीब ने
सूक्ष्म रूप में विपदा झेली

आड़ी-तिरछी रेखाओं में
हथियारों के ही निशान हैं
खुखरी है, बम है, असि भी है
गंडासा-भाला प्रधान हैं

दिल ने कहा—दलित माँओं के
सब बच्चे अब बागी होंगे
अग्निपुत्र होंगे वे, अंतिम 
विप्लव में सहभागी होंगे

दिल ने कहा—अरे यह बच्चा
सचमुच अवतारी वराह है
इसकी भावी लीलाओं का
सारी धरती चरागाह है

दिल ने कहा—अरे हम तो बस
पिटते आए, रोते आए!
बकरी के खुर जितना पानी
उसमें सौ-सौ गोते खाए!

दिल ने कहा—अरे यह बालक
निम्न वर्ग का नायक होगा
नई ऋचाओं का निर्माता
नए वेद का गायक होगा

होंगे इसके सौ सहयोद्धा
लाख-लाख जन अनुचर होंगे
होगा कर्म-वचन का पक्का
फ़ोटो इसके घर-घर होंगे

दिल ने कहा—अरे इस शिशु को
दुनिया भर में कीर्ति मिलेगी
इस कलुए की तदबीरों से
शोषण की बुनियाद हिलेगी

दिल ने कहा—अभी जो भी शिशु
इस बस्ती में पैदा होंगे
सब के सब सूरमा बनेंगे
सब के सब ही शैदा होंगे

दस दिन वाले श्याम सलोने
शिशु मुख की यह छ्टा निराली
दिल ने कहा—भला क्या देखें
नज़रें गीली पलकों वाली

थाम लिए विह्वल बाबा ने
अभिनव लघु मानव के मृदु पग
पाकर इनके परस जादुई
भूमि अकंटक होगी लगभग

बिजली की फुर्ती से बाबा
उठा वहाँ से, बाहर आया
वह था मानो पीछे-पीछे
आगे थी भास्वर शिशु-छाया

लौटा नहीं कुटी में बाबा
नदी किनारे निकल गया था
लेकिन इन दोनों को तो अब
लगता सब कुछ नया-नया था

तीन

'सुनते हो' बोला खदेरन
'बुद्धू भाई देर नहीं करनी है इसमें
चलो, कहीं बच्चे को रख आवें...
बतला गए हैं अभी-अभी
गुरु महाराज,
बच्चे को माँ-सहित हटा देना है कहीं
फ़ौरन बुद्धू भाई!'...
बुद्धू ने अपना माथा हिलाया
खदेरन की बात पर
एक नहीं, तीन बार!
बोला मगर एक शब्द नहीं
व्याप रही थी गंभीरता चेहरे पर
था भी तो वही उम्र में बड़ा
(सत्तर से कम का तो भला क्या रहा होगा!)
'तो चलो !
उठो फ़ौरन उठो!
शाम की गाड़ी से निकल चलेंगे
मालूम नहीं होगा किसी को...
लौटने में तीन-चार रोज़ तो लग ही जाएँगे...

'बुद्धू भाई तुम तो अपने घर जाओ
खाओ,पियो, आराम कर लो
रात में गाड़ी के अंदर जागना ही तो पड़ेगा...
रास्ते के लिए थोड़ा चना-चबेना जुटा लेना
मैं इत्ते में करता हूँ तैयार
समझा-बुझाकर
सुखिया और उसकी सास को...'

बुद्धू ने पूछा, धरती टेक कर
उठते-उठते—
'झरिया,गिरिडीह, बोकारो
कहाँ रखोगे छोकरे को?
वहीं न? जहाँ, अपनी बिरादरी के
कुली-मज़ूर होंगे सौ-पचास?
चार-छै महीने बाद ही
कोई काम पकड़ लेगी सुखिया भी...'
और, फिर अपने आपसे
धीमी आवाज़ में कहने लगा बुद्धू
छोकरे की बदनसीबी तो देखो
माँ के पेट में था तभी इसका बाप भी
झोंक दिया गया उसी आग में...
बेचारी सुखिया जैसे-तैसे पाल ही लेगी इसको
मैं तो इसे साल-साल देख आया करूँगा
जब तक है चलने-फिरने की ताक़त चोले में...
तो क्या आगे भी इस कलु॒ए के लिए
भेजते रहेंगे खर्ची गुरु महाराज?...

बढ़ आया बुद्धू अपने छ्प्पर की तरफ़
नाचते रहे लेकिन माथे के अंदर
गुरु महाराज के मुँह से निकले हुए
हथियारों के नाम और आकार-प्रकार
खुखरी, भाला, गंडासा, बम, तलवार...
तलवार, बम, गंडासा, भाला, खुखरी...

तकली मेरे साथ रहेगी

नागार्जुन

राजनीति के बारे में अब एक शब्द भी नहीं कहूँगा
तकली मेरे साथ रहेगी, मैं तकली के साथ रहूँगा
नहीं ज़रूरत रही देश में सत्याग्रह की, अनुशासन है
सही राह पर हाकिम हैं तो भली जगह पर सिंहासन है
संकट पहुँचा चरम बिंदु पर, एक वर्ष तक रहा मौन मैं
नहीं पता चलता था बिल्कुल, कौन आप हो, और कौन मैं
बहुत किया जब चिंतन मैंने, तकली का तब मिला सहारा
आओ भाई, छोड़-छाड़कर राजनीति की सूखी धारा
सत्य रहेगा अंदर, ऊपर से सोने का ढक्कन होगा
चाँदी की तकली होगी, तो मुँह में असली मक्खन होगा
करनी में गड़बड़ियाँ होंगी, कथनी में अनुशासन होगा
हाथों में बंदूक़ें होंगी, कंधों पर सिंहासन होगा
तकली से तकलीफ़ मिटाओ, बाक़ी सब कुछ सहते जाओ
ख़ुद ही सब कुछ सुनते जाओ, ख़ुद ही सब कुछ कहते जाओ
ठंड लगे तो गुदमा ओढ़ो, भूख लगे तो मक्खन खाओ
राजनीति का लफड़ा छोड़ो, बस, बाबा पर ध्यान जमाओ
बीस सूत्र हैं, बस काफ़ी हैं, निकलें इनसे लाखों धागे
तुम आओगे पीछे-पीछे, मैं जाऊँगा आगे-आगे
चीफ़ मिनिस्टर पैर छुएँगे, शीश नवाएँगे ऑफ़िसर
सवदय का जादू अबके नाचेगा शासन के सिर पर
आध्यात्मिकता पर बोलूँगा, बोलूँगा विज्ञान तत्व पर
राजनीति का ज़िक्र करूँगा थोड़ा-थोड़ा ऊपर-ऊपर
वही सुनूँगा याद रखूँगा जो मुझसे निर्मला कहेगी
लोगों से मिलने-जुलने का माध्यम मेरा वही रहेगी
शांति, शांति, संपूर्ण शांति बस, मेरा एक यही नारा
अपना मठ, अपने जन प्रिय हैं मुझको प्रिय अपना इकतारा
मुझको प्रिय है मैत्री अपनी, प्रिय है यह करुणा कल्याणी
अपने मौन मुझे प्यारे हैं, मुझको प्रिय है अपनी वाणी
दुर्जन हैं जो हँसते होंगे, बाबा उन पर ध्यान न देता
बकवासों का अंत नहीं है, बाबा उन पर कान न देता
बता नहीं पाऊँगा यह मैं, मौन मुझे कितना प्यारा है
बता नहीं पाऊँगा यह मैं कौन मुझे कितना प्यारा है
आज वृद्ध हूँ, बचपन में था भोली माँ का भोला बालक
महा-मुखर था कभी, आज तो महा-मौन का हूँ संचालक
सब मेरे, मैं भी हूँ सबका, मेरी मठिया सबका घर है
आप और हम सब नीचे हैं, सबके ऊपर परमेश्वर है
राजनीति के बारे में अब एक शब्द भी नहीं कहूँगा
तकली मेरे साथ रहेगी, मैं तकली के साथ रहूँगा

तीनों बंदर बापू के

नागार्जुन

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के!
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के!
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के!
ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के!
सर्वोदय के नटवरलाल
फैला दुनिया भर में जाल
अभी जिएँगे ये सौ साल
ढाई घर घोड़े की चाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल
लंबी उमर मिली है, ख़ुश हैं तीनों बंदर बापू के
दिल की कली खिली है, ख़ुश हैं तीनों बंदर बापू के
बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को भी बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बच्चे होंगे मालामाल
ख़ूब गलेगी उनकी दाल
औरों की टपकेगी राल
इनकी मगर तनेगी पाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल
सेठों का हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के
सत्य अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
पूँछों से छवि आँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बंदर बापू के
मुस्काते हैं आँखें मीचे तीनों बंदर बापू के
छील रहे गीता की खाल
उपनिषदें हैं इनकी ढाल
उधर सजे मोती के थाल
इधर जमे सतजुगी दलाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल
मूँड़ रहे दुनिया-जहान को तीनों बंदर बापू के
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बंदर बापू के
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बंदर बापू के
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बंदर बापू के
गांधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बंदर बापू के
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बंदर बापू के
दिल चटकीला, उजले बाल
नाप चुके हैं गगन विशाल
फूल गए हैं कैसे गाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल
हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बंदर बापू के
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के!

तीनों बंदर बापू के

नागार्जुन

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के!
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के!
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के!
ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के!
सर्वोदय के नटवरलाल
फैला दुनिया भर में जाल
अभी जिएँगे ये सौ साल
ढाई घर घोड़े की चाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल
लंबी उमर मिली है, ख़ुश हैं तीनों बंदर बापू के
दिल की कली खिली है, ख़ुश हैं तीनों बंदर बापू के
बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को भी बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बच्चे होंगे मालामाल
ख़ूब गलेगी उनकी दाल
औरों की टपकेगी राल
इनकी मगर तनेगी पाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल
सेठों का हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के
सत्य अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
पूँछों से छवि आँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बंदर बापू के
मुस्काते हैं आँखें मीचे तीनों बंदर बापू के
छील रहे गीता की खाल
उपनिषदें हैं इनकी ढाल
उधर सजे मोती के थाल
इधर जमे सतजुगी दलाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल
मूँड़ रहे दुनिया-जहान को तीनों बंदर बापू के
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बंदर बापू के
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बंदर बापू के
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बंदर बापू के
गांधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बंदर बापू के
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बंदर बापू के
दिल चटकीला, उजले बाल
नाप चुके हैं गगन विशाल
फूल गए हैं कैसे गाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल
हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बंदर बापू के
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के!

बहुत दिनों के बाद

नागार्जुन

बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर देखी
पकी-सुनहली फ़सलों की मुस्कान
—बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद
अबकी मैं जी भर सुन पाया
धान कूटती किशोरियों की कोकिलकंठी तान
—बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर सूँघे
मौलसिरी के ढेर-ढेर-से ताज़े-टटके फूल
—बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद
अबकी मैं जी भर छू पाया
अपनी गँवई पगडंडी की चंदनवर्णी धूल
—बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर तालमखाना खाया
गन्ने चूसे जी भर
—बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर भोगे
गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भू पर
—बहुत दिनों के बाद

सिके हुए दो भुट्टे

नागार्जुन

सिके हुए दो भुट्टे सामने आए
तबीयत खिल गई
ताज़ा स्वाद मिला दूधिया दानों का
तबीयत खिल गई
दाँतों की मौजूदगी का सुफल मिला
तबीयत खिल गई
अखिलेश ने अपनी मेहनत से
इन पौधों को उगाया था
वार्ड नंबर दस के पीछे की क्यारियों में
वार्ड नंबर दस के आगे की क्यारियों में
ढाई महीने पहले की अखिलेश की खेती
इन दिनों अब जाने किस-किस को पहुँचा रही है सुख
बीसियों जने आज अखिलेश को दुआ दे रहे हैं
सिके हुए भुट्टों का स्वाद ले रहे हैं
डिस्ट्रिक्ट जेल की चहारदीवारियों के अंदर
इन क्यारियों में अखिलेश अब सब्ज़ियाँ उगाएगा
वह किसी मौसम में इन्हें ख़ाली नहीं रहने देगा
श्रम का अपना सु-फल वो
जाने किस-किस को चखाएगा
वो अपना मन ताश और शतरंज में नहीं लगाएगा
हममें से जो बातूनी और कल्पना-प्रवण हैं
वे भी अखिलेश की फलित मेधा का लोहा मानते हैं—
मन ही मन प्रणत हैं वे अखिलेश की उद्यमशीलता के प्रति
पसीना-पसीना हो जाते हैं तरुण
लगाते-लगाते संपूर्ण क्रांति के नारे
फूल-फूल जाती हैं गर्दनों की नसें...
काश वे भी जेल के पिछवाड़े क्यारियों में
कुछ न कुछ उपजा के चले जाएँ
भले, दूसरे ही उनकी उपज के फल पाएँ!

वह दंतुरित मुस्कान (एन.सी. ई.आर.टी)

नागार्जुन

तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कानमृतक में भी डाल देगी जानधूलि-धूसर तुम्हारे ये गात...छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजातपरस पाकर तुम्हारा ही प्राण,पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाणछू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूलबाँस था कि बबूल?तुम मुझे पाए नहीं पहचान?देखते ही रहोगे अनिमेष!थक गए हो?आँख लूँ मैं फेर?क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आजमैं न सकता देखमैं न पाता जानतुम्हारी यह दंतुरित मुस्कानधन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!इन अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्कउँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्कदेखते तुम इधर कनखी मारऔर होतीं जब कि आँखें चारतब तुम्हारी दंतुरित मुस्कानमुझे लगती बड़ी ही छविमान
(2)
फ़सल
एक के नहीं दो के नहीं ढेर सारी नदियों के पानी का जादू :एक के नहीं,दो के नहीं,लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा :एक की नहीं दो की नहीं हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म :फ़सल क्या है?और तो कुछ नहीं है वह नदियों के पानी का जादू जय वह हाथों के स्पर्श की महिमा है भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है रूपांतर है सूरज की किरणों का सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!

वह दंतुरित मुस्कान (एन.सी. ई.आर.टी)

नागार्जुन

तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कानमृतक में भी डाल देगी जानधूलि-धूसर तुम्हारे ये गात...छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजातपरस पाकर तुम्हारा ही प्राण,पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाणछू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूलबाँस था कि बबूल?तुम मुझे पाए नहीं पहचान?देखते ही रहोगे अनिमेष!थक गए हो?आँख लूँ मैं फेर?क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आजमैं न सकता देखमैं न पाता जानतुम्हारी यह दंतुरित मुस्कानधन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!इन अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्कउँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्कदेखते तुम इधर कनखी मारऔर होतीं जब कि आँखें चारतब तुम्हारी दंतुरित मुस्कानमुझे लगती बड़ी ही छविमान
(2)
फ़सल
एक के नहीं दो के नहीं ढेर सारी नदियों के पानी का जादू :एक के नहीं,दो के नहीं,लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा :एक की नहीं दो की नहीं हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म :फ़सल क्या है?और तो कुछ नहीं है वह नदियों के पानी का जादू जय वह हाथों के स्पर्श की महिमा है भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है रूपांतर है सूरज की किरणों का सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!

मेरी भी आभा है इसमें

नागार्जुन

नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें
भीनी-भीनी ख़ुशबूवाले
रंग-बिरंगे
यह जो इतने फूल खिले हैं
कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था
कल इनको मेरे सपनों ने सहलाया था
पकी सुनहली फ़सलों से जो
अबकी यह खलिहान भर गया
मेरी रग-रग के शोणित की बूँदें इसमें मुस्काती हैं
नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखंड आज जो चमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें

फूले कदंब

नागार्जुन

(केवल पढ़ने के लिए)
फूले कदंब
टहनी-टहनी में कंदुक सम झूले कदंब
फूले कदंब।
सावन बीता
बादल का कोप नहीं रीता
जाने कब से तू बरस रहा
ललचाई आँखों से नाहक
जाने कब से तू तरस रहा
मन कहता है,छू ले कदंब
फूले कदंब
फूले कदंब।

बाघ आया उस रात

नागार्जुन

“वो इधर से निकला
उधर चला गया ऽऽ”
वो आँखें फैलाकर
बतला रहा था—
“हाँ बाबा, बाघ आया उस रात,
आप रात को बाहर न निकलो!
जाने कब बाघ फिर से आ जाए!”
“हाँ, वो ही ही ही! वो ही जो
उस झरने के पास रहता है
वहाँ अपन दिन के वक़्त
गए थे न एक रोज़?
बाघ उधर ही तो रहता है
बाबा, उसके दो बच्चे हैं
बाघिन सारा दिन पहरा देती है
बाघ या तो सोता है
या बच्चों से खेलता है...”
दूसरा बालक बोला—
“बाघ कहीं काम नहीं करता
न किसी दफ़्तर में
न कॉलेज में ऽऽ”
छोटू बोला—
“स्कूल में भी नहीं...”
पाँच-साला बेटू ने
हमें फिर से आगाह किया
“अब रात को बाहर होकर बाथरूम न जाना!”

बाघ आया उस रात

नागार्जुन

“वो इधर से निकला
उधर चला गया ऽऽ”
वो आँखें फैलाकर
बतला रहा था—
“हाँ बाबा, बाघ आया उस रात,
आप रात को बाहर न निकलो!
जाने कब बाघ फिर से आ जाए!”
“हाँ, वो ही ही ही! वो ही जो
उस झरने के पास रहता है
वहाँ अपन दिन के वक़्त
गए थे न एक रोज़?
बाघ उधर ही तो रहता है
बाबा, उसके दो बच्चे हैं
बाघिन सारा दिन पहरा देती है
बाघ या तो सोता है
या बच्चों से खेलता है...”
दूसरा बालक बोला—
“बाघ कहीं काम नहीं करता
न किसी दफ़्तर में
न कॉलेज में ऽऽ”
छोटू बोला—
“स्कूल में भी नहीं...”
पाँच-साला बेटू ने
हमें फिर से आगाह किया
“अब रात को बाहर होकर बाथरूम न जाना!”

कल्पना के पुत्र हे भगवान

नागार्जुन

कल्पना के पुत्र हे भगवान
चाहिए मुझको नहीं वरदान
दे सको तो दो मुझे अभिशाप
प्रिय मुझे है जलन, प्रिय संताप
चाहिए मुझको नहीं यह शांति
चाहिए संदेह, उलझन, भ्रांति
रहूँ मैं दिन-रात ही बेचैन
आग बरसाते रहें ये नैन
करूँ मैं उद्दंडता के काम
लूँ न भ्रम से भी तुम्हारा नाम
करूँ जो कुछ, सो निडर, निश्शंक
हो नहीं यमदूत का आतंक
घोर अपराधी-सदृश हो नत बदन निर्वाक
बाप-दादों की तरह रगड़ूँ न मैं निज नाक—
मंदिरों की देहली पर पकड़ दोनों कान
हे हमारी कल्पना के पुत्र, हे भगवान,
युगों से अराधना की, आ गए अब तंग
—झाल और मृदंग
शंख करता आ रहा था युगों से आक्रंद
तुम न पिघले, पड़ गई आवाज़ उसकी मंद
न अब तक सुलझे तुम्हारे बाल
थक गईं लाखों उँगलियाँ, हो गया अतिकाल
अँधेरे में रहे लोग टटोल—
ठोस हो या पोल?
हो गए नीरस तुम्हारी चिंतना में—
व्यस्त होकर तर्क औ’ अनुमान
हे हमारी कल्पना के पुत्र, हे भगवान!
परिधि यह संकीर्ण, इसमें ले न सकते साँस
गले को जकड़े हुए हैं यम-नियम के फाँस
—पुराने आचार और विचार
गगन में नीहारिकाओं को न करने दे रहे
अभिसार
छोड़कर प्रासाद खोजूँ खोह—
कह रहा है पूर्वजों का मोह
ज़ोर देकर कह रहे ये वेद और पुरान
मूल से चिपटे रहो नादान
बनूँ मैं सज्जन, सुशील विनीत
हार को समझा करूँ मैं जीत
क्रोध का अक्रोध से कर अंत
बनूँ मैं आदर्श मानव संत
रह न जाए उष्णता कुछ रक्त में अवशिष्ट
गुरुजनों को भी यही था इष्ट
सड़ गई है आँत
पर दिखाए जा रहे हैं दाँत
छोड़कर संकोच, तजकर लाज
दे रहा है गालियाँ यह जीर्ण-शीर्ण समाज
खोलकर बंधन, मिटाकर नियति के आलेख
लिया मैंने मुक्ति पथ को देख
नदी कर ली पार, उसके बाद
नाव को लेता चलूँ पीठ पर मैं लाद
सामने फैला पड़ा शतरंज-सा संसार
स्वप्न में भी मैं न इसको समझता निरस्सार
इसी में भव, इसी में निर्वाण
इसी में तन-मन, इसी में प्राण
यहीं जड़-जंगम सचेतन औ’ अचेतन जंतु
यहीं ‘हाँ,’ ‘ना’, ‘किंतु’ और ‘परंतु’
यहीं है सुख-दुःख का अवबोध
यहीं हर्ष-विषाद, चिंता-क्रोध
यहीं है संभावना, अनुमान
यहीं स्मृति-विस्मृति सभी का स्थान
छोड़कर इसको कहाँ निस्तार
छोड़कर इसको कहाँ उद्धार
स्वजन-परिजन, इष्ट-मित्र, पड़ोसियों की याद
रहे आती, तुम रहो यों ही वितंडावाद
मूँद आँखें शून्य का ही करूँ मैं तो ध्यान?
कल्पना के पुत्र हे भगवान!

जी हाँ, लिख रहा हूँ...

नागार्जुन

जी हाँ, लिख रहा हूँ...
बहुत कुछ! बहोत-बहोत!!
ढेर-ढेर-सा लिख रहा हूँ!
मगर, आप उसे पढ़ नहीं
पाओगे... देख नहीं सकोगे
उसे आप!
दरअसल बात यह है कि
इन दिनों अपनी लिखावट
आप भी मैं कहाँ पढ़ पाता हूँ
नियोन-राड पर उभरती पंक्तियों की
तरह को अगले ही क्षण
गुम हो जाती है
चेतना के ‘की-बोर्ड’ पर वो बस
दो-चार सेकेंड तक ही
टिकती है...
कभी-कभार ही अपनी इस
लिखावट को काग़ज़ पर
नोट कर पाता हूँ,
स्पंटनशील संवेदन की
क्षण-भंगुर लड़ियाँ
सहेजकर उन्हें और तक
पहुँचाना!
बाप रे, कितना मुश्किल है!
आप तो ‘फ़ोर फ़िंगर’ मासिक—
वेतन बाले उच्च-अधिकारी ठहरे,
मन ही मन तो हँसोगे ही,
कि भला यह भी कोई
काम हुआ, कि अनाप-
शनाप ख़यालों की
महीन लफ़्फ़ाज़ी ही
करता चले कोई—
यह भी कोई काम हुआ भला!

मंत्र कविता

नागार्जुन

ओं शब्द ही ब्रह्म है
ओं शब्द और शब्द और शब्द और शब्द
ओं प्रणव, ओं नाद, ओं मुद्राएँ
ओं वक्तव्य, ओं उद्गार, ओं घोषणाएँ
ओं भाषण...
ओं प्रवचन...
ओं हुंकार, ओं फटकार, ओं शीत्कार
ओं फुसफुस, ओं फुत्कार, ओं चित्कार
ओं आस्फालन, ओं इंगित, ओं इशारे
ओं नारे और नारे और नारे और नारे
ओं सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ
ओं कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं
ओं पत्थर पर की दूब, ख़रगोश के सींग
ओं नमक-तेल-हल्दी-ज़ीरा-हींग
ओं मूस की लेडी, कनेर के पात
ओं डायन की चीख़, औघड़ की अटपट बात
ओं कोयला-इस्पात-पेट्रोल
ओं हमी हम ठोस, बाक़ी सब फूटे ढोल
ओं इदमन्नं, इमा आपः, इदमाज्यं, इद हवि
ओं यजमान, ओं पुरोहित, ओं राजा, ओं कवि:
ओं क्रांतिः क्रांतिः क्रांतिः सर्वग्वं क्रांतिः
ओ शांतिः शांतिः शांतिः सर्वग्वं शांतिः
ओं भ्रांति भ्रांति भ्रांति सर्वग्वं भ्रांतिः
ओं बचाओ बचाओ बचाओ बचाओ
ओं हटाओ हटाओ हटाओ हटाओ
ओं घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ओं निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ
ओं दलों में एक दल अपना दल, ओं
ओं अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीकरण
ओं मुष्टीकरण, तुष्टीकरण, पुष्टीकरण
ओं एतराज़, आक्षेप, अनुशासन
ओं गद्दी पर आजन्म वज़ासन
ओं ट्रिब्युनल ओं आश्वासन
ओं गुट निरपेक्ष सत्तासापेक्ष जोड़तोड़
ओं छल-छंद, ओं मिथ्या, ओं होड़महोड़
ओं बकवास, ओं उद्घाटन
ओं मारण-मोहन-उच्चाटन
ओं काली काली काली महाकाली महाकाली
ओं मार मार मार, वार न जाए ख़ाली
ओं अपनी ख़ुशहाली
ओं दुश्मनों की पामाली
ओं मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार,
ओं अपोज़िशन के मुंड बनें तेरे गले का हार
ओं ऐं हीं वलीं हूँ आड्
ओं हम चबाएँगे तिलक और गांधी की टाँग
ओं बूढ़ें की आँख, छोकरी का काजल
ओं तुलसीदल, बिल्वपत्र, चंदन, रोली, अक्षत, गंगाजल
ओं शेर के दाँत, भालू के नाख़ून, मर्कट का फोता
ओं हमेशा हमेशा हमेशा करेगा राज मेरा पोता
ओं छूः छूः फूः फूः फट फिट फुट
ओं शत्रुओं की छाती पर लोहा कुट
ओं भैरो, भैरो, भैरो, ओं बजरंगबली
ओं बंदूक का टोटा, पिस्तौल की नली
ओं डॉलर, ओं रूबल, ओं पाउंड
ओं साउंड, ओं साउंड, ओं साउंड
ओम् ओम् ओम्
ओम् धरती, धरती, धरती, व्योम् व्योम् व्योम्
ओं अष्टधातुओं की ईंटों के भट्ठे
ओं महामहिम, महामहो, उल्लू के पट्ठे
ओं दुर्गा दुर्गा दुर्गा तारा तारा तारा
ओं इसी पेट के अंदर समा जाए सर्वहारा
हरिः ओं तत्सत् हरिः ओं तत्सत्

महाकवि निराला

नागार्जुन

झाँझ और घड़ियाल बजाते
मर्मज्ञों को ख़ूब खिझाते, ख़ूब लजाते
चरणामृत पीने का अभिनय करते धूर्त-पुजारी
जाने किस-किस राक्षस ने आरती अभी न उतारी
हे औढर औघड़ बंभोला
परम प्रबुद्ध महाकवि
हे ममतामय पिता, सनेही सखा
अकारण बंधु
सिद्ध आचार्य
वे ही तुमको पागल कहते जो हैं दुष्ट अनार्य
प्रगतिशील मानवता के हो सूझ-बूझ तुम
पाखंडों से रहे जूझ तुम
प्रपितामह तुम नए-नए पौधों के
तुम उपादान कारण मानस पौधों के
महामहिम, शुभमूर्ति, यशोधन
तुम से ही पाते आए हैं हम उद्बोधन
प्रतिभा की यह कली खिली है
तुम से ही चेतना मिली है
जय लोकोत्तर! जय युगद्रष्टा! कवि-कुलगुरु भीम ललाम!
जनयुग का यह रिक्त हस्त कवि सादर करता तुम्हें प्रणाम!
हाय रे हाय!
तुम्हारी चर्चा भी बन रही आज व्यवसाय
महाप्राण, जबरन तुमको गेरुआ पहनाकर
धूप-दीप-नैवेद्य सजाकर
हम दुनिया को ठगें, मगर धोखे में तुमको डाल नहीं सकते हैं
महाकाल के वज्र कंठ को फोड़-फाड़कर
गिरा तुम्हारी गूँज रही है :
“खुला भेद, विजयी कहाए हुए जो
लहू दूसरों का पिए जा रहे हैं...”
क्या कारण है?
हँसते हो तुम खिल-खिल-खिल
खः खः खाह-खाह-खा
क्या कारण है?
रोते हो तुम बहा-बहाकर आँसू
बुक्का फाड़-फाड़कर
क्या कारण है?
बोल रहे हो बिड़-बिड़-बिड़-बिड़
उठा-उठा तर्जनी न जाने किसे शून्य में डाँट रहे हो?
फाड़-फाड़कर आँखें, भौंहें कुंचित करके
अँग्रेजी में, बंगला में, या संस्कृत में ललकार रहे हो
किस दानव को?
माँग रहे किससे हिसाब, क़ैफ़ियत तलब किससे करते हो?
—हँसते हो तुम उन मूर्खों पर
जो युग की गति के मुड़ने का स्वप्न देखते!
—डाँट रहे शोषक समाज को
बुद्धि विमल है, प्रखर चेतना
स्फीत धारणा-शक्ति
याद रहती बातें
उत्तर देते हो पत्रों के
पाँच सात दस बीस तीस चालीस रुपैया
आए दिन ‘मनिआर्डर’ भेजा करते हो
एक-एक कूपन सँभाल रक्खा है तुमने!

चंदू, मैंने सपना देखा

नागार्जुन

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेक़ाबू
चंदू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, ख़ूब पतंगें लूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो
चंदू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डॉक्टर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलैंडर

प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है

नागार्जुन

नफ़रत की अपनी भट्ठी में
तुम्हें गलाने की कोशिश ही
मेरे अंदर बार-बार ताक़त भरती है
प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है अपने ऋषि का,
वियेत्कांग के तरुण गुरिल्लें जो करते थे
मेरी प्रिया नहीं करती है...
नव-दुर्वासा, शबर-पुत्र मैं, शबर-पितामह
सभी रसों को गला-गला कर
अभिनव द्रव तैयार करूँगा
महासिद्ध मैं, मैं नागार्जुन
अष्ट धातुओं के चूरे की छाई में मैं फूँक मारूँगा
देखोगे, सौ बार मरूँगा
देखोगे, सौ बार जिऊँगा
हिंसा मुझसे थर्राएगी
मैं तो उसका ख़ून पिऊँगा
प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है मेरे कवि का
जन-जन में जो ऊर्जा भर दे, उद्गाता हूँ उस रवि का

खटमल

नागार्जुन

उमड़ उमड़ आए खटमल
मैं जागा सारी रात
बिस्तर क्या था, जंगल था,
मैं भागा सारी रात
ख़ून खींचता रहा रगों से
आगा सारी रात
अस्पताल में यों हम बैठे
नागा सारी रात
अभी-अभी मारा, फिर कैसे
निकला यह पाताल से
तरुण गुरिल्ला मात खा गए
शिशु खटमल की चाल से
रात्रि-जागरण-दिन की निद्रा
चिपके मेरे भाल से
यम की नानी डरती होगी
खटमल के कंकाल से
निकल आया फिर कहाँ से
खटमलों का यह हजूम
मैं ज़रा जाता हूँ बाहर
मैं ज़रा आता हूँ घूम
रक्त बीजों की फ़सल को
मौत क्या सकती है चूम
मगर बाहर मच्छरों ने भी मचा रक्खी है धूम
हम भी भागे, छिपकलियाँ भी भागीं सारी रात
हम भी जागे, छिपकलियाँ भी जागीं सारी रात
जीत गई छिपकलियाँ, लेकिन हमने मानी हार
अपने बूते सौ पचास भी मच्छर सके न मार
जीत गईं छिपकलियाँ, लेकिन हमने मानी हार
अपने बूते सौ पचास भी खटमल सके न मार

मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा

नागार्जुन

मैं
मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा
करेंगे वे मुझे नीलाम
कोई चतुर ताँगावाला
ले जाएगा मुझे
चढ़ा देगा आँखों के किनारे
रंगीन आवरण
और कहता रहेगा :
सामने चल बेटा
सामने चल...
सामने...

गांधी

नागार्जुन

कल मैंने तुमको फिर देखा
हे खर्वकाय, हे कृश शरीर,
हे महापुरुष, हे महावीर!
हाँ, लगभग ग्यारह साल बाद
कल मैंने तुमको फिर देखा
हे देव तुम्हारे दर्शन को
कल जुटे आदमी दस हज़ार!
उस संघशक्ति को श्रद्धा से
दोनों हाथों को जोड़ किया
तुमने ही पहले नमस्कार,
फिर नन्हीं-सी तर्जनी दिखा,
उद्वेल जलधि-सी जनता को
क्षण-भर में तुमने किया शांत!
घर हो, बाहर हो, कारा हो
लाचारी हो, बीमारी हो
सत्याग्रह की तैयारी हो
बंबई हो कि या लंदन हो
हो क्षुद्र गाँव या महानगर
कुछ भी हो, कैसी भी स्थिति हो,
तुम सुबह-शाम
उस परमपिता परमेश्वर की प्रार्थना नित्य—
करते आए हो जीवन भर,
दो-चार और दस-बीस जने
शामिल हो जाते हैं उसमें।
पर कभी-कभी दस-दस पंद्रह-पंद्रह हज़ार
यह सहस-शीश यह सहस-बाहु
जनता भी शामिल होती है।
कल मुझे लगा ऐसा कि, नहीं—
उस परमपिता परमेश्वर की प्रार्थना हेतु;
पर, दरस तुम्हारा पाने को
एकत्रित होती है जनता
उद्वेलित सागर-सी अधरी,
हे खर्वकाय, हे कृश शरीर!
जय रघुपति राघव राम राम!
बिस्मिल्ला हिर्रहमाने रहीम!
प्रार्थना सुनी, देखी नमाज़
फिर भी जनता ज्यों की त्यों थी
उद्वेलित सागर-सी अधीर!
तुम लगे बोलने तब जाकर वह हुई शांत!
देखा तुमको भर-आँख और भर-कान सुना,
कुछ तृप्ति हुई, कुछ शांति मिली;
बोले तुम केवल पाँच मिनट!
चुप रहे आदमी दस हज़ार, बस पाँच मिनट!
तुम चले गए, जनता उठकर बन गई भीड़
उच्छृंखल सागर-सी अधीर
फिर धन भर में सब बिखर गए
कुछ इधर गए, कुछ उधर गए
देखा बिड़ला की कोठी का वह महाद्वार
तैनात वहाँ थी स्वयंसेवकों की क़तार
हे धनकुबेर के अतिथि...नहीं, हे जननायक!
कल तेरे दर्शन के निमित्त
थे जुटे आदमी दस हज़ार
इस दुखी देश के हे फ़क़ीर,
हे खर्वकाय, हे कृश शरीर!
जिस सागर का मैं एक बिंदु
तुम उसकी तरंगों का करने आए हो प्रतिनिधित्व
यद्यपि ख़ुद भी तुम बिंदुमात्र
यद्यपि ख़ुद भी तुम व्यक्तिमात्र
फिर भी लाखों जन से पाकर प्रेरणा बने हो महाप्राण
हे खर्वकाय, हे कृश शरीर!
संध्या को साढ़े सात बजे
कल तेरे दर्शन के निमित्त जुटे थे दस हज़ार
मैं उनमें था : तुमको देखा
फिर लगभग ग्यारह साल बाद।

भारतेंदु

नागार्जुन

सरल स्वभाव सदैव, सुधीजन संकटमोचन
व्यंग्य बाण के धनी, रूढ़ि-राच्छसी निसूदन
अपने युग की कला और संस्कृति के लोचन
फूँक गए हो पुतले-पुतले में नव-जीवन
हो गए जन्म के सौ बरस, तउ अंततः नवीन हो!
सुरपुरवासी हरिचंद जू, परम प्रबुद्ध प्रवीन हो!
दोनों हाथ उलीच संपदा बने दलीदर
सिंह, तुम्हारी चर्चा सुन चिढ़ते थे गीदर
धनिक वंश में जनम लिया, कुल कलुख धो गए
निज करनी-कथनी के बल भारतेंदु हो गए
जो कुछ भी जब तुमने कहा, कहा बूझकर जानकर!
प्रियवर, जनमन के बने गए, जन-जन को गुरु मानकर!
बाहर निकले तोड़ दुर्ग दरबारीपन का
हुआ नहीं परिताप कभी फूँके कंचन का
राजा थे, बन गए रंक दुख बाँट जगत का
रत्ती भर भी मोह न था झूठी इज़्ज़त का
चौंतीस साल की आयु पा, चिरजीवी तुम हो गए!
कर सदुपयोग धन-माल का, वर्ग-दोष निज धो गए!
अभिमानी के नगद दामाद, सुजन जन-प्यारे
दुष्टों को तो शर तुमने कस-कस के मारे
ऑफ़िसरों की नुक़्ताचीनी करने वाले
जड़ न सका कोई भी तेरे मुँह पर ताले
तुम सत्य प्रकट करते रहे बिना झिझक बिना सोचना
हमने सीखी अब तक नहीं तुलित तीव्र आलोचना
सर्व-सधारन जनता थी आँखों का तारा
उच्चवर्ग तक सीमित था भारत न तुम्हारा
हिंदी की है असली रीढ़ गँवारू बोली
यह उत्तम भावना तुम्हीं ने हम में घोली
बहुजन हित में ही दी लगा, तुमने निज प्रतिमा प्रखर!
हे सरल लोक साहित्य के निर्माता पंडित प्रवर !
हे जनकवि सिरमौर सहज भाखा लिखवइया
तुम्हें नहीं पहचान सकेंगे बाबू-भइया
तुम-सी ज़िंदादिली कहाँ से वे लावेंगे
कहाँ तुम्हारी सूझ-बूझ वे सब पावेंगे
उनकी तो है बस एक रट : भाषा संस्कृतनिष्ठ हो!
तुम अनुक्रमणिका ही लिखो यदपि अति सुगम लिस्ट हो !
जिन पर तुम थूका करते थे साँझ-सकारे
उन्हें आजकल प्यार कर रहे प्रभु हमारे
भाव उन्हीं का, ढब उनका, उनकी ही बोली
दिल्ली के देवता, फिरंगिन के हमजोली
सुनना ही पंद्रह साल तक अंग्रेज़ी बकवास है
तन भर अजाद हरिचंद जू, मन गोरन कौ दास है
कामनवेल्थी महाभँवर में फँसी बेचारी
बिलख रही है रह-रह भारतमाता प्यारी
यह अशोक का चक्र, इसे क्या देगा धोखा
एक-एक कर लेगी, सबका लेखा जोखा
जब व्यक्ति-व्यक्ति के चित्त से मिट जाएगी दीनता
माँ हुलसेगी खुलकर तभी लख अपनी स्वाधीनता
दूइ सेर कंकड़ पिसता फी मन पिसान में
घुस बइठा है कलिजुग राशन की दुकान में
लगती है कंट्रोल कभी, फिर खुल जाती है
कपड़ों पर से पहली कीमत धुल जाती है
बनिये तो यही मना रहे; विश्व युद्ध फिर हो शुरू
फिर लखपति कोटीश्वर बने; कुछ चेहरे हों सुर्ख़रू!
गया यूनियन जैक, तिरंगे के दिन आए
चालाकों ने खद्दर के कपड़े बनवाए
टोप झुका टोपी की इज़्ज़त बढ़ी सौगुनी
माल मारती नेतन की औलाद औगुनी
हम जैसे तुक्कड़ राति-दिन कलम रगड़ि मर जाएँगे
तो भी शायद ही पेट भर अन्न कदाचित पाएँगे
वही रंग है वही ढंग है वही चाल है
वही सूझ है वही समझ है वही हाल है
बुद्धिवाद पर दंडनीति शासन करती है
मूर्च्छित हैं हल बैल और भूखी धरती है
इस आज़ादी का क्या करें बिना भूमि के खेतिहर?
हो असर भला किस बात का बिन बोनस मजदूर पर?
लाटवाट का पता नहीं अब प्रेसिडेंट है
अपने ही बाबू भइया की गवर्मेंट है
चावल रुपए सेर, सेर ही भाजी भाजा
नगरी है अंधेर और चौपट है राजा
एक जोंक वर्ग को छोड़ कर सब पर स्याही छा रही
दुर्दशा देखकर देश की याद तुम्हारी आ रही
बड़े-बड़े गुनमंत धँस रहे प्रगट पंक में
महाशंख अब बदल गए हैं हड़ा शंख में
प्रजातंत्र में बुरा हाल है काम काज का
निकल रहा है रोज जनाज़ा रामराज का
प्रिय भारतेंदु बाबू कहो, चुप रहते किस भाँति तुम
हैं चले जा रहे सूखते बिना खिले ही जब कुसुम?
प्रभुपद पूजैं पहिरि-पहिरि जो उजली खादी
वे ही पा सकते हैं स्वतंत्रता की परसादी
हम तो भल्हू देस दसा के पीछे पागल
महँगी-बाढ़-महामारी मइया के छागल
है शहर जहल-दामुल सरिस निपट नरक सम गाँव है
अति कस्ट अन्न का वस्त्र का नहीं ठौर ना ठाँव है
पेट काट कर सूट-बूट की लाज निबाहैं
पिन से खोदैं दाँत, बचावैं कहीं निगाहैं
दिल दिमाग़ का सत निचोड़ कर होम कर रहे
पढ़ुआ बाबू दफ़्तर में बेमौत मर रहे
अति महँगाई के कारण जीना जिन्हें हराम है
उनकी दुर्गति का क्या कहूँ जिनका मालिक राम है
संपादकगन बेबस करै गुमस्तागीरी
जदपि पेट भर खाएँ न बस फाँकैं पनजीरी
बढ़ा-चढ़ा तउ अखबारन का कारबार है
पाँती-पाँती में पूँजीवादी प्रचार है
क्या तुमने सोचा था कभी; काले-गोरे प्रेसपति
भोले पाठक समुदाय की हर लेंगे मति और गति
अंडा देती है सिनेट की छत पर चींटी
ढूह ईंट-पत्थर की, कह लो यूनिवर्सिटी
तिमिर-तोम से जूझ रहा मानव का पौधा
ज्ञान-दान भी आज बन गया कौरी सौदा
हे भारतेंदु, तुम ही कहो, संकट को कैसे तरे?
औसत दर्जे के बाप को कुछ न सूझता क्या करे?
टके-टके बिक रहा जहाँ पर गीतकार है
बाक़ी सिरिफ़ सिनेमाघर में जहाँ प्यार है
कवि विरक्त बन फाँकि रहे चित्त चैतन चूरन
शिक्षक को भूखा रखता परमातम पूरन
अब वहाँ रोष है रंज है, जहाँ नेह सरिता बही
लो-प्रेम जोगनी आजकल अन्न-जोगनी हो रही
दीन दुखी मैं लिए चार प्रानिन की चिंता
बेबस सुनता महाकाल की धा धा धिनता
रीते हाथों से कैसे मैं भगति जताऊँ
किस प्रकार मैं अपने हिय का दरद बताऊँ
लो आज तुम्हारी याद में लेता हूँ मैं यह सपथ
अपने को बेचूँगा नहीं चाहे दुख झेलूँ अकथ
मैं न अकेला, कोटि-कोटि हैं मुझ जैसे तो
सबको ही अपना-अपना दुख है वैसे तो
पर दुनिया को नरक नहीं रहने देंगे हम
कर परास्त छलियों को, अमृत छीनेंगे हम
सब परेशान हैं, तंग हैं सभी आज नाराज हैं
हे भारतेंदु तुम जान लो, विद्रोही सब आज हैं
जय फक्कड़ सिरताज, जयति हिंदी निर्माता !
जय कवि-कुल गुरू! जयति जयति चेतना प्रदाता !
क्लेश और संघर्ष छोड़ दिखलावें क्या छवि—
दीन दुखी दुर्बल दरिद्र हम भारत के कवि!
जो बना निवेदन कर दिया, काँटे थे कुछ, शूल कुछ !
नीरस कवि ने अर्पित किए लो श्रद्धा के फूल कुछ!

ओ जन-मन के सजग चितेरे

नागार्जुन

हँसते-हँसते, बातें करते
कैसे हम चढ़ गए धड़ाधड़
बंबेश्वर के सुभग शिखर पर
मुन्ना रह-रह लगा ठोकने
तो टुनटुनिया पत्थर बोला—
हम तो हैं फ़ौलाद, समझना हमें न तुम मामूली पत्थर
नीचे है बुंदेलखंड की रत्न-प्रसविनी भूमि
शीश पर गगन तना है नील मुकुट-सा
नाहक़ नहीं हमें तुम छेड़ो…
फिर मुन्ना कैमरा खोलकर
उन चट्टानों पर बैठे हम दोनों की छवियाँ उतारता रहा देर तक
नीचे देखा :
तलहटियों में
छतों और खपरैलों वाली
सादी-उजली लिपी-पुती दीवारोंवाली
सुंदर नगरी बिछी हुई है
उजले पालों वाली नौकाओं से शोभित
श्याम-सलिल सरवर है बाँदा
नीलम की घाटी में उजला श्वेत कमल-कानन है बाँदा!
अपनी इन आँखों पर मुझको
मुश्किल से विश्वास हुआ था
मुँह से सहसा निकल पड़ा—
क्या सचमुच बाँदा इतना सुंदर हो सकता है
यू.पी. का वह पिछड़ा टाउन कहाँ हो गया ग़ायब सहसा
बाँदा नहीं, अरे यह तो गंधर्व नगर है…
उतरे तो फिर वही शहर सामने आ गया!
अधकच्ची दीवारोंवाली खपरैलों की ही बहार थी
सड़कें तो थीं तंग किंतु जनता उदार थी
बरस रही थी मुस्कानों से विवश ग़रीबी
मुझे दिखाई पड़ी दुर्दशा ही चिरजीवी
ओ जन-मन के सजग चितेरे
साथ लगाए हम दोनों ने बाँदा के पच्चीसों फेरे
जनसंस्कृति का प्राणकेंद्र पुस्तकागार वह
वयोवृद्ध मुंशी जी से जो मिला प्यार वह
केन नदी का जल-प्रवाह, पोखर नवाब का
वृद्ध सूर्य के चंचल शिशु भास्वर छायानट
सांध्य घनों की सतरंगी छवियों का जमघट
रॉड ज्योति से भूरि-भूरि आलोकित स्टेशन
वहीं पास में भिखमंगों का चिर-अधिवेशन
काग़ज़ के फूलों पर ठिठकी हुई निगाहें
बसें छबीली, धूल भरी वे कच्ची राहें
द्वारपाल-सा जाने कब से नीम खड़ा था
ताऊजी थे बड़े कि जाने वही बड़ा था
नेह-छोह की देवी, ममता की वह मूरत
भूलूँगा मैं भला बहूजी की वह सूरत?
मुन्नू की मुस्कानों का प्यासा बेचारा
चिकना-काला मखमल का वह बटुआ प्यारा
जी, रमेश थे मुझे ले गए केन नहाने
भूल गया उस दिन दतुअन करना क्यों जाने
शिष्य तुम्हारे शब्द-शिकारी
तरुण-युगल इक़बाल-मुरारी!
ऊँचे-ऊँचे उड़ती प्रतिभा थी कि परी थी
मेरी ख़ातिर उनमें कितनी ललक भरी थी
रह-रह मुझको याद आ रहे मुन्ना दोनों
तरुणाई के ताज़ा टाइप थे वे मोनो
बाहर-भीतर के वे आँगन
फले पपीतों की वह बगिया
गोल बाँधकर सबका वह ‘दुखमोचन’ सुनना
कड़ी धूप, फिर बूँदाबाँदी
फिर शशि का बरसाना चाँदी…
चितकबरी चाँदनी नीम की छतनारी डालों से
छन-छन कर आती थी
आसमान था साफ़, टहलने निकल पड़े हम
मैं बोला : केदार, तुम्हारे बाल पक गए!
‘चिंताओं की घनी भाफ में सीझे जाते हैं बेचारे’—
तुमने कहा, सुनो नागार्जुन,
दुख-दुविधा की प्रबल आँच में
जब दिमाग़ ही उबल रहा हो
तो बालों का कालापन क्या कम मखौल है?
ठिठक गया मैं, तुम्हें देखने लगा ग़ौर से…
गौर-गेहुँआ मुख-मंडल चाँदनी रात में चमक रहा था
फैली-फैली आँखों में युग दमक रहा था
लगा सोचने—
तुम्हें भला क्या पहचानेंगे बाँदावाले!
तुम्हें भला क्या पहचानेंगे साहब काले!
तुम्हें भला क्या पहचानेंगे आम मुवक्किल!
तुम्हें भला क्या पहचानेंगे शासन की नाकों पर के तिल!
तुम्हें भला क्या पहचानेंगे ज़िला अदालत के वे हाकिम!
तुम्हें भला क्या पहचानेंगे मात्र पेट के बने हुए हैं जो कि मुलाज़िम!
प्यारे भाई, मैंने तुमको पहचाना है
समझा-बुझा है, जाना है…
केन कूल की काली मिट्टी, वह भी तुम हो!
कालिंजर का चौड़ा सीना, वह भी तुम हो!
ग्रामवधू की दबी हुई कजरारी चितवन, वह भी तुम हो!
कुपित कृषक की टेढ़ी भौंहें, वह भी तुम हो!
खड़ी सुनहली फ़सलों की छवि-छटा निराली, वह भी तुम हो!
लाठी लेकर कालरात्रि में करता जो उनकी रखवाली वह भी तुम हो!
जनगण-मन के जाग्रत शिल्पी,
तुम धरती के पुत्र : गगन के तुम जामाता!
नक्षत्रों के स्वजन कुटुंबी, सगे बंधु तुम नद-नदियों के!
झरी ऋचा पर ऋचा तुम्हारे सबल कंठ से
स्वर-लहरी पर थिरक रही है युग की गंगा
अजी, तुम्हारी शब्द-शक्ति ने बाँध लिया है भुवनदीप कवि नेरूदा को
मैं बड़भागी, क्योंकि प्राप्त है मुझे तुम्हारा
निश्छल-निर्मल भाईचारा
मैं बड़भागी, तुम जैसे कल्याण मित्र का जिसे सहारा
मैं बड़भागी, क्योंकि चार दिन बुंदेलों के साथ रहा हूँ
मैं बड़भागी, क्योंकि केन की लहरों कुछ देर बहा हूँ
बड़भागी हूँ, बाँट दिया करते हो हर्ष-विषाद
बड़भागी हूँ, बार-बार करते रहते हो याद

सुबह-सुबह

नागार्जुन

सुबह-सुबह
तालाब के दो फेरे लगाए
सुबह-सुबह
रात्रि शेष की भीगी दूबों पर
नंगे पाँव चहलक़दमी की
सुबह-सुबह
हाथ-पैर ठिठुरे, सुन्न हुए
माघ की कड़ी सर्दी के मारे
सुबह-सुबह
अधसूखी पत्तियों का कौड़ा तापा
आम के कच्चे पत्तों का
जलता, कड़ुवा कसैला सौरभ लिया
सुबह-सुबह
गँवई अलाव के निकट
घेरे में बैठने बतियाने का सुख लूटा
सुबह-सुबह
आंचलिक बोलियों का मिक्स्चर
कानों की इन कटोरियों में भरकर लौटा
सुबह-सुबह

रहा उनके बीच मैं

नागार्जुन

रहा उनके बीच मैं!
था पतित मैं, नीच मैं
दूर जाकर गिरा, बेबस उड़ा पतझड़ में
धँस गया आकंठ कीचड़ में
सड़ी लाशें मिलीं
उनके मध्य लेटा रहा आँखें मीच, मैं
उठा भी तो झाड़ आया नुककड़ों पर स्पीच, मैं!
रहा उनके बीच मैं!
था पतित मैं, नीच मैं!!

तन गई रीढ़

नागार्जुन

झुकी पीठ को मिला
किसी हथेली का स्पर्श
तन गई रीढ़
महसूस हुई कंधों को
पीछे से,
किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें
तन गई रीढ़
कौंधी कहीं चितवन
रँग गए कहीं किसी के होंठ
निगाहों के ज़रिए जादू घुसा अंदर
तन गई रीढ़
गूँजी कहीं खिलखिलाहट
टूक-टूक होकर छितराया सन्नाटा
भर गए कर्णकुहर
तन गई रीढ़
आगे से आया
अलकों के तैलाक्त परिमल का झोंका
रग-रग में दौड़ गई बिजली
तन गई रीढ़

रवि ठाकुर!

नागार्जुन

रुन झुन रुन झुन
सुने थे तुमने
भगवती वीणापाणि शारदा के नूपुर
विश्ववंद्य भारतीय महाकवि ठाकुर!
पाया था अनुपम प्रतिभा का अवदान
यहाँ से, वहाँ से,
जाने कहाँ-कहाँ से,
धन्य तुम पुरुषोत्तम!!
लाँघकर मरु, गिरि, जल और जंगल
युग-युग तक गुँजाते रहेंगे भू-तल
तुम्हारे ये दिव्यगान।
चलता रहेगा अबाधित गति से
दिशा-विदिशा सभी को मुखरित करता हुआ
वृत्तांत के बंकिम पथ पर विचरता हुआ
तुम्हारा यह कालनेमि अद्भुत महायान।
हुए थे पैदा तुम
सुशिक्षित अभिजात धनाढ्य द्विज कुल में
सभी ओर सुख था
सभी ओर सुविधा
परिचर्या के लिए प्रतिपल तत्पर—
सेवक सेविकागण रहते थे घेरे
दिन में, रात में, साँझ में, सबेरे
नहीं खाई होगी अभाव की मार कभी
मालूम न पड़ा होगा संसार असार कभी
साधन थे प्रस्तुत, फिर न हुए क्यों तुम
अकर्मण्य, आलसी, विलासी, भू-भारमात्र?
अहे कनक-कमनीय गात्र!
कवि के रूप में हो गए विकसित कैसे तुम अचानक?
बाह्य आडंबर उतना भयानक!!
गला क्यों न घोट सका
तुम्हारे महामानव का?
कहाँ से मिली तुम्हें इतनी अनुभूतियाँ
पीड़ित मनुष्य के निम्नतम स्तर की?
बात यदि करते तुम केवल ऊपर की—
अपने उच्च वर्ग की, अपने आडंबर की—
तो भी क्या हानि थी!
तुम्हारा गुणगान मैं भला क्या करूँ
न उतना देखा है, न सुना है उतना
पैदा हुआ था मैं—
दीन-हीन अपठित किसी कृषक-कुल में
आ रहा हूँ पीता अभाव का आसव ठेठ बचपन से
कवि! मैं रूपक हूँ दबी हुई दूब का
हरा हुआ नहीं कि चरने को दौड़ते!!
जीवन गुज़रता प्रतिपल संघर्ष में!!
मुझको भी मिली है प्रतिभा की प्रसादी
मुझसे भी शोभित है प्रकृति का अंचल
पर न हुआ मान कभी!
किया न अनुमान कभी!
तुंगभद्र! महानाम!—
तुम्हारा यश-सागर असीम लहरा रहा
अग-जग में भू पर!!
तुम्हारी गुरुता का ध्वजपट
फहरा रहा हिमगिरि के ऊपर!!
मेरा क्षुद्र व्यक्तित्व
रुद्ध है, सीमित है—
आटा-दाल-नमक-लकड़ी के जुगाड़ में!
पत्नी और पुत्र में!
सेठ के हुकुम में!
क़लम ही मेरा हल है, कुदाल है!!
बहुत बुरा हाल है!!!
करूँ मैं किस वर्ग में गिनती अपनी!
लेखक ही बना रहूँ!
पकड़ लूँ वह पेशा—
बाप-दादा करते आए जो हमेशा?
नहीं, नहीं, ऐसा नहीं।
आशीष दो मुझको—मन मेरा स्थिर हो!!
नहीं लौटूँ, चीर चलूँ, कैसा भी तिमिर हो!!
प्रलोभन में पड़ कर बदलूँ नहीं रुख
रहूँ साथ सबके, भोगूँ साथ सुख-दुख।
गुरुदेव मेरे!
दाढ़ी यह तुम्हारी सन-सी सफ़ेद है—
चाचा करीम और तुममें क्या भेद है?
तुम भी शुकनास, वह भी शुकनास
(किंतु तुम श्रीनिवास!)
अभी भी फुर्ती से कपड़ा वह बुनता है
सुनता हूँ, अब तक तुम भी रहे
बुनते किरणों की जाली!!
देखते-देखते समता के सपने
कर गए खतम खेल तुम अपने
सौंप गए हमको सारी विश्वभारती
आज नहीं तो कल उतारेंगे आरती
अभी तो अकिंचन है विकल है, जनगण दुर्लभ है अन्नकण
मैं भी अकिंचन मैं भी विकल हूँ
आवेश में आकर बहुत कुछ कह गया
पितामह, क्षमा करो!
मेरी यह धृष्टता, कटुता, उद्दंडता—
क्षमा करो, पितामह!!
रुन झुन रुन झुन सुने थे तुमने—
भगवती वीणापाणि शारदा के नुपूर!
विश्ववंद्य भारतीय महाकवि ठाकुर!!

पथरीला शिल्प

नागार्जुन

उन्नीसवीं शताब्दी की
कुलीन बुर्ज़ुआ के
सुसज्जित बगीचे वाले कोठी के
विशाल बरामदे में
पंक्तिबद्ध वे नग्न प्रतिमाएँ
कितनी मनोरम
कितना अपरूप
मैं मूर्ख
मैं अभागा
मैं बहुत बड़ा गधा
इसीलिए तो अब तक नहीं जानता
उस पथरीली शिल्प सृष्टि समुच्चय के
आदि स्रष्टा का नाम!
मेरे अग्रज
काव्य रसिक श्री श्री बालकृष्ण व्यास महानुभाव से
अभी सुना है
वह इस इतालवी कलाकृतियों के
हैं चरम निर्देशन
जबकि शलभ श्री रामसिंह
एवं शंकर माहेश्वरी के मतानुसार
वह सब फ्रेंच मूर्ति शिल्प के
चरम प्रतिफलन हैं
जी, क्या सोच रहा हूँ मैं
क्या बताऊँ...
एकदम बन गया मूक मैं तो
जबकि स्वीकारना ही है
प्रभाव
प्रत्येक सुबह
परिक्रमा करता हूँ अकेले-अकेले
उस बगीचेवाली
कोठी की
खुली आँखों से देखता हूँ
उन नग्न प्रतिमाओं का सौंदर्य
इस बूढ़े मन-प्राण को
बहुत भाते हैं!

प्रतिबद्ध

नागार्जुन

प्रतिबद्ध हूँ
संबद्ध हूँ
आबद्ध हूँ
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ—
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त...
संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ...
अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया-धसान’ के ख़िलाफ़…
अंध-बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए...
अपने आपको भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने की ख़ातिर...
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ!
संबद्ध हूँ, जी हाँ, संबद्ध हूँ—
सचर-अचर सृष्टि से…
शीत से, ताप से, धूप से, ओस से, हिमपात से…
राग से, द्वेष से, क्रोध से, घृणा से, हर्ष से, शोक से, उमंग से, आक्रोश से...
निश्चय-अनिश्चय से, संशय-भ्रम से, क्रम से, व्यतिक्रम से…
निष्ठा-अनिष्ठा से, आस्था-अनास्था से, संकल्प-विकल्प से…
जीवन से, मृत्यु से, नाश-निर्माण से, शाप-वरदान से...
उत्थान से, पतन से, प्रकाश से, तिमिर से...
दंभ से, मान से, अणु से, महान से…
लघु-लघुतर-लघुतम से, महा-महाविशाल से…
पल-अनुपल से, काल-महाकाल से…
पृथ्वी-पाताल से, ग्रह-उपग्रह से, निहारिका-जल से...
रिक्त से, शून्य से, व्याप्ति-अव्याप्ति-महाव्याप्ति से…
अथ से, इति से, अस्ति से, नास्ति से…
सबसे और किसी से नहीं
और जाने किस-किस से...
संबद्ध हूँ, जी हाँ, शतदा संबद्ध हूँ।
रूप-रस-गंध और स्पर्श से, शब्द से...
नाद से, ध्वनि से, स्वर से, इंगित-आकृति से...
सच से, झूठ से, दोनों की मिलावट से...
विधि से, निषेध से, पुण्य से, पाप से...
उज्ज्वल से, मलिन से, लाभ से, हानि से...
गति से, अगति से, प्रगति से, दुर्गति से…
यश से, कलंक से, नाम-दुर्नाम से…
संबद्ध हूँ, जी हाँ, शतदा संबद्ध हूँ!
आबद्ध हूँ, जी हाँ, आबद्ध हूँ—
स्वजन-परिजन के प्यार की डोर में…
प्रियजन के पलकों की कोर में…
सपनीली रातों की भोर में…
बहुरूपा कल्पना रानी के आलिंगन-पाश में…
तीसरी-चौथी पीढ़ियों के दंतुरित शिशु-सुलभ हास में…
लाख-लाख मुखड़ों के तरुण हुलास में…
आबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा आबद्ध हूँ!

ऋतु-संधि

नागार्जुन

प्रतीक्षा की
बहुत जोही बाट
जेठ बीता, हुई वर्षा नहीं, नभ यों ही रहा खल्वाट
आज है आषाढ़ वदि षष्ठी
उठा था ज़ोर का तूफ़ान
उसके बाद
सघन काली घन घटा से
हो रहा आच्छन्न यह आकाश
आज होगी, सजनि, वर्षा—हो रहा विश्वास
हो रही है अवनि पुलकित, ले रही निःश्वास
किंतु अपने देश में तो
सुमुखि, वर्षा हुई होगी एक क्या, कै बार
गा रहे होंगे मुदित हो लोग ख़ूब मलार
भर गई होगी अरे वाह वाग्मती की धार
उगे होंगे पोखरों में कुमुद पद्म मखान
आँख मूँदे कर रहा मैं ध्यान
लिखूँ क्या प्रेयसि, यहाँ का हाल
सामने ही बह रही भागीरथी, बस यही है कल्याण
जिस किसी भी भाँति गर्मी से बचे हैं प्राण
आज उमड़ी घन घटा को देख
मन यही करता कि मैं भी, प्रियतमे, उसका करूँ आह्वान
—कालिदास समान
सामने सरपट पड़ा मैदान
है न हरियाली किसी भी ओर
तृण-लता तरुहीन
नग्न प्रांतर देख
उठ रहा सिर में बड़ा ही दर्द
हरा धुँधला या कि नीला—
आ रहा चश्मा न कोई काम
किंतु मुझको हो रहा विश्वास
यहाँ भी बादल बरसने जा रहा है आज
अब न सिर में उठेगा फिर दर्द
लग रहा था आज प्रातःकाल पानी सर्द
गंगा नहाने वक़्त
आया ख़्याल
हिमालय में गल रही है बर्फ़ :
आज होगा ग्रीष्म ऋतु का अंत।

सौदा

नागार्जुन

चार बीड़ा पान थमाकर बोले मिस्टर ओसवाल :
बिज़नेस बिज़नेस है!
एमोशनल होने से चलता नहीं काम
जाइए, अभी आप कीजिए आराम...
घिसे हुए रिकार्ड की थर्राती ध्वनि में
बोला आख़िर मैं भी :
ठीक ही तो फ़रमाते हैं आप
मार्केट डल् है जेनरल बुक्स का
चारों ओर स्लंपिंग है; मगर! मगर, दो साल हो गए
बेटा जकड़ा है बोन-टीबी की गिरफ़्त में
पचास ठो रुपइया और दीजिएगा
बत्तीस ग्राम स्टप्टोमाइसिन कम नहीं होता है
जैसा मेरा वैसा आपका
लड़का ही तो ठहरा
एँ हें हें हें कृपा कीजिएगा
अबकी बचा लीजिएगा...एँ हें हें हें
पचास ठो रुपइया लौंडे के नाम पर!
ओफ़्फ़ो SSS ह!
—फुफ् फुफ् फुफकार उठे
प्रगतिशील पुस्तकों के पब्लिशर मिस्टर ओसवाल
नामी दुकान ‘किताब कुंज’ के कुंजीलाल
यहाँ तो ससुर मुश्किल है ऐसी कि...
और आप खाए जा रहे हैं माथा महाशय मंजुघोष!
इतना कहकर खटाक से सेठ ने
कैप्स्टन् का साबित पैकेट पटक दिया
झटके-से खुल गई स्वर्णिम चेन दामी रिस्टवाच की
प्रतिफलित हो उठी
सामने पड़े अति रुचिर पेपरवेट की पीठ पर
बढ़ गई मेरे दिल की धड़कन
अति चेतन मन से मैंने सोचा...
रूठ गए अन्नदाता! हाय रे विधाता!!
फिर मैं तपाक से उठा, ठुड्डी छू ली अपने सेठ की
बटोर कर साहस क्षण भर बाद बुदबुदाया :
अच्छा, जैसी हो आपकी मर्ज़ी!
पचास न सही पच्चीस या बीस
...इतना तो ज़रूर!
जिएगा तो गुन गायगा लौंडा हिं हिं हिं हिं, हुँ हुँ हुँ हुँ
रोग के रेत में लसका पड़ा है जीवन का जहाज़—
भन्नाकर बीच में ही बोले मिस्टर ओसवाल :
वाह भाई वाह! ख़ासी अच्छी कविता सुना गए आप तो!
थैंक्यू! थैंक्यू महाशय मंजुघोष!
लेकिन जनाब यह मत भूलिए कि डालमिया नहीं हूँ मैं,
अदना-सा बिज़नेसमैन हूँ
ख़ुशनसीब होता तो और कुछ करता
छाप-छाप कूड़ा भूखों न मरता
जितना कह गया, उतना ही दूँगा
चार सौ से ज़्यादा धेला भी नहीं
हो गर मंजूर तो देता हूँ चैक
वरना मैनस्कृप्ट वापस लीजिए
जाइए, ग़रीब पर रहम भी कीजिए
अपने उस सेठ का यह तेवर देखकर सचमुच मैं गया डर—
बिदक न जाएँ कहीं मिस्टर ओसवाल?
पांडुलिपि लेकर मैं क्या करूँगा?
दवाई का दाम कैसे मैं भरूँगा?
चार पैसे कम... चार पैसे ज़्यादा...
सौदा पटा लो बेटा मंजुघोष!
ले लो चैक, बैंक की राह लो
उतराए ख़ूब अब दुनिया की थाह लो
एग्रीमेंट पर किया साइन, कॉपीराइट बेच दी
(नाम था नॉवेल का ‘ठंडा-तूफ़ान’
छप के होंगे यही कोई डेढ़-एक सौ पेज
डबल क्राउन साइज के)
दस रोज़ सोचा, बीस रोज़ लिखा
महीने की मेहनत तीन सौ लाई!
क्या बुरा सौदा है?
जीते रहें हमारे श्रीमान् करुणानिधि ओसवाल
साहित्यकारों के दीनदयाल
प्रूफ़रीडरों के प्रणतपाल
नामी दूकान ‘किताब कुंज’ के कुंजीलाल
इनसे भागा कर जाऊँगा कहाँ मैं
गुन ही गाऊँगा, रहूँगा जहाँ मैं
वक़्त पर आते हैं काम
कवर पर छपने देते हैं नाम
मातम में—ख़ुशी में करते हैं याद
फुलाते रहते हैं देकर दाद
नई-नई ली है अभी ''हिंदुस्तान फ़ोर्टीन”
सो उसमें यदा-कदा साथ बिठाते हैं
पान खिलाते हैं, गोल्ड फ़्लैक पिलाते हैं
मंजुघोष प्यारे और क्या चाहिए बेटा तुमको???

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